Saturday, June 9, 2018

डब्बू अंकल एंड बॉलीवुड

बीते जमाने के एक हीरो के आमंत्रण पर डब्बू अंकल ऐरोप्लेन से मुम्बई पधारे। इस हीरो को भी आखिरकार MP के पॉलिटिशियन्स की तरह VDV(viral dance video) स्टार डब्बू अंकल का सहारा लेना पड़ा ताकि खड्डे में पड़ा उसका फ़िल्मी कैरियर डब्बू नामकी रस्सी के सहारे बाहर आ सके। डब्बू अंकल के आते ही जुहू के उन बंगलों के बाहर भी ट्रैफिक जाम होने लगा जिनमें बहुत पुराने जमाने के हीरो रहते हैं और उनके लॉन मे चिड़िया भी बीट करने नही आती। ये सब इस चहलकदमी से खुश हैं। इन्हें लग रहा है कि इनकी किस्मत बदलने के लिए किसी नए डांसर बाबा का अवतरण हुआ है। भाड़े पर दी गयी प्रॉपर्टी से घरखर्च चलाने वाले और झुर्रियों भरा चेहरा लेकर अभी भी हीरो बनने का ख्वाब देखने वाले इन बहुत पुराने जमाने के हीरोज़ को कौन समझाये की जमाना अब हीरो का नही VDV स्टार का है।

FB न्यूजफीड पे डब्बू अंकल के बम्बई लैंडिंग की खबर सुनते ही लाखों की तादाद में मौजूद स्ट्रगलर्स को अपनी रोज़ी रोटी की चिंता सताने लगी है। इन्हें लगता है कि जनसंख्या में हुई इस अस्वाभाविक वृद्धि से उनके रोज़ के दारू मुर्गे में बेतहाशा कमी पैदा हो जाएगी। कुछ को तो चिंता के मारे मिर्गी के दौरे पड़ गए है, कुछ को जूता सुंघा कर होश में लाना पड़ा है। कोलीवाड़ा में दो-दो हाथ के कमरों में सदियों से रह रहे कुछ एक्टर तंग, बदबूदार, मच्छी-मुर्गे के मांस और गंदगी से बजबजाती गलियों से निकल कर वर्सोवा बीच पहुच गए हैं। इनका मानना है कि डब्बू अंकल की बॉलीवुड एंट्री ने उनके सपनों पर ग्रहण लगा दिया है। इसलिए अब उनके पास गंदगी से भरपूर इस कॉस्मोपॉलिटन दरिया मे अपने सपने को सुसाइड कराने के अलावा कोई और रास्ता नहीं है। इनमे से कुछ मरियल सिर्फ वड़ापाव के बल पर सालों से जिंदा है। पर्याप्त न्यूट्रिशन के बिना ज़िंदा रह कर इन लोगों ने मेडिकल साइंस को अचम्भे में डाल रक्खा है। इनसे गिरती सेहत के बारे में पूछने पर जवाब मिलता है कि जनाब एक फ़िल्म के लिए रोल प्रिपेयर कर रहे हैं। अरे ऐसा कौन सा रोल जिसकी प्रिपरेशन दस साल चलती है और ये बक*** अपना जीना मरना भूल सिर्फ उसी में लगा है।

कई बार तो इन्हें देख ऐसा लगता है कि ये अभी-अभी हेल हिटलर के यातना कैम्प से निकल कर बाहर आये है। कोलीवाड़ा के लोगों को इनके लिए सरकार से एक आंगनवाड़ी केंद्र खोलने की मांग करनी चाहिए, ताकि इन्हें दोनों वक़्त वडापाव की बजाय पर्याप्त मात्रा में पोषित आहार मिले और ये दुनिया के सबसे स्वस्थ और स्वच्छ देश के ऊपर कुपोषित होने का धब्बा न लगा पाएं। इन्हें देख मुझे कई बार खुद के ऊपर भ्रम होने लगता है लेकिन ये लोग न जाने किस फौलाद के बने है कि दशको की मुफलिसी भी मार ना पाई। इतनी गरीबी तो कालाहांडी में कई पीढ़ियाँ खा जाती है। इतना स्ट्रगल UPSC की परीक्षा में कर लोग IAS बन जाते है। और वो भी नही तो कम से कम अपने शहरों के छोटे-मोटे स्टीव जॉब्स तो हो ही जाते हैं।

