Showing posts with label पोस्ट से पहले. Show all posts
Showing posts with label पोस्ट से पहले. Show all posts

Saturday, December 27, 2008

कहानी तृष्णा की ...

दोस्तों PLZ READ...

कहानी तृष्णा की ...

तिलिस्म सात सवाल का ...


http://umranala-post.blogspot.com/2008/12/blog-post_24.html

कहानी FM की ... रेडियो की कहानी
CHHINDWARA आकाशवाणी
यानी .... मेरी कहानी ....

ब्लॉग - उमरानाला पोस्ट पर
http://umranala-post.blogspot.com/2008/12/blog-post_24.html

http://umranala-post.blogspot.com/2008/12/blog-post_24.html

Thanks
RAMKRISHNA DONGRE
Mob : +91-98730 74753
Blog: http://chhindwara-chhavi.blogspot.com/

Wednesday, August 6, 2008

उल्टा तीर की... "जश्न-ए-आज़ादी"

पोस्ट से पहले...
में इस बार "जश्न-ए-आज़ादी" ....
http://ut-patrika।blogspot.com/

उल्टा तीर की... "जश्न-ए-आज़ादी"

ब्लॉग जगत में पहली बार ....

उल्टा तीर की प्रथम पत्रिका "जश्न-ए-आज़ादी" प्रकाशित हो चुकी है । "जश्न-ए-आज़ादी" की किताब पढिये पूरे महीने भर। और भाग लीजिये उल्टा तीर पर नई बहस। उल्टा तीर की पत्रिका पढने के लिए "जश्ने-आज़ादी " पर क्लिक कीजिए ।

जश्ने-आज़ादी :: http://ut-patrika.blogspot.com/
-------------------------------------------------------
रामकृष्ण डोंगरे की कविता -आतंकवाद और सच्ची देश भक्ति
http://ut-patrika.blogspot.com/2008/08/blog-post_7776.html
----------------------------------------------------
साहित्यकार बाबा स्व. श्री संपतराव धरणीधरकी ---
(कविता - भूख -भरे पेट की)
http://ut-patrika.blogspot.com/2008/08/blog-post_3139.html

RAMKRISHNA DONGRE, MCU, 2005-07
E-mail : dongre.trishna@gmail.com

http://chhindwara-chhavi.blogspot.com/

Thursday, July 17, 2008

"जश्ने -आज़ादी २००८"

"जश्ने -आज़ादी २००८"

http://ultateer.blogspot.com/2008/07/blog-post_14.html

आमंत्रण

उल्टा तीर के साथ मनाईये पूरे अगस्त आज़ादी का जश्न

आज़ादी की किताब

अपने लेख कविताये विचार आदि अपनी तस्वीर के साथ भेजिए

http://ultateer.blogspot.com/
अगस्त के महीने में उल्टा तीर पूरे महीने आजादी का जश्न मनायेगा। आप सभी से अनुरोध है कि इस जश्ने-आज़ादी-२००८ में अपने लेख, विचार, कविताये, विश्लेषण आदि अपनी तस्वीर व् अपने संक्षिप्त विवरण के साथ २५ जुलाई २००८ तक भेज कर आज़ादी के जश्न में खुल कर शिरकत करें।

http://ultateer.blogspot.com/
ultateer@gmail.com, help.ultateer@gmail.com
---
आभार-आपका;
अमित के. सागर
ocean4love@gmail.com # 99993 27975
-- With; Thanks & regards
from: http://ultateer.blogspot.com/
Ulta Teer (Teer Wahee Jo Ghayal Kar De...)
उल्टा तीर (तीर वही जो घायल कर दे...) ---

Ulta Teer "Nishkarsh" Bahas Ke Maayane...)
उल्टा तीर "निष्कर्ष" (बहस के मायने...)
http://ut-con.blogspot.com/
please visit and rush your precious comments and articles.

