Saturday, December 27, 2008

कहानी तृष्णा की ...

दोस्तों PLZ READ...

कहानी तृष्णा की ...

तिलिस्म सात सवाल का ...


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कहानी FM की ... रेडियो की कहानी
CHHINDWARA आकाशवाणी
यानी .... मेरी कहानी ....

ब्लॉग - उमरानाला पोस्ट पर
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Thanks
RAMKRISHNA DONGRE
Mob : +91-98730 74753
Blog: http://chhindwara-chhavi.blogspot.com/

Sunday, December 21, 2008

बाबा विष्णु खरे, मुलाक़ात, मेट्रो में राधेश्याम

आज दोपहर हम लोग घूमने निकले ... प्लान पहले से तय नहीं था ... रविवार है इसलिए मेरे पास भी पूरा वक्त था . पहले प्लान फिल्म सिटी , सेक्टर -१६ नॉएडा जाने का था फिर प्लान ... मंडी हाउस का बन गया . वहां बाबा श्री विष्णु खरे जी से मुलाकात करना था ।


कार्यक्रम शाम ५.३० बजे था , लेकिन हम लोग २ - २.३० बजे ही निकल गए। रास्ते में लक्ष्मीनगर में कुछ काम था । फ़िर हम लोग जनकपुरी वाली बस में बैठ कर मंडी हाउस जा पहुंचे । chhindwara ke बुजुर्ग लेखक , पत्रकार से पहली बार आमने -सामने की मुलाक़ात थी । काफी अच्छी मुलाक़ात रही ... राधेश्याम से भी बाबा ने बात की, जॉब के लिए सलाह दी कि चिंता म़त करो - सब ठीक हो जाएगा । बाबा से मिलकर बहुत खुशी हुई । बाबा कवि, लेखक तो है ही ... वे दिल्ली में हमारे परिवार के बुजुर्ग की तरह है ।

आज राधेश्याम -रामधन को मेट्रो में भी बैठने का मौका मिला । उसे बहुत ही अच्छा लगा । उसके चहरे की खुशी बता रही थी ।

Sunday, December 14, 2008

वेल कम टू शाहपुर जाट....



वेल कम टू शाहपुर जाट....

बिग बी ... यानी अमित जी, मीतू जी, अमिताभ दुबे का आज जन्म दिन है ... हम यानी राधेश्याम डोंगरे और मैं अभी शाहपुर जाट में है ... मीतू ने हमें कहा - वेल कम टू शाहपुर जाट... और हम आ गए


... दोस्त, भाई और मार्गदर्शक अमिताभ दुबे का नाम मेरे लिए बचपन से ... किसी सेलेब्रिटी से कम नहीं था . पापा से पहली बार मैंने सुना की ...दुबे सर के बेटे अमिताभ ने फिफ्थ क्लास में ब्लाक में पहला स्थान हासिल किया है ... फ़िर उमरानाला स्कूल में आने के बाद मैंने इनके जलवे देखे ... इतने इनाम बटोरते थे की ... बस पूछिये ही मत ... उमरानाला स्कूल में जलवा बिखेरने के बाद जनाब ... डीडीसी कॉलेज chhindwara में पहुंचे ... हम भी वहीं जा पहुंचे ... अमिताभ भाई को वहां भाई बेस्ट स्टूडेंट का आवार्ड मिला ... आप सोच सकते ... जनाब में क्या क्वालिटी होगी ... आज बिग बी दिल्ली में ... पिछले ८-९ साल से ... हम भी दिल्ली आ पहुंचे ... मगर इसका मतलब यह हरगिज़ नहीं ... हम उनका पीछा कर रहे है ... जस्ट जोकिंग ...

तो मीतू भाई १४ दिसम्बर , जन्म दिन की अनेक शुभकमानये ... विश यू अ हैप्पी डे ...
जन्म दिन मुबारक हो ...

आपका दोस्त , भाई
तृष्णा , आरके डोंगरे
http://dongretrishna.blogspot.com

Friday, November 28, 2008

Monday, October 27, 2008

हैप्पी दिवाली : अपनों की कमी सिर्फ मुझे ही या आपको भी


हैप्पी दिवाली : अपनों की कमी सिर्फ मुझे ही या आपको भी

अपनों से दूर रहकर शायद ही कभी अपनों की कमी पूरी होती हो...। मुझे तो यही लगता... और आपको ...। अगर कोई उपाय किसी केपास हो मुझे जरूर बताए। मैं आपका शुक्रगुजार रहूंगा।

दीपावली... प्रकाशपर्व यानी दिवाली। आप सब को दीपोत्सव पर हार्दिक शुभकामनाएं। आप में से जो लोग अपने गांव में, अपने परिवार के बीच दिवाली मना रहे हैं वे उन लोगों की बनिस्बत ज्यादा खुश होंगे, जो लोग अपने घर, अपने गांव नहीं जा सकें। मेरे जैसे कुछ लोग उन्हीं लोगों की सूची में आते हैं।
खैर...। हम अपने से दूर रहे या अपनों के करीब ...। हमें दिवाली को इन्जॉय तो करना ही है। मुझे अपने बचपन की दिवाली भी याद है और पिछले साल या उससे पिछले साल की दिवाली भी...।

बात पिछले साल की दिवाली की करते हैं। पिछले साल मैं दिल्ली से घर गया था। सभी के लिए कपड़े मैंने खरीदें थे। मेरे घर में एक पीढ़ी अपने बचपन के दौर से गुजर रही है। जिसमें मेरे दो भतीजे और एक भतीजी शामिल है। मैं छोटे- छोटे पटाखें, अनार दाने और फूलझड़ी खरीद कर लाता हू और हां ... साथ में टिकली भी। बड़ा भतीजा सोनू हमेशा इन चीजों से दूर भागता है। अभी वह 6 साल का हो गया है ... कई साल से उसका रवैया ऐसा ही रहा है... ।

अब बात मेरे बचपन की। हम तीन भाई और बड़ी दीदी भी कुछ इसी तरह केस्वभाव केरहे हैं। मैं और मेरा छोटा रामधन छोटे-छोटेपटाखे और लक्ष्मी पटाखे फोड़ा करते थे...। जवार केखेत में पक्षियों को भगाने केलिए कई दिनों तक हम पटाखे फोड़ा करते थे।

खास बात जो मुझे याद आती है वो ये कि मैं रंगोली सजाने, घर की साफ-सफाई करने और सामान को व्यवस्थित करने में सबसे आगे रहता था। कौन- सा सामान कहां होना चाहिए, यह मुझे हमेशा अच्छी तरह याद होता था। इसलिए घर की साफ-सफाई केबाद सामान जमाने की जिम्मेदारी मेरी ही होती थी।
इस बार दिवाली पर मैं घर नहीं गया। ऐसे मौके पर मुझे सभी की याद आ रही है। मोबाइल के चलते सभी से रोज बात हो जाती है। फिर भी मन नहीं भरता। कई दोस्तों, परिचितों को एसएमएस किया, कुछेक को फोन किया फिर भी चैन नहीं मिला। अपनों से दूर रहकर शायद ही कभी अपनों की कमी पूरी होती हो...। मुझे तो यही लगता... और आपको ...। अगर कोई उपाय किसी केपास हो मुझे जरूर बताए। मैं आपका शुक्रगुजार रहूंगा।

एक बार फिर आप सबको दिवाली की हार्दिक शुभकामनाएं। हैप्पी दिवाली।

Friday, October 3, 2008

सरकार की उपेक्षा से गिरमिटिया बनते बिहारी

सरकार की उपेक्षा से
गिरमिटिया बनते बिहारी

विश्वनाथ सुमन

पुराने आंकड़ों पर गौर करें बिहार से बाहर पलायन करने वालों में कोसी क्षेत्र के लोग अधिक हैं। 1954 में कोसी बैराज बनने के बाद अभी तक चार बार तटबंध टूट चुका है और पिछले 50 वर्षों में इस क्षेत्र के लोग पलायन करने वालों में शामिल हैं।
आशंका जताई जा रही है कि इस साल भी इस क्षेत्र से ही पांच लाख लोग उद्योगों वाले शहर में पहुंचेंगे, काम की तलाश में। कहीं काम नहीं करेंगे तो करेंगे क्या? सरकार के पास ऐसी योजना नहीं है, जो इनके कदम रोक ले।


1834 में अंग्रेजों की ज्यादती के कारण पहली बार बिहार के कुछ लोग गिरमिटिया बने, अब कुदरत के कहर और सरकार की उपेक्षा के कारण गिरमिटिया बन रहे हैं, वह भी अपनी मर्जी से। आखिर जीना तो सभी चाहते हैं।

अथ बिहार कथा ...

बाढ़ ने ही बीमारू राज्य बना दिया बिहार को
प्रत्येक वर्ष करीब 55 लाख बिहारी दूसरे राज्यों में रोजी रोटी तलाशने निकलते है
प्लानिंग कमीशन की मानें तो बिहार की 42.6 फीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे जिंदगी गुजार रही
एक रिपोर्ट के अनुसार बिहार की 82 प्रतिशत श्रमिक कृषि, मछली पालन सहित प्राइमरी सेक्टर से जुड़े हैं


बिहार फिर मुसीबत में हैं। इस राज्य के 16 जिले कोसी के कहर की चपेट में हैं। करीब 755 गांवों के 25 लाख लोग प्रत्यक्ष रूप से इस विभिषिका से प्रभावित हैं। टूटी रेल पटरियां, सिर पर गठरी लेकर सुरक्षित ठिकाने की तलाश करते वृद्ध और महिलाएं, जलमग्न खेत, दशहत और बेबसी की कहानी कहतीं इस तरह कितनी तस्वीरें अखबारों के पन्नों पर दिख रहे हैं।

खबरिया टीवी चैनलों में इस भयावह आपदा के दृश्यों को देखकर लोग सिहर जाते हैं। हालात दिन ब दिन बदतर होते जा रहे हैं। बाढ़ में फंसे लोग दो जून की रोटी और पानी के लिए तरस रहे हैं। अब तो बाढ़ से घिरे लोग ही नहीं, दूर परदेस में बैठे लोग भी यह सोचने को मजबूर हो गए कि यह बुरे दिन कब खत्म होंगे। रोज बढ़ रहे कोसी के कहर और सरकारी इंतजामात से यह नहीं लगता है कि यह विपदा जल्द ही खत्म हो जाएगी। इसलिए लोगों ने पलायन करना भी शुरू कर दिया है।

हालांकि यह इस प्रदेश के लिए बाढ़ और पलायन कोई नई समस्या नहीं है। शायद ही कोई ऐसा वर्ष बीता हो, जब बाढ़ ने विकराल रूप नहीं दिखलाया हो।

पिछले वर्षों में कमला, बलान, गंडक, बागमती और अधवारा समूह की नदियां उत्तर बिहार को जलमग्न करती रहीं हैं। बाढ़ ने ही इस राज्य को बीमारू बना दिया और इसका नतीजा यह रहा है कि प्रत्येक वर्ष करीब 55 लाख बिहारी दूसरे राज्यों में रोजी रोटी तलाशने निकल जाते हैं।

प्रदेश के 35 जिलों में से 24 जिले कमोवेश बाढ़ प्रभावित रहे हैं। इनमें से 11 जिलों में तो हर साल बाढ़ पैर पसार ही लेती है। कुल मिलाकर बिहार का 73.6 प्रतिशत हिस्सा बाढ़ से ग्रस्त है। यहां के सिर्फ पांच जिले ही ऐसे हैं, जहां बाढ़ और सूखा का प्रकोप नहीं होता है।

जाहिर तौर पर बाढ़ और सूखे की वजह से फसलें भी चौपट होती रहीं हैं और लोग रोजी-रोटी की तलाश में भागते रहे हैं शहरों की ओर। इस बार भी स्थिति और भी विकराल है और इसका असर काफी लंबे समय तक रहेगा। इस कारण इस बार घर छोड़कर परदेस जाने वालों की तादाद काफी बढ़ेगी। फिर जाएंगे दिल्ली, हरियाणा, मुंबई, सूरत, लुधियाना और इंदौर। खेतिहर श्रमिकों की कमी से जूझ रहे पंजाब और हरियाणा को मजदूर आसानी से मिल जाएंगे। दिल्ली और लुधियाना में बिहार के मजदूरों की खेप आनी शुरू हो गई है। कई परिवार के साथ आए तो कई परिवार को उनके भाग्य के भरोसे छोड़ आए । इस उम्मीद के साथ कि जब वापस जाएंगे तो उनकी जरूरतों को पूरा कर लेंगे। इस दौरान ये श्रमिक कहीं भी, कैसे भी के आधार पर गुजारा कर लेंगे।

इस बीच क्षेत्र विशेष में वहां के उपराष्ट्रवाद और उनके सियासी गुस्से को झेल लेंगे। इसके सिवा उनके पास चारा ही क्या है। इन दिनों उनका साथ उनके पुराने परिचित दे रहे हैं जो उनसे पहले घर छोड़ चुके हैं। पुराने आंकड़ों पर गौर करें बिहार से बाहर पलायन करने वालों में कोसी क्षेत्र के लोग अधिक हैं। 1954 में कोसी बैराज बनने के बाद अभी तक चार बार तटबंध टूट चुका है और पिछले 50 वर्षों में इस क्षेत्र के लोग पलायन करने वालों में शामिल हैं।

