Sunday, January 19, 2020

मेरी फेसबुक पोस्ट : आप पत्रकार हो ही नहीं सकते...

साल 2005-07 के बीच का एक किस्सा आपको सुनाता हूं. उस समय मैं भोपाल के पत्रकारिता विश्वविद्यालय में एमजे की पढ़ाई कर रहा था. एक एजुकेशनल टूर या असाइनमेंट पर अपने क्लासमेट के साथ होशंगाबाद गया था। वहां नर्मदा मैया के दर्शन और घूमना-फिरना हुआ। ये सब अलग बात है। लेकिन मूल विषय पर आता हूं।

लौटते वक्त हम बस से आ रहे थे। जिस क्लासमेट के साथ मैं गया था वह अब इस दुनिया में नहीं है। हम दोनों जिस बस में सवार थे। उसी बस में कुछ लोगों ने हमसे बातचीत की। जब हमने उन्हें कहा कि हम पत्रकार है तो एक सज्जन बुरी तरह से अड़ गए। उन्होंने कहा कि नहीं, आप पत्रकार हो ही नहीं सकते।

हमने कहा - नहीं हम पत्रकार हैं. क्योंकि मैं खुद और मेरा साथी विश्वविद्यालय के छात्र होने के साथ ही पहले से ही कुछ अखबारों में काम कर रहे थे.

इसलिए हम जोर देकर कह रहे थे कि हम पत्रकार हैं...

अब वह बात समझ में आती है कि वे सज्जन क्यों ऐसा कह रहे थे कि आप पत्रकार नहीं हो।

प्रोफेशनली देखा जाए तो किसी का डॉक्टर, किसी का इंजीनियर, किसी का एक्टर का काम करना.. अलग बात होती है. और परिपक्व होना, अलग बात होती है.

हम जब प्रोफेसर कहते हैं तो अतिथि विद्वान की तरह, गेस्ट फैकल्टी की तरह क्लास में जाकर एक-दो लेक्चर दे देना ही प्रोफेसर कहलाने के लिए पर्याप्त नहीं होता.

प्रोफेसर मतलब अपने विषय का मास्टर।

इस संदर्भ में देखे तो अब कोई पत्रकार नजर नहीं आता। (एक दो अपवाद को छोड़कर). हम सब तो मीडिया हाउस के कर्मचारी है। जोकि ऊपर से मिले निर्देशों के अनुसार काम करते हैं।

पत्रकार तो किसी जमाने में होते थे, जो खुद की सुनते थे. और जैसा वे चाहते थे. वैसा लिखते थे. इंटरव्यू में वैसे ही सवाल करते थे. जैसा वे पूछना चाहते थे। आजकल के इंटरव्यू पूरी तरह से प्रायोजित और मैच फिक्सिंग जैसे होते हैं। या सिर्फ खुश करने वाले।

चाहे तो टेबल पर बैठकर ही लिख लो। तारीफ में लिख रहे हो तो छपने के बाद किसको खराब लगेगा। बुरा लगेगा। किसको आपत्ति होगी।

#फेसबुक_पोस्ट
20 जनवरी 2020


मेरी फेसबुक पोस्ट : बातचीत का आधार था आधार

आज एक बैंक मैनेजर से मुलाकात हुई। परिचय से होते हुए बातचीत शहर के इश्यू से लेकर राष्ट्रीय मुद्दों तक जा पहुंची।

बातचीत का आधार था आधार। यानी आधार कार्ड की व्यवस्था और उसकी अनिवार्यता। इसके अलावा जनधन अकाउंट। उनका साफ मानना था कि तमाम चीजों को आधार से लिंक करा देना कोई बड़ी सफलता नहीं। क्योंकि साइबर सिक्योरिटी के बिना सब बेकार है। इससे आम जनता का नुकसान भी हो सकता है।