-------------------amit k. sagar
+91 99993 27975
फ़कत इक़ मौज का प्यासा ~! ~"सागर"~! ~

Thursday, June 5, 2008

पोस्ट से पहले, पेश है एक ब्लॉग



तीन बिन्दु डॉट ब्लागस्पाट डॉट कॉम पर
http://www.teenbindu.blogspot.com/

पूजा का ब्लॉग ... जो जारी है ...

जो जारी है ...
http://www.teenbindu.blogspot.com/
जो जारी है ...
http://www.teenbindu.blogspot.com/
जो जारी है ...
http://www.teenbindu.blogspot.com/
जो जारी है ...
http://www.teenbindu.blogspot.com/
जो जारी है ...


`रजनीगंधा` अब महकती है
http://teenbindu.blogspot.com/2008/05/blog-post_14.html

एक कविता ...

http://teenbindu.blogspot.com/2008/05/blog-post_13.html
http://teenbindu.blogspot.com/2008/05/blog-post.html

बात है अधूरी सी
रात है स्याह गहरी सी

पीछे कुछ छूटता नहीं
साथ कुछ भी चलता नहीं

मुक्ति सच में हो

http://teenbindu.blogspot.com/2008/04/blog-post.html
इंटरनेट पर एक खबर है। खबर अपने आप में चौंकाने वाली तो है ही, संग में एक साथ कई सवाल उठाती है। खबर के अनुसार बिहार और झारखंड में कई स्थानों पर भूतों और प्रेतों से कथित तौर पर पीड़ित लोगों को प्रेत बाधा से मुक्ति दिलवाने के लिए मेलों का आयोजन किया जाता है। इन मेलों में कथित `पहुंचे हुए` पंडे और ओझा भूत उतारते हैं।



Wednesday, May 14, 2008

`रजनीगंधा` अब महकती है

रजनीगंधा 15 साल की थी जब उसकी शादी हुई। ससुराल में भी सभी मैला ढोने का काम करते हैं। उसने बताया, ``शादी से कुछ महीने पहले जब मां पहली बार अपने साथ काम पर ले गईं तो चक्कर आ गए थे। इसके बाद कई दिन कई बार उल्टी कर देती। मगर जाना पड़ता। क्योंकि, मां कहतीं कि ससुराल में तो जाना ही पड़ेगा। यह काम करना ही होगा।``

रजनीगंधा मैला ढोने का काम नहीं करना चाहती थी। लेकिन, पहले मां के दबाव में और फिर परिवार की आर्थिक जरूरत के मद्देनजर यह करना ही पड़ा। फिर उसने इसे नियति मान कर समझौता कर लिया।

उसका नाम रजनीगंधा है। उसकी उम्र 39 साल है। अलवर के जिरका फिरोजपुर के पास उसका मायाका है और हिजौरीगढ़ में उसका ससुराल है। वह महीनेवार अठारह सौ रूपए कमाती है। दो बेटियां हैं और एक बेटा है। बड़ी बेटी के हाथ पीले करने है, संभवत: इसी बरस जबकि छोटी बेटी पढ़ रही है। बेटा भी पढ़ रहा है और पुलिस में भर्ती होना चाहता है। रजनीगंधा की आंखों में चमक है और चेहरे पर संतोष भी। उसकी आंखों में अब सपने भी हैं जिनके पूरे होने की न सिर्फ वह कामना करती है बल्कि कोशिश भी करती है। मगर, पहले ऐसा नहीं था।

कभी रजनीगंधा देश के उन सैकड़ों स्त्री पुरूषों में से एक थी जिनकी जिंदगियां एक ऐसा काम करते-करते बीतती रही हैं जो न केवल गैर कानूनी है बल्कि एक सभ्य समाज के माथे पर कलंक की तरह है। भारत सरकार द्वारा मैला ढोने की प्रथा गैर कानूनी करार दे दी गई है। मगर आज भी देश के कई राज्यों में यह कथित ``प्रथा`` बिना किसी रोकटोक के जारी है।

रजनीगंधा का सपना है कि वह यहां से सिलाई कढ़ाई सीख कर अपनी खुद की सिलाई की दुकान खोले। रजनीगंधा के हाथों मैला ढोने का काम `छूटने` के बाद अब उसका पति भी किसी और काम की तलाश में है ताकि इस घिनौने काम से मुक्त हो सकें।

लगभग सौ साल पहले महात्मा गांधी ने बंगाल में हुई कांग्रेस की बैठक में वाल्मीकि समुदाय के लोगों की काम की परिस्थितियों और उनकी विवशताअों का मसला उठाया था। तब से आज तक एक पूरी सदी बीत चुकी है मगर एक कु-प्रथा है कि मिटती नहीं।

Tuesday, May 13, 2008

अब..?


