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Tuesday, August 27, 2024

नईदुनिया में दूसरी पारी : इनपुट एडिटर की जिम्मेदारी, चुनाव में ग्राउंड रिपोर्ट से लेकर विशेष खबरों का प्रकाशन

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में 9 वर्षों तक मैंने सफलतापूर्वक दैनिक भास्कर में काम किया. 1 अप्रैल 2022 से मुझे दैनिक जागरण समूह के नईदुनिया समाचार पत्र में इनपुट एडिटर की जिम्मेदारी सौंपी गई। 
यहां रायपुर यूनिट के 19 जिलों के ब्यूरो प्रभारियों, जिला प्रतिनिधि और संवाद सूत्र साथियों के साथ इनपुट के लिए समन्वय बनाने का दायित्व मुझे सौंपा गया। 
यहां मुझे रायपुर यूनिट के बस्तर संभाग, रायपुर और दुर्ग संभाग के उन सभी जिलों की वे खबरें, जो नेशनल स्तर पर प्रकाशित हो सकती है, उन्हें तैयार करना होता था।

जागरण विशेष, नईदुनिया विशेष कैटेगरी में कई खबरें हमारे यूनिट से प्रकाशित हुई. 
इसके साथ ही विधानसभा चुनाव 2023 और इस लोकसभा चुनाव में छत्तीसगढ़ चुनाव डेस्क पर काम करते हुए हमने अलग-अलग सेगमेंट की खबरें तैयार करवाई.

इसके साथ ही हमने बस्तर संभाग में दोनों चुनाव के दौरान ग्राउंड रिपोर्ट की। साथ ही वहां से विशेष स्टोरी भी निकाली गई। चुनाव के दौरान विश्लेषणात्मक समाचार भी प्रकाशित किए गए। कई खबरें चर्चित रही, जो यहां दी जा रही है। 

Sunday, December 11, 2022

Naidunia Raipur : नईदुनिया, नवदुनिया और जागरण के देशभर के संस्करणों में प्रकाशित - मेरा हौसला बड़ा है... स्टोरी

लोकप्रिय समाचार पत्र दैनिक जागरण, नईदुनिया, नवदुनिया के देशभर में प्रकाशित संस्करणों में आज मेरी स्टोरी 'मेरा हौसला बड़ा है'... प्रकाशित हुई है।

#firststoryinDainikJagran #FirststoryNaidunia

अंतर्राष्ट्रीय पर्वत दिवस विशेष इस स्टोरी में मैंने देशभर की महिला पर्वतारोहियों से बात की है। इनमें हरियाणा की आदरणीय संतोष यादव, झारखंड की प्रेमलता अग्रवाल, उत्तर प्रदेश की अरुणिमा सिन्हा, मध्यप्रदेश की बेटियों मेघा परमार, भावना डेहरिया (छिंदवाड़ा), हरियाणा की शिवांगी पाठक, छत्तीसगढ़ की अंकिता गुप्ता शामिल है।

सभी से बात करके अहसास हुआ कि पुरुषों के लिए माने जाने वाले इस फील्ड में महिलाओं ने किस तरह अपना वर्चस्व कायम किया है। अपनी पहचान बनाने के लिए लालायित महिलाओं में ऐसा जुनून होता है, जो पर्वत को भी डिगा देता है। किसी ने 16 साल की उम्र में, किसी ने 48 साल की उम्र में तो किसी ने एक पैर नहीं होने के बावजूद दुनिया की ऊंची ऊंची चोटियों पर देश का तिरंगा लहराया है। 

कहते है ना कि... 
मंजिलें क्या है, रास्ता क्या है, 
हौसला हो तो फासला क्या है...
(आलोक श्रीवास्तव जी का शेर) 

https://jagranappepaper.page.link/Szbb
 
 Via  Dainik Jagran App.

Click to download   
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Tuesday, May 3, 2022

Women Journalist : भास्कर समूह के ऐलान से महिला पत्रकारों में नई उम्मीदें

"महिलाएं काम के मामले में बहुत सिंसियर, ईमानदार होती है। वे हर टास्क को सिंसेरली पूरा करती है। जबकि पुरुष वर्ग के कई साथी हमेशा लापरवाही करते नजर आते हैं।" -

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हिंदी के एक बड़े समाचार पत्र समूह ने ऐलान किया है कि अगले 1 वर्ष में प्रिंट और डिजिटल के लिए 50 महिला पत्रकारों की नियुक्ति करेगा। पत्रकारिता में महिला की स्थिति बाकी फील्ड की तरह ही है। मतलब उंगलियों पर गिनने लायक नाम। और कुछ जगह तो एक बड़ा शून्य…। 

लगभग दो दशक के अपने पत्रकारिता सफर के आधार पर ही इस पर चर्चा करता हूं। 2003-04 में आकाशवाणी छिंदवाड़ा के इंटरव्यू के दौरान का किस्सा है। वहां एनाउंसर, कंपेयर के रूप सबसे ज्यादा महिलाओं का ही सलेक्शन हुआ था। यह अच्छा संकेत माना जा सकता है कि लगभग 40 नियुक्तियों में 36 महिलाएं थी। 

जब मैंने 2003 में लोकमत समाचार छिंदवाड़ा ज्वाइन किया। वहां पर भी कोई महिला पत्रकार नहीं थीं। लोकमत ब्यूरो में लगभग 8-10 लोगों का स्टाफ था। भोपाल के स्वदेश समाचार पत्र में भी साल 2004 के दौरान कोई महिला पत्रकार नहीं थीं। अगले संस्थान सांध्य दैनिक अग्निबाण में जरूर एकमात्र महिला पत्रकार आरती शर्मा थीं। 

इसके बाद मेरे अगले संस्थान 'राज्य की नई दुनिया भोपाल' में एक महिला पत्रकार स्नेहा खरे की एंट्री हुई, इसमें छोटी सी भूमिका मेरी भी रही। मुझसे कहा गया था कि एक महिला पत्रकार चाहिए। उस वक्त स्नेहा किसी छोटे अखबार या मैग्जीन में थीं। इन दिनों वे मध्यप्रदेश के किसी सरकारी कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर है। सबसे बड़े समाचार पत्र दैनिक भास्कर में उन दिनों दो महिला पत्रकार काफी सीनियर थीं, जिनमें नीलम शर्मा और रानी शर्मा का नाम है। इसके अलावा दिव्याज्योति पाल जैसे और भी कुछ नाम है। साल 2007 में मैंने अमर उजाला नोएडा ज्वाइन किया। यहां कुछ साल बाद दिव्याज्योति पाल ने भी ज्वाइन किया था। इस बड़े संस्थान में आधा दर्जन के करीब महिला पत्रकार रही होगी। इधर दैनिक भास्कर रायपुर में फिलहाल एक महिला पत्रकार लक्ष्मी कुमार है, जो कि सिटी भास्कर में कार्यरत है। और मेरे नए संस्थान में कोई महिला पत्रकार नहीं है।। 

… तो महिला पत्रकारों की संख्या मीडिया में, खासकर प्रिंट मीडिया में काफी कम है। जब उन्हें मौका ही नहीं दिया जाएगा तो उनकी तादाद कैसे बढ़ेगी। महिला पत्रकारों को हमेशा हेल्थ बीट, एजुकेशन बीट या लाइफस्टाइल या आर्ट एंड कल्चर कवर करने के लिए ही कहा जाता है। बहुत कम नाम ऐसे होते हैं छोटे शहरों में, जिन्हें क्राइम बीट या पॉलिटिकल बीट या बड़ी और बीट भी दी जाती हो। 

दूसरा उन्हें समय-समय पर प्रमोशन भी नहीं मिलता। अगर वह देर तक काम करने को खुद तैयार हैं तो उन्हें इसकी भी इजाजत नहीं दी जाती। जबकि हम समानता की बात करते हैं तो आज के समय में महिला - पुरुष में कोई अंतर नहीं है। जितना श्रम पुरुष करते हैं, उतना ही श्रम महिलाएं भी कर सकती है। और करती ही है। अमर उजाला नोएडा में हम जब 2:30 बजे रात को ऑफिस से घर के लिए निकलते थे, तो हमारे साथ दो-तीन महिला पत्रकार हुआ करती थीं। बकायदा उनको सबसे पहले ड्रॉप किया जाता था। 