आशंका जताई जा रही है कि इस साल भी इस क्षेत्र से ही पांच लाख लोग उद्योगों वाले शहर में पहुंचेंगे, काम की तलाश में। कहीं काम नहीं करेंगे तो करेंगे क्या? सरकार के पास ऐसी योजना नहीं है, जो इनके कदम रोक ले। प्लानिंग कमीशन की मानें तो बिहार की 42.6 फीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे जिंदगी गुजार रही है। राज्य के अन्य जिलों की अपेक्षा कोसी परिक्षेत्र में ही बीपीएल परिवारों की तादाद अधिक है। उदाहरण के तौर पर अररिया की 78.6 फीसदी आबादी बीपीएल पैमाने के नीचे गुजर बसर कर रही है। इंडियन इन्स्तित्युत ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की रिपोर्ट के अनुसार बिहार की 82 प्रतिशत श्रमिक कृषि, मछली पालन सहित प्राइमरी सेक्टर से जुड़े हैं। कल कारखाने हैं नहीं। 2006-07 में इंडटि्रयल डिवेलपमेंट रेट 5.5 फीसद रही (जबकि नैशनल रेट 20.1 है )।
ऐसे हालात में प्राकृतिक आपदा से घिरा यह तबका क्या करें? हाथ पर हाथ धरकर कब तक सरकार की राहत का इंतजार करे? हालांकि इस श्रम पलायन का खामियाजा खुद बिहार को ही उठाना पड़ रहा है। विधानसभा में पेश इननॉमिक सवे 2006-07 मे जब खुलासा हुआ कि पिछले एक साल में खाद्यान्न का उत्पादन स्तर 26.4 फीसदी तक गिर गया है। इसके बावजूद सरकार को कम होती श्रम शक्ति का एहसास नहीं हुआ।

फिलहाल दु:ख की इस घड़ी में पूरा देश बिहार के साथ खड़ा दिख रहा है। हर तरफ से मदद के हाथ बढ़ रहे हैं। मगर इस राज्य के पलायन की समस्या को भी बाढ़ और सूखे की मार से अलग करके देखना सही नहीं होगा। कोई भी अपना घर, अपना गांव नहीं छोड़ना चाहता है और न ही परदेस में दर-दर की ठोकरें खाना।

1834 में अंग्रेजों की ज्यादती के कारण पहली बार बिहार के कुछ लोग गिरमिटिया बने, अब कुदरत के कहर और सरकार की उपेक्षा के कारण गिरमिटिया बन रहे हैं, वह भी अपनी मर्जी से। आखिर जीना तो सभी चाहते हैं।

अब इस पलायन को रोकने की जिम्मेदारी भी समाज और सरकार को मिलकर उठानी होगी।
दो महत्वपूर्ण क्षेत्र में सहयोग और सुविधा से प्राकृतिक आपदाओं से त्रस्त बिहार की इस समस्या का निदान हो सकता है। पहला वहां की कृषि संबंधी सुधार किए जाएं । दूसरा वहां शिक्षा की बेसिक और उच्च शिक्षा की गुणवत्ता सुधारा जाए। शायद बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर के डिवेलप होने के बाद घर छोड़ने वालों के कदम देहरी छोड़ने से पहले ठिठकेंगे तो सही।


विश्वनाथ सुमन



(लेखक दिल्ली के एक राष्ट्रीय अखबार में कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत है . इन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल से वर्ष 2005 में मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म का कोर्स भी किया है . खास बात ये है की लेखक ख़ुद उस राज्य के मूल निवासी है जिसकी कहानी वे बयां कर रहे है .)

Sunday, September 28, 2008

'उल्टा तीर पत्रिका' का दूसरा अंक "दिनकर"

पोस्ट से पहले

'उल्टा तीर पत्रिका' का दूसरा अंक "दिनकर"

दिनकर पढने के लिए क्लिक करें: उल्टा तीर पत्रिका दिनकर

'उल्टा तीर पत्रिका' का दूसरा अंक "दिनकर" प्रकाशित हो चुका है । उल्टा तीर अपने सभी सुधि पाठकों और "दिनकर" में रचनात्मक व प्रेरणात्मक योगदान देने वाले रचनाकारों, टिप्पणीकारों का दिल से आभार व्यक्त करता है। "जश्न-ए-आज़ादी" पत्रिका के बाद अब "दिनकर" पत्रिका पढिये पूरे महीने भर। और भाग लीजिये उल्टा तीर पर जारी बहस में। उल्टा तीर की पत्रिका पढने के लिए "दिनकर" पर क्लिक कीजिए।



आभार;
अमित के. सागर

Friday, August 8, 2008

9 अगस्त : मेरे जीवन की क्रांति का दिन


तारीखें याद आती है...


9 अगस्त : मेरे जीवन की क्रांति का दिन


आज है 9 अगस्त...। 9 अगस्त यानी अगस्त क्रांति का दिन। और यही नौ अगस्त मेरे जीवन में भी क्रांति का दिन है। मुझे अच्छी तरह याद है साल 2000 का 9 अगस्त। जिस दिन मेरी आवाज रेडियो के जरिये छिन्दवाड़ा जिले में गूंजी थी ... जी हां, आकाशवाणी के छिन्दवाड़ा स्टेशन से।

आकाशवाणी यानी रेडियो मेरी लाइफ में खास जगह रखता है। कह सकते हैं कि इसी से प्रेरणा लेकर मैं जीवन पथ पर आगे बढ़ता गया। जिसकी बदौलत मैं आज कुछ बेहतर स्थिति में हूँ । रेडियो से मेरा इंटरव्यू बॉडकास्ट होने के साथ ही मेरा रेडियो से नाता जुड़ता ही चला गया। इंटरव्यू के बाद इंटरव्यू ... रेडियो की गतिविधियां बढ़ती गई ... और फिर मेरा रेडियो रूपक भी आकाशवाणी छिन्दवाड़ा से रिले हुआ। जिसके लिए मैं कार्यक्रम अधिकारी आदरणीय डॉ। हरीश पराशर रिशु सर का हमेशा आभारी रहूंगा। और देखा जाए तो रिशु सर जैसे लोगों के मार्गदर्शन केचलते ही मैं एक छोटे से क़स्बे से निकलकर दिल्ली जैसे बड़े शहर तक आ पाया।

रेडियो से जुड़े संस्मरण, किस्से, यादें और बातें तो मेरे पास कई है, मगर यहां मैं खासतौर पर 9 अगस्त से जुड़े बातें आपके साथ शेयर करना चाहूंगा।

कैसे मिला रेडियो पर इंटरव्यू देने का मौका
आकाशवाणी से यूथ केलिए एक खास प्रोग्राम होता है युववाणी। जिसमें अलग-अलग दिन कई दिलचस्प और जानकारी से लबरेज कार्यक्रम होते हैं। ऐसा ही एक कार्यक्रम सात सवाल मेरा पसंदीदा प्रोग्राम हुआ करता था। इसे मैं 1995 से लगातार सुनता आ रहा था। सात सवाल बेसिकली सामान्य ज्ञान के सवालों पर आधारित प्रोग्राम है।

उस ह$ ते के प्रोग्राम केसभी सातों सवालों का जवाब देना वाला मैं एकमात्र श्रोता था। इस प्रोग्राम के विजेता को पुरस्कार के बदले युववाणी के लिए एक इंटरव्यू देना का मौका मिलता था। मुझे भी इसीलिए मौका मिला। इससे पहले भी विजेता रहा था, मगर झिझक के चलते मैं आकाशवाणी नहीं आ पाया।

पहले इंटरव्यू का अनुभव
मेरा पहला इंटरव्यू मशहूर एनाउंसर आदरणीय अवधेश तिवारी जी ने लिया था। मुझे अच्छी तरह याद है, इसकेलिए उन्होंने कई बार रीटेक किया था। पहली दफा आकाशवाणी आना, स्टूडियो देखना और इंटरव्यू देना मेरे लिए रोमांचक अनुभव था।
अवधेश तिवारी जी मेरा इंट्रोडेक्शन कुछ इस अंदाज में दिया था- छिन्दवाड़ा में एक छोटा-सा गांव है तन्सरामाल ... और यहां रहते हैं एक उत्साही नौजवान रामकृष्ण डोंगरे...। इस पहले इंटरव्यू के बाद मैंने और भी इंटरव्यू इस प्रोग्राम के लिए दिए ...। पहला इंटरव्यू तो मेरे लिए हमेशा यादगार रहेगा ही मगर एक और इंटरव्यू मेरे लिए खास है।

उस इंटरव्यू में मुझसे दो लोगों ने बातचीत की थी। एक थे एनाउंसर धीरेन्द्र दुबे और दूसरे थे एक सीनियर कार्यक्रम अधिकारी ... जिनका नाम मैं भूल रहा हूं। शायद शशिकांत व्यास सर थे. इस लंबे इंटरव्यू में कई सवाल थे, और मेरी कुछ कविता भी शामिल थी।

मेरी यही दीवानगी बाद में मेरे काम आई...
अंत में फिर से 9 अगस्त के इंटरव्यू का जिक्र करना चाहूंगा ... उस दिन हमारे नये घर का काम चल रहा था। मैं जल्दी काम पूरा करके उमरानाला पंहुचा और उस इंटरव्यू को रिकार्ड करवाया। जब मैं इंटरव्यू को रिकार्ड को रिकार्ड करवा रहा था, उस वक्त दूकान पर लोगों की भीड़ मेरा ... तन्सरामाल... उमरानाला ... का नाम सुन रही थी ... मुझे कांटों तो खून नहीं।

.... रेडियो के प्रति मेरी दीवानगी का ये आलम था कि इसे मैं अपना पहला प्यार कहता था... सात सवाल के उत्तर खोजना मेरे लिए जीवन-मरण और प्रतिष्ठा का प्रश्न होता था... एक- एक सवाल के उत्तर के लिए मैं अपनी सारी किताबें, नोटबुक और डायरियां उलट-पुलट डालता था। इसके अलावा सारे मित्रों-पड़ोसियों के यहां भी खाक छानता फिरता था।

मेरी यही दीवानगी बाद में मेरे काम आई...।

Wednesday, August 6, 2008

उल्टा तीर की... "जश्न-ए-आज़ादी"

पोस्ट से पहले...
में इस बार "जश्न-ए-आज़ादी" ....
http://ut-patrika।blogspot.com/

उल्टा तीर की... "जश्न-ए-आज़ादी"

ब्लॉग जगत में पहली बार ....

उल्टा तीर की प्रथम पत्रिका "जश्न-ए-आज़ादी" प्रकाशित हो चुकी है । "जश्न-ए-आज़ादी" की किताब पढिये पूरे महीने भर। और भाग लीजिये उल्टा तीर पर नई बहस। उल्टा तीर की पत्रिका पढने के लिए "जश्ने-आज़ादी " पर क्लिक कीजिए ।

जश्ने-आज़ादी :: http://ut-patrika.blogspot.com/
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रामकृष्ण डोंगरे की कविता -आतंकवाद और सच्ची देश भक्ति
http://ut-patrika.blogspot.com/2008/08/blog-post_7776.html
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साहित्यकार बाबा स्व. श्री संपतराव धरणीधरकी ---
(कविता - भूख -भरे पेट की)
http://ut-patrika.blogspot.com/2008/08/blog-post_3139.html

RAMKRISHNA DONGRE, MCU, 2005-07
E-mail : dongre.trishna@gmail.com

http://chhindwara-chhavi.blogspot.com/

Saturday, August 2, 2008

हैप्पी फें्रडशिप डे




दोस्ती ता-उम्र बरकरार रहे
या खुदा जब तक ये संसार रहे।


हैप्पी फें्रडशिप डे

Friday, July 25, 2008

एक बाबा का कुबूलनामा

coming soon post ...
डायरी पर अगली स्पेशल पोस्ट

.............
भगवान् से बड़े हुए भक्त...
एक बाबा का कुबूलनामा

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आप यकीन किजीये यहीं सच है ...
हम बताएँगे आपको ,
हमारी अगली पोस्ट में...
आप डायरी ... के साथ बनें रहिये ...
कहीं छुट ना जाए आप ...
एक बाबा के कुबूल नामा को देखने से ....

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भगवान् नहीं अब भक्तों की कृपा पर जीते है बाबा
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बाबा बोलें,
सब भक्तों की कृपा है ...
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एक बाबा का कुबूलनामा
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मतलब आज का सच्चा बाबानामा
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बाबा रे बाबा ... बाबा रे बाबा------
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बदल रहा है बाबागिरी का अंदाज़ ...
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लाखों की चमचमाती कार में
सवार है बाबा -----
और कहते है ...
सब भक्तों की कृपा है ...
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बाबा के पहले क्या होता था जग्गू के साथ
और बाबा के बाद क्या होता है जग्गू के साथ ..
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बाबा पहले दादा थे,
तब क्या होता था

जग्गू दादा हाथ उठा कर , हाथ तोड़कर हजारों पैसा ' कमाते ' थे ...
पुलिस से भागे -भागे फिरते थे ...
दोपहिया गाड़ी पे घूमते थे ....

और जब ...

जग्गू दादा बाबा हो गए ...
हाथ झुकाकर हाथ जोड़कर लाखों कमाते ... करोड़ों कमाते है ...
पुलिस क्या करोड़पति आदमी भी भाग - भाग कर
उनके पास आते है

और वे चमचमाती चारपहिया गाड़ी में घूमते है ...
और कहते है ...

सब भक्तों की कृपा है ...

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तो जरूर देखिये
एक बाबा का कुबूलनामा
डायरी की स्पेशल पोस्ट
भगवान् से बड़े हुए भक्त

Thursday, July 17, 2008

"जश्ने -आज़ादी २००८"

"जश्ने -आज़ादी २००८"

http://ultateer.blogspot.com/2008/07/blog-post_14.html

आमंत्रण

उल्टा तीर के साथ मनाईये पूरे अगस्त आज़ादी का जश्न

आज़ादी की किताब

अपने लेख कविताये विचार आदि अपनी तस्वीर के साथ भेजिए

http://ultateer.blogspot.com/
अगस्त के महीने में उल्टा तीर पूरे महीने आजादी का जश्न मनायेगा। आप सभी से अनुरोध है कि इस जश्ने-आज़ादी-२००८ में अपने लेख, विचार, कविताये, विश्लेषण आदि अपनी तस्वीर व् अपने संक्षिप्त विवरण के साथ २५ जुलाई २००८ तक भेज कर आज़ादी के जश्न में खुल कर शिरकत करें।

http://ultateer.blogspot.com/
ultateer@gmail.com, help.ultateer@gmail.com
---
आभार-आपका;
अमित के. सागर
ocean4love@gmail.com # 99993 27975
-- With; Thanks & regards
from: http://ultateer.blogspot.com/
Ulta Teer (Teer Wahee Jo Ghayal Kar De...)
उल्टा तीर (तीर वही जो घायल कर दे...) ---

Ulta Teer "Nishkarsh" Bahas Ke Maayane...)
उल्टा तीर "निष्कर्ष" (बहस के मायने...)
http://ut-con.blogspot.com/
please visit and rush your precious comments and articles.