आधार का मॉडल जहां से एडॉप्ट किया है वहां साइबर सिक्योरिटी पर भी भारी बजट रहता है। इससे हैकिंग का खतरा कम हो जाता है। ऐसी कई बातें हैं। जो लोगों के मन में डर पैदा करती हैं।

इसके अलावा क्या सिर्फ सब्सिडी से लोगों का भला हो सकता है। तमाम सब्सिडी को खत्म कर देना चाहिए। सभी को मिलने वाली। लोगों की आय बढ़ाने पर जोर होना चाहिए।

खर्च जिस हिसाब से बढ़ रहा है उसमें सबके पास बैंक अकाउंट होने का भी कोई फायदा नहीं। महंगाई को कंट्रोल नहीं किया गया तो आम लोगों के पास बचत कहां से होगी कि वे बैंक में जमा कर सकें।

लोगों के पास अच्छे रोजगार के अवसर अधिक से अधिक होने चाहिए। आय ज्यादा होनी चाहिए। तब तो बचत की जा सकती है।

#आधार #जनधन_खाता #बैंक

20 जनवरी 2018


Friday, December 6, 2019

क्या हाई-प्रोफाइल रेपिस्ट का एनकाउंटर देखेंगे लोग

पोस्ट-1

संचार क्रांति ने दुनिया भर के लोगों को किसी भी मुद्दे पर अपनी राय रखने के लिए कई प्लेटफार्म उपलब्ध करा दिए है। चाहे टेक्स्ट फॉर्मेट हो, ऑडियो हो, वीडियो हो या पिक्चर हो।

अच्छी बात है कि हमें अपनी बात रखने का मौका मिलता है. इससे देश और दुनिया की राय पता चलती है. आपके विचार कई बार औरों को आपके जैसा सकारात्मक सोचने पर मजबूर भी करते हैं।

लेकिन हमें अपनी राय, अपने विचार बेहद जिम्मेदार नागरिक के बतौर और संतुलित रूप से जाहिर करना चाहिए. क्योंकि आप का बयान, आपकी राय मजाकिया बिल्कुल नहीं होना चाहिए. यह आपके नाम से इतिहास में दर्ज हो रहा है ऐसा आप को मानना चाहिए.

साथ ही हर मुद्दे पर त्वरित टिप्पणी के रूप में कुछ भी लिखने से बचना चाहिए. यह मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि मैंने खुद इस पर अमल में लाना शुरू कर दिया है.

आपके मोहल्ले से लेकर आपके शहर, देश और दुनिया में रोज सैकड़ों - हजारों घटनाएं होती है. जिस पर आप अपनी प्रतिक्रिया, या राय जाहिर कर सकते हैं. अगर हम अपने देश की चंद बड़ी घटनाओं की बात करें तो पिछले कुछ महीनों से कई मुद्दे चल रहे थे/हैं. जिस पर हर कोई लिख रहा है. अयोध्या मसला, प्याज की बढ़ती कीमतें, अर्थव्यवस्था का गिरता स्तर, महिलाओं के खिलाफ हिंसा रेप जैसे कई मुद्दे अखबारों की सुर्खियां बने हुए तो बात इन्हीं पर करते हैं.

#फेसबुकपोस्ट


पोस्ट - 2

हैदराबाद गैंगरेप मामले में अगर आज के घटनाक्रम की बात करें तो पुलिस ने आरोपियों को एनकाउंटर में मार गिराया है. शुरुआत यहीं से करते हैं.

1. अगर ये चारों आरोपी वाकई इस रेप केस से जुड़े हैं। और इन्होंने वाकई भागने की कोशिश की थी जिन्हें पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराया तो यह एक हद तक सही है.

क्योंकि बदमाशों को पुलिस एनकाउंटर में मारती है. इसमें कोई नई बात नहीं है. लेकिन सब जानते हैं कि कई बार पुलिस एनकाउंटर भी फर्जी होते हैं.

2. देश में न्याय व्यवस्था, अदालतें अगर नाकाम हो रही है और पुलिस ही सजा देने का काम करने लगेगी तो स्थिति भयावह हो सकती है.

