Monday, December 12, 2022
Rachna Dairy : मेरी कविता - खबरों का नशा
Thursday, March 24, 2022
'बाबा' श्री संपतराव 'धरणीधर' : कविता में जीवन वृत्त
दस मार्च उन्नीस सौ चौबीस मोहखेड़ में जन्में थे संपतराव धरणीधर।
इन्हें प्रोत्साहित करने वाले थे, पिता इनके श्री बापूराव उर्फ तुकड़ों जी धरणीधर।
मात्र एक वर्ष की आयु में छोड़ गयी थी, माता इनकी अनुसुईया जी धरणीधर।
पढ़ाई के लिए भटके थे आप, कभी मोहखेड़, कभी छिन्दवाड़ा तो कभी नागपुर।
बी.ए. की उपाधि हासिल की थी आपने, उन्नीस सौ पैंसठ में विश्वविद्यालय सागर से।
उब्बीस सौ छियालिस, सेण्ट्रल जेल नागपुर में, 'मुझे फाँसी पे लटका दो...' गाते थे जोर-शोर से।
उल्नीस सौ छियालिस में ही मोहगांव स्कूल में, एक वर्ष अंग्रेजी शिक्षक रहे श्री धरणीधर ।
उन्नीस सौ अइतालिस से तक चौरई हाईस्कूल में, अध्यापन कार्य में लगे रहे श्री धरणीधर ।
उन्नीस सौ पचहत्तर में जुट गये थे पूर्णतः साहित्य साधना में।
स्थानीय कलेक्ट्रेट से क्लर्क के कार्य से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर।
बालक संपत की पहली रचना हुई थी प्रकाशित, 'बालक' श्री संतराम बी. ए. के अखबार में।
तभी से डटे हुए हैं धरणीधर, साहित्य साधना के दरबार में।
इनका नहीं कोई घर-द्वार, फिर भी नहीं करते ये किसी से कोई तकरार |
उन्नीस सौ नब्बे दिल्ली में सम्मानित हुए थे धरणीधर, डॉ. बाबा साहब आम्बेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार से।
उन्नीस सौ चौरासी में चुने गये थे धरणीधर, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की ओर से प्रदेश के साहित्यकार में।
बीते आठ वर्षों से जिला चिकित्सालय छिन्दवाड़ा में डाले अपना डेरा पड़े हैं मझधार में।
आज भी होती है इनकी गिनती, सतपुड़ा के महान साहित्यकार में।
इनकी प्रकाशित कृतियाँ हैं, 'किस्त-किस्त जिंदगी' और 'महुआ केसर'।
आज भी करते हैं, रचना धरणीधर, ताजा-तरीन है इनकी रचना 'अपनी मौत पर'।
धर्म, साहित्य, कला, राजनीति, या हो कोई अन्य विषय रखते हैं ये अपने विचार, तब गर्व महसूस होता है हमें इनकी सोच पर।
याद रखें इनको हर शख्स कहता है ये 'तृष्णा' क्योंकि इनके जैसा नहीं कोई दूसरा साहित्य जगत का मुरलीधर।
ये है 'बाबा' हमारे श्री संपतराव धरणीधर
©® रामकृष्ण डोंगरे "तृष्णा", कला तृतीय वर्ष, डीडीसी कॉलेज, साल 2002
Friday, March 11, 2022
Transgender : समाज की नफरत का परिणाम है ट्रांसजेंडर की हरकत... जानिए आखिर पूरा सच क्या है...