-------------------amit k. sagar
+91 99993 27975
फ़कत इक़ मौज का प्यासा ~! ~"सागर"~! ~

Wednesday, July 2, 2008

एक आदर्श विभूति डॉ. प्रभुदयालु जी

एक आदर्श विभूति डॉ. प्रभुदयालु जी

सुविख्यात साहित्यकार एवं अनेक भाषाओं के प्रकाण्ड विद्वान आचार्य डॉ. प्रभुदयालु अग्निहोत्री का 5 जून 2008 की देर रात देहावसान हो गया। पेश है उन पर लिखा मेरे मित्र परवेज़ मसूद का आत्मीय लेख .

वयोवृद्ध स्वतंत्रता सेनानी साहित्य रत्न आचार्य श्री प्रभुदयालु अग्निहोत्री जी राष्ट्र की अनमोल धरोधर हैं। उम्र के इस कठिन और दुष्कर पड़ाव में भी वह अपने सहज एवं विनम्र व्यवहार से मिलने-जुलने वालों को विस्मित कर देते हैं। साधारणतः वृद्धावस्था में व्यक्ति के सोचने-समझने की शक्ति जवाब दे जाती है और स्वभाव में चिड़चिड़ापन आ जाता है लेकिन इसके विपरीत बाबूजी आश्चर्यजनक रूप से नौ दशक का फासला पार करके भी मृदुभाषी, विनोदप्रिय और सरल तबीयत के बने हुए हैं। दृढ़ इच्छाशक्ति, वैचारिक प्रतिबद्धता, अनवरत कर्म का संकल्प तथा जीवन-मूल्यों को आगे ले जाने की चाह, उनकी आँखों में स्पष्ट नजर आती है।

आजादी की लड़ाई में सपत्नीक योगदान देने वाले बाबूजी को आज के अव्यवस्थित हालात भीतर तक पीड़ित करते हैं। अव्यवस्था से संक्रमित वर्तमान परिदृश्य और मानवता पर कोड़े बरसाती निर्दयी राजनीति पर जब चर्चा चलती है तो अंग्रेजों से जूझने वाले इस नायक का मन रोष से भर उठता है। साम्प्रदायिकता, अशिक्षा, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और आतंकवाद ये ऐसे दुखद पहलू हैं जो बाबूजी को व्यथित कर देते हैं। टीवी देखना, रेडियो सुनना और अखबार पढ़ना उनकी दिनचर्या में शामिल हैं, परन्तु मनोरंजन या समय व्यतीत करने के लिए नहीं, बल्कि देश दुनिया की मौजूदा परिस्थितियों पर नजर रखने के लिए वह इन संचार माध्यमों से रूबरू होते हैं।

अपने बीते समय की यादों और अनुभवों को जब वे बाँटते हैं तो ऐसा लगता है कि बाबूजी उसी कालखण्ड में पहुँचकर वहां से आवाज लगा रहे हों। अतीत जैसे उनकी आँखों में जीवन्त हो उठता है। बचपन, लड़कपन एवं विद्यार्थी जीवन की रोचक बातें, स्वाधीनता संग्राम की रोमांचक घटनाएँ, साहित्य सम्बन्धी उपलब्धियाँ और विभिन्न शिक्षण संस्थाओं, महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों से जुड़े गरिमापूर्ण अनुभव, सब कुछ उनकी स्मृति में क्रमवार अंकित है। अपने पैतृक गाँव से लेकर सुदूर विदेश-भ्रमण तक की बातें वह बहुत उत्साह और तन्मयता से सुनाते हैं। कभी ऐसा भी होता है कि अपने गुजरे समय की बहुत-सी बातें बाबूजी कुछ-कुछ दिनों के अन्तराल पर फिर से सुना देते हैं। तब मैं उन्हें टोकना उचित नहीं समझता। इस प्रकार कई बार अभिव्यक्त हो चुके अनुभव मैं पुनः सुन लेता हूँ। वास्तव में उनकी स्मृति में संग्रहित प्रसंग बार-बार और हर बार सुनना अच्छा लगता है। सुगंधित फूलों की सुगंध जितनी मर्तबा ली जाए, मन प्रसन्न होता है।


वैसे तो बाबूजी के चुने हुए अनुभव तथा यादगार अनुभूतियाँ उनकी आत्मकथात्मक, संस्मरणात्मक पुस्तकों में संकलित हैं। मगर मौखिक रूप से एक विशिष्ट शैली में इस अनुपम अनुभवों को सुनना स्वयं में एक दिलचस्प एहसास है। कभी-कभी वह मजाक में मुझे 'जनरल परवेज मुशर्रफ' कहकर संबोधित करते हैं, तो मैं मुस्कुरा देता हूँ। एक बार मैंने उनसे हँसते हुए कहा कि "मैं तो भारतीय परवेज हूँ'' तो बाबूजी बोले "परवेज मुशर्रफ भी तो भारतीय हैं, दिल्ली में पैदा हुए थे। नाम में क्या रखा है। सब परिस्थितियों के अनुसार अपनी भूमिकाएँ निभाते हैं।'' देस-परदेस की भौगोलिक सीमाओं को लाँघकर उनकी मानवीय दृष्टि ÷वसुधैव कुटुम्बकम' की भावना पर जा टिकती है। इस प्रकार विश्व के सारे लोग स्वतः उनके अपने हो जाते हैं।

बाबूजी कबीर से अत्यन्त प्रभावित हैं। महात्मा गांधी उनके हृदय में बसते हैं। गाँधी जी के प्रति अपार श्रृद्धा रखने वाले बाबू जी स्वतंत्रता आंदोलन के समय उनसे व्यक्तिगत और भावनात्मक रूप से जुड़े थे। स्वतंत्रता आंदोलन को परवान चढ़ाने के लिए वह गांधी जी से विचार-विमर्श तथा मंत्रणाएँ किया करते थे। अब गांधी जी नहीं रहे और देश स्वतंत्र है, परन्तु राष्ट्रपिता की विचारधारा बाबूजी के मन में निरन्तर प्रवाहित है।


भारतीय जनमानस में व्याप्त धार्मिक संकीर्णता, अंधविश्वास हानिकारक रीति -रिवाज, प्रथाएँ और मान्यताएँ वर्तमान सन्दर्भ में ये सारी बातें बाबूजी को गैर जरूरी लगती हैं। उनके अनुसार आज के इस प्रगतिशील युग में इन सामाजिक बुराइयों को वैज्ञानिक तर्कों और तथ्यों पर कसना चाहिए। इनकी निरर्थकता को पहचान कर परम्परागत भ्रांतियों से मुक्त होना चाहिए।

पारिवारिक संस्कार की यात्रा, स्वतंत्रता यात्रा, साहित्यिक यात्रा तथा विभिन्न पदों से सुशोभित शिक्षण यात्रा के समानांतर ही बाबूजी समाजसेवा से ओतप्रोत इंसानियत की यात्रा भी कुशलतापूर्वक कर रहे है। गहन चिंतन-मनन के दौरान अन्तर्मन में बसी इन सारी यात्राओं पर वह निकल पड़ते हैं, और मानसिक जरूरत के मुताबिक, लोकोपयोगी सामग्री लेकर वापस लौटते हैं। तब लोगों में ज्ञान का प्रकाश फैलाती कृतियों का जन्म होता है।


इस प्रकार आज भी बाबूजी का साहित्य कर्म ईश्वरीय निर्देशानुसार निर्बाध रूप से अनवरत चल रहा है। बाबूजी के जीवन के किसी भी पक्ष को लिया जाए, जीवन के किसी भी हिस्से पर नजर डाली जाए, वहीं से प्रेरणा का प्रकाश फूट पड़ता है। उनके गुजरे समय प्रत्येक पल और वर्तमान का हर एक क्षण इंसान होने का अर्थ समझाता है। अद्भुत प्रेरणास्त्रोत हैं बाबूजी।

( मेरे दोस्त परवेज ने यह लेख लिखा था . हम अक्सर बाबा के पास जाया करते थे .)
http://aaspaas.net/khabar-march07.html

आचार्य डॉ प्रभुदयालु अग्निहोत्री का देहावसान

आचार्य डॉ प्रभुदयालु अग्निहोत्री का देहावासान

भोपाल । सुविख्यात साहित्यकार एवं अनेक भाषाओं के प्रकाण्ड विद्वान आचार्य डॉ. प्रभुदयालु अग्निहोत्री का 5 जून 2008 की देर रात देहावसान हो गया। वरेण्य पीढ़ी के डॉ. अग्निहोत्री का जन्म 30 मार्च 1913 को उत्तरप्रदेश में हुआ था।

महात्मा गांधी, लाला लाजपतराय, पंडित दीनदयाल मालवीय जैसे महापुरुषों के सानिध्य में डॉ. अग्निहोत्री ने स्वाधीनता आन्दोलन में भी भाग लिया। अनेक पुरस्कारों और सम्मानों से विभूषित डॉ. अग्निहोत्री वेदों और उपनिषदों के भी उद्भट विद्वान थे। वे जबलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति और मध्यप्रदेश हिन्दी ग्रंथ अकादमी के संस्थापक निदेशक जैसे अनेक महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके हैं।

आचार्य प्रभुदयालु अग्निहोत्री विगत लम्बे समय से अस्वस्थ थे। हालत अधिक खराब होने पर उन्हें एक निजी चिकित्सालय में भरती करवाया गया था, जहाँ एक दिन पूर्व ही संस्कृति मंत्री श्री लक्ष्मीकांत शर्मा ने उनसे मिलकर स्वस्थ होने की कामना की थी।
६ जून को भोपाल के सुभाषनगर स्थित विद्युत शवदाहगृह में उनके पुत्र विवेक अग्निहोत्री ने अन्तिम संस्कार किया।

डॉ. अग्निहोत्री की पुत्रवधु (सिने अभिनेत्री) पल्लवी जोशी सहित भोपाल के अनेक साहित्यकार, बुद्धिजीवी और समाज के सभी वर्गों के लोग उनकी अन्तिम यात्रा में शामिल हुए।

http://aaspaas.net/khabar.html

Saturday, June 14, 2008

अगर पिता है घर, नहीं किसी का डर

फादर्स डे पर स्पेशल :
अगर पिता है घर,
नहीं किसी का डर


पिता की मृत्यु की सदी

पिता के लिए कई संबोधन है ... बाबूजी, जी आदि

हम सभी भाई -बहन पिताजी को भाऊ कहते थे



सबसे प्रिय 70 शब्दों में पिता का कोई स्थान नहीं



[जब बात पिता की होती है ... सबसे पहले हमें अपने पिता याद आते है . मेरे पिता अब इस दुनिया में नहीं है ... हम सभी भाई -बहन उन्हें भाऊ कहते थे ... पिता के लिए वैसे तो कई संबोधन है ... बाबूजी, जी आदि . मगर अब पापा शब्द ज्यादा चल पड़ा है ... हमारे समुदाय में , हमारे गाँव और आसपास के गाँव में भी पिताजी को भाऊ ही कहा जाता है ... मुझे याद है ... मेरे नाना जी को भी ... माँ , मौसी , मामा जी सभी लोग भाऊ ही बुलाते थे. मेरे पिता जी ... यानी भाऊ एक अच्छे इन्सान थे ... उन्होंने शायद ही कभी हम भाई - बहनों को कभी मारा हो ... माँ, कल्पना दीदी , अशोक भइया, छोटा भाई रामधन और मैं यानी पूरा परिवार उन्हें बहुत याद करता है ... साथ ही हम सभी उनकी कमी महसूस करते है . ]

फ़र्ज़ का परचम पिता

इक नन्हें दिल में कितने ही लिए मौसम पिता
सह रहे हो चुपके -चुपके कैसे -कैसे गम पिता .

क्या है माँ , क्या है पिता , मैं कह रहा हूँ तुम सुनो
माँ तो है ममता की मूरत , फ़र्ज़ का परचम पिता .

खुश नसीब हैं वे जिनके पिता साथ होते हैं ,
पिता के दो नहीं हजारों हाथ होते हैं .

बाप की आंखों में दो बार आंसू आते हैं
बेटी घर छोड़े तब , बेटा मुंह मोड़े तब .

फादर्स डे पर एक किताब से परिचय ...

पिता ... पिता पर केंद्रित स्वादित साहित्य
स्वादन- वल्लभ डोंगरे, संसार के समस्त पिताओं को समर्पित
प्रकाशन - सतपुडा प्रकाशन, भोपाल वर्ष - 2007-08

आसमान से ऊंचा कौन है ?
... पिता

वल्लभ डोंगरे जी ने ... पिता की मृत्यु की सदी नाम से सम्पादकीय में यहीं लिखा है ... आसमान से ऊंचा कौन है ? ... पिता. वे लिखते है कई देशों में बच्चों का लालन -पालन वहां की सरकार के जिम्मे होता है . माता -पिता की भूमिका वहां केवल महज़ बच्चा पैदा करने तक सीमित होती है .
आगे उन्होंने लिखा है की 102 देशों के 40 हजार लोगों में हुए सर्वे में संसार के सबसे प्रिय 70 शब्दों में पिता का कहीं कोई स्थान नहीं था . पिता को हाशिये पर करता यह समय पिता की मृत्यु का उदघोष करता प्रतीत होता है ...यह सदी पिता की मृत्यु की सदी कहलाने को तैयार सी लगती है ... ऐसे समय में पिता को साहित्य में सहेजना पिता के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करना है .

