Wednesday, September 9, 2020

मेरी फेसबुक पोस्ट : आज मैंने बीड़ी खरीदी

आज मैंने बीड़ी खरीदी। आप पूछेंगे क्यों? तो आपको मैं विस्तार में बताता हूं। ये बीड़ी मैंने पितृपक्ष में श्राद्ध पूजा के लिए खरीदी थी। समझने वाले, समझ गए होंगे।

पितृपक्ष में हमारे स्वर्गवासी परिजनों के लिए हम श्राद्ध रखते हैं. वे जो चीज इस्तेमाल करते थे, उन चीजों को भी पूजा में रखते हैं. मेरे पिताजी बीड़ी पीते थे. साल 2006 में हार्ट अटैक की वजह से वे हमारे बीच नहीं रहे.

मैंने लगभग 20 से 25 साल के बाद बीड़ी खरीदी होगी. जब मैं गांव में था। छोटा था। तब पिताजी के लिए खरीदकर लाता था। यहां पर मैं यह कहना चाहता हूं कि कभी भी अपने बच्चों से बीड़ी, सिगरेट, शराब नहीं मंगवानी चाहिए। ना ही उनके सामने इनका सेवन करना चाहिए। क्योंकि उनमें भी यह ऐब, नशा लग जाता है।
हालांकि हम सभी भाइयों में ये बुरी आदत नहीं है। ये भी हमारी खुशकिस्मती है।

पता नहीं क्यों? मेरे मन में बार-बार ये सवाल आता है कि लोग नशा क्यों करते क्यों करते हैं? एक बार मेरे एक रिश्तेदार ने मुझे ड्रिंक लाने के लिए भेजा था. जब मुझे इसके बारे में भी ज्यादा कुछ नहीं पता था. उस वक्त मैं कॉलेज में था. साल था 1998. जब मैं एक बियर शॉप में गया तो उन्होंने मुझे खुली शराब एक बोतल में डाल कर दे दी। जब मैं उन रिश्तेदार के पास पहुंचा तो उन्होंने मुझे डांटा, कहा- ऐसे भी कोई शराब लाता है। और फिर यह क्रॉस चेक करने के लिए कि कहीं उस शराब में कोई मिलावट तो नहीं है। वे मुझे लेकर उस बियर शॉप तक लेकर गए, जहां से मैंने वो शराब खरीदी थी। फिर तसल्ली होने के बाद हम वापस आ गए।

बचपन में जब हम बीड़ी पीने का नाटक करते थे। (सचमुच की बीड़ी नहीं, एक सन-पटसन का पेड़ होता है, जिससे जूट रस्सी निकलती है। उसकी लकड़ी सरकंडी को जलाकर धुआं बाहर फेंकते हैं। तब मेरे मोहल्ले के एक चाचा ने मुझे बहुत डांटा। शायद वही एक डांट थी, जिसने मुझे उस राह पर पर जाने से रोका।

जब मैं साल 2004 में भोपाल पहुंचा। तब मेरे आस-पास सारे पत्रकार साथी थे। हमारे रूम में भी आते थे। खूब बीयर पार्टी चलती थी। और सब मुझे मुझे कहते थे- "कैसे  पत्रकार हो। शराब नहीं पीते हो। चलो शराब पियो और मैं हाथ भी नहीं लगाता था. किसी ने मेरे साथ जबरदस्ती नहीं की कि तुमको पीना ही पड़ेगा. अगर आपके दोस्त आपको इस नशेड़ी दुनिया में धकेलना ना चाहे तो आप बच सकते हो।

अभी टीवी पर आशिकी-2 मूवी देख रहा हूं। क्या बकवास मूवी है। (आप समझ गए होंगे मैं कहना क्या चाहता हूं) इसमें गानों के अलावा कुछ भी अच्छा नहीं है। क्या शराबी और शराब की दुनिया दिखाई है इस फिल्म में। नशा कोई भी हो। किसी के लिए भी अच्छा नहीं होता। क्यों हम नशा करते करते हैं? इस नशे से अपनों को बचाने के लिए हमें हर संभव काम करना चाहिए।

नशा कितने घरों को बर्बाद कर देता है। कितने लोगों की खुशहाल जिंदगी को उजाड़ देता है। ये हम सब जानते हैं। मगर फिर भी कुछ लोग नशे की आदत को छोड़ना नहीं चाहते। वे इस दलदल में कितने धंस जाते हैं कि बाहर ही नहीं निकल पाते। अगर आपको नशे की बुरी लत है तो अपने बच्चों को इससे बचाने के लिए हमेशा समझाएं. कि यह बुरी आदत है. इसे कभी ना अपनाए. उनसे कहे कि आप भी यह नशा करना छोड़ना चाहते हैं. छोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।

©® रामकृष्ण डोंगरे

(मेरी फेसबुक पोस्ट)