महिलाओं का ख्याल रखना। या महिलाओं की सुरक्षा का ध्यान रखना, यह सब तो जरूरी है ही लेकिन उन्हें अवसर प्रदान करना और उनकी योग्यता का यथोचित सम्मान करते हुए उन्हें आगे बढ़ाना भी जिम्मेदारी बनती है सभी संस्थानों की। लेकिन पत्रकारिता फील्ड ही क्यों, सभी सेक्टर इसमें पीछे ही रहते है। महिलाओं को पुरुषों के समान वेतन भी नहीं दिया जाता। और मौके तो क्या ही दिए जाएंगे। 

महिलाओं के नाम से कुछ सीनियर्स को 'डर' भी लगता है। इस वजह से भी उन्हें मौके नहीं दिए जाते। दूसरा महिलाओं पर इस तरह के आरोप भी लगाए जाते हैं कि वे आगे बढ़ने के लिए 'दूसरे' रास्ते अपनाती है। जबकि यह अपवाद ही होगा। आगे बढ़ना तो हर व्यक्ति चाहता है। लेकिन हम यह नहीं कह सकते कि कौन या सिर्फ महिला गलत रास्ते अपनाती है। पुरुष भी इस मामले में पीछे नहीं हैं, जो कि अपने बॉस, सीनियर्स की 'अनावश्यक तारीफ', चापलूसी, टीटीएम करके अपने नंबर बढ़ाने में लगे रहते हैं। जबकि उनका काम देखा जाए तो 'शून्य' होता है। वहीं महिलाएं काम के मामले में बहुत सिंसियर, ईमानदार होती है। वे हर टास्क को सिंसेरली पूरा करती है। जबकि पुरुष वर्ग के कई साथी हमेशा लापरवाही करते नजर आते हैं। 

अब हम मीडिया में हाई लेवल पर महिला पत्रकारों की संख्या गिनते हैं। तो पूरे इंडिया में दो-चार या आधा दर्जन नाम ही होंगे है, जो प्रिंट में संपादक के स्तर पर पहुंचे होंगे। लेकिन हम अगर हिंदी पत्रकारिता के प्रमुख राज्य चाहे वह यूपी-बिहार या मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब देखें तो अभी भी कोई बड़ा नाम हमें नजर नहीं आता। जो संपादक लेवल पर हो। हालांकि दैनिक भास्कर समूह ने अच्छी शुरुआत की है भोपाल में उपमिता वाजपेयी को स्थानीय संपादक बनाकर। अब एक साल में 50 महिला पत्रकारों की नियुक्ति के ऐलान ने नई उम्मीद जगाई है। दैनिक भास्कर समूह की यह बेहतरीन पहल दूसरे पत्रकारिता संस्थानों को भी प्रेरित करेगी कि अपने यहां ज्यादा से ज्यादा महिला पत्रकारों को स्थान दें। साथ ही उन्हें आगे बढ़ाने के लिए अवसर भी प्रदान करें। उन्हें पुरुषों के समान वेतन भी दें। 

(लेखक रामकृष्ण डोंगरे करीब दो दशक से प्रिंट मीडिया में सक्रिय है। आपने पत्रकारिता की शुरुआत मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के लोकमत समाचार से की थी। इन रायपुर छत्तीसगढ़ के प्रतिष्ठित अखबार में डीएनई के रूप में कार्यरत है।)

Wednesday, April 27, 2022

Bad Uncle: बैड अंकल से मम्मी को बचाओ, छत्तीसगढ़ महिला आयोग में नाबालिग बच्चियों ने लगाई गुहार

इस खबर को ध्यान से पढ़िए। यह बेहद महत्वपूर्ण खबर है। विवाहेत्तर संबंध (extramarital affairs) का दर्द बच्चों को किस तरह से झेलना पड़ता है। इसका सटीक उदाहरण है। 
छत्तीसगढ़ महिला आयोग (CHHATTISGARH Mahila Ayog) के पास कल एक अजीब मामला पहुंचा। इसमें दो बच्चियों ने आवेदन लगाया कि "बैड अंकल को हमारी मम्मी के पास से दूर करो"... रिपोर्टर ने इसी पंच लाइन से हमें इस खबर को बताया था।

पूरी खबर को देखने के बाद एहसास हुआ कि यह महत्वपूर्ण खबर है। इसलिए इसे प्रमुखता से प्रकाशित किया गया। 

मामला कुछ इस तरह है कि रायपुर नगर निगम Raipur Nagar Nigam में कार्यरत एक महिला के तीन बच्चे हैं, जिनमें दो बच्चियां है जो कि नाबालिग है। एक बेटा डेढ़ साल का है।

महिला अपने पति को छोड़कर किसी अन्य पुरुष के साथ रह रही है। उसने सिर्फ डेढ़ साल के बेटे को अपने पास रखा है। वहीं दोनों बेटियां अपने पिता के साथ है। महिला ने 4 महीने से अपना घर छोड़ दिया है। 

कहीं से कोई उम्मीद नहीं दिखाई दी तो *बेटियों ने इस मामले में महिला आयोग से गुहार लगाई है। उन्होंने कहा है कि हमारी मम्मी को वापस बुलाया जाए। और "बैड अंकल को हमारी मम्मी के पास से दूर किया जाए"...*

इस मामले की सुनवाई चल रही है। छत्तीसगढ़ महिला आयोग ने अब बाल संरक्षण आयोग को मामला सौंपा है।

आज यह खबर तमाम वेबसाइट और नेशनल न्यूज़ का हिस्सा बन गई है। 

पूरी खबर..... 

'बैड अंकल को हमारी मम्मी के पास से दूर करो'

रायपुर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। बैड अंकल को मम्मी से दूर रखने के लिए दो बच्चियों ने महिला आयोग से गुहार लगाई है। आयोग ने बच्चियों की मां को पति के पास वापस जाने के लिए काफी समझाया लेकिन वह नहीं मानी। बताया जा रहा है कि पिछले चार महीने से बच्चियों को पति के पास छोड़कर आज महिला दूसरे आदमी के साथ रहने लगी है। महिला आयोग ने मामले को बाल संरक्षण आयोग को सौंप दिया है। बुधवार को एकबार फिर इस मामले को सुलझाने का प्रयास होगा।

मंगलवार को दोनों बच्चियां महिला आयोग के सामने उपस्थित हुई और बैड अंकल को मम्मी से दूर रखने के लिए आवेदन प्रस्तुत किया। उन्होंने गुहार भी लगाई कि उनकी मम्मी को वापस बुलाया जाए। महिला नगर निगम जोन कार्यालय में एआरआइ के पद पर कार्यरत है। 

आयोग की अध्यक्ष डा. किरणमयी नायक ने मामले की गंभीरता को देखते हुये तत्काल रायपुर नगर निगम कमिश्नर को फोन कर महिला को बुलवाया। महिला के साथ जोन कमिश्नर को भी बुलाया गया। 

जोन कमिश्नर की मौजूदगी में महिला को समझाया गया कि वह अपने पति और बच्चों के पास चली जाए। समझाने के बावजूद महिला पर कोई असर नहीं हुआ और उसने स्पष्ट कह दिया कि वह पति के पास वापस नहीं जाएगी।

4 माह से बेटियों को छोड़ा, दूसरे आदमी संग रहने लगी

नगर निगम जोन कार्यालय में पदस्थ महिला के तीन बच्चे है। डेढ़ साल के बच्चे को अपने साथ लेकर वह दूसरे व्यक्ति के साथ रहती है। वहीं, 11 और सात साल की दो बेटियों को पिछले चार महीने छोड़ दिया है। बेटिया फिलहाल अपने पिता के पास है। दोनों मासूम बच्चिया कहती है कि मम्मी के बिना उन्हें कुछ भी अच्छा नहीं लगता है।

©® *पत्रकार रामकृष्ण डोंगरे की कलम से*
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Friday, April 22, 2022

Naidunia Story : मां- बाप के रिश्ते हुए खराब, 17 साल का नाबालिग आठ साल तक रहा अपनों की 'कैद' में

Please call... प्लीज कॉल...