इस किताब में कविता , कहानी , ग़जल , संस्मरण , और पत्र भी है ... पिता के पत्र .

निदा फाजली, कुमार अंबुज , एकांत श्रीवास्तव , यश मालवीय जैसे कई बड़े कवियों की कविताये है , वहीं ग़जलकारों कुंवर बैचेन, आलोक श्रीवास्तव जैसे कई नाम शामिल है ...

कहानियों में... पिता नाम से धीरेन्द्र अस्थाना की एक कहानी है .

पत्र कई सारे है ... घनश्याम दस बिड़ला का पत्र , औरंगजेब का पत्र , आदि .

कुल मिला कर किताब पठनीय है .

Thursday, June 5, 2008

पोस्ट से पहले, पेश है एक ब्लॉग



तीन बिन्दु डॉट ब्लागस्पाट डॉट कॉम पर
http://www.teenbindu.blogspot.com/

पूजा का ब्लॉग ... जो जारी है ...

जो जारी है ...
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जो जारी है ...
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जो जारी है ...


`रजनीगंधा` अब महकती है
http://teenbindu.blogspot.com/2008/05/blog-post_14.html

एक कविता ...

http://teenbindu.blogspot.com/2008/05/blog-post_13.html
http://teenbindu.blogspot.com/2008/05/blog-post.html

बात है अधूरी सी
रात है स्याह गहरी सी

पीछे कुछ छूटता नहीं
साथ कुछ भी चलता नहीं

मुक्ति सच में हो

http://teenbindu.blogspot.com/2008/04/blog-post.html
इंटरनेट पर एक खबर है। खबर अपने आप में चौंकाने वाली तो है ही, संग में एक साथ कई सवाल उठाती है। खबर के अनुसार बिहार और झारखंड में कई स्थानों पर भूतों और प्रेतों से कथित तौर पर पीड़ित लोगों को प्रेत बाधा से मुक्ति दिलवाने के लिए मेलों का आयोजन किया जाता है। इन मेलों में कथित `पहुंचे हुए` पंडे और ओझा भूत उतारते हैं।



Wednesday, May 14, 2008

`रजनीगंधा` अब महकती है

रजनीगंधा 15 साल की थी जब उसकी शादी हुई। ससुराल में भी सभी मैला ढोने का काम करते हैं। उसने बताया, ``शादी से कुछ महीने पहले जब मां पहली बार अपने साथ काम पर ले गईं तो चक्कर आ गए थे। इसके बाद कई दिन कई बार उल्टी कर देती। मगर जाना पड़ता। क्योंकि, मां कहतीं कि ससुराल में तो जाना ही पड़ेगा। यह काम करना ही होगा।``

रजनीगंधा मैला ढोने का काम नहीं करना चाहती थी। लेकिन, पहले मां के दबाव में और फिर परिवार की आर्थिक जरूरत के मद्देनजर यह करना ही पड़ा। फिर उसने इसे नियति मान कर समझौता कर लिया।

उसका नाम रजनीगंधा है। उसकी उम्र 39 साल है। अलवर के जिरका फिरोजपुर के पास उसका मायाका है और हिजौरीगढ़ में उसका ससुराल है। वह महीनेवार अठारह सौ रूपए कमाती है। दो बेटियां हैं और एक बेटा है। बड़ी बेटी के हाथ पीले करने है, संभवत: इसी बरस जबकि छोटी बेटी पढ़ रही है। बेटा भी पढ़ रहा है और पुलिस में भर्ती होना चाहता है। रजनीगंधा की आंखों में चमक है और चेहरे पर संतोष भी। उसकी आंखों में अब सपने भी हैं जिनके पूरे होने की न सिर्फ वह कामना करती है बल्कि कोशिश भी करती है। मगर, पहले ऐसा नहीं था।

कभी रजनीगंधा देश के उन सैकड़ों स्त्री पुरूषों में से एक थी जिनकी जिंदगियां एक ऐसा काम करते-करते बीतती रही हैं जो न केवल गैर कानूनी है बल्कि एक सभ्य समाज के माथे पर कलंक की तरह है। भारत सरकार द्वारा मैला ढोने की प्रथा गैर कानूनी करार दे दी गई है। मगर आज भी देश के कई राज्यों में यह कथित ``प्रथा`` बिना किसी रोकटोक के जारी है।

रजनीगंधा का सपना है कि वह यहां से सिलाई कढ़ाई सीख कर अपनी खुद की सिलाई की दुकान खोले। रजनीगंधा के हाथों मैला ढोने का काम `छूटने` के बाद अब उसका पति भी किसी और काम की तलाश में है ताकि इस घिनौने काम से मुक्त हो सकें।

लगभग सौ साल पहले महात्मा गांधी ने बंगाल में हुई कांग्रेस की बैठक में वाल्मीकि समुदाय के लोगों की काम की परिस्थितियों और उनकी विवशताअों का मसला उठाया था। तब से आज तक एक पूरी सदी बीत चुकी है मगर एक कु-प्रथा है कि मिटती नहीं।

Tuesday, May 13, 2008

अब..?


बात है अधूरी सी
रात है स्याह गहरी सी

पीछे कुछ छूटता नहीं
साथ कुछ भी चलता नहीं

खामोशी है पैनी सी
उंगलियों को कुरेदती सी

बेचैनी सागर की लहरों सी
खुद को पत्थरों से ठोकती सी

अजीब सी बेकरारी है नहीं,
प्रेम नहीं,कोई और ही सी महामारी है


रोशनी है कहीं-कहीं कौंधती सी
आस पास को चीरती भेदती सी

और मैं सिमटती सी
तलाशती हूं ``क्या हूं मैं अब?``

Tuesday, April 15, 2008

मुक्ति सच में हो

इंटरनेट पर एक खबर है। खबर अपने आप में चौंकाने वाली तो है ही, संग में एक साथ कई सवाल उठाती है। खबर के अनुसार बिहार और झारखंड में कई स्थानों पर भूतों और प्रेतों से कथित तौर पर पीड़ित लोगों को प्रेत बाधा से मुक्ति दिलवाने के लिए मेलों का आयोजन किया जाता है। इन मेलों में कथित `पहुंचे हुए` पंडे और ओझा भूत उतारते हैं।

खबर पर गौर करें, इन मेलों में आने (लाए जाने) वालों में महिलाएं ही अधिक होती हैं। जिन्हें, डंडे की चोट पर स्वीकार करवाया जाता है कि उन पर प्रेत छाया है। मार खा कर लॉक अप में पुलिस उस जुर्म को कबूल करवा पाने में सफल हो जाती है जो गिरफ्त ने किया न हो तो एक महिला की क्या बिसात! वैसे खबर की ओट न भी ली जाए तो हम और आप यह जानते ही हैं इस देश में महिलाओं को ही अक्सर भूत बाधा का सामना करना पड़ता है। समाज में महिलाएं ही अक्सर चुड़ैल करार दी जाती हैं। इन भूतों को भी महिलाएं ही प्यारी होती हैं। पुरूष नहीं। वे अक्सर महिलाओं को ही निशाना बनाते हैं। वह भी ऐसी महिलाओं को, जो पहले से ही अपने परिवार या समुदाय में दबी-कुचली परिस्थिति में दोयम दर्जे का जीवन जी रही होती हैं। बीमार या उपेक्षित होती हैं। न जाने क्यों यह भूत प्रजाति ऐसी महिला पर कब्जा करती है जिसका खुद अपने पर कोई `कब्जा` नहीं होता! ऐसे में ऐसी महिला को कब्जा कर कोई भूत दूसरों पर अपनी `ताकत` (या सत्ता) कैसे साबित कर सकता है!? वह एक कमज़ोर महिला पर हावी हो कर कैसे उसके आस पास के लोगों को परेशान करने की कोशिश में `सफल` हो सकता है! यह बात भूत योनि की समझ में नहीं आती, तो पता नहीं क्यूं।

वैसे यहां आपत्ति उस मानसिकता पर भी है जिसके तहत इस खबर में पीड़ित शब्द का उपयोग किया गया है। मानो, वाकई `भूत आना` कोई बीमारी हो। ईश्वरप्रदत्त बीमारी? महिला के बुरे कर्मों का फल? या फिर, अपनों की बेड इंटेशन की शिकार? या समाज के भीड़तंत्र से पीड़ित ? दरअसल मुक्ति चाहिए तो सही, मगर किसको किससे? यह जानने की जरूरत है।


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Tuesday, May 27, 2008

नहीं रहे मयाराम काका

नाटकों में दमदार रोल करने वाले मयाराम काका नहीं रहे ...
भाऊ की तरह ही चल बसे दूध डेहरी वाले मयाराम काका


सोमवार को छोटे भाई (रामधन) से मोबाइल पे बात हुई ...
बता रहा था कि भाऊ की तरह ही दूध डेहरी वाले मयाराम काका भी चल बसे ...
भाऊ यानी हमारे पिताजी। मतलब मयाराम काका का रविवार 25 मई को निधन हो गया .

मुझे पिताजी का अचानक चले जाना बरबस याद हो आया ...
तारीख थी 2006 के नवम्बर महीने की 15 ।मैं दो- एक दिन पहले ही दिल्ली से भोपाल लौटा था ...
मेरे मोबाइल पर फोन आया कि जल्दी घर आ जाओ भाऊ सीरियस है ...
बाद में सब कुछ साफ हो गया ...पापा को अटैक आया था ...मैं दूसरे दिन घर पंहुचा था ...

पूरे गाँव में कई दिनों तक चर्चा होती रही कि फंला आदमी कैसे अचानक चल बसे ...
गांवों - देहातों में किसी को हाट अटैक आना कुछ समय पहले तक सुनाई नहीं देता थामगर अब अक्सर अटैक आने की खबर सुनने को मिल जाती है...

इस बार भी मयाराम काका के चल बसने की बात पर मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा है ...
मयाराम काका नाटकों में यादगार काम करते थे ...बचपन में कई नाटक रात -रात भर जागकर देखे थे ... परिवार के साथ अपने गाँव में नाटक देखने जाते थे ...मयाराम काका का हरेक नाटक में दमदार रोल होता था ... उनकी आवाज दूर -दूर तक गूंजती थी ...

मयाराम काका हमेशा राजा का रोल करते थे ... द्रोपदी चीर हरण , भरत -मिलाप जैसे कई नाटकों वे हमेशा लीड रोल करते थे ... वैसे एक इन्सान के रूप भी मुझे हमेशा याद आते रहेगें ...
पड़ोसियों के बीच विवाद होना कोई नई बात होती ॥ मगर उनका स्वभाव इतना अच्छा था कि कभी किसी से कोई विवाद या झगड़ा रहा हो ऐसा मुझे याद नहीं आता ...उनके परिवार में पत्नी और चार बच्चे है ...

गांवों में जल्दी ना पता चल पाने बीमारी - हाट अटैक ने मयाराम काका की भी जान ले ली ।

आख़िर हाट अटैक का पता क्यों नहीं चल पाताकैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के ताजा शोध में पता चला है की 50 फीसदी लोगों को मालूम ही नहीं हो पाता है कि उन्हें हाट अटैक जैसी गंभीर बीमारी है ...

इस शोध में यह भी खुलासा किया गया है कि ...दिल के अगल -बगल में दर्द या दूसरी अन्य बीमारियों का वे समझ ना पाने के कारण इलाज नहीं करा पाते ...

मयाराम काका और पिताजी के प्रति सच्ची श्रदांजलि यह होगी कि
गाँव के लोग हाट अटैक के बारे सचेत हो जाए .

Friday, May 23, 2008

आरुषि हत्याकांड


नोएडा [वरिष्ठ संवाददाता]। बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड में शुक्रवार को उत्तर प्रदेश की पुलिस ने अहम खुलासा करते हुए बताया कि इस हत्याकांड में आरुषि के पिता डा। राजेश तलवार ही मुख्य आरोपी है और उसने ही इस डबल मर्डर [आरुषि व घरेलू नौकर हेमराज की हत्या] को अंजाम दिया।


इससे पहले पुलिस ने डा। तलवार को आज सुबह ही गिरफ्तार किया। उधर, आरुषि की मां डा. नुपूर तलवार और डा. राजेश की महिला मित्र डा. अनीता दुर्रानी को भी पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया गया। वहीं, पुलिस हत्या में प्रयुक्त हथियार और हेमराज के मोबाइल को अब तक बरामद नहीं कर पाई है।


हालांकि आज की प्रेस कांफ्रेंस में पुलिस इस दोहरे हत्या की स्पष्ट वजह नहीं बता पाई लेकिन डा। तलवार को गिरफ्तार करने के उपरांत कत्ल की इस सनसनीखेज वारदात से पर्दा उठाने का दावा किया है।


यद्यपि पुलिस की कहानी में कई ऐसे पेंच हैं जिनका जवाब पुलिस के पास अभी भी नहीं है। पुलिस के अनुसार डा। तलवार ने अपनी पुत्री आरुषि और नौकर हेमराज को आपत्तिजनक अवस्था में देखने के बाद दोनों को ठिकाने लगा दिया। समझाने के बहाने पहले वह हेमराज को छत पर लेकर गया, जहां उसकी हत्या कर दी। बाद में अपने कमरे में आकर शराब पी तथा फिर उसके बाद बेटी को मौत की नींद सुला दिया। वारदात में डाक्टर ने पहले हथौड़ीनुमा वस्तु से सिर पर वार किया, फिर किसी धारदार हथियार से दोनों के गले की नसें काट डाली थीं।

हालांकि पुलिस अभी वारदात में प्रयुक्त हथियार तथा मोबाइल फोन बरामद नहीं कर पाई है। पुलिस का यह भी दावा है कि डा। राजेश तलवार के संबंध किसी अन्य महिला से थे जिसकी जानकारी आरुषि व हेमराज को थी।