3. मॉब लिंचिंग की घटनाएं जिस तरह से सामने आई है. अगर जनता यह मान ले कि किसी भी आरोपी को सजा नहीं मिल पाएगी तो हर आरोपी को मौत की सजा जनता ही देने लगेगी. इसमें कई बार बेगुनाह लोग भी मारे जा सकते हैं. जैसा कि पिछली कई मॉब लिंचिंग की घटनाओं में सामने आया है.

अब अगर छोटी बड़ी रेप की वारदात और उनके आरोपियों को सजा देने के लिए इसी तरह के पुलिसिया एनकाउंटर पर बात करें तो.

क्या आज देश के ज्यादातर लोग जिस तरीके से इस एनकाउंटर पर पर जश्न मना रहे हैं.

क्या आने वाले दिनों में रेप के केस में फंसे हाई प्रोफाइल लोगों का भी एनकाउंटर देखना चाहते हैं.

क्या ऐसा संभव है या सिर्फ लो क्लास और कमजोर आरोपियों को ही पुलिस एनकाउंटर करेगी.

#फेसबुक_पोस्ट


Saturday, September 7, 2019

मेरी फेसबुक पोस्ट : तुम इंसान हो ना कि भगवान

हम किसी व्यक्ति या संस्था को पसंद करते हैं। प्यार करते हैं। लट्टू है। अरे पागल है।

फिर भी सही और गलत की समझ तो रखना ही चाहिए। तर्क कीजिए। बहस कीजिए। या जिसके विचार पसंद नहीं। आलोचना पसंद नहीं। उन्हें सीधे देशद्रोही कह दोगे।  सजा दोगे। तुम इंसान हो ना कि भगवान

या अपने आप शैतान कहलाना पसंद करोगे। जो सीधे मारने के अलावा कोई बात पसंद नहीं करता।

क्या हो रहा है लोगों को। कुछ युवाओं को तो अफीम जैसा नशा हो गया है। धर्म का नशा। जाति का नशा।

इंसानियत तो भूल ही गए!

इंसान ही रहो।
न भगवान बनो।
न शैतान...।

मेरी फेसबुक पोस्ट, 7 सितंबर, 2017


Thursday, August 22, 2019

दोस्तनामा : महोदय अपनी गाड़ी लेकर आएं...और मैं देखकर दंग रह गया...

बाएं से रामकृष्ण और संजय। नागपुर के येवले चाय शॉप पर 20 अगस्त 2019 को। 
भोपाल, सन 2004, मैं मप्र विज्ञान एवं प्रोद्यौगिकी परिषद (मेपकास्टमें काम करता था. अप्रैल का महीना, तीसरे सप्ताह में लगातार चार दिन की छुट्टी थी. न्यू मार्केट (भोपाल का मुख्य बाजार) में घूमते हुये एक बैनर पर नजर रुख गई...कवि सम्मेलन, मुशायरा, नाटक और क्लासिक फिल्म का मंचन, स्थान भारत भवन (कला के प्रति समर्पित, प्रख्यात केंद्र) और मजे की बात सब ‘फ्री’ में... अपनी तो लॉटरी लग गई थी.

शायरी की दुनिया का जाना-माना नाम बशीर बद्र साहब उनको 10 फीट की अंतर से देखना और सुनना ‘अद्भूत’ था, इनके साथ भारत भर से आए और भी कवि, शायर इनसे रूबरू होने को मिलेगा। एक दिन शाम 7 बजे श्री फणीश्वरनाथ रेणुजी का प्रसिद्ध उपन्यास ‘मारे गये गुलफाम’ से प्रेरित श्री बासू भट्टाचार्य जी की राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म ‘तीसरी कसम’ का मंचन हो रहा था. पहले सोचा, रहने दे, रात घर जाने के लिए अाटो या भट नहीं मिलेगा. मैं यहां भट के बारे में बता दूं, ये पुराना तीन पहिया वाला अाटो, जो शोर और धुंआ फेंकते हुए अपनी प्रस्तुति देता था. आज ये वाहन इतिहास की बात है, लगभग सभी शहरों से लुप्त हो गए. फिर हिम्मत करते हुए बैठ गया...देख लेंगे जो भी होगा.