मीडिया के साथियों को आने वाले फोन कॉल और ऐसे मैसेज कई बार किसी की कितनी मदद कर सकते हैं. इसका अंदाजा नहीं लगा सकते. अगर आपने समय पर उनका रिप्लाई कर दिया या उनसे बात कर ली तो....
📝 पत्रकार रामकृष्ण डोंगरे की कलम से... 

आज इस कहानी को शेयर कर रहा हूं. उसकी शुरुआत होती है 17 अप्रैल 2022 को जब मेरे एक परिचित का लगातार मेरे पास कॉल आ रहा था. जब मैं बात नहीं कर पाया तो मैंने व्हाट्सएप पर मैसेज छोड़ा कि... प्लीज व्हाट्सएप कीजिए... फिर 2 दिन बाद उनका फिर मैसेज आता है. क्या मैं बात कर सकता हूं. और इसी के साथ उनका एक टेक्स्ट मैसेज भी आ गया... 

मैसेज ये था... 

नमस्ते।

हमारे सोसाइटी में एक फैमिली है, जिसमें एक लड़का अपने रिलेटिव के साथ रहता है, उसकी मां कभी कभी आती, पर सब उसको बहुत मारते है और खाने भी नहीं देते, और भी बहुत तकलीफ देते है। उसको बाहर से ताला लगा के जाते है और कई बार बाथरूम में बंद रखते है, सोसाइटी के बच्चे उसकी मदद कर रहे , child abuse कॉल सेन्टर में कांटेक्ट किये थे पर मदद नहीं मिली।

कृपया मदद के लिए कोई NGO या कोई मदद करने वाले मिले तो बच्चे को निकाला जा सकता है। बच्चे ने बताया कि वो ऐसा पिछले 10 साल से झेल रहा है।
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मामले की गंभीरता को समझते हुए मैंने तत्काल क्राइम रिपोर्टर साथी @deepak Shukla दीपक शुक्ला जी को इसे फॉरवर्ड किया। उन्होंने भी बच्चे का मामला देख कर सीधे पुलिस अफसरों और संबंधित एजेंसी से संपर्क किया। आखिर एक-दो दिन की मेहनत के बाद बच्चे को गुरुवार को रेस्क्यू किया गया।

जो कहानी सामने आई वह आपकी आंखों में आंसू ला सकती है....

उस नाबालिग बच्चे ने 4 पेज का एक पत्र लिखा था, सोसाइटी के बच्चों के नाम। जिसमें उसने अपने आपको छुड़ाने के लिए गुहार लगाई थी। पत्र बेहद मार्मिक है....

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कहानी बहुत लंबी है. इस कहानी की शुरुआत एक हंसते खेलते परिवार से होती है। जहां एक बच्चा है उसके माता-पिता है। लेकिन उनके खराब रिश्तों की वजह से बच्चा पिछले 8 साल से अपने ही रिश्तेदारों की कैद में था। जहां उसे मारा पीटा जाता था। और हर तरह की तकलीफ दी जाती थी। इसमें उसकी सगी मां और उसके संबंधी शामिल थे।

शादी के कुछ समय बाद मां-बाप के खराब रिश्तों का खामियाजा इस बच्चे को भुगतना पड़ा। पिता ओडिशा चले गए। और मां ने भी बच्चे को यूं ही छोड़कर किसी और से शादी कर ली।

बच्चे से संपर्क रखा जरूर। लेकिन दूसरों को सौंप दिया गया। बच्चे को जिस तरह की यातना झेलनी पड़ी है, वह एक मार्मिक कहानी है। इससे सबक लिया जाना चाहिए। अगर हम अपने बच्चों को इस तरह से तकलीफ देंगे तो उनके मन में रिश्तों के प्रति क्या छवि बनेगी। वह अपने ही मां-बाप को लेकर क्या सोचेगा।

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राजधानी रायपुर की सोलस हाइट्स सोसायटी के जागरूक बच्चों और वहां के जागरूक रहवासियों को धन्यवाद और बधाई। उनके प्रयासों से ही इस बच्चे को कैद से आजाद कराया जा सका।

.... ऐसा ही उदाहरण हमें पेश करना चाहिए। दूसरों की मदद के लिए आगे आना चाहिए। और सभी अपार्टमेंट रहवासियों के लिए यह कहानी एक सबब भी है कि जब किसी को फ्लैट या मकान किराए पर देते हैं तो पुलिस वेरिफिकेशन जरूर करवाएं। इसके अलावा तमाम जांच पड़ताल के बाद ही किसी को फ्लैट मकान किराए पर दें वरना आप किसी भी तरह की मुसीबत में फंस सकते हैं।

©® रामकृष्ण डोंगरे, पत्रकार, रायपुर

THANKS to Satish Pandey Rajkumar Dhar Dwivedi deepak shukla 

Thursday, March 31, 2022

Goodbye Bhaskar : अलविदा भास्कर... दैनिक भास्कर के साथ अपनी पहली पारी को फिलहाल देता हूं विराम...

दैनिक भास्कर रायपुर में अपने 8 साल से ज्यादा लंबे सफर को फिलहाल विराम दे रहा हूं। सितंबर 2013 में मैंने दैनिक भास्कर रायपुर ज्वाइन किया था। यहां मैं बतौर "सिटी डेस्क हेड" अपनी जिम्मेदारी निभाता रहा। 

(दैनिक भास्कर रायपुर में आखिरी दिन। 31 मार्च 2022)

इस दौरान भास्कर रायपुर में कई चेंजेज हुए, कई बदलाव हुए… *बदलाव, परिवर्तन प्रकृति का नियम है, जिसे शायद ही कोई रोक पाया है। 

(परीक्षित त्रिपाठी जी के साथ) 

जब मैंने ज्वाइन किया था। तब श्री आनंद पांडेय जी, संपादक स्टेट एडिटर हुआ करते थे। उसके बाद श्री राजेश उपाध्याय सर आए और अब श्री शिव दुबे सर के मार्गदर्शन में दैनिक भास्कर रोज नई ऊंचाइयों को छू रहा है। 

(विनोद कुमार जी और आकाश धनगर) 

मेरी ज्वाइनिंग के बाद ही मुझे पता चला था कि श्री नवाब फाजिल सर यहां ज्वाइन कर रहे हैं। या ज्वाइन कर चुके हैं। वे ट्रेनिंग पर गए हुए थे। *नवाब सर चूंकि मेरे बॉस थे। इसलिए उनका मुझे हमेशा सपोर्ट मिला। शुक्रिया नवाब सर।* 

हमेशा से आकर्षित करते रहा है भास्कर 


मैं मूलतः जिला छिंदवाड़ा मध्यप्रदेश से हूं। बचपन में जरूर नवभारत, नईदुनिया या लोकमत अखबार पढ़ें होंगे। लेकिन जबसे मीडिया से जुड़ा हूं, दैनिक भास्कर हमेशा से आकर्षित करते रहा है। जब सन 2004 में मैं भोपाल पहुंचा तो मेरा भी सपना था दैनिक भास्कर में जॉब करना। उस वक्त दैनिक भास्कर मेरे लिए बहुत दूर की बात थी। मैंने सभी संस्थानों में अपना रिज्यूमे सबमिट किया। अंत में मुझे एक अन्य अखबार में मौका मिल गया। और इस तरह मेरा भोपाल में पत्रकारिता का सफर शुरू हुआ। जो कि लगभग 3 साल तक पार्ट टाइम और फुल टाइम चलता रहा। 

अमर उजाला नोएडा में थी 7 साल की पहली लंबी पारी 

(भाई मनोज व्यास और हम) 

साल 2007 में देश की राजधानी दिल्ली पहुंचा, जहां एक अन्य प्रतिष्ठित अखबार अमर उजाला दैनिक के साथ मेरी 7 साल की पारी रही। उसके बाद दूसरी सबसे लंबी पारी दैनिक भास्कर रायपुर के साथ ही थी, जो कि 16 सितंबर 2013 से लेकर 31 मार्च 2022 तक थी। 