खैर इतने सालों से इस शहर और इन एक्टरों के बीच रहने के बाद एक बात तो मुझे अच्छे से समझ मे आ गयी है कि इनकी इस दुर्दशा के पीछे कुछ खास लोगों का हाथ है। इन खास लोगों में से मैं सबके नाम नही ले पाऊंगा क्योंकि कुछ परलोकवासी हो गए है और परलोकवासियों से मुझे बहुत डर लगता है। न जाने कब ये अपनी अलौकिक शक्तियों का प्रयोग कर मेरे दस साल पुराने लैपटॉप की हार्डडिस्क उड़ा दें, जिसमे मुझे अमर बनाने वाली अनगिनत कहानियां सेव हैं। इसलिए मैं सिर्फ उन खास लोगो के नाम लूंगा जो ज़िंदा है। क्योंकि इस मायावी शहर में एक मच्छर भी खास लोगों को उनकी औकात दिखा देता है। यहां अब लोग भाई से नहीं मच्छरों से डरते हैं इसलिए मैं भी अब खुद को मच्छर मानकर उन खास लोगों के नाम लेता हूँ जिनकी वजह से इस शहर में लाखों की तादाद में मौजूद एक्टरों का बेड़ा गर्क हुआ है।

सबसे पहले तो बच्चन साब, नवाज़ुद्दीन, कंगना, अनुष्का, प्रियंका और राजकुमार राव सरीखे एक्टरों ने देशभर के लाखों करोड़ों नौजवानों को एक्टर बनने का सपना देकर भरमाया फिर रही सही कसर SRK ने ये कह कर पूरी कर दी कि अगर शिद्दत से किसी को चाहो तो सारी कायनात उसे आपसे मिलाने को साजिश में जुट जाती है। इसी साजिश का नतीजा है ये बेतहाशा भीड़ और भाड़ा, कोलीवाड़ा का। जिस कमरे की औकात 5000 रु महीने की नही, इस भीड़ की वजह से वो 12 हजार रुपये महीना मिलता है। पूरी कमाई भाड़े में घुस जाएगी तो आदमी खायेगा क्या, वड़ापाव!!!

इस साजिश में सिर्फ ये खास लोग शामिल नहीं है, इसमे इनके माँ-बाप, यार-दोस्त, चाचा, ताऊ, मामू भी बराबरी के हिस्सेदार हैं। बच्चा जरा सा गोरा क्या हुआ ये लोग उसे अंग्रेज समझने लगते हैं। भले ही उसकी नाक पकोड़ा हो और आंखे एक दूसरे को तिरछी रेखा में काटती हों लेकिन ये लोग तुरंत उसकी तुलना हीरो हेरोइन से कर बैठते हैं। अब ऐसा बच्चा जिसे बचपन से ही स्टारडम की लत लग गयी हो उसका मन भला स्कूल की बासी किताबों में लगेगा?? उसका मन तो अभिषेक, जैकी, कुमार गौरव, लव, मिमोह, आर्य, ईशा, उदय, अध्यन, तुषार, फरदीन, हरमन की तरह स्टारडम के पीछे ही भागेगा। सोते जागते जब उसे यही सुनने को मिले भाई तू अभी तक मुम्बई नहीं गया!! तो क्या वो अपने गांव में बैठ लिट्टी चोखा खायेगा??? उसका मन तो किसी अवार्ड सेरेमनी में गूंज रही तालियों की गड़गड़ाहट में अटका होगा।