उधर, अदालत में पेश करते समय डाक्टर राजेश तलवार ने पुलिस पर उसे झूठा फंसाने का आरोप लगाया है। ज्ञात हो कि गत 15 मई की रात में सेक्टर-25 जलवायु विहार निवासी डाक्टर दंपति राजेश तलवार की पुत्री आरुषि [14] और उनके घरेलू नौकर हेमराज [45] की हत्या कर दी गई थी।
मेरठ परिक्षेत्र के पुलिस महानिरीक्षक गुरुदर्शन सिंह ने इस दोहरे हत्याकांड का खुलासा करते हुए बताया कि आरुषि के कत्ल की सूचना मिलने पर जांच के लिए पहुंची पुलिस टीम को डा। राजेश तलवार ने खुद को काफी दुखी दिखाते हुए नौकर हेमराज को तत्काल गिरफ्तार करने को कहा। पुलिस टीम को मौके की सही ढंग से जांच भी नहीं करने दी गई। टीम ने जब उनसे छत पर लगे दरवाजे की चाबी मांगी तो उन्होंने कहा कि जांच बाद में कर लेना नहीं तो नौकर फरार हो जाएगा।


घटना के अगले दिन 17 मई को जब पुलिस ने छत से हेमराज का शव बरामद किया तो यह बात सामने आई कि उसकी हत्या भी उसी तरह की गई थी जिस तरह आरुषि को मारा गया था।
पुलिस महानिरीक्षक के अनुसार दोनों की हत्या एक ही रात में कुछ अंतराल पर हुई। हत्यारे ने दोनों के सिर पर हथौड़ीनुमा वस्तु से वार किया था तथा बाद में किसी धारदार हथियार से उनके गले की नसें काट दी थीं।


गौरतलब है कि इस दोहरे हत्याकांड को सुलझाने के लिए नोएडा पुलिस के साथ एसटीएफ को भी काम पर लगाया गया। पुलिस की टीमों ने कई बिंदुओं से मामले की जांच की। लेकिन हर बार शक की सुई घर में मौजूद सदस्यों के इर्द गिर्द ही घूमकर रह जाती थी। आरुषि के घर में काम कर चुके नौकरों, उसके दोस्तों व हेमराज के परिजनों आदि से भी लंबी पूछताछ की गई। तब इस बात का पता चला कि आरुषि के पिता डा। राजेश तलवार के किसी महिला से अवैध संबंध थे। इसका जिक्र हेमराज ने अपने दोस्तों से करते हुए अपनी जान का भी डाक्टर से खतरा जताया था।


इसके आधार पर पुलिस ने डा। तलवार और उनकी पत्‍‌नी नुपुर तलवार से कई राउंड पूछताछ की। इस दौरान कई ऐसी बातें सामने आई, जिससे पुलिस का शक और गहरा हो गया। मसलन घर में दो लोगों की हत्याएं हों और घर में सोए हुए लोगों को पता नहीं चला? दूसरा राजेश तलवार के मोबाइल फोन कॉल की जांच में पता चला कि वह 15 मई की रात्रि में करीब 12 बजे तक अपने किसी परिचित से बात कर रहे थे। इससे साफ था कि वह घटना के समय गहरी नींद में नहीं थे। इस आधार पर संदेह पुख्ता हुआ और पुलिस ने शुक्रवार सुबह डा. राजेश को उनके घर से गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने आरोपी डाक्टर को अदालत में पेश किया जहां से उन्हें चौदह दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। पुलिस अब उनके रिमांड की तैयारी कर रही है।


पुलिस महानिरीक्षक गुरुदर्शन सिंह ने कत्ल की वजह बताते हुए कहा कि डा। राजेश तलवार ने देर रात अपनी बेटी के कमरे का दरवाजा खुला होने पर अंदर झांका तो उन्हें नौकर हेमराज तथा बेटी आरुषि आपत्तिजनक अवस्था में मिले पर वह यौन संबंध नहीं बना रहे थे। इससे वह गुस्से में आ गए। नौकर को समझाने के बहाने उन्होंने छत पर भेजकर आरुषि को उसके कमरे में बंद कर दिया। इसके बाद डा. राजेश हथौड़ीनुमा वस्तु तथा एक धारदार हथियार लेकर छत पर गए जहां पर उन्होंने पहले हेमराज के सिर पर वार किया तथा बाद में उसके गले की नसें काट दी। इसके बाद डाक्टर घर में नीचे आए और कमरे में जाकर शराब पी। फिर वह आरुषि के कमरे में पहुंचे तथा नौकर की ही तरह उसका भी कत्ल कर दिया।


पुलिस अधिकारियों के अनुसार डा। राजेश के एक अन्य महिला के साथ में अवैध संबंध थे, जिसका पता आरुषि को चल गया था। इसका जिक्र उसने घर के नौकर हेमराज से भी किया था। तभी से नौकर व आरुषि एक दूसरे के करीब आ गए थे। इसके अलावा डा. राजेश इस बात से भी गुस्से में थे कि हेमराज उनके अवैध संबंधों की बात बाहर भी बता चुका था। इस बात से भी डा. राजेश अपने नौकर से नाराज चल रहा था। नौकर के कत्ल के बाद डाक्टर ने हेमराज के शव को छत पर रखे कूलर के ढक्कन से ढकने के बाद छत के गेट पर ताला जड़ दिया था। उसका इरादा आरुषि के कत्ल का आरोप हेमराज पर लगाकर उसके शव को भी गायब कर देना था, लेकिन मौके पर मीडिया व पुलिस की मौजूदगी के चलते वह सफल नहीं हो पाया। पुलिस अभी वारदात में अन्य किसी व्यक्ति की भूमिका की भी जांच कर रही है। यह और बात है कि पुलिस के हाथ अभी तक दोनों हत्याओं में प्रयुक्त हथियार, खून से सने हुए कपड़े तथा मोबाइल फोन नहीं लगे हैं।


उधर, अदालत में पेशी के लिए जाते हुए डा. राजेश तलवार ने स्वयं को बेकसूर बताते हुए पुलिस पर उसे फंसाने का आरोप लगाया है। वहीं पुलिस के आला अधिकारियों का कहना है कि डाक्टर को रिमांड पर लेने के बाद मामले से जुड़ी कई अन्य कड़ियों से भी पर्दा उठ सकेगा।
उधर, बेटी व नौकर की हत्या करने के आरोपी डा। राजेश तलवार को फोर्टिस अस्पताल प्रबंधन ने विजिटिंग कंसलटेंट के पद से हटा दिया है। दंत रोग विशेषज्ञ राजेश तलवार के दिल्ली समेत कई क्लीनिक व अस्पताल में दांत संबंधी रोगियों की जांच करते थे।


डा. तलवार के खिलाफ ऐसे मिले सुराग

1. हत्या के बाद डा. तलवार ने पुलिस को सूचित करने की बजाय पड़ोसियों को बुलाया।
2.15 मई को कत्ल रात में 12 से दो बजे के बीच हुआ। इस रात डा. तलवार 12 बजे तक लोगों से फोन पर बात करता रहा। अगर कातिल बाहर से आता तो इसकी भनक उसको लगती।
3. घर में आने को तीन दरवाजे पार करने पड़ते हैं। ऐसे में बाहर से आने वाले हत्यारा जोर-जबरदस्ती किए बिना घर में नहीं घुस सकता था। इससे पुलिस को लगा कि हत्यारा घर में ही मौजूद था।
4. नौकर हेमराज व आरुषि की हत्या एक ही दिन हुई पर शव दो दिन बाद छत पर मिला। हत्या के बाद शव को कूलर के ढक्कन से ढका गया, जिससे शव को कड़ी धूप में सड़ने से बचाया जा सके। इससे लगा कि यह सोची समझी रणनीति है।
5. आरुषि की हत्या के बाद खून से सना गद्दा पड़ोसी की छत पर रखा गया। इससे साफ हो गया कि कातिल अगर बाहर का था तो वह हत्या के अगले दिन घर में घुसकर गद्दे को छत पर कैसे ले गया।
6। पुलिस ने डा. तलवार व उसके वकील के बीच हुई बातों को टेप किया। बातचीत में पुलिस को कुछ अहम बातों का पता लगा।

डाक्टर की करतूत से पड़ोसी स्तब्ध

आरुषि हत्याकांड में पिता के हाथ होने की खबर ने लोगों को स्तब्ध कर दिया है। आरुषि व हेमराज की हत्या डा। राजेश तलवार ने ही की थी, लोग इस पर यकीन भी नहीं कर पा रहे। जैसे ही पुलिस ने आरुषि व नौकर हेमराज की हत्या में डा. तलवार की संलिप्तता की बात कही, सभी भौचक्के रहे गए। सच्चाई सामने आते ही लोगों की भीड़ सेक्टर-25 स्थित डा. तलवार के घर पर पहुंचना शुरू हो गई। उसी सेक्टर में रहने वाले सुबोध सूद ने बताया कि डाक्टर द्वारा अपनी बेटी की हत्या करना आश्चर्यचकित करता है और वे इस घटना से स्तब्ध हैं।


वहीं उन्होंने बताया कि मैं भी अपनी बेटी के दांतों का इलाज कराने उनके पास ले गया था, लेकिन ज्यादातर समय उनकी क्लीनिक पर कोई महिला डाक्टर होती थी। ऐसे में उनसे मुलाकात नहीं हो पाई थी। सेक्टर-25 में रहने वाली 69 वर्षीय विभाप्रिया बताती है कि बाप द्वारा बेटी की हत्या करना मैं सपने भी नहीं सोच सकती। इसी सेक्टर के एसके ग्रोवर बताते हैं कि यहां एक डाक्टर बाप ने हैवानियत की कई हदें पार कर अपनी बेटी की हत्या कर दी। ऐसे कई सवाल लोगों के जेहन में अब भी कौंध रहे हैं कि एक पिता अपनी बेटी की हत्या कैसे कर सकता है?

आरुषि हत्याकांड एक नजर में

16 मई- नोएडा के जलवायु विहार में रहने वाले डा. राजेश तलवार की चौदह साल की बेटी आरुषि का शव सुबह कमरे से बरामद, गले पर तेज धारदार वाले चाकू से वार करके हत्या की गई, वारदात का शक घर से लापता नौकर हेमराज पर। नौकर की तलाश में पुलिस टीम नेपाल के लिए रवाना।
17 मई- घटना के तीस घंटे बाद डा. राजेश और नुपुर तलवार के फ्लैट की छत से नौकर हेमराज का शव बरामद, उसकी हत्या भी गले पर तेज धार वाले हथियार से की गई।
-दोनों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में खुलासा कि आरुषि व हेमराज का कत्ल 15 मई को हुआ।
-जिस गद्दे पर आरुषि का शव पड़ा था, वह गद्दा घर की बजाय छत पर मिला।
-मामले की जांच एसटीएफ को सौंपी गई।
-एसपी सिटी व सेक्टर बीस के थाना प्रभारी का तबादला।
18 मई-एसटीएफ ने आरुषि के परिजनों से पूछताछ की।
-पुलिस ने वारदात के समय आरुषि के बेड पर बिछा गद्दा जांच के लिए कब्जे में लिया।
-19 मई-पुलिस ने हत्याकांड में महत्वपूर्ण सुराग मिलने का दावा किया, एसएसपी सतीश गणेश ने दो दिन में मामले से पर्दा हटाने की बात कही।
-डाक्टर परिवार के पूर्व नौकर विष्णु समेत कई लोगों से पूछताछ।
-डाक्टर परिवार भी शक के घेरे में।
20 मई- प्रदेश के डीजीपी का बयान, जल्द होगा मामले का खुलासा।
- घटना में प्रयुक्त हथियार की बरामदगी के लिए एनसीआर में छापे।
- पांच दिन बाद पुलिस को याद आई डाक्टर राजेश के गैराज की तलाशी।
21 मई- आरुषि के पिता का मीडिया में बयान, हत्या के विषय में कुछ नहीं पता।
-पुलिस का बयान, जल्द होगा खुलासा।
-दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच की टीम भी मौके पर पहुंची।
22 मई -पहली बार एसएसपी ने मीडिया के सवालों के जवाब देने को प्रेसवार्ता की।
-बिसरा व फोरेंसिक रिपोर्ट के लिए एसएसपी ने आगरा संपर्क किया।
-पुलिस ने ऑनर किलिंग की थ्योरी पर जांच शुरू की।
-आरुषि के दोस्त अनमोल से भी पूछताछ।
23 मई - पुलिस ने आरुषि की हत्या के आरोप में उसी के पिता डा. राजेश तलवार को गिरफ्तार किया।
-अदालत ने डा. तलवार को 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेजा।


http://in.jagran.yahoo.com/news/national/crime/5_18_4474651.html

Thursday, May 22, 2008

छिंदवाड़ा की जेल से आते थे मुंबई में हुक्म

छिंदवाड़ा की जेल से आते थे मुंबई में हुक्म

डेटलाइन इंडिया

भोपाल, 7 मार्च-मध्य प्रदेश की छिंदवाड़ा जेल में बंद एक डाकू अपने गिरोह को अपने मोबाइल से लगातार आदेश देता रहा और जब तक वह जेल में रहा और उसका मोबाइल पकड़ा नहीं गया, तब तक वह दस करोड़ रुपए कमा चुका था।

पापड़या कालिया नाम के इस डाकू के खिलाफ महाराष्ट्र में बहुत सारे मामले दर्ज हैं और छिंदवाड़ा चूंकि मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की सीमा पर स्थित है इसीलिए वह इस जिले में भी वारदातें करवाता था। ऐसे ही एक मौके पर मध्य प्रदेश पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया और अदालत के आदेश पर उसे न्यायिक हिरासत में छिंदवाड़ा जेल भेज दिया गया। कालिया जेल में था और उसकी पत्नी रेखा गिरोह संभाल रही थी।

रेखा को जल्दी ही पुलिस ने गिरफ्तार किया और उस पर मकोका कानून की धाराएं लगाई गईं। मकोका विशेष अदालत के सामने दिए गए बयान में रेखा ने जो बताया, उससे तो अदालत में मौजूद सभी लोगों के होश उड़ गए। रेखा ने कहा था कि उसका पति कालिया छिंदवाड़ा की जेल से उसे और गिरोह को नियमित निर्देश देता है और उन्हीं के आधार पर गिरोह डकैतियां डालता है।