भास्कर में ज्वाइनिंग अटक गई थी साल 2006-07 में 

(डीबी स्टार वाले संजय पाठक जी और उनकी टीम) 

भास्कर को अलविदा कहते वक्त मैं उन सभी लोगों को याद करना चाहूंगा, जिनमें तमाम वे संपादकगण और सीनियर साथी है, जो आज भास्कर में है या भास्कर छोड़ चुके हैं। जिनसे मुझे कुछ ना कुछ सीखने को मिला। जब 2006-07 में भास्कर भोपाल में मेरी ज्वाइनिंग की प्रक्रिया चल रही थी तब श्री श्रवर्ण गर्ग से मुलाकात हुई थी। श्री देवप्रिय अवस्थी सर से हमेशा सीखने को मिला। हालांकि उस वक्त किन्हीं कारणों से मेरी ज्वाइनिंग नहीं हो पाई थी। 

नवनीत सर से पहली मुलाकात रायपुर आफिस में हुई 

(पहले सिटी भास्कर और अब डिजिटल के स्टार सुमन पांडेय जी) 

श्री नवनीत गुर्जर सर से मेरी पहली मुलाकात श्री आनंद पांडेय जी ने रायपुर आफिस में ही करवाई थी। हालांकि सर का मैंने पहले से ही नाम सुन रखा था। भोपाल या मध्यप्रदेश में कार्यरत सभी सीनियर्स से मेरा थोड़ा या ज्यादा परिचय पहले से ही रहा है। 

(सिटी डेस्क का ये कोना अब छूट रहा है...  Goodbye) 

दैनिक भास्कर रायपुर में आने के बाद श्री आनंद पांडेय सर, श्री राजेश उपाध्याय सर, श्री शिव दुबे सर, श्री नवाब फाजिल सर, श्री यशवंत गोहिल जी और तमाम सीनियर्स और साथियों से सीखने और समझने का अवसर मिला। आप सभी का मैं तहेदिल से शुक्रिया अदा करता हूं. 

(भाई अभिषेक तिवारी) 

इसके अलावा और तमाम साथियों जैसे श्री निजामुद्दीन... निजाम भाई और वीरेंद्र शुक्ला जी, यशवंत गोहिल जी, निकष परमार जी, असगर भाई, ठाकुरराम यादव, मेरे दोस्त और भाई जैसे अमिताभ अरुण दुबे जी, पीलूराम साहू जी, प्रमोद साहू, सुधीर उपाध्याय, जॉन राजेश पाल सर, कौशल भाई, मनोज भाई, राकेश पांडेय जी, नीरज मिश्रा, राजीव शुक्ला जी, सतीश चंद्राकर, सुमयकर, फोटो जर्नलिस्ट भूपेश केसरवानी जी, सुधीर सागर मैथिल जी, सिटी भास्कर टीम से तन्मय अग्रवाल, मनीष, अनुराग, लक्ष्मी मैडम, रीजनल से परीक्षित त्रिपाठी जी, अभिषेक, डिजिटल टीम से श्री विश्वेश ठाकरे सर, सुमन पांडेय भाई, मिथिलेश जी और सिटी डेस्क टीम से डिजाइनर तरुण साहू, विजय जी, विनोद कुमार जी, आकाश, गौरव, डिजाइनिंग टीम से युनूस अली, विपिन पांडेय, प्रवीण, हेमंत साव, हेमंत साहू, धर्मेंद्र वर्मा, बब्बू जी तमाम साथियों का मुझे स्नेह मिला। सहयोग मिला। समर्थन मिला। 

आप सभी से मुझे जो प्यार-स्नेह और आशीर्वाद मिला है, यही मेरे जीवन की अमूल्य पूंजी है। इसे मैं ताउम्र संजोकर रखूंगा।

Friday, December 3, 2021

DNE FB Post : ट्रेनी से डीएनई तक का सफर

दैनिक भास्कर रायपुर से पहले मेरा सबसे लंबा समय हिंदी दैनिक अमर उजाला नोएडा में बीता। माखनलाल पत्रकारिता यूनिवर्सिटी भोपाल से 2005 साथ में एमजे की डिग्री कंप्लीट होने के बाद हमारा कैंपस अमर उजाला में हुआ था। मैंने 7 मई 2007 को अमर उजाला, नोएडा ज्वाइन किया था। प्रताप सोमवंशी सर ने हमारा कैंपस भोपाल आकर लिया था। जॉइनिंग के दिन हमारा इंटरव्यू ग्रुप एडिटर श्री शशि शेखर जी ने लिया था। 

उस दौरान काफी सारे क्वेश्चन पूछे गए थे. मेरा एक्सपीरियंस जानने के बाद मैंने उनसे कहा कि आप मुझे Sub Editor ज्वाइन करवाएं तो उन्होंने इंकार कर दिया था. और मुझे नए सिरे से बतौर ट्रेनी यहां से नई शुरुआत करनी पड़ी। हालांकि इससे पहले मैं करीब आधा दर्जन संस्थानों में काम कर चुका था। यानी पत्रकारिता में अलग अलग फील्ड की रिपोर्टिंग और डेस्क पर काम करने का लगभग 3 साल का अनुभव मुझे हो चुका था। लेकिन इन संस्थानों में मेरा जॉब पार्ट टाइम जैसा ही रहा। क्योंकि मैं पढ़ाई के साथ ये काम कर रहा था। 

साल 2003 में लोकमत समाचार पत्र छिंदवाड़ा से शुरुआत रिपोर्टिंग से हुई। इसके बाद 2004 में स्वदेश समाचार पत्र भोपाल में रिपोर्टिंग के साथ डेस्क की जिम्मेदारी मिली। बीच में कुछ वक्त "शब्द शिल्पियों के आसपास" में काम किया। इसके बाद 2005 में सांध्य दैनिक अग्निबाण में आर्ट एंड कल्चर रिपोर्टर के रूप में काम किया। साल 2006 में राज्य की नई दुनिया में आर्ट एंड कल्चर रिपोर्टर और डेस्क की जिम्मेदारी निभाई। 

*अब बात विस्तार से करते हैं अमर उजाला नोएडा की...*

यहां पर हमने बतौर ट्रेनी ज्वाइन किया. सबसे पहले मुझे बिजनेस  डेस्क पर रखा गया। इसके बाद जनरल डेस्क पर मेरी नियुक्ति की गई। जहां मुझे सबसे ज्यादा समय तक काम करने का मौका मिला। 

अमर उजाला का हेड ऑफिस नोएडा में था। इसीलिए मुझे उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर आदि राज्यों के एडिशन से कोडिनेट करना पड़ता था। हमारी टीम में दो से चार साथी ही थे। लेकिन सबसे शुरुआत से जुड़े होने की वजह कई बार बॉस की अनुपस्थिति में मुझे ही जिम्मेदारी संभालनी पढ़ती थी। इसी दौरान श्री राम शॉ जी जनरल डेस्क में शामिल हुए थे। वे पेज वन पर भी काम करते थे। लेकिन बॉस के नहीं रहने पर वे मेरे साथ भी होते थे। 

*मेरे बॉस चूंकि DNE थे. और मैं ट्रेनी था तो वे (श्री राम शॉ) मुझे कहते थे कि तुमको तो ट्रेनी नहीं DNE होना चाहिए... क्योंकि आप ट्रेनी होकर डीएनई का काम करते हो...खैर...।*

जनरल डेस्क पर मेरे सहयोगी थे - चंद्रशेखर राय जी, धर्मनाथ प्रसाद जी, मनीष मिश्रा जी, हरिशंकर त्रिपाठी जी, मनीष, दीपक कुमार जी आदि। और बॉस थे राधारमण जी। 

अमर उजाला नोएडा में मुझे ग्रुप एडिटर श्री शशि शेखर जी, श्री देवप्रिय अवस्थी सर, संजय पांडेय जी, श्री निशीथ जोशी जी, श्री शंभूनाथ शुक्ला जी, श्री यशवंत व्यास जी, श्री राधारमण सर, श्री अरुण आदित्य सर, श्रीचंद सर, श्री भूपेन जी, श्री आलोक चंद्र जी आदि का सानिध्य मिला। यहां मैंने बतौर ट्रेनी ज्वाइन किया. उसके बाद सब एडिटर और सीनियर सब एडिटर बना।