बंबई आते ही सबसे पहले ये लोग एक्टिंग सीखने के लिए जिम जॉइन करते हैं। सालों साल लगातार एक्टिंग सीखने के दौरान माँ बाप की मोटी सेलरी कब पेंशन में बदल जाती है, लोखंडवाला की चमचमाती लेन्स से भागकर ये कब कोलीवाड़ा की बदबू मारती गलियों में पहुच जाते है, ज़िन्दगी कैसे सड़ा-गला मिस्सल बन जाती है इन्हें पता ही नहीं चलता। इनमे से कई आजीवन ब्रम्हचारी रह कर त्याग की भावना से ओतप्रोत रहते हैं। कई बहुत सारे रिलेशन और डिवोर्स के बाद बलिदानी की भूमिका में अदा करते हैं। फिर एक ऐसा वक़्त आता है जब ये घर के रहते है ना घाट के, तब ना शरीर साथ देता है ना मुखड़ा। तब इनमें एक अलग तरह का आत्मज्ञान जाग्रत होता है जो दबी कुचली आवाज़ में कहता है कि तू इस पके बाल और झुर्रीदार थोबड़े को किस मुह से अपने यार-दोस्तो, चाचा, ताऊ, मामू को दिखायेगा। पूरी लाइफ के स्ट्रगल के बाद यहीं हमारा हीरो हार मान जाता है। वो निराशा के समंदर में डुबकियां लगाते हुए डब्बू अंकल जैसे VDV स्टार से जलने लगता है। उसके मन मे इस उभरते हुए स्टार के लिए बुरी भावनाएं पनपती है जिन्हें वो रोकने में नाकामयाब रहता है, फिर वो सार्वजनिक तौर पर VDV स्टार्स का विरोध शुरू कर देता है।

ऐसे ही एक्टरों के एक दल ने बीते जमाने के उस हीरो के साथ अपने यूनियन की शरण ली है जिसके डांस की कॉपी कर डब्बू अंकल VDV स्टार बने हैं। इस हीरो का कहना है कि उसे भी डब्बू अंकल की पॉपुलैरिटी और कमाई में से कुछ हिस्सा मिलना चाहिए क्योंकि ओरिजिनल वो है, डब्बू उसका डुप्लीकेट। अब इन नामुरादों को कौन समझाए की ओरिजिनल/डुप्लीकेट कुछ नहीं होता। होती बस एक चीज़ है - एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट और सिर्फ एंटरटेनमेंट।

VDV स्टार अमर रहे। डब्बू अंकल अमर रहें!!!!

|© *Chinmay Sankrit* |

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=10214132234072188&id=1003276729


Wednesday, May 23, 2018

कर्नाटक शपथ ग्रहण के बहाने : राजनीति मेरा प्रिय विषय नहीं है।

राजनीति मेरा प्रिय विषय नहीं है।

फिर भी। आज कर्नाटक में शपथ ग्रहण की तस्वीर अपलोड करके सभी अपने अपने ढंग से लिख रहे हैं। लिख क्या रहे हैं मजे ले रहे हैं। फेसबुक पर ज्यादातर लोग मजे ही लेते हैं।

मजाक बनाते हैं किसी का। किसी सीरियस मुद्दे पर कोई पोस्ट होगी तो उस भी मजाक वाले कमेंट लिखेंगे। खैर।

मसला ये है कर्नाटक में विपक्ष एकजुट हुआ। इस लेकर खूब चटखारे लिए जा रहे हैं। अभद्र और अश्लील तक कमेंट किए जा रहे हैं। पूछिए क्यों। क्या आप भाजपा के कार्यकर्ता हो। आपको बुरा लग रहा है विपक्षी पार्टियों का एकजुट होना। या भक्त हो।

भई आप पहले देश के नागरिक। आप ये भी सोच सकते थे कि अच्छा हुआ विपक्ष एकजुट हो गया। अब सरकार के कामकाज में जहां खामी नजर आएगी। वहां विपक्ष पुरजोर ढंग से आवाज उठाएगा। सवाल करेगा।

लोकतांत्रिक देश के लिए सत्ता पक्ष के साथ - साथ विपक्ष का भी मजबूत होना जरूरी है। अगर ऐसा होता है तो देश के लिए अच्छा ही है। शुभ संकेत है।

मगर.... आप तो ठहरे भक्त। आप राम भक्त या हनुमान भक्त नहीं हो। हो ही नहीं सकते। आप भाजपा के चंद नेताओं के भक्त हो। जो सिर्फ उनकी चाटुकारिता करते हो। उनको अच्छी लगने वाली बातें लिखते हो। पोस्ट। फोटो शेयर करते हो।