Tuesday, August 18, 2020

मेरी कविता : मैं वेबिनार में हूं

||मैं वेबिनार में हूं||

©® कवि - रामकृष्ण डोंगरे

मुझे ना छेड़ो यारों
मैं वेबिनार में हूं।।

ना मुझे तुम कॉल करो,
ना तुम वाट्सएप करो,
ना ही मुझे मैसेज करो।

समझा करो यारों,
मैं वेबिनार में हूं।।

तुमने सेमिनार का नाम तो सुना ही होगा,
वही जिसमें विद्वान वक्ता 1 घंटे के लेक्चर देते हैं
सेमिनार का समय होता है 11 बजे,
और श्रोता आते हैं 12 बजे तक,
मतलब सेमिनार 12 बजे ही शुरू होता है,
मगर कहने को सेमिनार 11 बजे होता है।

आज भी मैं तैयार हूं.
मैं वेबिनार में हूं।।

अब जमाना ऑनलाइन का है,
वीडियो कॉल, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का है,
इसलिए तो सेमिनार नहीं वेबिनार होते हैं,

तो मैं तैयार हूं, हां मैं वेबिनार में हूं।।

देश-दुनिया में बैठकर
आप बोलते हैं,
आपको कोई भी, कहीं से भी
देखता है और सुनता है।

यह नए जमाने का व्यवहार है,
हां यही तो वेबिनार है।।

एक स्क्रीन पर हजारों चेहरे,
सितारों के जैसे जगमगाते हैं।
म्यूट, अनम्यूट का बटन दबाते ही,
ये सितारे तुरंत बोल पड़ते हैं,
हां यही वेबिनार है यारों।

सेमिनार में बैठकर
आप ऊंघते थे, सो भी जाते थे,
कई बार तो उठकर भाग जाते थे।

मगर यह वेबिनार है यारों,
आप गायब हुए तो पकड़े जाओगे,
इसीलिए अटेंशन रहकर बैठे रहो,
क्योंकि यह वेबिनार है यारों।।

©® रामकृष्ण डोंगरे
रचना समय : 18 अगस्त, 2020, भावना नगर, रायपुर


Monday, July 27, 2020

मध्यप्रदेश अब मक्का प्रदेश...

मक्का प्रदेश : मध्यप्रदेश में अब हर तरफ मक्का ही मक्का

- सोयाबीन की चार कतारों के बाद 2 कतार में बोया जाता था पहले मक्का...

मध्यप्रदेश अब मक्का प्रदेश...
डूब गया सोयाबीन का सूरज....

मध्यप्रदेश ने खोई सोया प्रदेश की पहचान...

[ मेरी उम्र के मित्रगण अपने बचपन या किशोरावस्था को याद कीजिए। अगर आप कृषक परिवार से हो तो मेरी राय से पूरी तरह से सहमत होंगे। 1980 से पहले तक एमपी के कई जिलों जैसे छिंदवाड़ा- बैतुल में खरीफ की फसलों में ज्वार, बाजरा, मक्का, जगनी, कुटकी, अलसी जैसी फसलें ज्यादातर बोई जाती थी। अचानक से नकदी फसलों में शुमार तिलहन की एक किस्म सोयाबीन का आगमन होता है। फिर देखते ही देखते एमपी को सोया प्रदेश का खिताब मिल जाता है।]

लेकिन इन दिनों सोयाबीन संकट में है, फसल सिमटती गई और चार कतार के बाद दो कतार में बोया जाने वाला मक्का हर तरह छा गया है।

अब विस्तार से पहले सोयाबीन की बात।

माताजी ने बताया कि हमारे यहां 1981 में पहली बार एक कुडो (10 किग्रा) सोयाबीन का बीज लाया था। उसके बाद इसकी बोआई लगातार बढ़ती गई। मुझे ठीक से याद नहीं मगर शायद साल 2010 के आसपास से सोयाबीन का उतार चालू हो गया। यानी उत्पादन कम। खेती कम। कीट का हमला। दाने छोटे बनना। मजदूरी भी महंगी।

जब सोयाबीन का सूरज उग रहा था तभी केंद्र सरकार ने 1986 में तिलहन प्रौद्योगिकी मिशन की स्थापना की थी। उस दौर की बात करें धीरे-धीरे सोयाबीन ने खरीफ की बाकी फसलों को खत्म-सा कर दिया। जैसे- ज्वार, मक्का, धान, जगनी, अलसी।

