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Friday, January 14, 2022

प्रज्ञा प्रसाद के वॉल से : कितना जरूरी है पैसा?

"रिश्ते-नाते सब हों, लेकिन भूख से बिलबिलाते या फिर अभावों में जीते, छोटी-छोटी खुशियों के लिए तरसते क्या हम प्यार कर सकते हैं? बच्चे को प्यार करें और उसे खराब स्थिति में देखें तो क्या अच्छा लगेगा? मां-बाप को ही प्यार करें और उनका टूटा चश्मा बनाने के लिए पैसे न हों, तो अच्छा लगेगा?"

अक्सर प्यार, पैसे और रिश्तों की तुलना होते हुए आपने सुना होगा. अधिकतर लोगों का कहना है कि रिश्तों और प्यार से बढ़कर कुछ भी नहीं होता है, लेकिन कभी-कभी मेरे मन में कई ख्याल आते हैं, तो सोचा कि आपसे भी इन्हें बांटूं और आपकी भी राय इस पर जानूं... 

दरअसल परिवार की शुरुआत होती है विवाह नाम की संस्था से, क्योंकि विवाह होगा, तभी संतान होगी, फिर वही पति-पत्नी माता-पिता बन जाएंगे और फिर जब उनके बच्चे बड़े होंगे तब वे अपना परिवार कहेंगे अपने माता-पिता, भाई-बहन, पत्नी/पति और फिर उनकी खुद की संतान को...

अब आते हैं प्यार और पैसे पर.. हम जैसे ही जन्म लेते हैं वैसे ही हमें लगती है भूख, जिसके लिए चाहिए दूध तो वो दूध आता है पैसे से... क्योंकि मां की छाती में भी दूध तभी उतरता है जब उसे पौष्टिक या फिर चाहे जैसा भी आहार मिला हो, तो वो भोजन भी आता है पैसे से... इससे भी पहले जब महिला गर्भवती होती है, तो सबसे पहले उसे डॉक्टर को दिखाने की जरूरत होती है और डॉक्टर को देनी पड़ती है फीस .. फीस मतलब पैसा.. अगर आप सरकारी अस्पताल में निःशुल्क इलाज कराने भी जाएं, तो ऑटो या रिक्शा करने के लिए चाहिए होगा पैसा... दवाई लाने के लिए चाहिए होगा पैसा.. 9 महीने महिला को अच्छी देखभाल यानि अच्छा आहार मिले, तो उसके लिए भी चाहिए पैसा. जब बच्चे के जन्म का समय आया, तो फिर अस्पताल में भर्ती होने के लिए चाहिए पैसा.. बच्चा पैदा हो गया, उसे पहनाने के लिए कपड़ा चाहिए, उसकी दवाई चाहिए, टीकाकरण चाहिए, तेल-पाउडर शैंपू चाहिए, इन सबके लिए चाहिए पैसा.. मां स्वस्थ हो पाए, तो उसे अच्छा खिलाने के लिए, कंफर्ट फील कराने के लिए चाहिए पैसा.. बच्चे को जब भूख लगती है, उस वक्त मां का अथाह प्रेम भी सिर्फ थोड़ी देर ही उसे चुप करा सकता है.. उसे सबसे पहले चाहिए दूध.. इसका मतलब कि जब पेट भरा होता है, जरूरतें पूरी रहती हैं, तभी आप प्रेम को भी महसूस कर पाते हैं. भूख से तड़पने पर केवल खाना चाहिए होता है, उस वक्त न तो किसी का प्रेम अच्छा लगता है और न तो किसी की बातें...

जब बच्चा थोड़ा सा बड़ा हुआ तो उसे पढ़ाने के लिए चाहिए पैसा.. स्कूल भेजने के लिए चाहिए पैसा.. किताब-कॉपी खरीदने के लिए चाहिए पैसा... उसके खिलौने खरीदने के लिए चाहिए पैसा... किसी अलग तरह के फील्ड में करियर बनाना चाहता हो तो उसकी कोचिंग के लिए चाहिए पैसा.. बच्चा जब बड़ा होता है और जब नौकरी के लिए फॉर्म भरना हो तो चाहिए पैसा, जॉब इंटरव्यू के लिए जाना हो तो पैसा.. वर्क फ्रॉम होम करना हो, तो लैपटॉप के लिए चाहिए पैसा.. बात करने के लिए मोबाइल चाहिए वो आएगा पैसे से...