अच्छा है भविष्य की जुगाड़ में लगे हो। लगे रहो।

लेकिन कभी चिंतन करो तो ये भी सोचना। देश में व्यक्ति बड़ा नहीं होता। पद बड़ा होता है। वो पद प्रधानमंत्री का। मुख्यमंत्री का। मंत्री का। सांसद या विधायक का हो सकता है।

इस पद पर बैठा व्यक्ति कोई देवता नहीं होता। कि आप उसकी पूजा करने लग जाओ। भक्त बन जाओ। उसकी आलोचना करने से आपके हाथ कांप जाए। कलम सूख जाए। जुबान बंद हो जाए।

... ध्यान रखिए। वो भी आपकी तरफ एक इंसान है। इस देश का एक नागरिक है। उसमें हजार अच्छाई होगी तो चंद कमियां और बुराइयां भी होगी। होती है। हर इंसान में होती है। ये बात अलग है कि आपकी नजर में वो देवता हो तो फिर कुछ नहीं किया जा सकता।

सरकार का काम ही अच्छी योजनाएं बनाना। अच्छा काम करना। अगर कोई सरकार लोगों की भलाई का काम नहीं करती है तो सवाल करना हर नागरिक का अधिकार है। गलत योजनाओं पर आलोचना करना भी जरूरी है।

ये बात अलग है कि आप सरकार की पार्टी से हो तो आपकी मजबूरी हो जाता है। सिर्फ तारीफ करना। क्या कहते हैं उसे चाटुकारिता...।

अब भी समय है।
देश के बारे में सोचिए...
देश की बात कीजिए।

नोट : असभ्य कमेंट लिखकर अपना परिचय मत दीजिए। लोग जान जाएंगे कि आप...।


Saturday, April 28, 2018

पत्थलगड़ी की आग... आखिर सच क्या है


*झारखंड के बाद छत्तीसगढ़ के जिलों में भी फैली*

झारखंड के बाद छत्तीसगढ़ के कुछ जिलों में आदिवासियों के जनाक्रोश को इसी नाम से पुकारा जा रहा है। मामला है आदिवासी गांवों और जिलों में पत्थर गाड़ने और यह लिखने का कि अब हमारे इलाके में सिर्फ ग्रामसभा ही सबकुछ तय करेगी। मतलब सीधे सीधे भारतीय संविधान को मानने से इंकार।

मैंने चंद रोज पहले ही इस शब्द पर गौर किया। जब 22 अप्रैल को जशपुर के एक गांव में पत्थलगड़ी की घटना हुई। मामला झारखंड से निकलकर अब छत्तीसगढ़ तक पहुंचा है। हालांकि यहां 1996 में सबसे पहले पत्थलगड़ी हुई थी।

*आइए देखते आखिर पत्थलगड़ी है क्या*

पत्थलगड़ी शब्द नक्सलबाड़ी जैसा प्रतीत होता है। सभी जानते हैं कि नक्सल शब्द की उत्पत्ति पश्चिम बंगाल के छोटे से गाँव नक्सलबाड़ी से हुई है, जहां भाकपा के नेता चारू मजूमदार और कानू सान्याल ने 1967 में सत्ता के खिलाफ़ एक सशस्त्र आंदोलन की शुरुआत की थी। जो वर्तमान में आतंकवाद जैसा खतरनाक रूप ले चुका है।
बात करते हैं पत्थलगड़ी की। विकिपीडिया के मुताबिक कम से कम ईसा पूर्व 10वीं शताब्दी में पत्थलगड़ी अस्तिव में था। इसके तीन प्रकार माने गए है। जिसमें मृतकों की याद में, आबादी और बसाहट की सूचना देने वाले, अधिकार क्षेत्रों के सीमांकन और खगोल विज्ञान संबंधी जानकारी देने वाले पत्थर को गाड़ा जाता है, इसे ही पत्थलगड़ी कहा जाता है।

छत्तीसगढ़ में इस घटना ने राजनीतिक रंग ले लिया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस साल यानी 17 फरवरी 2018 को अनुसूचित जनजाति आयोग के राष्ट्रीय अध्यक्ष और भाजपा के वरिष्ठ नेता नंदकुमार साय ने जशपुर जिले के घोरगढ़ी में पत्थलगड़ी का उद्धाटन किया था। जिसका वीडियो भी वेबसाइट पर उपलब्ध है। हालांकि अब वे कह रहे हैं कि मैंने वहां पूजा-पाठ की थी। मगर मैं नहीं जानता था कि ये पत्थलगड़ी है।