Thursday, December 30, 2021
मेरी कविता : हिंदू राष्ट्र
Monday, December 6, 2021
अच्छे आदमी
Tuesday, August 31, 2021
मेरी कविता : बच्चों को अपना दोस्त बनाएं
Thursday, April 22, 2021
|| छोड़ो इन बातों को ||
Tuesday, August 18, 2020
मेरी कविता : मैं वेबिनार में हूं
||मैं वेबिनार में हूं||
©® कवि - रामकृष्ण डोंगरे
मुझे ना छेड़ो यारों
मैं वेबिनार में हूं।।
ना मुझे तुम कॉल करो,
ना तुम वाट्सएप करो,
ना ही मुझे मैसेज करो।
समझा करो यारों,
मैं वेबिनार में हूं।।
तुमने सेमिनार का नाम तो सुना ही होगा,
वही जिसमें विद्वान वक्ता 1 घंटे के लेक्चर देते हैं
सेमिनार का समय होता है 11 बजे,
और श्रोता आते हैं 12 बजे तक,
मतलब सेमिनार 12 बजे ही शुरू होता है,
मगर कहने को सेमिनार 11 बजे होता है।
आज भी मैं तैयार हूं.
मैं वेबिनार में हूं।।
अब जमाना ऑनलाइन का है,
वीडियो कॉल, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का है,
इसलिए तो सेमिनार नहीं वेबिनार होते हैं,
तो मैं तैयार हूं, हां मैं वेबिनार में हूं।।
देश-दुनिया में बैठकर
आप बोलते हैं,
आपको कोई भी, कहीं से भी
देखता है और सुनता है।
यह नए जमाने का व्यवहार है,
हां यही तो वेबिनार है।।
एक स्क्रीन पर हजारों चेहरे,
सितारों के जैसे जगमगाते हैं।
म्यूट, अनम्यूट का बटन दबाते ही,
ये सितारे तुरंत बोल पड़ते हैं,
हां यही वेबिनार है यारों।
सेमिनार में बैठकर
आप ऊंघते थे, सो भी जाते थे,
कई बार तो उठकर भाग जाते थे।
मगर यह वेबिनार है यारों,
आप गायब हुए तो पकड़े जाओगे,
इसीलिए अटेंशन रहकर बैठे रहो,
क्योंकि यह वेबिनार है यारों।।
©® रामकृष्ण डोंगरे
रचना समय : 18 अगस्त, 2020, भावना नगर, रायपुर
Sunday, February 18, 2018
कुछ आदमी अच्छे होते हैं...
कुछ आदमी अच्छे होते हैं,
कुछ आदमी बुरे होते हैं।
कुछ बिहारी अच्छे होते हैं,
कुछ बिहारी बहुत बुरे होते हैं।
कुछ उड़िया अच्छे होते हैं,
तो कुछ उड़िया बुरे भी होते हैं।
कुछ मध्यप्रदेशी अच्छे होते हैं,
तो कुछ मध्यप्रदेश अच्छे नहीं भी होते हैं।
कुछ यूपी के भैया अच्छे होते हैं,
तो कुछ यूपी वाले बुरे भी होते हैं।
मतलब
बुराई का संबंध किसी जाति-धर्म,
प्रदेश या देश से नहीं है।
ये किसी भी इंसान में हो सकती है।
मगर अपनी बुराई,
अपनी कमियों को छुपाना
या नियंत्रण करना हमें आना चाहिए
और अपनी अच्छाइयों को
दूसरों के सामने और अच्छे से
पेश करना हमें आना चाहिए।
©®रामकृष्ण डोंगरे तृष्णा
रचना समय - 19 फरवरी, 2018
Monday, February 12, 2018
रोज एक शायरी
दुनिया में जब आप जैसे अच्छे लोग है,
फिर क्यों मैं बुरे लोगों के बारे में सोचूं।
©®रामकृष्ण डोंगरे तृष्णा
Friday, December 8, 2017
रोज एक शायरी