जब बच्चे की शादी करनी हो, तो लड़का या लड़की ढूंढने के लिए या फिर बात-वात चलाने के लिए इधर-उधर जाना पड़ता है, उसके लिए चाहिए पैसा.. शादी तय हो गई, तो शादी करवाने के लिए चाहिए पैसा.. गृहस्थी शुरू कराने के लिए जो सामान देते हैं उसके लिए चाहिए पैसा.. भोज-भात कराने के लिए चाहिए पैसा.. बेहतर जिंदगी के लिए भी चाहिए पैसा... माता-पिता बुजुर्ग हो जाते हैं उनकी देखभाल, उनके भोजन-दवा के लिए भी चाहिए पैसा... 

रिश्ते-नाते सब हों, लेकिन भूख से बिलबिलाते या फिर अभावों में जीते, छोटी-छोटी खुशियों के लिए तरसते क्या हम प्यार कर सकते हैं? बच्चे को प्यार करें और उसे खराब स्थिति में देखें तो क्या अच्छा लगेगा? मां-बाप को ही प्यार करें और उनका टूटा चश्मा बनाने के लिए पैसे न हों, तो अच्छा लगेगा? 

हर मां-बाप ये क्यों सोचते हैं कि बच्चे का करियर अच्छा बन जाए.. अच्छा करियर मतलब जिसमें अच्छे पैसे मिलते हों.... अच्छा खाए स्वस्थ रहे.. अच्छा खाना दूध-फल अनाज सबके लिए चाहिए पैसा.... 

न्यूज की हेडलाइन बनती है-

रिक्शेवाले का बेटा बना कलेक्टर, 
खुद से लिखी अपनी तकदीर
या 
चौकीदार की बेटी जाएगी IIT, 
गरीबी को मात देकर बनाया भविष्य

ये हेडलाइन कहां बनती है...

रिक्शेवाले के बेटे ने पाए बहुत अच्छे संस्कार, 
कभी नहीं बोलता है झूठ

अंबानी के बेटे ने पकड़ी 
ईमानदारी की राह, सादा जीवन उच्च विचार
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यहां भी अच्छा करियर, सुनहरे भविष्य के पीछे का मतलब पैसा और उसके साथ मिलने वाला पावर ही है... 
अरे, लड़की की तो किस्मत ही चमक गई.. गरीब की लड़की इतने अच्छे (अमीर) घर में चली गई... 

यानी गरीब की लड़की की किस्मत भी तभी चमकती हुई मानी जाती है, जब अच्छा कमाने-खाने वाला लड़का मिल जाए...   

रिश्ते संतोष देते हैं, प्यार खुशी देता है, लेकिन उसे एंजॉय तभी किया जा सकता है, जब पैसे से बुनियादी जरूरतें (ठीकठाक भोजन, छोटा मगर अच्छा आवास, करियर ओरिएंटेड शिक्षा, ढंग के कपड़े और सुविधासहित चिकित्सा) पूरी हो चुकी हों... 

मैं खुद को तब रिलैक्स फील करती हूं, जब खा-पीकर, नहा-धोकर बच्चे को बढ़िया ऑनलाइन क्लास करते हुए देखती हूं, तब लगता है अब शांति से बैठती हूं.. लेकिन खा-पीकर यानी अनाज आया पैसे से, नहा-धोकर यानी साबुन-शैंपू आया पैसे से यहां तक कि वॉटर भी आया पैसे से, क्योंकि कॉलोनी मेंटेनेंस में इन्क्लूडेड है... ऑनलाइन क्लास यानी बच्ची के पास मोबाइल है, जो आया है पैसे से.. इतना सबकुछ हो जाने के बाद अब रिलैक्स हो सकी... 

कहीं घूमने जाना है तो चाहिए पैसा (जगह सस्ती-महंगी हो सकती है), किसी के यहां शादी-छठी, बर्थडे में भी जाना हो तो चाहिए पैसा, रिश्तेदारों के यहां जाना हो तब भी चाहिए पैसा.. 

आखिर में मरने के बाद कफन के लिए भी चाहिए पैसा... श्मशान ले जाने के लिए जो चचरी बनेगी उसके लिए भी चाहिए पैसा... जलाने के लिए चाहिए लकड़ी वो आएगा पैसे से.. पंडित क्रियाकर्म कराएगा... उसके लिए लेगा दक्षिणा यानी पैसा....

अब पता नहीं कि पैसा महत्वपूर्ण है या इंसान.. रिश्ता या प्रेम... अगर आपलोग कुछ प्रकाश डाल सकें तो बताएं... 