इस मामले का दिलचस्प पहलू यह है कि भाजपा ने अब इसका विरोध करते हुए उन इलाको में जनजागरण के लिए सद्भभावना यात्रा शुरू कर दी है। इसकी अगुवाई केंद्रीय मंत्री और आदिवासी नेता विष्णुदेव साय कर रहे हैं। उन्होंने इसे सरकार के खिलाफ साजिश बताया है। उधर विपक्ष यानी कांग्रेस इसे सरकार की नीतियों के खिलाफ जनाक्रोश के रूप में देख रही है। शनिवार को सद्भाभावना यात्रा के दौरान भाजपा कार्यकर्ताओं ने पत्थलगड़ी को तोड़ने की कोशिश है। इसके बाद आदिवासी और भाजपा कार्यकर्ताओं में विवाद और झूमाझटकी हो गई।

*तो फिर पत्थलगड़ी का सच क्या है*

यह पता लगाना वैसे पुलिस और प्रशासन का काम है। लेकिन आम नागरिक के नाते है हम इसी किसी घटना का समर्थन नहीं कर सकते । जो भारतीय संविधान के खिलाफ हो। मगर यह पता लगाना भी जरूरी है कि आखिर झारखंड के बाद बार्डर से लगे छत्तीसगढ़ के कुछ जिलों में पत्थलगड़ी की आग क्यों फैल रही है। क्या वाकई में उन गांवों के आदिवासियों के साथ कुछ गलत हुआ है। क्या निजी कंपनियों ने वहां की जमीन पर गैरकानूनी ढंग से कब्जा कर लिया है। या उन इलाकों में प्रशासन के अफसरों की ओर से ज्यादती की जा रही है। या वहां पर विकासकार्य बिल्कुल ठप है। जिस तरह से खबरों में आया कि वहां 2013 के बाद रोजगार गारंटी योजना का पैसा तक नहीं मिला है। आखिर क्या वजह है।

*क्या सच में नक्सलवाद जैसा कुछ है*

सरकार को यह पता लगाना चाहिए कि कहीं इन घटनाओं के पीछे कहीं आपराधिक तत्वों का हाथ तो नहीं है। यानी सीधा सीधा नक्सलियों या नक्सल समर्थक लोगों का। आखिर आदिवासी ग्रामीण क्यों निर्वाचित सरकार के खिलाफ जाने जैसा कदम उठा रहे  है। हालांकि उन्होंने ये भी साफ साफ कहा है कि हम सरकार के खिलाफ नहीं है। मगर हम ये भी चाहते हैं कि हमारे गांवों में जो कुछ भी हो, हम से यानी ग्रामसभा की परमिशन के बाद ही हो।

_*पत्रकार रामकृष्ण डोंगरे के फेसबुक वॉल से*_


Sunday, April 8, 2018

मुलाकातों के सिलसिले : 20 साल बाद मुलाकात...

स्कूल के क्लासमेट और फ्रेंड देवाराम शेरके के साथ 
देवाराम से आज दिन में अचानक चैटिंग हुई। पता चला कि वे भी रायपुर में। आफिशियल ट्रेनिंग के लिए। फिर मिलने का प्लान बना। करीब 20 साल के बाद हम मिल रहे थे। काफी उत्सुकता थी।

उमरानाला स्कूल से 1998 में निकलने के बाद हम आगे की पढ़ाई के लिए अलग अलग जगह चले गए। फिर फोन और फेसबुक पर ही मुलाकात होती थी।

देवाराम पॉलिटेक्निक करने के बाद नेवी की नौकरी के लिए मुंबई चले गए थे। फिर 15 साल बाद वहां से रिजाइन देकर अब केनरा बैंक सौंसर में कार्यरत है।

दैनिक भास्कर आफिस में 24 जनवरी 2018 को मुलाकात के दौरान अमिताभ भाई  Amitabh Arun Dubey भी साथ थे। देवाराम 25 साल के बाद अमिताभ भाई से मिल रहे थे।

इस मुलाकात ने स्कूल की कई यादें ताजा कर दी।

ये सोचना ग़लत है के' तुम पर नज़र नहीं...