हर दौर में जमाने ने देखे हैं कमीने दो-चार आदमी
मैं फिर क्यों अफसोस करूं, जो एक कमीना देख लिया।
#अधूरी_शायरी #रोज_एक_शायरी #रचना_डायरी
©® रामकृष्ण डोंगरे #तृष्णातंसरी
Tuesday, December 5, 2017
रोज एक शायरी
खेलने को तुमको एक खिलौना चाहिए था,
कमबख्त तुमको बस दिल मेरा चाहिए था।
#अधूरी_शायरी #रचना_डायरी
रचना समय : 14 नवंबर 2017, रायपुर, छत्तीसगढ़
©® रामकृष्ण डोंगरे 'तृष्णा' तंसरी
Thursday, November 16, 2017
अधूरी शायरी : ये जग सोता है
#रोज_एक_शायरी
होता है अक्सर,
ऐसा भी होता है।
हम जागते है और
ये जग सोता है।
#रचना_डायरी #अधूरी_शायरी
रचना काल और स्थान : 11 नवंबर 2003, नागपुर
©® रामकृष्ण डोंगरे #तृष्णा तंसरी
Wednesday, November 15, 2017
अधूरी शायरी
हंसते भी रहे हम,
रोते भी रहे हम।
बारूद को सीने में दबा के,
सोते भी रहे हम।
#रोज_एक_शायरी #अधूरी_शायरी #रचना_डायरी
रचना काल : 7 अगस्त 2004
©® रामकृष्ण डोंगरे 'तृष्णा' तंसरी
Friday, August 18, 2017
वो लम्हा जरूर याद आता है
कोई आता है,
कोई जाता है।
वक्त-बे-वक्त
वो लम्हा जरूर याद आता है....
कोई रुलाता है,
कोई हंसाता है।
वो लम्हा जरूर याद आता है....
कोई याद रहता है,
कोई भूल जाता है।
वो लम्हा जरूर याद आता है...
|| अभी-अभी ||
रामकृष्ण डोंगरे #तृष्णा
18 अगस्त 2015
#रचना_डायरी
Tuesday, August 8, 2017
इंसान की जब सोशल लाइफ खत्म हो जाती है
तो क्या बचता है
सिर्फ सोशल साइट...
मगर क्या वहां आपको
मिल पाता है चैन और सुकून...
Facebook के हजारों हजार फ्रेंड
उनकी हजारों-हजार पोस्ट
मुस्कुराते चेहरे
सेल्फी - वीडियो
मूवी और मॉल जाने की तस्वीरें
WhatsApp के दर्जनों पोस्ट
दर्जनों फनी वीडियो
दर्जनों ज्ञान की बातें
क्या आप को उनके करीब महसूस कर पाती है...
हजारों दोस्तों की इस दुनिया में भी
हम अपने आप को अकेला ही पाते हैं...
हम सब को जरूरत है
हमारे रीयल अपने
हमारे माता पिता
हमारे भाई बहन
हमारे पत्नी और बच्चे
उन सब के पास जाने की...
©® रामकृष्ण डोंगरे तृष्णा
रचनासमय : रायपुर, 8 अगस्त 2017
Tuesday, March 21, 2017
वो लम्हा जरूर याद आता है
( कुछ दिन रायपुर-रायगढ़ में रहने के बाद आज दीदी छिंदवाड़ा लौट रही है। एक कविता उनकी यादों को समेटे )
----'--'---'''----'---'---
कोई आता है,
कोई जाता है।
वक्त-बे-वक्त
वो लम्हा जरूर याद आता है....
कोई रुलाता है,
कोई हंसाता है।
वो लम्हा जरूर याद आता है....
कोई याद रहता है,
कोई भूल जाता है।
वो लम्हा जरूर याद आता है...
|| अभी-अभी ||
#रामकृष्ण डोंगरे तृष्णा #रचना_डायरी
Saturday, May 31, 2014
काश ये रात न आए
Tuesday, August 6, 2013
मेरा व्यंग्य लेख : अब देश में उठी अलग देश की मांग!