फिल्म रात करीब 11 बजे खत्म हो गई.
वापस घर मतलब किराए के कमरे तक जाने की चिंता सता रही थी
कि एक लगभग ‘पांच’ फीट के सज्जन सामने आकर पूछने लगे... 

भाई साहब, आपको ये फिल्म कैसी लगी? 
हमने भी हमारे ‘फिल्मी’ ज्ञान को प्रस्तुत करना शुरू किया... 
ये भाई साहब के ‘सवाल’ खत्म नहीं हो रहे थे...
आखिर हमने कहा... यार आप तो पत्रकार जैसे सवाल पूछ रहे हो...! 
एक प्यारी मुस्कान के साथ कहा... 
’जी...हम पत्रकार है और नई दुनिया (पत्रिका का नाम मुझे ठीक से याद नहीं) के साथ काम करते है! 

हमने कहा....
बेहतरीन काम है ! फिल्म देखने के पैसे मिलते है आपको...! एक हंसी....!
मुझे अपनी चिंता सताये जा रही थी...घर कैसे पहुंचे....!
हमने पत्रकार महोदय से पूछ लिया... भाई, कहां रहते हो...? 

जवाब मिला...नेहरू नगर...
...अरे मैं भी नेहरू नगर रहता हूं...!
कैसे जाओगे....?
पत्रकार...मेरे पास गाड़ी है...? ओ...हो...
मुझे लिफ्ट दोगे क्या...?
पत्रकार: हां क्यूं नहीं...बस थोड़ी मेहनत करनी पड़ेगी...!
हां...जरूर...!

दरअसल, भारत भवन बड़ी झील के किनारे है और मुख्य सडक तक आने के लिए एक बड़ी चढ़ाई को पार करना पड़ता है. मुझे लगा, पत्रकार महोदय की गाड़ी थोड़ी ‘कमजोर’ होगी, इसलिए थोडी दूर मुझे पैदल चलना पड सकता है. मैं निश्चिंत था, अपना काम हो गया...! सोचा दस रुपये बच गये, तो हमने ‘दो’ आइसक्रीम कोन लेकर ‘पत्रकार’ महोदय के साथ ‘बतियाते’ हुए आइसक्रीम का लुफ्त उठाया...तब तक 11:45 हो गए थे...! महोदय बोले…मैं गाड़ी लेकर आता हूं..! 

मजेदार बात...आगे है...

महोदय अपनी गाड़ी लेकर आएं...और मैं देखकर दंग रह गया...ये और पास आए...तो दोनों भी...खिलखिला कर हंसने लगे... हां भाई यही मेरी गाड़ी है...! ये जनाब ‘साइकिल’ लेकर आए...!

मैं लंबाई में इनसे बड़ा था...तो फ्रंट ‘सीट’ का ‘सम्मान’ मुझे मिला... ये पीछे के सीट (?) पर विराजमान हो गए. दोनों डबल पैडल लागते हुए रात एक बजे नेहरू नगर पहुंचे. महोदय ने बताया ये मेरा कमरा है...! मैं दो तीन गल्ली पीछे रहता था, सो धन्यवाद देकर अपनी रूम तक जाने लगा.

कहानी में ट्वीस्ट...

मेरे रूम तक जाने के लिये दो रास्ते थे. पहले रास्ते से गया तो... ‘प्रहरी’ याने गली के 4-5 कुत्ते मेरे पीछे लग गये. मैंने दूसरा रास्ता आजमाकर देखा...मेरे जाने से पहले ‘इनके’ साथी वहां भी मौजूद थे...! मैं वहा से भागा...सीधा पत्रकार महोदय के कमरे पर...
पत्रकार : क्या हुआ भाई...?
यार कुत्ते पीछे लग गये....!
कोई दिक्कत ना हो तो रातभर मैं यही सो जाऊं...?
पत्रकार : हां क्यू नहीं!
पत्रकार जी ने हमारे लिये अपने कमरे में जगह बनाई और हमने उनके लिये हमारे दिल में... हमेशा के लिये..!