बात है अधूरी सी
रात है स्याह गहरी सी

पीछे कुछ छूटता नहीं
साथ कुछ भी चलता नहीं

खामोशी है पैनी सी
उंगलियों को कुरेदती सी

बेचैनी सागर की लहरों सी
खुद को पत्थरों से ठोकती सी

अजीब सी बेकरारी है नहीं,
प्रेम नहीं,कोई और ही सी महामारी है


रोशनी है कहीं-कहीं कौंधती सी
आस पास को चीरती भेदती सी

और मैं सिमटती सी
तलाशती हूं ``क्या हूं मैं अब?``

Tuesday, April 15, 2008

मुक्ति सच में हो

इंटरनेट पर एक खबर है। खबर अपने आप में चौंकाने वाली तो है ही, संग में एक साथ कई सवाल उठाती है। खबर के अनुसार बिहार और झारखंड में कई स्थानों पर भूतों और प्रेतों से कथित तौर पर पीड़ित लोगों को प्रेत बाधा से मुक्ति दिलवाने के लिए मेलों का आयोजन किया जाता है। इन मेलों में कथित `पहुंचे हुए` पंडे और ओझा भूत उतारते हैं।

खबर पर गौर करें, इन मेलों में आने (लाए जाने) वालों में महिलाएं ही अधिक होती हैं। जिन्हें, डंडे की चोट पर स्वीकार करवाया जाता है कि उन पर प्रेत छाया है। मार खा कर लॉक अप में पुलिस उस जुर्म को कबूल करवा पाने में सफल हो जाती है जो गिरफ्त ने किया न हो तो एक महिला की क्या बिसात! वैसे खबर की ओट न भी ली जाए तो हम और आप यह जानते ही हैं इस देश में महिलाओं को ही अक्सर भूत बाधा का सामना करना पड़ता है। समाज में महिलाएं ही अक्सर चुड़ैल करार दी जाती हैं। इन भूतों को भी महिलाएं ही प्यारी होती हैं। पुरूष नहीं। वे अक्सर महिलाओं को ही निशाना बनाते हैं। वह भी ऐसी महिलाओं को, जो पहले से ही अपने परिवार या समुदाय में दबी-कुचली परिस्थिति में दोयम दर्जे का जीवन जी रही होती हैं। बीमार या उपेक्षित होती हैं। न जाने क्यों यह भूत प्रजाति ऐसी महिला पर कब्जा करती है जिसका खुद अपने पर कोई `कब्जा` नहीं होता! ऐसे में ऐसी महिला को कब्जा कर कोई भूत दूसरों पर अपनी `ताकत` (या सत्ता) कैसे साबित कर सकता है!? वह एक कमज़ोर महिला पर हावी हो कर कैसे उसके आस पास के लोगों को परेशान करने की कोशिश में `सफल` हो सकता है! यह बात भूत योनि की समझ में नहीं आती, तो पता नहीं क्यूं।

वैसे यहां आपत्ति उस मानसिकता पर भी है जिसके तहत इस खबर में पीड़ित शब्द का उपयोग किया गया है। मानो, वाकई `भूत आना` कोई बीमारी हो। ईश्वरप्रदत्त बीमारी? महिला के बुरे कर्मों का फल? या फिर, अपनों की बेड इंटेशन की शिकार? या समाज के भीड़तंत्र से पीड़ित ? दरअसल मुक्ति चाहिए तो सही, मगर किसको किससे? यह जानने की जरूरत है।


http://www.teenbindu.blogspot.com/