देश के 29 वें राज्य तेलंगाना के गठन पर मुहर क्या लगी, पं. बंगाल में अलग गोरखालैंड और असम में बोडोलैंड राज्य की मांग को लेकर हिंसक प्रदर्शन शुरू हो गए। तेलंगाना के बाद पं. बंगाल में गोरखालैंड, असम में बोडोलैंड, यूपी को बांटकर बुंदेलखंड, पूर्वांचल, हरित प्रदेश, अवध प्रदेश, महाराष्ट्र से विदर्भ, गुजरात से सौराष्ट्र, कर्नाटक से कुर्ग, बिहार से मिथिलांचल, राजस्थान में मारूप्रदेश, उड़ीसा में कोसल, मध्यप्रदेश में बाघेलखंड और जम्मू जैसे दो दर्जन राज्य बन गए तो क्या होगा? कहीं दक्षिण भारत में भी कई और नए राज्य सिर उठाने लगे तब? इन सब बातों को लेकर दिमाग में दिनभर मंथन चलता रहा।
अपना काम खत्म करके देर रात को मैं आफिस से घर पहुंचा और गहरी नींद में सो गया। फिर पता नहीं कब सपनों की दुनिया में खो गया। देखता क्या हूं कि मैं एक चैनल का बॉस हूं। अचानक आफिस से मेरे एक जूनियर का फोन आता है- 'सर, देश के अलग-2 हिस्सों में सुबह से ही हिंसक प्रदर्शन शुरू हो गए है। लोगों की मांग है कि अब उन्हें अपना अलग देश भी चहिए।' मैंने सोचा- कल तक तो अलग राज्य की ही मांग उठ रही थी। क्या इतनी जल्दी दर्जनभर राज्य बन गए? क्या अब कुछ नेताओं की इच्छा सीधे प्रधानमंत्री बनने की हो गई? जो हिंसक प्रदर्शन पर उतारू हो गए। मैंने तुरंत अपने कलीग को लाइव कवरेज का आदेश दे डाला और मैं विचारों की दुनिया में खोते लगाने लगा...।
भगवा बिग्रेड कब से अपने लिए हिंदुस्तान मांग रहा है। दलित की बेटी प्रधानमंत्री बनने के सपने देख रही है। बिहार वाले अपने लिए अलग देश, मराठी भाषी महाराष्ट्र को देश बनाना चाहते हैं। कहीं ऐसा न हो कि हम मध्यकालीन भारत में पहुंच जाए... और मगध, काशी, कुरुक्षेत्र, कौशल, अवन्ति, चेदि, वत्स, पांचाल जैसे सभी महाजनपद यानी आज के नए देश अवतरित हो जाए। नेतागण अपने फायदे-नुकसान के लिए चाहे, जो करवा लें। वे अलग राज्य में जैसे अपने लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी फिक्स समझते हैं। ठीक वैसे ही अलग देश में उनकी मंशा होगी- 'अपने देश के पीएम बनो और केंद्र-राज्य के झगड़े से मुक्ति पाओ।'
फिर आगे क्या होगा। अफ्रीकन कंट्री, रशियन कंट्री की तर्ज पर भारत के सभी देश भी इंडियन कंट्री के देश कहलाएंगे। फिर हम साउथ कोरिया और नार्थ कोरिया की तरह आपस में ही लड़ेगें। हां, कुछ देशों का पाकिस्तान जैसे दुश्मन देश से पीछा जरूर छूट जाएगा। लेकिन क्या हम फिर आपस में ही नहीं लड़ने लगेंगे। 'ये मेरा देश, ये तेरा देश'- के नारे के साथ...। अचानक कानों में बीवी की आवाज सुनाई दी- 'उठो! ये लो चाय, और अखबार..। आंख खुली तो देखा मैं तो वहीं हूं, एक अखबार का अदना-सा पत्रकार। चैनल का बॉस... अलग देश की मांग... ये सब तो सपने की बातें थी। शुक्र है कि सब सपना था। सोचिए अगर यह हकीकत होती, तो क्या होगा? खुदा से दुआ करो कि हमारे वतन के और टुकड़े न हो। देश में और कई राज्य न बनें।