पत्रकारिता में मेरे पहले मार्गदर्शक बड़े भैया जगदीश पवार जी हैं, जिन्होंने मुझे इस राह पर चलने के लिए प्रेरित किया. लोकमत समाचार छिंदवाड़ा में श्री धर्मेंद्र जायसवाल के नेतृत्व में बतौर ट्रेनी काम करने के दौरान ही मुझे छिंदवाड़ा दैनिक भास्कर के लिए ऑफर मिला. मुझे परासिया ब्लॉक में ब्यूरो चीफ की जिम्मेदारी दी जा रही थी। लेकिन चूंकि में MA फाइनल ईयर में था. मैंने इस ऑफर को अस्वीकार कर दिया. उसके बाद मुझे दैनिक भास्कर से जुड़ने में कई साल लग गए। जब मैं भोपाल पहुंचा तो ज्यादा किसी से पहचान ना होने के चलते मैंने एक के बाद एक सारे समाचार पत्रों में अपना रिज्यूमे दिया। जहां मुझे स्वदेश समाचार पत्र में तत्काल ही जॉब मिल गई। 3 साल भोपाल में रहने के दौरान मेरा सभी समाचार पत्र के साथियों के साथ परिचय हो गया था।

भोपाल में अलग-अलग संस्थानों में काम के दौरान मुझे श्री अवधेश बजाज जी, अजय बोकिल जी, विनय उपाध्याय जी, पंकज शुक्ला जी, गौरव चतुर्वेदी जी, गीत दीक्षित जी के साथ काम करने और सीखने का मौका मिला। 

भोपाल में मेरे कई साथ रहे… जैसे श्री संजय पांडेय जी, हरीश बाबू, जितेंद्र सूर्यवंशी, निश्चय कुमार बोनिया, जुबैर कुरैशी, खान आशु भाई आदि। श्री संजय पांडे जी, जो इन दिनों जमशेदपुर दैनिक भास्कर में बतौर स्थानीय संपादक कार्यरत है. वे मेरे बड़े भाई और मार्गदर्शक है। दैनिक भास्कर रायपुर में मुझे ज्वाइन कराने में उनका बड़ा योगदान रहा है। 

आज जबकि में प्रमोट हुआ हूं तो यह खुशी आप सभी के साथ शेयर कर रहा हूं। आप सभी मेरी इस सफलता में सहभागी रहे है।

DNE - Dis (this) is Not the End...

this is just the beginning

अभी तो शुरुआत है…

तो सफलता का यह सिलसिला यूं ही चलता रहे. और आप सभी का स्नेह, आशीर्वाद मुझे मिलता रहे. यही कामना करता हूं… इसी के साथ उम्मीद करता हूं कि और भी नए दोस्त और सीनियर साथी मेरे इस कारवां का हिस्सा बनेंगे…

#DNE_POST #Facebook #डोंगरे_की_डायरी #फेसबुक_पोस्ट 


Friday, December 2, 2016

दैनिक भास्कर रायपुर में प्रकाशित खबरें : नोटबंदी पर विभूति की कविताएं


लाखों तक पहुंची विभूति की कविता, देश बदल रहा है, आप कब बदलोगे...

नोटबंदी के पक्ष में सोशल मीडिया पर कई कविताएं काफी वायरल हो रही हैं। इनमें से कुछ कविताएं हमारे शहर की मूल निवासी युवा कवयित्री विभूति दुग्गड़ मुथा की भी हैं।
उनकी ज्यादातर कविताएं अभी वीडियो के रूप में ही मौजूद हैं। देशभर में सबसे ज्यादा शेयर हो रही उनकी कविता, बदलाव भी चाहते हैं और बदलना भी नहीं चाहते... को अब तक डेढ़ लाख से ज्यादा लोगों ने देखा है। उनके यूट्यूब चैनल और फेसबुक पेज से लोग वीडियो डाउनलोड करके शेयर कर रहे हैं। केंद्र सरकार के विमुद्रीकरण के फैसले को लेकर लोगों में उम्मीद जगाने वाली इन कविताओं ने लोगों के दिलों को छू लिया हैउनकी कुछ कविताओं की बानगी देखिए- जुगाड़ लगाना है तो सही जगह लगाओ, क्या-क्या बंद करोगे, लोगों की आवाज कैसे बंद करोगे, नहीं मैं नेता नहीं बनना चाहती, देश बदल रहा है, आप कब बदलोगे....।

दैनिक भास्कर रायपुर में प्रकाशित खबरें : राजीव सिंह

20 जून 2016 को प्रकाशित खबरें
वर्दी पहनने का सपना टूटा मगर अब खुद ही अफसरों को दे रहे हैं ट्रेनिंग
  • बिहार के राजीव सिंह आईपीएस, डिप्टी कलेक्टर्स व डीएसपी को दे रहे प्रशिक्षण
वे बचपन से खाकी वार्दी पहनकर देश और समाज की सेवा करने का सपना देखते थे, जब उनका सपना पूरा नहीं हुआ तो खुद अफसरों को ट्रेनिंग देने लगे। एक अच्छी जिद की ये कहानी है 32 वर्षीय युवा राजीव सिंह की। विजिटिंग प्रोफेसर, स्वतंत्र पत्रकार और पुलिस-पब्लिक-मीडिया संबंध विशेषज्ञ राजीव छत्तीसगढ़ पुलिस अकादमी में आईपीएस और डीएसपी को व्यवहार, पर्सनाल्टी डेवलपमेंट और कम्युनिकेशन स्किल की ट्रेनिंग दे चुके हैं। इसके अलावा वे मध्यप्रदेश पुलिस अकादमी में भी प्रशिक्षण दे चुके हैं। वे बताते हैं कि बारह से ज्यादा इंटरव्यू में फेल होने से निराश हो चुके माता-पिता अब उनके कामों को देखकर धीरे धीरे खुश होने लगे है। पढ़िए उनकी कहानी उन्हीं की जुबानी… 

Sunday, November 27, 2016

विभूति का सवाल : देश बदल रहा है, आप कब बदलोगे...

युवा कवयित्री विभूति दुग्गड़ मुथा
  • दुबई में रह रहीं रायपुर की युवा कवयित्री विभूति मुथा की कविताओं ने लोगों के दिलों को छुआ
  • लोगों ने कविताओं के वीडियो को वाट्सएप, फेसबुक और यूट्यूब पर खूब शेयर किया
रामकृष्ण डोंगरे

रायपुर। नोटबंदी के पक्ष में सोशल मीडिया पर कई कविताएं काफी वायरल हो रही हैं। इनमें से कुछ कविताएं हमारे शहर की मूल निवासी युवा कवयित्री विभूति दुग्गड़ मुथा की भी हैं। उनकी ज्यादातर कविताएं अभी वीडियो के रूप में ही मौजूद हैं। देशभर में सबसे ज्यादा शेयर हो रही उनकी कविता, बदलाव भी चाहते हैं और बदलना भी नहीं चाहते...को अब तक डेढ़ लाख से ज्यादा लोगों ने देखा है। उनके यूट्यूब चैनल और फेसबुक पेज से लोग वीडियो डाउनलोड करके शेयर कर रहे हैं।
केंद्र सरकार के विमुद्रीकरण के फैसले को लेकर लोगों में उम्मीद जगाने वाली इन कविताओं ने लोगों के दिलों को छू लिया है। उनकी कुछ कविताओं की बानगी देखिए- जुगाड़ लगाना है तो सही जगह लगाओ, क्या-क्या बंद करोगे, लोगों की आवाज कैसे बंद करोगे, नहीं मैं नेता नहीं बनना चाहती, देश बदल रहा है, आप कब बदलोगे....