रोजी रोटी के चक्कर में 2006 तक भोपाल में रहा, 2007 में अहमदनगर और वहां से दिल्ली...2008 से नागपुर में हूं. वो भी काम के सिलसिले में भोपाल, दिल्ली, छिंदवाडा, रायपुर इत्यादी शहर में अपनी सेवाएं दे चुके है...! फिलहाल रायपुर में है...! कल यानी 20 अगस्त 2019 को नागपुर में मुलाकात हुई...! 

पत्रकार महोदय का नाम है श्री रामकृष्ण डोंगरे जी, प्यार से वो ‘तृष्णा’ कहलाना भी पसंद करते हैं, मैं उन्हें आरके कहना पसंद करता हूं...! बहुत मेहनती, जमीन से जुड़े है, जब भी नागपुर आते हैं...हम मिलते रहते है...! इस दोस्ती के लिए कोई तय दुनियादारी का ‘पैमाना’ नहीं है...प्योर दोस्ती..!

नोट: ये बात मैं पहले कहना चाहता था...पर कलम के जादूगार बाजी मार गए...पहला पोस्ट आरके ने लिखा..!

अनेक – अनेक धन्यवाद...!


आपकासंजय अप्तुरकर


फेसबुक वॉल से साभार
https://www.facebook.com/sanjay.apturkar.9/posts/2430524267030157

Tuesday, August 13, 2019

एक मुलाकात, एक व्यक्तित्व, एक सृजन...

आकाशवाणी के प्रोग्राम एग्जीक्यूटिव और नाटककार अमर रामटेके जी के साथ...

आकाशवाणी छिंदवाड़ा और आकाशवाणी नागपुर में लंबे अरसे तक काम कर चुके मेरे प्रेरणा स्रोत, लेखक, दलित नाटककार और कार्यक्रम अधिकारी सम्मानीय सर श्री अमर रामटेके जी से हाल ही में मुलाकात हुई। उनकी गिनती प्रमुख दलित लेखकों में होती है।

छिंदवाड़ा आकाशवाणी से उनके ट्रांसफर के करीब 15 साल बाद हुई इस मुलाकात ने कई यादें ताजा कर दी। जब उनसे पहले आकाशवाणी छिंदवाड़ा में मुलाकात हुई। फिर बस स्टैंड के यादव लॉज की कई मुलाकातें। साहित्यिक आयोजनों में। वे हमारे गांव तंसरामाल भी आए थे... तारीख थी 16 मई 2001। जब मैंने इंटरनेट रेडियो श्रोता संघ का उद्घाटन किया था। छिंदवाड़ा से उनकी वापसी के समय का भावुक क्षण कभी भूल नहीं सकता।

वे इन दिनों बेड रेस्ट पर है। 6 साल पहले हुए एक गंभीर हादसे के बाद स्वस्थ होने में उन्हें काफी वक्त लग गया। रामटेके जी लेखक के अलावा एक अच्छे एक्टर भी है। कई नाटकों में उन्होंने यादगार रोल प्ले किए है। उनकी कई किताबें भी प्रकाशित हो चुकी है। मराठी के अलावा हिंदी में भी अपना लेखन करते हैं।

उन्होंने कई शहरों के आकाशवाणी केंद्रों में काम करते हुए कई युवाओं को प्रेरणा दी और आगे बढ़ाया। मध्यप्रदेश में आकाशवाणी छिंदवाड़ा के अलावा आकाशवाणी बैतूल में भी उन्होंने काम किया। जिन शहरों में वे रहे वहां उन्होंने साहित्यिक संस्था बनाकर युवाओं को सार्थक लेखन की ओर अग्रसर किया। फेसबुक पर जो साथी उन्हें जानते हैं वे चीज के गवाह होंगे।