Tuesday, June 4, 2013
मेरी एक कहानी : एक घूंट पानी
कहानी एक गांव से जुड़ी है। गांव में जाति-धर्म के बंधन बहुत जटिल होते हैं। अलग-अलग जाति के मोहल्ले-टोले होते हैं। ऐसा ही एक गांव था। जहां विभिन्न जातियों के मोहल्ले बंटे हुए थे। इसी गांव में एक सज्जन रहते थे। नाम था सुखीराम। सुखीराम की लाखों की दौलत थी। सुखी घर-परिवार था। थे तो धार्मिक प्रवृत्ति के। पूजापाठ नित्यप्रति होती थी। उन्हें जैसे ही मालूम हुआ कि एक महाराज दूर से अपने गांव में पधारे हुए हैं। उन्होंने तुरंत उन्हें अपने घर बुला लिया। महाराज ने पूजापाठ की। सुखीराम बहुत खुश थे। क्योंकि इतने प्रसिद्ध महाराज उनके घर आए थे। उन्होंने महाराज के द्वारा जूठा किया गया गिलास, जो कि आधा भरा हुआ था, उठाकर उसमें से एक घूंट पानी पी लिया। इस अवसर पर शायद गांव का ही कोई व्यक्ति उनके घर में था जो यह सारा दृश्य देख रहा था। कहना चाहिए कि महाराज के जूठे गिलास से एक घूंट पानी सुखीराम के द्वारा पीने का वह एक मात्र प्रत्यक्षदर्शी था। जो यह जानता था कि महाराज नीची जाति के है। बस, फिर क्या था। वह जहां भी जाता सबको खूब नमक-मिर्च लगा-लगाकर बताता कि सुखीराम ने नीची जाति के व्यक्ति का जूठा पानी पीया है।
सुखीराम जाति-धर्म को मानने वाला व्यक्ति था। उससे ऐसी महाभयंकर भूल कैसे हुई? इसके पीछे भी एक वजह थी। दरअसल महाराज थे तो नीची जाति के मगर उनके रहन-सहन और बुद्धि के प्रभाव के चलते उन्हें कोई भी नीची जाति का समझने की सोच भी नहीं सकता था।
सुखीराम के दिल में यह बात घर कर गई कि उसने नीची जाति के व्यक्ति का जूठा पानी पी लिया है। वह अब घर से बहुत कम निकलने लगा। घर से खुशहाल होते हुए भी, सुना जाता है कि उन्होंने कभी अपने घर के बच्चों के लिए चॉकलेट नहीं खरीदी थी। और अब वही व्यक्ति जब भी बाहर निकलता बच्चों के लिए खूब चॉकलेट खरीदता। केवल इसलिए कि बच्चे यह कहकर न चिढ़ाए कि सुखीराम दादा ने नीची जाति के व्यक्ति का जूठा पानी पी लिया है। पर यह सब करने के बावजूद चिढ़ाने का सिलसिला नहीं थमा। क्योंकि थे तो वे बच्चे ही। खाने-पीने के बाद वे भी भूल जाते थे। और फिर वही दोहराना शुरू...। सुना तो यहां तक जाता है कि सुखीराम इतनी ज्यादा चाकलेट खरीदते थे कि दुकानदारों के पास की सारी चाकलेट खत्म हो जाती थी।
सुखीराम तो खाली नाम के सुखीराम बन के रह गए थे, बात तो यह थी कि वे इन दिनों दु:खी रहने लगे थे। उनके मन में यह बात बैठ गई थी कि उन्होंने नीची जाति के व्यक्ति का जूठा पानी पी लिया है। वे लगातार यही सोचा करते। उन्होंने पूरे गांव से अपने आप को काट लिया। क्योंकि वे लोगों के ताने सुन-सुनकर और दु:खी हो जाते थे, और डेढ़ माह नहीं बीते होंगे कि वे चल बसे। एक घूंट पानी उनके लिए मौत की निशानी बन गया।
- रामकृष्ण डोंगरे 'तृष्णा'