बाकी मकर संक्रांति की बहुत-बहुत शुभकामनाएं... 
और हां, जो दही-चूड़ा, तिल-लाई, खिचड़ी जो भी खाई हूं, 
उन सबमें भी लगा है पैसा...

(ये आलेख वरिष्ठ पत्रकार प्रज्ञा प्रसाद के फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है। प्रज्ञा मूलतः पूर्णिया बिहार की रहने वाली है। वे डेढ़ दशक से ज्यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय है। दूरदर्शन, ईटीवी, ईटीवीभारत, आईबीसी24 में अपनी सेवाएं दे चुकी है। फिलहाल रायपुर में न्यूज24 मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ के साथ जुड़ी हुई है।) 

Tuesday, December 5, 2017

शशि कपूर: कला चेतना से भरे मासूम चेहरे का खामोश हो जाना

अजय बोकिल

सहजता से बोला गया एक डायलाॅग भी तमाम स्टाइलिश संवादों पर कैसे भारी पड़ सकता है, इसे समझने पहले ‘शशि कपूर स्टाइल आॅफ एक्टिंग’ को समझना होगा। यादगार फिल्म दीवार’में अमिताभ के खाते में दसियों दमदार डायलाॅग थे। उस पर बिग- बी की आवाज उन डायलाॅग्स में और जान डाल देती थी। लगता था छल-प्रपंच भरी इस दुनिया में प्रतिशोध ही जीने का सही रास्ता है। लेकिन सिर्फ और सिर्फ एक डायलाॅग अमिताभ की सारी एक्टिंग को पानी भरने पर मजबूर कर देता है और वह है- मेरे पास मां है! यानी सौ सुनार की और एक लुहार की।

सोमवार (4 दिसंबर, 2017) को दिवंगत अभिनेता शशि कपूर के पास ‘मां’ के अलावा भी बहुत कुछ था। एक मशहूर फिल्मी खानदान में पैदा होने के बाद भी उनमें कोई हेकड़ी नहीं थी। दरअसल 60 के दशक में शशि कपूर फिल्म इंडस्ट्री के चाकलेटी चेहरों के बीच एक ऐसा फेस थे, जो काफी कुछ विदेशी सा लगता था। उनके नाक-नक्श ग्रीक हीरो की तरह लगते थे। मानो कोई गलती से ग्रीक देवताअों के स्वर्ग से हिंदुस्तानी खलिहान में चला आया हो। जो तन से युवा और मन से किशोर हो। यूं शशि कपूर ने ढाई दशक में फिल्मों में कई रोल अदा किए, लेकिन उन्हें याद तो कुछ भूमिकाअो, अपने सामाजिक तथा कला सरोकारों के ‍िलए किया जाएगा। साम्प्रदायिक दंगों पर बनी फिल्म ‘धर्मपुत्र’ में उनका रोल एकदम अलग तरह का था तो हिट फिल्म ‘वक्त’ में ‘जी को मारकर’ जिंदगी बिताने वाले युवा के रूप में उन्हें कभी नहीं भुलाया जा सकेगा। उम्र में बड़े होने के बाद भी शशि कपूर ने पर्दे पर अमिताभ के छोटे भाई का रोल कई फिल्मों में  बड़ी शिद्दत से अदा किया था। उन्होने प्ले ब्वाॅय टाइप भूमिकाएं भी कीं। लेकिन यह उनके स्वभाव के अनुकूल कभी नहीं लगीं। कारण कि शशि कपूर के चेहरे में एक स्थायी मासूमियत और दुनिया की चालािकयों से स्तब्ध हो जाने का परमनेंट भाव था। शशि जब पर्दे पर नाचते थे तो लगता था कि यह काम उनसे जबरन कराया जा रहा है। हां, फिल्म ‘जब जब फूल खिले’ में  शशि जब ‘हम को तुम पे प्यार आया..प्यार आया..’ चीखते हुए इश्क में बावले हो जाते हैं, तब महसूस होता है कि सच्ची मोहब्बत करने वाला जब प्यार की सार्वजनिक अभिव्यक्ति करना चाहता है तो उसका हाल क्या होता है। शशि कपूर की पर्दे पर और जाती जिंदगी में भी इमेज एक क्लीन और ईमानदार इंसान की रही है। वह जो भी कहता है, सच सच और बेलाग ढंग से कह देता है। जिसमें कोई बनावटीपन नहीं है। शशिकपूर का यह नेचर अपने अग्रज राज कपूर की देसी और गंवई छवि एवं  शम्मी कपूर की मस्त मौला तथा चुहलबाज इमेज से बिल्कुल हटकर है। शशि कपूर को देखकर हमेशा यही लगा कि ये आदमी कभी विलेन नहीं हो सकता। वह कांटो पर भी चलेगा तो फूलों की संवेदना के साथ चलेगा। 