ये सोचना ग़लत है के' तुम पर नज़र नहीं,
मसरूफ़ हम बहुत हैं मगर बेख़बर नहीं....

बड़े भाई जैसे श्री आलोक श्रीवास्तव जी की ये लाइनें और वे स्वयं किसी परिचय के मोहताज नहीं है।

प्रोफाइल आप गूगल कर सकते हैं। या आप जानते ही होंगे। आलोक जी से मेरी पहली मुलाकात साल 2004 में भोपाल में हुई थी।

तब वे दैनिक भास्कर की रविवारीय मैग्जीन रसरंग में हुआ करते थे। तब मैं भोपाल के अपने शुरुआती पत्रकारीय जीवन में साहित्यकारों की मैग्जीन "शब्द शिल्पियों के आसपास", पड़ाव प्रकाशन में काम कर सकता था।

भास्कर आफिस में ही उनसे मुलाकात हुई थी। इससे पहले सिर्फ उनको पढ़ा था। बाद में आलोक जी उसी साल 2004 में दिल्ली चले गए। 2006 में फिर मेरी उनसे इंडिया टीवी में मुलाकात हुई। 2007 से लगातार 2013 तक मैं दिल्ली में रहा। अमर उजाला में नौकरी के दौरान। मगर उनसे मुलाकात नहीं हो पाई।

इधर रायपुर आने के बाद उनसे एक दो बार और मुलाकात हुई। वे पिछली बार ओमपुरी जी के साथ आए थे।

आलोक पुतुल जी से भी पहली बार रूबरू मुलाकात हुई है। जान पहचान काफी पुरानी है। आलोक पुतुल जी की धारदार रिपोर्ट्स मैंने बीबीसी पर पढ़ी थी। खास तौर पर बस्तर को लेकर। इन दिनों आप नवभारत से भी जुड़े हुए हैं।

आलोक श्रीवास्तव जी और आलोक पुतुल जी के बीच मैं किसी जुगनू की मानिंद हूं। मैं ऐसे लोगों से ज्यादा मिलना पसंद करता हूं। जिनसे दिल से जुड़ाव महसूस करता हूं। मुझे आज आप जैसे महानुभावों से मिलकर बेहद खुशी हुई।

उम्मीद है ये मुलाकात फिर होगी...

Thursday, April 5, 2018

सोशल मीडिया : नजर है आप पर

मित्रों, देखा जा रहा है कि वर्तमान में कई अनर्गल भड़काऊ मैसेज सोशल मीडिया, व्हॉट्सऐप आदि पर वायरल किए जा रहे हैं।

        यह ऐसे मैसेज यदि पर्सनल पर मिले तो सबसे पहले, पहला प्रश्न खुद से करें कि *"यह मेरे पास क्यों आया है ?"*

        और… यदि ग्रूप में आता है तो आपका प्रश्न खुद से यह होना चाहिए कि *"इसे ग्रूप में किसने और क्यों भेजा है ?"* भेजने वाले को आप कितना जानते पहचानते हैं, अनजान है तो उससे परिचय लेकर और जानकार है तो तब भी, इस अनर्गल भड़काऊ मैसेज का सोर्स source पूछते हुए पोस्ट करने का जायज कारण प्रेमपूर्वक पूछें।

       *विश्वास करिए, जब उपरोक्त विचार पर आपका ध्यान होगा, तत्सामयिक आकस्मिक उद्वेलन आपका शांत रहेगा अर्थात ऐसी ग़ुस्सा दिलाने वाली पोस्ट पढ़कर भी आपको ग़ुस्सा नहीं आएगा।*