छत्त्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कलेक्टोरेट के पीछे स्थित रविनगर निवासी समाजसेवी विजय दुग्गड़ और साधना दुग्गड़ की बेटी विभूति इन दिनों दुबई में रहती हैं। मोटिवेशनल ट्रेनर विभूति बताती हैं कि 8 नवंबर को प्रधानमंत्री मोदी ने जब इस फैसले का ऐलान किया तो देशभर में काफी चर्चाएं होने लगीं। इनमें दोनों तरफ से लोगों की प्रतिक्रिया आ रही थी। मुझे लगा कि पहली बार हमारे देश में किसी नेता ने इस दिशा में गंभीरतापूर्वक सोचा है। तब मैंने 12 नवंबर को इस पर पहली कविता लिखी- बदलाव भी चाहते हो और बदलना भी नहीं चाहते... इस कविता को हजारों लोगों ने पसंद किया। मेरे फेसबुक पेज और यूट्यूब चैनल पर लोगों के काफी अच्छे कमेंट्स आए। इसके बाद मैंने कई कविताएं लिखीं।

बुजुर्ग सीए ने फोन करके आशीर्वाद दिया
विभूति ने बताया कि उनसे देश के कई शहरों से लोग संपर्क कर रहे हैं। अहमदाबाद के एक बुजुर्ग सीए ने उन्हें फोन करके कहा कि बिटिया आपकी कविता ने मुझे झकझोर दिया है। आप लोगों को प्रेरित कर रही हैं। मेरी शुभकामनाएं और आशीर्वाद आपके साथ है। वे कहती हैं कि अहमदाबाद, हैदराबाद, बेंगलूरू, जयपुर, रायपुर, मुंबई, दिल्ली, चेन्नई,वडोदरा से लोग वाट्सएप के स्क्रीनशॉट टैग कर रहे हैं। फेसबुक मैसेंजर पर भेज रहे हैं।

बेटी ने देश के लिए लिखा, बहुत खुश हूं
विभूति के पिता विजय दुग्गड़ कहते हैं, बेटी ने दुबई में रहकर भी देश के माहौल को लेकर सोचा और अच्छी कविताएं लिखीं, मैं बहुत खुश हूं। हमें गर्व है। मैंने विभूति का वीडिया अपने मित्रों को भी भेजा है, सभी उसे पसंद कर रहे हैं।

2004 से लिख रहीं कविताएं
मोटिवेशनल कविताओं के सफर के बारे में विभूति ने बताया कि उन्होंने 2004 से कविताएं लिखना शुरू किया। इसकी प्रेरणा उन्हें अपने कॉलेज में एक सहपाठी से मिली। उनके यूट्यूब चैनल को 2 हजार 62 लोगों ने सब्सक्राइब किया है। बदलाव वाली कविता को डेढ़ लाख से ज्यादा पेज व्यू मिले हैं। वहीं, जुगाड़ वाली कविता को अब 50 हजार लोगों ने पसंद किया है।
  1. यूट्यूब चैनल को 2062 लोगों ने सब्सक्राइब किया है।
  2. बदलाव वाली कविता को डेढ़ लाख से ज्यादा पेज व्यू मिले है।
  3. जुगाड़ वाली कविता को अब 50 हजार लोगों ने पसंद किया है।
  4. सभी कविताओं को अब तक चार लाख से ज्यादा लाइक-कमेंट्स।
विभूति का फेसबुक पेज
https://www.facebook.com/poetrywithpurposebyvibhuti/

दैनिक भास्कर रायपुर में रामकृष्ण डोंगरे की रिपोर्ट, 27 नवंबर, 2016

Monday, April 4, 2016

दशक बीत गए... गांवों में बचपन अब भी नंगे पांव

दैनिक भास्कर रायपुर, 3 अप्रैल, 2016

दशक बीत गए... बचपन अब भी नंगे पांव

दैनिक भास्कर रायपुर में प्रकाशित फोटो जर्नलिस्ट सुधीर सागर की इस तस्वीर ने तीन दशक पहले बीते बचपन की याद को ताजा कर दिया। खास तौर पर स्कूल के दिन। साल 1985 से 1990 के प्राइमरी स्कूल के दिन। जब कई बच्चे नंगे पांव ही स्कूल जाते थे। मार्च-अप्रैल-मई की लू जैसी गर्मी में धूप से बचने के लिए दौड़ लगाते थे। गुलमोहर के पेड़ के नीचे खड़े होते थे। सड़क के किनारे चलते वक्त धूब यानी घास वाली जगह पर पैर रखकर चलते थे। सिर पर बस्ता भी रखते थे..... कितना मशक्कत होती थी तेज धूप से बचने के लिए। ये सच है कि कई बच्चों को पहनने के लिए जूते-चप्पल तक नहीं मिलते थे। बाद में पैरागाॅन, लखानी की चप्पलें आ गई। ....मगर कितने माता-पिता इन्हें बार-बार खरीदकर दे पाते थे। क्योंकि बच्चे तो चप्पल तोड़ेंगे ही।

तीन दशक बीत चुके हैं कि मगर गांव भी हालत सुधरे नहीं है। फिर गांव चाहे किसी भी राज्य के हो। मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ या यूपी-बिहार। इसके लिए कौन जिम्मेदार है। गांव में बचपन आज भी अभावों में बीत रहा है।



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Wednesday, March 16, 2016

दैनिक भास्कर रायपुर में प्रकाशित खबरें : जिद्दी इंडियन

दैनिक भास्कर के रायपुर एडिशन में 5 फरवरी, 2016 को प्रकाशित।
लोगों को हादसों से बचाने के लिए सड़कों पर उतर गए जिद्दी इंडियन
जिद फॉर चेंज के सदस्यों का जयस्तंभ चौक और शास्त्री चौक पर अभियान,
कोर ग्रुप में अभी 12 सदस्य लेकिन मुहिम से जुड़ चुके हैं सैकड़ों लोग
रायपुर| रात में डिपर का प्रयोग करें... , मोबाइल ऑफ, सीट बेल्ट ऑन..., यूज यूअर हेलमेट..., इस तरह के बैनर लेकर कुछ युवा इन दिनों रात में राजधानी के चौराहों पर नजर आ रहे हैं। इन लोगों का मकसद जागरुकता लाना है, ताकि सड़क हादसों में किसी की जान न जाएं। इस मुहिम से अब तक 300 लोग जुड़ चुके हैं। 

Monday, September 14, 2015

दैनिक भास्कर में प्रकाशित खबरें : पवन दुग्गल से बातचीत

जाने माने साइबर लॉ एक्सपर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट के वकील पवन दुग्गल ने छत्तीसगढ़ के लोगों को साइबर ठगी से बचाने के लिए दिए टिप्स
दैनिक भास्कर, 27 दिसंबर, 2014 को प्रकाशित
दुर्ग में ऑनलाइन धोखे के बाद पति-पत्नी की खुदकुशी से पूरा राज्य सकते में हैं। राज्य के बड़े शहरों से लेकर गांवों तक, ऑनलाइन ठगों का जाल बुरी तरह फैल गया है। अमूमन हर मोबाइल फोन पर हजारों-लाखों डॉलर के पुरस्कार से लेकर संपत्ति नाम कराने के मैसेज और मेल रहे हैं।
यही नहीं, बैंक अफसर बताकर एटीएम और क्रेडिट कार्ड का पासवर्ड लेने वाले साइबर ठगों ने राज्यभर में दर्जनों लोगों के खाते खाली किए हैं। पुलिस ही नहीं, साइबर मामलों के जानकारों का साफ तौर पर मानना है कि साइबर क्राइम का शिकार कोई भी हो सकता है। जरूरत सिर्फ सावधान रहने की है। दैनिक भास्कर ने देश के जाने वाले साइबर लॉ एक्सपर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट के वकील पवन दुग्गल से बातचीत कर यह पता लगाने की कोशिश की है कि आखिर साइबर अपराधियों से किस तरह सुरक्षित रह सकते हैं

दैनिक भास्कर में प्रकाशित खबरें : छत्तीसगढ़ में नक्सली हमला


दैनिक भास्कर रायपुर, 4 दिसंबर, 2014
नक्सलियों ने सुकमा जिले में ही 1 दिसंबर, 2014 को फिर एक बड़ी वारदात को अंजाम दिया। चिंतागुफा से 11 किमी दूर एलमागुंडा पंचायत के कसलपाड़ गांव को घेरने पहुंचे सीआरपीएफ जवानों पर घात लगाए नक्सलियों ने अंधाधुंध फायरिंग कर दी। हमले में सीआरपीएफ के असिस्टेंट कमांडेंट राजेश कपूरिया और डिप्टी कमांडेंट बीसी वर्मा समेत 14 जवान शहीद हो गए।