शशि कपूर को फिल्मी किरदारों से ज्यादा फिल्म इंडस्ट्री और थियेटर क्षेत्र में किए गए उनके योगदान के लिए याद किया जाएगा। सच्चा कलाकार न तो पैसे से संतुष्ट होता है और न ही प्रसिद्धी से भरमा जाता है। उसके मन में कुछ ऐसा करने की भूख होती है, जिससे सरस्वती संतुष्ट हो। कला की देवी मुस्कुराए। संस्कृति का पैमाना छलके। इतिहास खुद बांहे फैलाकर उसकी तलाश करे। फिल्मी चकाचौंध में रहकर भी शशि कपूर में सच्चे अभिनय की तड़प थी। इसलिए उन्होने अपनी जीवन साथी भी मशहूर अदाकारा जेनिफर कैंडल को बनाया। ’36 चौरंगी लेन’ में जेनिफर का अभिनय भला कौन भूल सकता है। इस फिल्म को ‘सेल्युलाइड पर लिखी कविता’ कहा गया। फिल्मों से नाम और पैसा कमाने के बाद 1978 में शशिकपूर ने  दो माइलस्टोन काम किए। उन्होने अपने पिता और महान ‍अभिनेता पृथ्वीराज कपूर की याद में मुंबई में ‘पृथ्वी  थियेटर्स’ की स्थापना की। साथ ही खुद की फिल्म कंपनी ‘फिल्म वाला’ भी शुरू की। दोनो प्रयास वास्तव में ‍शशि कपूर के भीतर छुपे और कुलबुलाते कलाकार तथा  सर्जक के बैटिंग ग्राउंड थे। उन्होने इसे पूरी तरह भुनाया भी। शशि कुछ ऐसा करना चाहते थे, जो कपूर परिवार के ग्लैमर से हटकर हो और उसके बाद भी याद रखा जाए। ‘फिल्म वाला’ के बैनर तले शुरू हुआ यह ‘जनून’, ‘उत्सव’ तक अपनी पराकाष्ठा पर पहुंचा। दुनिया ने शशि की कला को एक नए शीशे में देखा, उससे अभिभूत हुई। उसके अनोखेपन को महसूस किया।

पिछले कई दिनों से शशि कपूर काफी बीमार चल रहे थे। जीवन संगिनी का जिंदगी की शाम से पहले साथ छोड़ जाने का दर्द तो था ही। शरीर भी थकने लगा था।  इस बीच उन्हें पद्म विभूषण और प्रतिष्ठित दादा साहब फालके अवाॅर्ड से नवाजा गया। तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री अरूण जेटली उन्हें यह पुरस्कार  देने शशिजी के घर पहुंचे। यह पुरस्कार लेते समय शशि का चेहरा अवाक था। मानो बहुत देर कर दी, हुजर आते-आते। फिर भी पुरस्कार तो पुरस्कार है। उसकी अपनी आत्मा होती है। अगर यह पुरस्कार शशि कपूर को न दिया जाता तो शायद यह पुरस्कार ही ग्लानिभाव से भर जाता। क्योंकि दादा साहब फाल्के की जिंदगी ही कुछ नया करने में बीती। भले ही उन्हें फाके करने पड़े हों। शशि का ‘जुनून’ भी कुछ ऐसा ही था। कुछ अलग और लीक से हटकर करने की जिद और कला को उसने नए रूपों में निखारने की चाह। सिनेमा से उलीचकर थियेटर को सींचने वाले फिल्म इंडस्ट्री में बिरले ही होते हैं। क्योंकि यह घर फूंक तमाशा है। लेकिन शशि कपूर ने यह काम पूरी निष्ठा और प्रतिदान की अपेक्षा के बगैर किया। अगर सलीम जावेद‍ फिर से ‘दीवार’ के लिए डायलाॅग लिखें तो उन्हे शशिकपूर के लिए लिखना पड़ेगा- ‘मेरे पास कला है।‘ और कला कभी काल की गुलाम नहीं होती।

‘राइट ‍क्लिक’
( ‘सुबह सवेरे’ में दि. 5 दिसंबर 2017 को प्रकाशित)