कालिया और उसके तीन साथी अगस्त, 2007 में जब पकड़े गए थे, तो उनके पास से लाखों रुपए के अलावा 18 किलो सोना बरामद हुआ था। अभी तक पुलिस कुल छत्तीस मामलों का पता लगा पाई है और कालिया तमाम दबावों के बावजूद पुलिस के सामने अपने धंधे के रहस्य खोलने पर राजी नहीं हुआ। कालिया उस गिरोह का सदस्य भी था, जिसे मुंबई के लोखंडवाला में हुए एक एनकाउंटर में मार डाला गया था और इस घटना पर एक मशहूर फिल्म शूट आउट इन लोखंडवाला भी बन चुकी है।


रेखा ने अदालत में जब यह बयान दिया तो पहले तो किसी को भरोसा नहीं हुआ। फिर मुंबई उच्च न्यायालय के जज डी जी कार्णिक ने अपने सहयोगी से उस नंबर पर डायल करने के लिए कहा, जिससे कालिया अपनी पत्नी रेखा को फोन किया करता था। अदालत के फोन में एसटीडी नहीं थी इसीलिए रेखा से ही फोन ऑन करवाया गया और अदालत के सामने उसने अपने पति कालिया से बात की।


मकोका अदालत ने निर्देश तो यह दिया था कि छिंदवाड़ा जेल के अधीक्षक को कैद करके उनके सामने पेश किया जाए, लेकिन मध्य प्रदेश सरकार ने एक सब जेलर को, जो हेड कांस्टेबल दर्जे का होता है, निलंबित करके उसके खिलाफ जांच बैठा दी। कालिया अब भी छिंदवाड़ा जेल में है और उसकी पत्नी रेखा मुंबई की ऑर्थर रोड जेल में।

http://aaloktomar.blogspot.com/2008/03/blog-post_07.html

भोपाल गैस कांड




बाबा धरणीधर



भोपाल गैस कांड

(बाबा धरणीधर की मशहूर कविता से चुनिदा लाइनें .... )

हर जिस्म जहर हो गया एक दिन
मुर्दों का शहर हो गया भोपाल एक दिन
...........................

सर्दी की रात थी वो क़यामत की रात थी
दोजख की आग थी वो भयानक सी रात थी
जो भी हो मगर ये भी एक बात थी
कि तहजीबो तरक्की के गिलाजत की रात थी
...................

मासूम कोई चीखता अम्मी मुझे बचा
मरती बहन भी टेरती भैय्या मुझे उठा
कहता था कोई आँख से आंसू बहा बहा
मरते दफा तो बाप को बेटा खुदा दिखा
...............................................

फर्क था न लाश को जात पांत का
नस्ल रंग आज सब साथ साथ था
हिंदू का हाथ थामते मुस्लिम का हाथ था
जां जहाँ था मौत के हाथ था
..................................

देखा गया न जो कभी सोचा गया
नहीं दर्द को भी पी गई भोपाल की जमीं
खुदा करे ये हादसा गुजरे न अब कहीं
शायद ही अगली peediyan इसपे करे यकीं

.................................

हर जर्रा शरर हो गया भोपाल एक दिन
मुर्दों का शहर हो गया भोपाल एक दिन
...............................................................

Tuesday, May 20, 2008

पत्रकार एवं साहित्यकार बाबा स्व. श्री संपतराव धरणीधर


पलंग पर लेटे हुए बाबा धरणीधर के साथ हनुमंत मनगटे और दामोदर सदन .

पत्रकार एवं साहित्यकार बाबा स्व. श्री संपतराव धरणीधर


जन्म १० मार्च , १९२४ और निधन १५ मई , २००२

रचनाए
- गजल संग्रह " किस्त किस्त जिंदगी "
कविता और लोकगीतों का संग्रह " महुआ केशर "
कविता संग्रह - नहीं है मरण पर्व
नहीं है मरण पर्व के बारे में कुछ खास बातें ...

संस्करण - प्रथम - 2003

प्रमुख कविताये ...

टाइटल कविता मरण पर्व के अलावा
भोपाल गैस कांड ,
दिल्ली ,
मेरा मध्यप्रदेश ,
२१ वीं सदी के लिए ,
भूख - भरे पेट की ,
किस आंधी का शोर हुआ है ,
आदमी ,
क्यों मौसम बेइमान हुआ है ,
बस्ती
साहित्यकार से एक परिचय ...

Monday, May 19, 2008

छिंद के वाडे के नाम पर पड़ा छिंदवा़ड़ा...





छिंदवाड़ा : ऐतिहासिक तथ्य

एक समय छिंदवा़ड़ा जिला छिंद के पे़ड़ों से भरपूर था इसलिए इसका नाम छिंद के वाडे के नाम पर छिंदवाड़ा पड़ा। वहीं दूसरी ओर कहा जाता है कि छिदंवाड़ा में शेरों की संख्या काफी अधिक थी। यहां काफी संख्या में शेर आते थे। इसलिए इसे सिंहद्वार भी कहा जाता था।

छिंदवाड़ा में कभी भक्त बुलुंद का राज हुआ करता था। इसने तीसरी शताब्दी में यहां शासन किया। इसके बाद राष्ट्रकुट ने नीलकंठ गांव बसाया। उसने 7वीं सदी तक राज किया। इसके पश्चात गौंडवाना राजाओं ने राज किया। उन्होंने देवगढ़ को अपनी राजधानी बनाया तथा देवगढ़ में किले का निर्माण भी किया। यहां भक्त बुलुंद सबसे शक्तिशाली राजा था। उसने औरंगजेब की हुकूमत के समय मुस्लिम धर्म अपना लिया था। इसके बाद यहां पर राजपाट बदलता रहा। अंत में 1803 में अंतिम मराठा शासन समाप्त हुआ और 17 सितम्बर 1803 को ईस्ट इंडिया कंपनी ने रघुजी-द्वितीय को परास्त कर अपना आधिपत्य स्थापित किया।

स्वतंत्रता के बाद नागपुर की राजधानी छिंदवाड़ा को बनाना चाहते थे।
1 नवंबर, 1956 को इस जिले का पुनर्गठन किया गया।

आकर्षक स्थलः



पातालकोट जिले का प्रख्यात दर्शनीय स्थल हैं
तामिया जनजातीय संग्रहालय
छोटा महादेव की गुफा
देवगढ़ का किला
नदादवाड़ी
गर्म पानी का फुहारा, अनहोनी
राधादेवी की गुफाएं
जामसावली हनुमान मंदिर, सौंसर

छिंदवाड़ा :

छिंदवाड़ा जिले का गठन 1 नवंबर, 1956 को हुआ। यह सतपुड़ा पर्वत माला के दक्षिण-पश्चिमी में स्थित है। यह 21।28 से 22.49 डि. उत्तरी देशांतर और 78.40 से 79.24 डिग्री पूर्वी अक्षांश में 11,815 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में फैला हुआ है। जिले की सीमा दक्षिण में महाराष्ट्र के नागपुर जिले, उत्तर में मप्र के होशंगाबाद और नरसिंहपुर, पश्चिम में बैतूल एवं पूर्व में सिवनी जिले से लगी हुई है। छिदंवाड़ा जिला क्षेत्रफल की दृष्टि से प्रदेश में पहले नंबर पर है। जो प्रदेश के कुल क्षेत्रफल का 3.85 प्रतिशत है। यह जिला 9 तहसीलों (छिंदवाड़ा, परासिया, जुन्नारदेव, तामिया, अमरवाड़ा चौरई, बिछुआ, सौसर और पांढुर्णा) में बंटा हुआ है। जिले में 11 विकासखंड (छिंदवाड़ा, परासिया, जुन्नारदेव, तामिया, अमरवाड़ा, चौरई, बिछुआ, हर्रई, मोहखेड़, सौसर और पांढुर्णा) हैं। जिले में 4 नगर पालिकाएं (छिंदवाड़ा, परासिया, जुन्नारदेव, और पांढुर्णा) हैं। वहीं 8 नगर पंचायतें (सौसर, अमरवाड़ा, चांदामेटा भूतरिया, न्यूटन चिकली, हर्रई, मोहगांव, चौरई और लोधीखेड़ा है। वहीं 10 छोटे कस्बे (दीघावनी, जाटाछापर, इकलहरा, पगारा, काली छापर, दमुआ, पाला चौरई, बम्हौरी, अम्बाड़ा और बड़कुही हैं। जिले में 1984 गांव हैं। इनमें से 1903 गांवों को 19 राजस्व मंडल और 319 पटवारी हल्कों में बांटा गया है। जिले में 808 पंचायतें हैं। प्रमुख औद्योगिक इकाईयां : हिन्दुस्तान लीवर लिमिटेड, लहगड़ुआ रेमण्ड वूलन मिल्स लिमिटेड, बोरगांव पी.बी.एम. पोलीटेक्स लिमिटेड, बोरगांव सुपर पैक (बजाज) ग्राम सावली भंसाली इंजीनियरिंग पोलीमर्स, सातनूर सूर्यवंशी स्पिनिंग मिल्स, ग्राम राजना शशिकांत एंड कम्पनी, जुन्नारदेव रूबी इंजीनियंरिग वर्क्स छिंदवा़ड़ा ईश्वर इंडस्ट्रीज खजरी,

Saturday, May 17, 2008

छिंदवाड़ा का बादल भोई tribal म्यूज़ियम




वर्ल्ड म्यूज़ियम डे १८ मई स्पेशल जनजातीय म्यूज़ियम

chhindwara में जनजातीय म्यूज़ियम की शुरूआत 20 april 1954 में हुई थी .
वर्ष 1975 को इसे स्टेट म्यूज़ियम का दर्जा दिया गया .

8 सितम्बर १९९७ को इसका नाम बदलकर श्री बादल भोई tribal म्यूज़ियम कर दिया गया . असल में श्री बादल भोई जिले के क्रन्तिकारी जनजातीय नेता थे . उनका जन्म 1845 में परासिया तहसील के dungria titra गाँव में हुआ था । उनके नेतृत्व में हजारों आदिवासियों ने १९२३ में कलेक्टर के बंगले पर एकत्र होकर प्रदर्शन किया था। इस दौरान उन पर लाठियाँ बरसाई गईं और गिरफ्तार कर लिया गया.
२१ अगस्त १९३० को अंग्रेजों के शासनकाल में उन्हें रामाकोना में वन नियमों का उल्लंघन करने के जुर्म में चन्दा जेल में बंद कर दिया गया था। उन्होने इसी जेल में अंग्रेजों द्वारा जहर दिए जाने के कारण वर्ष १९४० में अपने प्राण गंवा दिए. राष्ट्र कि आजादी में उनके इस बलिदान के कारण traibala म्यूजियम का नाम बदलकर श्री बदल बोई स्टेट traibala म्यूजियम कर दिया गया.

पर्यटकों के लिए १५ अगस्त २००३ से यह म्यूजियम रविवार तक खोला जाता है। जनजातीय सोध संगठन प्रमुख के निर्देश और चपरासियों के सुपुर्द है. इसमें ११ कमरे और ४ गैलारियाँ हैं. इसमें करीब ४५ जनजातीय संस्कृतियों और सभ्यताओं का वर्णन मिलता है.
यह मध्य प्रदेश का सबसे पुराना और बड़ा म्यूजियम है । सितम्बर २००३ से इस म्यूजियम में प्रवेश के लिए २ रुपये का शुल्क निर्धारित किया गया है. इससे पहले इस म्यूजियम में प्रवेश के लिए कोई शुल्क नहीं देना पड़ता था. यहाँ प्रतिदिन १००-१५० लोग आते हैं.

जो स्वतः ही इस म्यूजियम के प्रति लोगों के रुझान की स्पष्ट गवाही देता है।
वर्ष ---- पर्यटक
2000 ---- 9, 518
2001 ---- 82, 582
2002 ---- 96, 477
2003 ---- 75, 857
2004 ---- 36, 553
2005 ---- 35, 612

इस म्यूजियम में जिले की जनजातियों से सम्भंधित इक़ से इक़ अद्भुत चीजें हैं। इसमें घर, कपडे, जेवरात, हथियार, कृषि के साधन, कला, संगीत, नृत्य, त्यौहार, देवी-देवता, धार्मिक गतिविधियाँ, आयुर्वेदिक संग्रह जैसी वस्तुएं के बारे में विस्तृत जानकारी मिलती है. यह म्यूजियम जनजातीय संप्रदाय की उन्नत परम्पराओं और प्राचीन संस्कृति पर प्रकाश डालता है. जिले में गौंड और बैगदो प्रमुख जनजातियाँ थीं. इसमें उन लोगों के परिवार के रहने सहने के ढंग का भी वर्णन मिलता है. इसमें यह भी जानकारी मिलती है कि अगरियाजन्जाती के लोग किस तरह लोहे को मोदते थे. इन बातों को अगर इक़ लाइन में कहा जाए तो यह म्यूजियम जिले की जनजातीय के बारे में जानकारी जुटाने का सर्वथा उपयुक्त साधन है.