कानपुर की मासूम के सिर से कुछ महीने पहले मां का साया उठा, सुकमा के नक्सली हमले में पिता की शहादत ने उसे पूरी तरह तन्हा कर दिया। कहीं चार बहनें अपने इकलौते भाई को तकती रहीं, तो कहीं शादी से पहले ही जीवनसाथी छूट गया। आठ शहरों में शहीदों के शव पहुंचे तो भास्कर ने वहां का दर्द महसूस किया। उन्हीं शहरों से रिपोर्ट।

Tuesday, August 25, 2015

दैनिक भास्कर में प्रकाशित खबरें : पेंटर बिस्वाल से बातचीत

चूल्हे के कोयले से पेंटिंग करते थे बिस्वाल, पीएम ने की थी तारीफ

"गुजारे के लिए नौकरी जरूरी है। मैं कर भी रहा हूं। लेकिन पेंटिंग मेरी जिंदगी के लिए बेहद जरूरी है। पढ़ाई के बाद कोई भी नौकरी करने का प्रेशर फैमिली की ओर से रहा। इसलिए मैंने 1990 में रेलवे की नौकरी ज्वाइन की। रेलवे में टीटीई की नौकरी के दौरान तमाम रेलवे स्टेशनों में वक्त गुजारने का मौका मिला। मेरी सबसे ज्यादा खूबसूरत और मशहूर पेंटिंग्स में रेलवे प्लेटफार्म्स के दिलकश नजारे शामिल हैं।"

यह कहना है रेलवे में टीटीई और वरिष्ठ चित्रकार बिजय बिस्वाल का ... पूरा इंटरव्यू पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर डॉट कॉम पर यहां क्लिक कीजिए.... 

 
दैनिक भास्कर, रायपुर में 27 अगस्त, 2015 को प्रकाशित।

दैनिक भास्कर, रायपुर में 27 अगस्त, 2015 को प्रकाशित।

दैनिक भास्कर में प्रकाशित खबरें : अमिताभ बच्चन के 12 हमशक्ल


दैनिक भास्कर में 11 सितंबर, 2014 को सभी एडिशन में प्रकाशित खबर।
दैनिक भास्कर में 11 सितंबर, 2014 को सभी एडिशन में प्रकाशित खबर।
दैनिक भास्कर के जलगांव एडिशन में 11 सितंबर, 2014 को प्रकाशित खबर।

  बिग बी के 12 हमशक्ल, चेहरे से लेकर स्टाइल तक सब कुछ हूबहू                     

उनकी आवाज... उनका अंदाज... और उनका स्टाइल देखकर कोई भी उन्हें बॉलीवुड अभिनेता अमिताभ बच्चन समझ लेता है। वे जहां भी निकल जाते हैं लोगों की भीड़ लग जाती है। ये हैं बिग बी के डुप्लीकेट्स। हिंदी सिनेमा के महानायक अमिताभ की आकर्षक छवि और लोकप्रियता ने उनके कई हमशक्ल पैदा कर दिए हैं। देशभर में उनके एक दर्जन से ज्यादा डुप्लीकेट हैं। ये सभी डुप्लीकेट्स शनिवार को बिग बी का 72 वां जन्मदिन धूमधाम से मनाने की तैयारी कर रहे हैं।             

...... दैनिक भास्कर डॉट कॉम पर पूरी स्टोरी पढ़ने के लिए यहां क्लिक कीजिए

Sunday, July 12, 2015

वो क्रांतिकारी पत्रकार ! रहन दें अपनी क्रांति


क्रांति और पत्रकारिता। दोनों अलग-अलग है। क्रांति अलग। पत्रकारिता अलग। कभी रहे होंगे दोनों साथ-साथ। मगर अब नहीं। आजकल बात-बात में एक जुगला चलता है- वो क्रांतिकारी पत्रकार ! रहन दें हमें कोई क्रांति नहीं करनी है।

पत्रकारिता के अब तब के सफर काफी कुछ देखा-सुना है। यूपी में एक जमाने में, मायावती के टाइम पर रोज पेजवन पर स्टेट पेज माया मेडम का फोटो छपता था। एमपी में उमा भारती के जमाने में सब उमा की मर्जी से होता था।

कोई क्रांतिकारी पत्रकार अगर फील्ड में झक मारके बड़ी खबर लेकर आ भी जाए तो पब्लिश होते तक उसका कचूमर निकलना तय होता है। अगर मैनेजमेंट तक बात पहुंच गई तो। कई किस्से है। भोपाल में नामी अखबार की एक रिपोर्टर का रो-रोकर बुरा हाल था....क्योंकि उसकी रिपोर्ट को पैसों का लेन-देन करके रोक दिया गया था। सवाल पूछने पर उठता उसे ही प्रताड़ित किया गया।

पहले अखबार में सबसे बड़ा क्रांतिकारी संपादक ही होता था। उसने सोच नहीं तो क्रांति को पैदा होने होने से कोई नहीं रोक सकता। भोपाल में मेरा दूसरा अखबार सांध्य दैनिक अग्निबाण था। संपादक थे दबंग पत्रकार अवधेश बजाज सर। मेरी एक खबर पर मुझे धमकी मिल रही थी। मैंने बजाज सर ये बात डिस्कस की। उन्होंने कहा -जो लिखना है लिखो। किसी से डरने की जरूरत नहीं है। संपादक तो ऐसा ही होना चाहिए।
लेकिन अब माहौल बदल रहा है। संपादक सिर्फ संपादक नहीं रहा। मैनेजिंग एडिटर हो गया है। अब आपको हर चीज मैनेज करके काम करना है। इसी का परिणाम है कि एक ही शहर में सेकंड नंबर का अखबार क्रांति कर सकता है। दूसरा बड़ा अखबार न्यूट्रल हो जाता है। जहां आपकी कंपनी के हितों की बात आ जाए वहां कुछ और। आप सोच भी कैसे सकते है।

हमने तो पहले ही कहा- क्रांति और पत्रकारिता। दोनों अलग-अलग है जनाब। आप जमाने में रहते हैं। क्रांति कहीं नहीं है। अगर कहीं है तो केजरी बाबू की डिक्शनरी में।
.....जारी है

Wednesday, September 4, 2013

पत्रकारिता में मेरे दस साल...

अपने संग्रह के साथ मेरी तस्वीर, वर्ष 2001
पत्रकारिता में मेरी एंट्री साल 2003 में लोकमत समाचार के छिंदवाड़ा ब्यूरो से हुई। इस लिहाज से साल 2013 आते ही इस क्षेत्र में मेरे दस साल पूरे हो गए। पीछे लौटकर देखने या 'क्या खोया, क्या पाया' का आकलन करने का फिलहाल वक्त नहीं है। फिर भी उस वर्ष का यहां विस्तार से जिक्र करना चाहता हूं। लेकिन पहले एक बात बताना लाजिमी समझता हूं कि लोकमत से जुड़ने का आईडिया मुझे वरिष्ठ पत्रकार जगदीश पवार ने दिया था।

लोकमत के लिए ट्रेनी रिपोर्टर के रूप में मैंने 21 जुलाई को चार खबरें लिखी। जिनमें थी- आकाशवाणी और एआईआर एफएम गोल्ड, प्रोजेक्ट ज्ञानोदय, दीनदयाल पार्क के पास का सब्जी बाजार और पीको फॉल बना रोजगार। उस समय लोकमत के ब्यूरो चीफ थे श्री धर्मेंद्र जायसवाल जी, सिटी रिपोर्टर पंकज शर्मा, मैं और अंशुल जैन। 25 जुलाई को शायद लोकमत में मेरी पहली न्यूज छपी, श्रोताओं की पसंद-नापसंद में उलझा विविध भारती की जगह एफएम गोल्ड। 28 जुलाई को एक और न्यूज प्रकाशित हुई पीको फॉल बना रोजगार..। इसके बाद लगातार कई खबरें छपी। फोटोग्राफर बाबा कुरैशी जी को कैसे भूल सकता हूं जो मेरी खबरों के लिए फोटो लाया करते थे। इस दौरान मैंने सबसे पहले जाना कि फोटो भी मैनेज की जाती है। पंकज भाई मेरी खबरें एडीट किया करते थे।