हमारे यहां लगभग सभी जगह सोयाबीन बोया जाने लगा था। जगनी, अलसी, ज्वार-तुअर वाले सब खेत में। एक दिलचस्प बात ये है कि उन दिनों में मक्का सिर्फ फिलर (न्यूज की भाषा में) फसल थी। यानी सोयाबीन की 4 कतार के बाद 2 कतार-लाइन मक्के की रहती थी। इसके अलावा बहुत थोड़ी सी जगह, आधे एकड़ में मक्का बोया जाता है। आज देखिए हर तरफ मक्का ही मक्का। सोयाबीन के सूरज डूबने की एक वजह है लगातार घटता उत्पादन। कीटों, इल्लियों का हमला। छिंदवाड़ा जिले में पिछले साल (2015) सोयाबीन का रकबा करीब 90 हजार हेक्टेयर तक बोया गया था।
मगर उत्पादन क्या हुआ। 5 एकड़ के खेत में महज तीन बोरा ही सोयाबीन।

किसान परिवार के लोग इसके मायने समझ सकते हैं।

सोयाबीन का उत्पादन जब ज्यादा हो रहा था तब छिंदवाड़ा में सोयाबीन प्लांट भी लगाया गया था। प्रदेश के कई जिलों में भी प्लांट स्थापित किए गए थे।

सोयाबीन पर, सोयाबीन को लाने वालों पर कई आरोप भी लगते रहे हैं। जैसे- सोयाबीन की फसल लगातार लेने से जमीन उपजाऊ नहीं रह पाती। .... 

सोयाबीन की कहानी काफी लंबी है। जिसे शायद दूरबीन वाली दूरदर्शी नजरों से ही जाना और समझा जा सकता है।

पर ये बात तय है अगर मक्का यूं ही बोया जाता रहा तो भविष्य में एक ही फसल का सिक्का चलेगा... मक्का और सिर्फ मक्का। काश कि छिंदवाड़ा में, मेरे गांव तंसरा में सरसों की भी खूब खेती होती तो आपको मक्के की रोटी और सरसों का साग जरूर खिलाता।

**एक किसान का बेटा**
रामकृष्ण डोंगरे
सीनियर जर्नलिस्ट
(27 जुलाई, 2016)
☆☆ जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान☆☆


Tuesday, July 7, 2020

मेरी फेसबुक पोस्ट : अनबोलापन

अनबोलापन...

ये शब्द सुना तो ही होगा। आजकल ये बीमारी बढ़ती जा रही है।

इसमें गलती किसी एक व्यक्ति की नहीं है। हम सबकी है।  इसे खत्म करना है तो संकोच खत्म करके खुद आगे बढ़कर पहल करना होगा।

वाट्सएप पर दोस्तों को वायरल सामग्री फारवर्ड करके, गुड मार्निंग या गुड नाइट के फोटो भेजकर आप रिश्ते को जिंदा नहीं रख सकते।

सिर्फ अपना नाम ही रिकॉल करवा सकते हो। लेकिन आपके रिश्ते में मिठास तब आएगी जब आप मीठे मीठे बोल बोलोगे। बातचीत करोगे। और इस तरह आप अनबोलापन खत्म हो जाएगा।

संकोच बहुत बुरी चीज होती है।
ये दूरियां बढ़ा देती है। शुरुआत करने से
आप छोटे नहीं बन जाएंगे।....

तो तोड़ दीजिए इस दीवार को....

©® *बाबा डोंगरे*

#डोंगरे_की_बात #डोंगरे_की_डायरी #बाबा_डोंगरे_के_बोल #अनबोलापन


Thursday, February 27, 2020

मेरी फेसबुक पोस्ट : मेरे पिता को युद्ध ने मारा है

गुरमेहर कौर ने कहा - मेरे पिता को पाकिस्तान ने नहीं, युद्ध ने मारा है.

क्या गलत कहा उस लड़की ने। कारगिल के शहीद कैप्टन मनदीप सिंह की बेटी के ऐसा कहते ही कुछ लोग उन्हें देशद्रोही कहने लगे।

तरह तरह से मजाक बनाने लगे। मैंने नहीं, मेरे बल्ले ने बनाई सेंचुरी। मैंने नहीं, एके-47 ने मारा लोगों को।

देश कोई भी हो। भारत। पाकिस्तान। अफगानिस्तान। अमेरिका। रूस। चायना। अगर युद्ध होता है तो हमारे जवान, हमारे नागरिक जरूर मारे जाते हैं।

और इन युद्धों को रोकना किसका काम है। देश का। यानी भारत। पाकिस्तान।...।

जवानों की शहादत जारी है। देश के रहनुमाओं की राजनीति जारी है। कश्मीर मसले को कोई भी हल नहीं करना चाहता। जान जाती रही। उनके लिए अच्छी बात है। कह देंगे पाकिस्तान ने मारा। कह देंगे हिंदुस्तान ने मारा।

सच तो यही है युद्ध ही लोगों को मारता है।

#रामजस_कॉलेज #गुरमेहर #कश्मीर_मामला

28 फरवरी, 2017 की फेसबुक पोस्ट


Sunday, January 19, 2020

मेरी फेसबुक पोस्ट : आप पत्रकार हो ही नहीं सकते...