म्यूजियम की समय सारिणी और अवकाश
पर्यटकों के लिए घुमाने का समय

१ अप्रेल से ३० जून- सुबह ११:३० से शाम ६:३० बजे तक।
१ जुलाई से ३१ मार्च- सुबह १०:३० से शाम ५ बजे तक

****नोट: रविवार को छोड़कर सभी सरकारी छुट्टियों और सोमवार को म्यूजियम बंद रहता है।
(स्त्रोत: ट्राईबलम्यूजियम, छिंदवाड़ा के शोध अधिकारी)

Friday, May 16, 2008

१७ मई : आज मे भइया के ऑफिस मे दो बजे रात तक


आज मे भइया के ऑफिस मे दो बजे रात तक बैठा हूँ . यह पेपर कैसे छपता ये देखने के लिए मे आया था .पर बाकि ऑफिस देखने मे भी काफी मजा आया .ऑफिस एकदम शानदार बहुमंजिला इमारत है .जिसमे कई सारे कमरे है साथ ही यह पर एक बड़ा सा रिसेप्शन रूम और एक बड़ा सा रेस्टोरेंट की तरह भोजन कक्ष है.यही पर नीचे मे साडी मशीने है जो की काफी बड़ी है.इनमे पेपर छपते देखना मेरे लिए काफी रोमांचकारी अनुभव था ।

कहते है ये सभी लगभग ४ से ५ लाख कीमत की है इनमे टेलीफोन के वायर रोल की तरह ही पेपर रोल लगते है जोकि १५० किलो के होते है और लगभग १५ किलोमीटर लंबे है. मशीन मे ये पुरा रोल फसाया जाता है .पेपर पहले मेटल प्लेट मे छपता है फिर उसकी कॉपी पेपर मे आती है .इनका ऑफिस किसी फिल्मी ऑफिस की तरह ही दिखता है जो आकर्षक है इसमे हर किसी की अलग डेस्क है और हर डेस्क पे १ कंप्यूटर रखा होता है .साथ ही जैसा की मेरा अंदाज था की यह एयर कंदिशनेर की ठंडी तजि हवा आती है .जिसके कारन हमारेम भइया जी दिन बा दिन गोरे होते और निखरते जा रहे है ।

और क्या कहूँ यहाँ का स्टाफ वैसे तो मुझे ठीक ही लगा. और हाँ युः कियो छत से नजर और आसमान काफी साफ नजर आता हैं मुझे तो ये जगह काफी अच्छी लगी . ये बिल्डिंग काफी आधुनिक और कई अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त है यह पे टीवी भी है (कुल मिलाकर काफी मजेदार और रोमांचकारी अनुभव रहा ये ।)

@ आपका अखिलेश पवार@

chhindwara छबि





Thursday, May 1, 2008

घर की याद


शायद ही कोई ऐसा हो जिसको ना आती हो ... घर की याद
चंद दिनों बाद में घर जा रहा हूँ.

मेरे लिए ... अब दुनिया कितनी बड़ी हो गई है ...
... कहाँ तो बचपन में 25 किलो मीटर दूर का पता नहीं था
अब मैं हजार किलो मीटर से ज्यादा दूरी पर रह रहा हूँ ...
मुझको अब ... हजारों- हजार मील की दुनिया भी पता है ...

दिल्ली से भोपाल ... भोपाल से नागपुर ...
नागपुर से तन्सरामल ( उमरानाला ) ...
नागपुर में दोस्तों से मुलाकात ...उसके बाद घर ...

Saturday, April 26, 2008

तारीख 27-कमलेश्वर और छिंदवाड़ा


तारीख 27-कमलेश्वर और छिंदवाड़ा

हनुमंत मनगटे

अदीब जानता था, मोंतेजुमा ने उससे जो कहा था-प्रमथ्यु! तुमने तुलसी के पौधे की दाहिनी दिशा में पाताल के अंतिम तल तक पहुंचने का जो जलमार्ग बताया था, गिलगमेश उस पर बहुत आगे बढ़ गया है। वह किसी भी समय स्वप् नगरी पहुंच सकता है। वहां पहुंचते ही वह धन्वन्तरि शुरुप्पक के जिउसुद्दु को जरुर तलाश लेगा। अदीब घर-5116 इरोस गार्डन, सूरजकुंड रोड, नई दिल्ली के करीब पहुंच रहा था। कार में बगल में गायत्री अर्धांगिनी, कार ड्राइव करता ड्रायवर और तभी एकाएक सांस की गति में अवरोध। दाहिना हाथ एक एक गायत्री के कांधों पर और सिर कांधे से होता हुआ सीने के पास गायत्री के दिल पर। गायत्री के दिल की धड़कनों की गति से निर्मित असामान्य स्थिति। उत्तेजना में ईना की चीख और गिलगमेश की मनुष्य की पीड़ा, दुख, यातना, भय और मृत्यु से उसे उन्मुक्त करने की आवाज गूंजने लगी- मैं पीड़ा से लड़ूंगा यातना सहूंगा-कुछ भी हो मैं अपने मित्र और मनुष्य मात्र के लिये मृत्यु को पराजित करुंगा। मैं मृत्यु से मुक्ति की औषधि खोज कर लाऊंगा।

27 जनवरी 2007 की रात 830 बजे कमलेश्वर ने गिलगमेश को शायद किसी मुसीबत में देख मृत्यु से साक्षात्कार कर 'जलती हुई नदी' में छलांग लगा दी थी और तैरते हुए वह उस समन्दर में पहुंच गये थे गिलगमेश को खोजने, उसकी महायत्रा में हमसफर की भूमिका में। देह से मुक्त हो कमलेश्वर ने पंचतत्व में से जल को स्वीकारा, क्योंकि मृत्यु का रहस्य खोजने गिलगमेश अथाह, अतल समन्दर की गहराई में सदियों से श्रमरत था। वह थके नहीं, वह शिकस्ता हो हाथ पैर चलाने में लस्त पस्त हो जाये, अदीब उसी महायात्रा पर निकल पड़े। लेकिन वह हैं, रहेंगे, ािस्म भले ही हो, किताबों में, यादों में, 'यादों के चिरांग' की रोशनी में। यादों में कोई नहीं मरता। मरा हुआ जिन्दा हो जाता है, क्योंकि यादों के चिरांग की बतियां एक नहीं अनेक होती हैं, रंगों की अनगिनत बातियां, और उनमें तेल की जगह दौड़ता सतत लाल सुर्ख रक्त, स्वचलित, और इसीलिये उसमें से उभरती प्रकाश की अनवरत जलती रक्ताभ लौ। उस लौ में बार-बार उभर कर सामने आता है एक सांवला, आकर्षक, हर दिल अजीज, सामान्य कद का, विशिष्ट आवाज का बादशाह, जिन्दादिल, उम्र को धोंखा देता, लोगों को कृष्ण की सतत कर्मरत रहने की नसीहत देता-कमलेश्वर।

मेरी यादों में कमलेश्वर, और कमलेश्वर की यादों में छिन्दवाड़ा। यह इत्तेफाक नहीं, कोई अदृश्य तिलस्म है या कमलेश्वर की किमियागीरी...यादों के चिरांग को जलाना बुझाना नहीं पड़ता। बुझाने पर भी नहीं बुझते, ताउम्र। निरन्तर सतत ताजिन्दगी जलते रहते हैं, और उनमें मााी के वीसीडी और डीवीडी के माध्यम से दृश्य आंखों के समक्ष आते रहते हैं तथा आवाजें कानों के जरिये दिल और दिमाग को अहसास दिलाते रहती हैं कि अदीब अपने कांधों को जीयस के गिध्द से लगातार नुचवाते हुए भी गिलगमेश की प्रतीक्षा में, मृत्यु के हाथों सिर्फ नश्वर देह सौंपते हुए, वह आपके रुबरु उपस्थित रहता है, जब भी आपकी आंखें और दिल शिद्दत से चाहते हैं कमलेश्वर को अपने से बतियाते, मुजस्सम।

यादों के चिरांग की रोशनी में एक ही फ्रेम में कमलेश्वर, छिन्दवाड़ा और 27 तारींख...संगायन का उद्धाटन, कहानियों की रात, 7वां समांतर लेखक सम्मेलन, बाबा धरणीधर व्याख्यान माला... यादों में कहीं दृश्य एक दूसरे पर सुपर इम्पोज हो जाये इसलिये क्रमबध्द तरीके से...यानी कमलेश्वर का म।प्र. के छिन्दवाड़ा में पहली बार आगमन। 15 मार्च 1970 कथाकार दामोदर सदन, कवि सं. रा. धरणीधर, समीक्षक प्रवीण नायक, कैलाश सक्सेना और मेरे द्वारा गठित साहित्य, संस्कृति, संगीत केंद्रित संस्था 'संगायन' का उद्धाटन कमलेश्वरजी के हस्ते होने वाला था। साथ ही त्रिदिवसीय आयोजन में विभिन्न कार्यक्रमों के अतिरिक्त कहानी पर केन्द्रित परिचर्चाएं भी थीं। उन दिनों छिन्दवाड़ा आदिवासी बाहुल्य पिछड़ा जिला था, जिसमें ठहरने के लिये ढंग के सर्वसुविधा युक्त लॉज थे, यातायात के लिये टैक्सियां।

कमलेश्वरजी बम्बई से नागपुर आने वाले थे। सुबह 10 बजे के करीब टे्रन नागपुर पहुंचती थी। सवारियों को ढोने वाली एक खटारा सी टैक्सी उपलब्ध हो पाई थी, जिसे लेकर मैं और प्रवीण नायक सीधे नागपुर रेलवे स्टेशन पहुंचे थे। कुछ समय पहले ही टे्रन आकर प्लेटफार्म नं. 1 पर रुकी हुई थी। विलम्ब हो जाने के कारण आत्मग्लानि से भरे हम उन्हें खोजने लगे। देखा-पास ही एक पोल से टिककर सिगरेट के कश लेता हुआ नीले हाफ बुशशर्ट और फुलपेंट पहने हुए जो खड़ा है, वह कमलेश्वर थे। उन दिनों वे 'सारिका' के सम्पादक थे। करीब पहुंच देरी के लिये क्षमा मांगी तो उन्होंने चिरपरिचित मुस्कराहट के साथ मेरे कंधे पर हाथ रखते हुये कहा, 'कोई बात नहीं हनुमंत। ट्रेन कुछ मिनिट पहले ही आई है, चलो।' इस बीच प्रवीण नायक ने सूटकेस उठा लिया था। उन्होंने मुझे पहचान लिया था। शायद दस बारह वर्ष के अन्तराल के बावजूद।

पहली मुलाकात इसके पूर्व नागपुर में ही प्रथम विश्व हिन्दी सम्मेलन में हुई थी, जब उनके साथ राजेंद्र यादव थे। नागपुर से छिन्दवाड़ा का 125 कि.मी. का सफर। ऊबड़ खाबड़ डामररोड और उस पर उछलती टूटरंगी टैक्सी। ड्रायवर की बगल की सीट पर कमलेश्वरजी और हम दोनों पिछली सीट पर। उसके पीछे भी चार लोगों के बैठने लायक सीटें थी। राह में वे छिन्दवाड़ा और साहित्यिक गतिविधियों की जानकारी लेते रहे। सौंसर में चाय पानी के लिये कुछ देर रुके। सिल्लेवानी घाटी शुरु होने के पहले आमला गांव के पास सड़क के किनारे एक बुजुर्ग आदिवासी टैक्सी रुकवाने के लिये हाथ हिलाता दिखा। उसके साथ दो औरतें थीं। एक प्रौढ़ा और दूसरी विवाहिता नवयुवती, नंगे पैर मैली कुचैली साड़ी पहने। बुजुर्ग-सिर पर छितराये सफेद बाल, रुखे सूखे चेहरे पर बेतरतीब दाढ़ी, शरीर पर मैली सी फतोई और घुटने तक लंगोट की तरह कसी धोती, पैरों में जूते, चप्पलें। ड्रायवर ने उनके करीब पहुंच टैक्सी रोक दी। यह देख प्रवीण नायक ड्रायवर पर उखड़ गया- ड्रायवर, तुमसे बात हुई थी कि कोई भी सवारी नहीं लोगे। जानते हो, हमारे साथ कौन मेहमान हैं? हम वैसे ही लेट हो रहे हैं। हमने पूरी टैक्सी का किराया दिया है। चलो...बढ़ो।

तभी कमलेश्वरजी ने आदिवासियों को गौर से देखते हुए ड्रायवर से कहा-ड्रायवर, उन्हें बैठा लो। उनसे किराया मत सेना। यह थे कमलेश्वर। कुछ देर बाद ही हम थे सतपुड़ा पर्वत की सिल्लेवानी घाटी में रास्ते के एक ओर जितनी गहरी घाटी, दूसरी ओर उतने ही ऊंचे सीध में खड़े पर्वत। पहाड़ के उस पार 30 कि.मी. दूर छिन्दवाड़ा। घुमावदार सर्पीली डामर रोड के चढ़ाव पर रेंगती घर्र-घर्र करती, हाँफती, धुंआ छोड़ती टैक्सी। घाटियां कुहासे से ढंकी। ऊंचे ऊंचे सरपट सीध में खड़े सागौन के पतझड़ के कारण नंगे, नुचे से दरख्त। मार्च का महिना। लाल सुर्ख टेसू के फूलों से लदे पलाश के दरख्तों से दहकता जंगल। कमलेश्वरजी अभिभूत थे।

बम्बई (मुम्बई) लौट कर उन्होंने सारिका में जिक्र किया था छिन्दवाड़ा का, सतपुड़ा का, हरी भरी वादियों का। उनकी यादों में आखिर तक छिन्दवाड़ा और म।प्र. अमिट रहा। उन्होंने छिन्दवाड़ा साहित्य के पुरखे बाबा धरणीधर को जो जिला चिकित्सालय में पिछले छह वर्षों से मौत से लड़ रहे थे, जो पत्र भेजा था, वह... 4-4-99 भाई धरणीधर जी तो मैं सतपुड़ा की पहाड़ियों और जंगलों को भूल सकता हूँ, आपको, मनगटे तथा अन्य मित्रों को। मनीष राय भी यादों में उलझे हुए हैं। छिन्दवाड़ा, धार, कुक्षी और मांडू भी याद है। दामोदर सदन भी और कुक्षी के रास्ते की वे उत्कीर्ण गुफायें भी और वहां के आदिवासी भी। इस सबको आप जैसे साथियों ने ही तो, मेरी यादों का हिस्सा बनाया है...आप याद हैं तो सब याद है...आपके जीवट का तो कायल था ही, गहरी जिजीविषा का भी अब कायल हूँ। सारी सूचनाएं मनगटे से ही मिली थीं। अभी उनका पत्र भी आया है, किसी एक्सीडेंट के कारण पड़े हैं। आशा है वे भी शीघ्र स्वस्थ्य हो जायेंगे। और जब हम लोग आपसे मिलने पहुंचेंगे तो आपको भी चिकित्सालय से बाहर लायेंगे...और जशन मनायेंगे।