आपका व्यक्तित्व ही आपकी पहचान होता है और इस संसार में कुछ व्यक्तित्व - पर्सनालिटी ऐसी होती है जो अपने आप ही कई लोगों को कुछ कर गुजरने की प्रेरणा दी जाती है। इसमें सृजन भी शामिल है और जीवन का ध्येय निर्धारित करना भी।

इस दुनिया में हर जगह, हर संस्था में कुछ ऐसे लोग होते हैं जो आपको डिस्टर्ब कर सकते हैं। परेशान कर सकते हैं। आपको धैर्य के साथ अपना काम करते जाना चाहिए। यही ऐसी पर्सनालिटी हमें सिखाती है।

आकाशवाणी में प्रोग्राम एग्जीक्यूटिव रहते हुए उन्होंने किसानों के लिए कई अच्छे प्रोग्राम बनाए। कई गांवों का दौरा किया, उन गांव तक पहुंचे जहां पहले कभी आकाशवाणी पहुंचा ही नहीं था। आकाशवाणी छिंदवाड़ा से प्रसारित होने वाला किसान भाइयों का 'चौपाल' प्रोग्राम उन दिनों काफी पसंद किया जाता था। रेडियो पर रामटेके जी का अंदाज निराला होता था। उनकी आवाज दमदार और खनक वाली है।

अमर रामटेके जी की प्रमुख कृतियां :
‘गोडघाटेचाळ’, 'ग्रेस नावाचं गारूड ', जखमांचे शहर


Monday, May 13, 2019

फेसबुक पोस्ट : मेरी यादों में नागपुर

#नागपुर से लौटकर

बचपन से ही नागपुर को लेकर क्रेज रहा है. हमारे जिले #छिंदवाड़ा के नजदीक का बड़ा शहर नागपुर ही है। घर से 100 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है नागपुर। पहली बार मेरा नागपुर जाना कब हुआ होगा, मुझे कुछ याद नहीं है. हां इतना जरूर याद है कि कॉलेज के दौरान नेट के एग्जाम देने के लिए एक बार अपने दोस्तों के साथ नागपुर गया था और वह भी ट्रेन से. इसके अलावा कई बार बस से नागपुर आना जाना होता है।

नागपुर अब तक ज्यादा तो नहीं घूमा है मगर गणेश मंदिर, लोकमत चौक, सीताबर्डी, सदर बाजार जैसे कुछ इलाके जरूर देखे हैं। संतरों की नगरी नागपुर काफी गर्म शहर माना जाता है। सर्दियों के दिनों में भी यहां आपको ऊनी कपड़ों की जरूरत नहीं पड़ती और गर्मियों में इतनी गर्मी कि आप शहर घूमते घूमते पसीने से भीग जाएंगे।

रेलवे स्टेशन और उससे लगे मध्य प्रदेश बस स्टैंड को शायद ही कभी भूल पाएंगे। यहीं से हम अक्सर आना जाना करते हैं चाहे दिल्ली जाना हो या रायपुर. हालांकि अब दिल्ली के लिए छिंदवाड़ा से सीधी ट्रेन है। रायपुर के लिए भी एक - दो साल में चलने लगेगी।

नागपुर शहर में कुछ मित्र रहते हैं जिनसे अक्सर बात और मुलाकात हो जाती है। पूरा शहर घूमने की काफी इच्छा है। पता नहीं यह सपना कब पूरा होगा. नागपुर बाकी शहरों की तुलना में महंगा शहर है। हालांकि यहां पर खाने पीने की चीजें कई वैरायटी में और सस्ती मिल जाती है.

#नागपुर #संतरीनगरी #छिंदवाड़ाकीसैर #छिंदवाड़ा

17 मई 2017 की फेसबुक पोस्ट