साल 2005-07 के बीच का एक किस्सा आपको सुनाता हूं. उस समय मैं भोपाल के पत्रकारिता विश्वविद्यालय में एमजे की पढ़ाई कर रहा था. एक एजुकेशनल टूर या असाइनमेंट पर अपने क्लासमेट के साथ होशंगाबाद गया था। वहां नर्मदा मैया के दर्शन और घूमना-फिरना हुआ। ये सब अलग बात है। लेकिन मूल विषय पर आता हूं।

लौटते वक्त हम बस से आ रहे थे। जिस क्लासमेट के साथ मैं गया था वह अब इस दुनिया में नहीं है। हम दोनों जिस बस में सवार थे। उसी बस में कुछ लोगों ने हमसे बातचीत की। जब हमने उन्हें कहा कि हम पत्रकार है तो एक सज्जन बुरी तरह से अड़ गए। उन्होंने कहा कि नहीं, आप पत्रकार हो ही नहीं सकते।

हमने कहा - नहीं हम पत्रकार हैं. क्योंकि मैं खुद और मेरा साथी विश्वविद्यालय के छात्र होने के साथ ही पहले से ही कुछ अखबारों में काम कर रहे थे.

इसलिए हम जोर देकर कह रहे थे कि हम पत्रकार हैं...

अब वह बात समझ में आती है कि वे सज्जन क्यों ऐसा कह रहे थे कि आप पत्रकार नहीं हो।

प्रोफेशनली देखा जाए तो किसी का डॉक्टर, किसी का इंजीनियर, किसी का एक्टर का काम करना.. अलग बात होती है. और परिपक्व होना, अलग बात होती है.

हम जब प्रोफेसर कहते हैं तो अतिथि विद्वान की तरह, गेस्ट फैकल्टी की तरह क्लास में जाकर एक-दो लेक्चर दे देना ही प्रोफेसर कहलाने के लिए पर्याप्त नहीं होता.

प्रोफेसर मतलब अपने विषय का मास्टर।

इस संदर्भ में देखे तो अब कोई पत्रकार नजर नहीं आता। (एक दो अपवाद को छोड़कर). हम सब तो मीडिया हाउस के कर्मचारी है। जोकि ऊपर से मिले निर्देशों के अनुसार काम करते हैं।

पत्रकार तो किसी जमाने में होते थे, जो खुद की सुनते थे. और जैसा वे चाहते थे. वैसा लिखते थे. इंटरव्यू में वैसे ही सवाल करते थे. जैसा वे पूछना चाहते थे। आजकल के इंटरव्यू पूरी तरह से प्रायोजित और मैच फिक्सिंग जैसे होते हैं। या सिर्फ खुश करने वाले।

चाहे तो टेबल पर बैठकर ही लिख लो। तारीफ में लिख रहे हो तो छपने के बाद किसको खराब लगेगा। बुरा लगेगा। किसको आपत्ति होगी।

#फेसबुक_पोस्ट
20 जनवरी 2020


मेरी फेसबुक पोस्ट : बातचीत का आधार था आधार

आज एक बैंक मैनेजर से मुलाकात हुई। परिचय से होते हुए बातचीत शहर के इश्यू से लेकर राष्ट्रीय मुद्दों तक जा पहुंची।

बातचीत का आधार था आधार। यानी आधार कार्ड की व्यवस्था और उसकी अनिवार्यता। इसके अलावा जनधन अकाउंट। उनका साफ मानना था कि तमाम चीजों को आधार से लिंक करा देना कोई बड़ी सफलता नहीं। क्योंकि साइबर सिक्योरिटी के बिना सब बेकार है। इससे आम जनता का नुकसान भी हो सकता है।

आधार का मॉडल जहां से एडॉप्ट किया है वहां साइबर सिक्योरिटी पर भी भारी बजट रहता है। इससे हैकिंग का खतरा कम हो जाता है। ऐसी कई बातें हैं। जो लोगों के मन में डर पैदा करती हैं।

इसके अलावा क्या सिर्फ सब्सिडी से लोगों का भला हो सकता है। तमाम सब्सिडी को खत्म कर देना चाहिए। सभी को मिलने वाली। लोगों की आय बढ़ाने पर जोर होना चाहिए।

खर्च जिस हिसाब से बढ़ रहा है उसमें सबके पास बैंक अकाउंट होने का भी कोई फायदा नहीं। महंगाई को कंट्रोल नहीं किया गया तो आम लोगों के पास बचत कहां से होगी कि वे बैंक में जमा कर सकें।

लोगों के पास अच्छे रोजगार के अवसर अधिक से अधिक होने चाहिए। आय ज्यादा होनी चाहिए। तब तो बचत की जा सकती है।

#आधार #जनधन_खाता #बैंक

20 जनवरी 2018