धरणीधर जी...दार्शनिकों ने कहा है वक्त नहीं बीतता, हम बीतते हैं, पर मुझे तो लगता है वक्त बीत रहा है, हम नहीं...हम तो जी रहे हैं और वक्त हमारे साथ जी रहा है! तो मुलाकात के इंतजार के साथ-आपका-कमलेश्वर 7 वां अखिल भारतीय समांतर लेखक सम्मेलन का जिक्र करुं, जो छिन्दवाड़ा में हुआ था, उसके पहले उस पत्र का हवाला यहां देना जरुरी समझता हूँ, क्योंकि कमलेश्वर क्या थे, कैसे थे, पत्र से काफी कुछ स्पष्ट हो जायेगा। साथियों को किस तरह अनुप्रेरित, प्रोत्साहित किया जाता है, उनमें जिजीविषा किस तरह रोपी जाती है, उनके थके, लड़खड़ाते कदमों में किस तरह उर्जा प्रवाहित की जाती है, यह भला कमलेश्वरजी से ज्यादा कौन जानता था। यह उनकी फितरत का विशिष्ट गुण था, जिसे उन्होंने लंबे संघर्ष से अर्जित किया था।

9-5-96 प्रिय मनगटे उस दिन भोपाल में तुमसे आकस्मिक मुलाकात हो गई-जबकि मैं तुम्हारे 3-1-94 के पत्र का जवाब नहीं दे पाया था, पर तुमने क्या लिखा था, यह मुझे याद था। प्रेस बेचकर तुम बुढ़ापे का इंतजाम करना चाहते हो, यह सुनकर तकलीफ हुई। जब मैं बुङ्ढा नहीं हुआ हूँ तो तुम लोग बुढ़ापे की बात कैसे कर सकते हो? यह अधिकार तुम्हें नहीं है एक सच्चाई जरुर है कि अब कोई केंद्रीय पत्र या पत्रिका हमारे पास नहीं है ताकि विचारों का प्रक्षेपण हो सके-तो समांतर की विचारशीलता के लिये अब हमें विकेंद्रित व्यक्ति-केंद्रों की जरुरत होगी। जैसे कि तुम और तुम्हारे साथ 3-4 रचनाकार और॥इस बदलती बाजारु आर्थिक व्यवस्था के विरुध्द हमें वैचारिक प्रतिरोध केंद्र बनाने ही पड़ेंगे, नहीं तो आगे आने वाले समय में हमारा मनुष्य हिरोशिमा की मौत से ज्यादा दारुण गरीबी-निपट गरीबी की मौत मरने के लिये बाध्य होगा! तो सोचो और मुझे अपना बुढ़ापा त्याग कर उत्तर हो! सस्नेह-कमलेश्वर निष्क्रियता की केंचुल से निकल मेरे बाहर आने में और शिद्दत से सक्रिय होने में इस पत्र की उष्मा ने महती भूमिका अदा की।

तो... संक्रमण काल था वह। परीक्षा की घड़ी भी थी। उनके लिये जो समांतर से जुड़े थे और कमलेश्वरजी के लिये भी, क्योंकि टाइम्स ऑफ इंडिया के मालिक तत्कालीन मोरारजी देसाई की सरकार के दबाव में कमलेश्वरजी को 'सारिका' से अलग कर टाइम्स से बाहर करना चाह रहे थे। और कमलेश्वरजी लड़ रहे थे सिध्दांतों की लड़ाई। वह व्यक्ति जिसने अपनी शर्तों पर ऊंचे से ऊंचा पद स्वीकारा और एक झटके में छोड़ा भी किसी भी बड़े से बड़े दबाव में नहीं आने वाला था। 7 वां समांतर कहां हो तय नहीं हो पा रहा था। शायद सितंबर-अक्टूबर 77 में दामोदर सदन भोपाल में थे, सूचना प्रसारण विभाग में, फोन पर चर्चा के दौरान मैंने कहा था कि संभव हो तो छिन्दवाड़ा में सम्मेलन करने का भार मैं उठाने को तैयार हूँ। वे भाई साहब से चर्चा कर देखें। कुछ दिन बाद ही कमलेश्वरजी का फोन गया था। उन्होंने स्वीकृति और तिथि भी दे दी थी।

बाद-जितेंद्र भाटिया जो महासचिव थे, से संपर्क और पत्र व्यवहार होता रहा था सम्मेलन की रुपरेखा के संबंध में तैयारी के बारे में। हर क्षण बदलने वाली स्थिति। कुछ भी अप्रत्याशित घट जाने की हर पल संभावना। किस क्षण अपने ही दोस्त पाला बदल दुश्मन की गोद में बैठ हथियार ले वार करने पीठ पीछे खड़ा हो जाये। ऐसे नाजुक वक्त में बम्बई (मुंबई) एक पल के लिए भी छोड़ना समझदारी भरा कदम नहीं होता, लेकिन कमलेश्वरजी अपनी प्राथमिकताओं के बरक्स बड़े से बड़े हादसों से रुबरु होने में नहीं झिझकते थे। वह 27 और 28 जनवरी 78 को छिन्दवाड़ा में थे, करीब दो ढाई सौ साहित्यकारों के बीच जिनमें 150 के करीब देश के हर कोने से वरिष्ठ और युवा कथाकार, उपन्यासकार, समीक्षक सम्मेलन में अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज करा चुके थे। वह छिन्दवाड़ा में थे यानी छिन्दवाड़ा से नागपुर 4 घंटे और नागपुर से बम्बई टे्रन से 14 घंटे अर्थात 18 घंटे के अन्तराल पर जबकि हर लम्हा सिर पर लटकी तलवार सा पैना, जानलेवा। लेकिन चेहरे पर कोई शिकन नहीं। लगता ही नहीं था कि वह एक बड़ी लड़ाई के मोर्चे पर हैं, जिसका सम्बन्ध व्यक्ति विशेष से नहीं पूरी साहित्यिक बिरादरी से है। यह लड़ाई विचारों की, सिध्दान्तों की, प्रतिबध्दता की थी, जिसमें राजनैतिक सत्ताधारी दक्षिणपंथी पक्ष पूंजीपतियों के पीठ पर हाथ रखे हुए थे।

उस सम्मेलन में जो प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया गया था, उस दो पृष्ठों के प्रस्ताव का मजमून प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई और गृहमंत्री चरणसिंह को तार से भेजा गया था, क्योंकि उन दिनों टेलीप्रिन्टर या फैक्स की सुविधा छिन्दवाड़ा में उपलब्ध नहीं थी। स्मृति में जो नाम हैं, जिनके हस्ताक्षर पारित प्रस्ताव में थे वे सर्वश्री कमलेश्वर, जितेंद्र भाटिया, कमला प्रसाद, असगर अली इंजीनियर, दयापवार, मधुकर सिंह, सूर्य नारायण रणसुंभे, आलम शाह खान, देवेश ठाकुर, प्रीतम पंछी, धूमकेतु, बलराम, ज्ञानरंजन, धीरेंद्र अस्थाना, शंकर पुण्ताम्बेकर, सतीश कालसेकर, झा, दामोदर सदन, मनीष राय, नरेंद्र मौर्य, संजीव, तेजिन्दर, शौरिराजन, विभु खरे, राजेंद्र पटोरिया, हंसपाल, राजेंद्र शर्मा, विभुखरे, ललित लाजरस, मदन मालवीय, सं। रा. धरणीधर, हनुमंत मनगटे आदि। इत्तेफाक है कि 27 जनवरी 07 को अदीब महायात्रा पर निकल गया। ठीक 29 वर्ष पूर्व 27 जनवरी 78 को वह छिन्दवाड़ा में था। 27 तारीख कमलेश्वर और छिन्दवाड़ा। हमेशा विषम स्थितियां ही जन्मी।

एक और वाकिया। मेरे आग्रह पर बाबा धरणीधर व्याख्यान माला (म।प्र. हिन्दी साहित्य सम्मेलन छिन्दवाड़ा का आयोजन) में वर्ष 2004 में 'विमर्शों की भीड़ में गुमशुदा आम आदमी' विषय पर भाषण देने कमलेश्वर आने वाले थे। 27 नवंबर 04 को संध्या 5.45 बजे .पी. सुपरफास्ट टे्रन से नागपुर के लिये दिल्ली से वह रवाना होने वाले थे। 26 की रात फोन पर चर्चा भी हो गई थी। मैंने कहा था कि नागपुर में कथाकार डॉ. गोविंद उपाध्याय और दैनिक भास्कर नागपुर के सम्पादक प्रकाश दुबे 28 की सुबह उन्हें कार से उन्हें छिन्दवाड़ा ले आयेंगे। तब उन्होंने कहा था-हनुमंत, इन दिनों भागदौड़ नहीं होती है, उम्र के इस पड़ाव पर। ऐसा करो, तुम जाओ नागपुर या किसी को भेज दो। नागपुर से सीधे छिन्दवाड़ा के लिये रवाना हो जायेंगे। रास्ते में कहीं पर भी चाय बिस्कुट ले लेंगे। मैंने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा था कि जैसा वह चाहते हैं, वैसा ही करुंगा। दूसरे दिन उनके रवाना होने के पहले एक बार फिर रिंग करुंगा, यह भी कहा था। 27 को बात नहीं हो पाई। उसके पूर्व ही सुबह 11 बजे उनके ड्रायवर नरेंद्र का फोन गया कि भाई साहब को सांस लेने में तकलीफ होने के कारण डॉ. बत्रा के अस्पताल में भरती कर दिया गया है और इस वक्त आई.सी.यू. में हैं। अस्पताल जाने के पूर्व ही उन्होंने फोन पर सूचित करने को कह दिया था।

दस-पंद्रह दिन बाद अस्पताल से लौटकर महिना भर अस्पतालों के चक्कर आपरेशन, फिर आराम कर फिर से लेखन और अन्य गतिविधियों में सक्रिय हो गये, यह उनसे जुड़े सभी की जानकारी में है। दिल्ली के बाहर जाने के नाम पर सिर्फ बेटी मानू और दामाद आलोक के यहां भोपाल तक का सफर वे सपत्नीक करते थे, उस हादसे के बाद। मेरे कहानी संग्रह 'गवाह चश्मदीद' पर समीक्षात्मक आलेख (ही कहूंगा) उन्होंने लिखा था। पिछली दीवाली मनाने वह गायत्रीजी के साथ बेटी मानू के यहां भोपाल गये थे। फोन पर उन्होंने बताया था कि तीन चार दिन बाद वह दिल्ली लौट रहे हैं। मैंने जिक्र भी किया था कि 'गवाह चश्मदीद' छप गई है। 'शिल्पायन' के ललित शर्मा ने ही छापा है, जिन्होंने इसके पूर्व 'पूछो कमलेश्वर से' कहानी संग्रह छापा था। सिर्फ कवर छपने का रह गया है, जिसे 26, 27 अक्टूबर 06 (तीन चार दिन बाद) तक छापकर कुछ प्रतियां देने का वादा उन्होंने किया है।

मैं प्रथम प्रति उन्हें भेंट करने हेतु रहा हूँ। उन दिनों मैं भी अपनी बेटी वंदना गाटेकर के यहां सपत्नीक खेतड़ी नगर (राजस्थान) गया था, जहां से दिल्ली करीब 180 कि।मी. पर है। उनसे आखिरी बार मुलाकात का मौका इसलिये चूक गया कि दीवाली की छुट्टियों के कारण प्रेस के कर्मचारी काम पर नहीं लौटे और इसलिये कवर छपने से रह गया। किताब मिलने और ललित के घर पर ही शाम हो जाने, शाहदरा से सूरजकुंड की दूरी अधिक होने के कारण मैं उनके घर नहीं जा पाया, क्योंकि हमें बेटी को गुड़गांव से लेते हुए खेतड़ी भी लौटना था। उस दिन भी 26 या 27 तारीख थी। कमलेश्वर से जो अंतिम पत्र मिला था उसमें 'आराम' पर जोर दिया गया था। क्या वह थक रह थे? क्या जिस्म कभी भी साथ छोड़ सकता है, का अहसास उन्हें होने लगा था? 10-1-05 प्रिय मनगटे, तुम्हारा पत्र और छिन्दवाड़ा के प्रेम का प्रतीक लम्बा अनुशंसा पत्र भी मिला था। अभिभूत हूँ...क्या कहूँ... वैसे अच्छा ही हुआ कि 27 की सुबह ने तबियत से आगाह किया, नहीं तो मामला बिगड़ सकता था।

27-11-04 से आज तक तीन बार एस्कॉर्ट्स हार्ट इंस्टीटयूट और बत्रा हॉस्पीटल के आईसीसीयू में रहना पड़ा। एस्कॉर्ट्स में एक बड़ा आपरेशन भी हो गया। धमनियां साफ करने का। खैर.... अब तबियत सुधार पर है। मेरा नया वर्ष 15-20 दिनों बाद शुरु हो सकेगा। प्यार और स्नेह सहित- कमलेश्वर बस आराम, आराम, आराम...बोलना चालना भी मना है। थकान होती है। ....... उनके संपर्क में आने के बाद 'जो मैंने जिया' और अब तक जो पाया, वह 'जलती हुई नदी' में तैरकर किनारे पर पहुंच 'यादों के चिरांग' रोशन कर, आगे का सफर तय करते हुए, अदीब से रुबरु होने के इंतजार की कहानी लिखने में व्यस्त होना श्रेयस्कर होगा। कहानियां ऐसे ही लिखी जाती है ? कमलेश्वर की आत्मसंस्मराणत्मक किताबें - जो मैंने जिया, जलती हुई नदी और यादों के चिराग।


38 विवेकानंद नगर

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