खबर लिखने से पहले छपी थी मुझ पर खबर...
भाई अमिताभ दुबे ने साल 2000 या 2001 में मुझ पर एक खबर लिखी थी। जो कि मेरे सिक्कों, डाक टिकटों और पुरानी चीजों के कलेक्‍शन पर थी। इस खबर को पढ़कर मुझमें एक नया जोश पैदा हुआ था। शायद यहीं से मेरे अंदर प्रतिभाओं की खबरों को न्यूज पेपर में बेहतर जगह देने की इच्छा पैदा हुई थी। आज भी जब किसी ऐसे यूथ की खबर आती है तो उसकी प्रतिभा की कद्र करने का मन करता है।

खबरें लिखने का सिलसिला मैंने सन् 2001 से ही शुरू कर दिया था, जब साहित्यिक संस्‍था 'अबंध' के समाचार लिखकर अखबारों में देता था। इसके अलावा डीडीसी कॉलेज और पीजी कॉलेज के यूथ फेस्टिवल के समाचार भी मैंने 2000-2002 के बीच में लिखे। इसके अलावा भोपाल से प्रकाशित 'सुखवाड़ा' और संवाद पत्रिका 'शब्द शिल्पियों के आसपास' के लिए अवैतनिक रूप से संवाददाता के रूप में भी इसी दौरान जुड़ गया था।

जब मिली पत्रकारिता में न आने की सलाह...
28 जुलाई को ही वरिष्ठ पत्रकार गुणेंद्र दुबे जी से मुलाकात हुई। उन्‍होंने मीडिया में न आने वाली सलाह दोहराई- 'पत्रकारिता में क्यों आना चाहते हो, हिंदी से एमए कर रहे हो... प्रोफेसर बनो।' मगर मेरे अंदर तो जुनून सवार था मीडिया को लेकर। रेडियो सुन-सुनकर पहले आकाशवाणी में कॅरियर देखते दिन बीते, जब वहां से नाउम्मीद हुए तो अखबारी दुनिया में ही कूद पड़े। 2 अगस्त, 2003 को ही परासिया ब्यूरो चीफ के लिए भास्कर का ऑफर मिला। मगर काफी सलाह मशवरे के बाद मैंने एमए फाइनल की पढ़ाई पूरी करने का हवाला देते हुए ऑफर को प्रेमपूर्वक अस्वीकार कर दिया। यह ऑफर मुझे मिला था गिरीश लालवानी जी के जरिए।

अगले दस सालों की दास्तान काफी लंबी है। जिस पर विस्तार से फिर कभी बात करूंगा। फिलहाल उन पड़ावों का सिर्फ जिक्र। 2004 में एमए कम्‍प्लीट करने के बाद जुलाई में छिंदवाड़ा से राजधानी भोपाल आ गया। 14 जुलाई को दैनिक स्वदेश ज्वाइन किया। यहां रिपोर्टिंग और डेस्क दोनों काम शामिल थे। 2005 में संपादक अवधेश बजाज की सांध्य दैनिक अग्निबाण की टीम में शामिल हो गया। यहां आर्ट एंड कल्चर और जनरल रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी मिली। इसी साल माखनलाल राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि में एडमिशन लिया। फिर 2006 में राज्य की नईदुनिया में आ गया। यहां अजय बोकिल जी, आशीष्‍ा दुबे, पंकज शुक्ला, विनय उपाध्याय जी से काफी कुछ सीखने को मिला। 2007 में माखनलाल से एमजे पूरा करते ही कैंपस के जरिए दिल्ली आ पहुंचा। यहां अमर उजाला, नोएडा में नई पारी की शुरुआत हुई। जो अब तक जारी है।

मेरी पत्रकारिता पर कुछ और बातें पढ़ने के लिए यहां क्लिक कीजिए

Friday, March 8, 2013

कुछ बातें, कुछ लोग (पार्ट-सेवन)

एफआईआर भ्रष्टाचार का हथियार


पहले शॉट में-
नई दुनिया, भोपाल, 6 मार्च, 2007
नई दुनिया अखबार में प्रकाशित इस लेख को मैंने भोपाल में क्राइम बीट पर काम करने के दौरान हुए अनुभव के बाद ‌लिखा था। मैंने साल 2006 में राज्य की नई दुनिया में काम किया गया। इसमें मेरा ज्यादातर डेस्क वर्क ही होता था, लेकिन इसके अलावा मुझे क्राइम की खबरों में पंकज शुक्ला जी के साथ काम करना होता था। इस दौर की दिलचस्प बात यह है कि मेरे दोस्त और सीनियर मुझे कहते थे- कला से क्राइम तक डोंगरे जी। यानी पहले कला संवाददाता हुआ करता था फिर क्राइम रिपोर्टर। अब बात मुद्दे पर। जैसा कि अ‌र्टिकल की हेडिंग है- एफआईआर भ्रष्टाचार का हथियार, तो इसमें मैंने पुलिस महकमे में भ्रष्टाचार, घूसखोरी को बढ़ावा देने में एफआईआर की भूमिका को सामने लाया था। 

अब विस्तार से- 
आर्ट एंड कल्चर की रिपोर्टिंग करते-2 अचानक मुझे क्राइम की खबरों से जूझना पड़ गया था। शुरूआत में क्राइम से जुड़ीं कई शब्दावली और बातें मुझे समझ नहीं आती थी। इसमें हमारे सीनियर अजय बोकिल जी, आनंद दुबे, पंकज शुक्ला आदि मेरी हेल्प करते थे। रिपोर्टिंग के दौरान मैंने दूसरे अखबारों के क्राइम रिपोर्टर बंधुओं से भी संपर्क बना लिया था। जिनमें खास थे- गुनेंद्र अग्निहोत्री (जागरण), सुनीत सक्सेना (भास्कर), आनंद पांडे (राज एक्सप्रेस), जुबैर कुरैशी (अग्निबाण), जुगलकिशोर (सीटीवी)। लगभग सभी से मेरी एक-दो साल पुरानी जान-पहचान थी। सुनीत सक्सेना जी के साथ मैंने स्वदेश में काम किया था, तो जुबैर भाई के साथ अग्निबाण में।

Thursday, February 28, 2013

कुछ बातें, कुछ लोग (पार्ट-सिक्स)

सेहत के लिए सामाजिक स्थिति जिम्मेदार

नई दुनिया, भोपाल, 12 अप्रैल, 2006
पहले शॉट में-
भोपाल के नई दुनिया अखबार में प्रकाशित इस लेख को मैंने एक सेमिनार के दौरान लिखा था। मध्यप्रदेश के हिल स्टेशन पचमढ़ी में महिला स्वास्‍थ्य और मीडिया पर तीन दिवसीय सेमिनार का आयोजन किया गया था। इस लेख में महिला स्वास्‍थ्य की अनदेखी को रेखांकित किया गया है।

अब विस्तार से-
हमारे देश और समाज में महिला सुरक्षा की तरह महिला स्वास्‍थ्य को भी हमेशा नजरअंदाज किया जाता है। मैंने इस आर्टिकल में अपने ही परिवार का उदाहरण सामने रखा था। इस लेख को प्रकाशित कराने के पीछे माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विवि के प्रोफेसर पुष्पेंद्र पाल सिंह की प्रेरणा रही। इसमें मेरे दोस्त हरीश बाबू और रामसुरेश सिंह का भी सहयोग रहा। जैसा कि लेख का शीर्षक है- सेहत के लिए सामाजिक स्थिति जिम्मेदार...। यानी महिलाओं की सेहत, स्वास्‍थ्य के साथ खिलवाड़ के लिए हमारी सामाजिक स्थिति और सोच सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। हम स्वास्‍थ्य के प्रति जागरूक नहीं होते हैं। महिला खुद अपनी सेहत के प्रति लापरवाह हो जाती है और उसे ऐसा बनाती है, समाज की सोच। गांवों में यह स्थिति ज्यादा देखने को मिलती है।