        यह निम्न संकेत
```          🦅👁          ```
        हमेशा दिमाग़ में रखें कि कई राजनैतिक षड़यंत्रकारियों की *"गिद्ध नज़र"* आप पर बनी हुई है।

        वह ऐसे मैसेज जानबूझकर वायरल करवाना चाहते हैं और गिद्ध निगाह से विवेचना कर रहे हो सकते हैं कि कौनसे किन समाचारों से कितने बेवक़ूफ़ भड़क रहे हैं।

        आपको पता भी नहीं चलेगा, *आप बेवक़ूफ़ों की गिनती में गिने गये हैं।*

        आपको पता ही है कि अगले वर्ष *2019* में मतदान होने हैं। राजनीतिक षड़यंत्र किन्हीं घिनौने कृत्य को अंजाम देने की साज़िश की तैयारी जोरों पर हो रही हो सकती है।

        कई साज़िश-सहयोगियों को देश के बेवक़ूफ़ों की गिनती करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी हो सकती है। यह सब भी शायद इसी के तहत हो रहा हो सकता है।

        एक औचित्यहीन मैसेज एक बार जारी होने के बाद, कितने लोगों द्वारा कितनी बार कॉपी/पेस्ट या फ़ॉर्वर्ड किए जाकर वायरल होता है और इसकी प्रतिक्रिया में कौन किस प्रकार की भाषा का इस्तेमाल करता है। यह सब देखने के लिए कई *गिद्ध निगाहें* ऐक्शन/रीएक्शन पर नज़र रख बेवक़ूफ़ों के आँकड़े तैयार कर रही हो सकती हैं।

        और उनके आला अफ़सरान, साज़िश रचयिता संगठन अपनी तैयारियों का आँकलन कर रहे हो सकते हैं।

        *अपनी और अपनों की सुरक्षा हमारी निजी ज़िम्मेदारी भी है। यदि मेरे तर्क में कोई सच्चाई महसूस हो तो संकेत*
```          "🦅👁"          ```
*याद कर लें और उद्वेलित करने, भड़काने, ग़ुस्सा दिलाने आदि वाले सभी प्राप्त गुस्ताख़ मैसेज को तुरंत ही डिलीट कर दें और अपनी तरफ़ से कोई प्रतिक्रिया नहीं दें। प्रारंभिक पैराओं में दिए खुद से पूछने वाले प्रश्न भी ध्यान में रखेंगे तो तुरंत ग़ुस्सा भी नहीं आएगा।*

        है न दोहरा फ़ायदा :-```
  1. ``` ग़ुस्से पर कंट्रोल```
  2. ``` बेवक़ूफ़ों की गिनती में शामिलता से बचाव

        सहमत हैं तो अपने अपनों को जागरूक करने यह शेयर कर सकते हैं```।

```
(लेखक रमेश बलानी रायपुर में रहते हैं। और सोशल मीडिया पर पैनी नजर रखते हुए लोगों को जागरूक करने के लिए पोस्ट लिखते हैं।)


Tuesday, April 3, 2018

सोशल मीडिया पोस्ट : जरा सोचिए, रुकिए और गूगल कीजिए

सोशल मीडिया ने वैसे तो कई आंदोलन खड़े कर दिए। कई बदलाव भी ला दिए है। मगर दूसरी तरफ नफरत के बीज बोने में भी सबसे आगे हैं। ताजा उदाहरण एससी-एसटी एक्ट में बदलाव के विरोध में आयोजित भारत बंद का है। जहां दर्जनों फेक तस्वीरें वायरल हो रही है।

नफरत फैलाने के लिए लोगों का खास हथियार है- फर्जी तस्वीरें, फेक पोस्ट। जिसे आम आदमी सच मान लेता है। आंख मूंदकर भरोसा कर लेता है।

गूगल पर सर्च करके सच जानने की जरा भी कोशिश नहीं करता है। कहेगा टाइम किसके पास। मगर घंटों फेसबुक या यूट्यूब पर टाइम बर्बाद कर देगा।

गूगल करने में एक से दो मिनट लगेंगे। सारी सचाई खुद ब खुद आपके सामने आ जाएगा। नफरत की आग भड़काने या फैलाने से पहले जरा सोचिए। रुकिए। और गूगल कीजिए...

तय आपको करना है...
आग फैलाना चाहते हो...
या आग बुझाना चाहते हो...

*पोस्ट अच्छी लगे तो ज्यादा से  ज्यादा शेयर कीजिए।*

https://www.altnews.in/hindi/fake-photo-of-attack-on-police-sub-inspector-viral-on-social-media/