Showing posts with label अतिथि लेखक. Show all posts
Showing posts with label अतिथि लेखक. Show all posts

Tuesday, June 21, 2022

Gust Writer : गुजरातियों के छत्तीसगढ और मध्य प्रान्त में आने की कहानी


डाॅ. परिवेश मिश्रा 
सन् 1882 में नागपुर से राजनांदगांव के बीच जब मीटरगेज रेल लाईन बिछाने का काम शुरू हुआ तब बीच का इलाका घने जंगलों और नदी नालों वाला, किन्तु आमतौर पर सपाट था। लाईन आसानी से बिछ गयी। सिर्फ एक हिस्सा छूट रहा था। गोंदिया के पास जहां मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ और महाराष्ट्र की सीमाएं मिलती हैं, वहां पहाड़ था और बिना सुरंग (बोगदा) बने लाईन नहीं जा सकती थी। 

प्रचलित कहानी के अनुसार बड़े इंजीनियर ने दीवार पर टंगे नक्शे पर निशान लगाते कर कहा था यहां से पहाड़ खोदना शुरू करो। किन्तु युवा अंग्रेज़ इंजीनियर अनुभवहीन था और काम शुरू करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। उसे किसी जबर्दस्त मोटिवेशन की आवश्यकता थी। सो बड़े ने सुझाव दिया :  कल्पना करो कि पहाड़ के उस पार तुम्हारी पत्नी खड़ी है। तुम्हे वहां पहुंचना है और उसे "किस" करना है। लेकिन इंजीनियर के लिए हिम्मत जुटाना आसान नहीं था। काम शुरू करने से पहले मजदूरों ने अपने साहब को दसियों बार बड़बड़ाते सुना - "शैल आय किस हर ?" "शैल आय किस हर ?" (मैं उस छोर को "किस" कर पाऊंगा?)। युवा इंजीनियर के तमाम अविश्वास और शंकाओं के बावज़ूद काम शुरू हुआ। तब तक यह वाक्य, मजदूरों की अपनी जुबान में, उनके उच्चारण में, उनका नारा बन गया था। 

और एक दिन मजदूरों ने वह पत्थर हटाया जिसके दूसरी ओर रौशनी थी, सिरा मिल गया था। युवा इंजीनियर खुशी के मारे चीख उठा -"देयर आय किस हर" ( मैंने सही सिरा चूम ही लिया)। खुश मजदूर भी थे। उनके बीच भी नारा उठा, उनकी जुबान में, - "देअर आय किस हर"। पहले छोर की तरह यहां भी मजदूरों की दूसरी बस्ती बसी। दोनों बस्तियों के स्थान पर - सुरंग के दोनों सिरों पर - स्टेशन बने। इनके नाम मजदूरों ने पहले ही तय कर दिये थे। सलेकसा (शैल आय किस हर) और दरेकसा (देअर आय किस हर)। 

नागपुर-राजनांदगांव सेक्शन शुरू होते ही छत्तीसगढ को अपना घर बनाने वाले गुजरातियों के आगमन का मार्ग खुल गया। 
---------
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध का समय, विशेषकर 1870 के बाद का, गुजरातियों के लिए बहुत कष्ट का दौर था। सूखे और अकाल के इन वर्षों में अंग्रेज़ों के व्यवसायिक लालच का दुष्परिणाम कृषि पर दिखने लगा था। आमदनी के स्रोत घटने पर राज्य ने भूमि, नमक और शराब पर टैक्स अनाप-शनाप बढ़ा दिये थे। गरीबी, बेरोजगारी और भुखमरी से लड़ाई हारते हज़ारों परिवार गुजरात छोड़ने के लिए मजबूर हुए। उन्नीसवीं सदी के "द ग्रेट इंडियन माईग्रेशन" में बड़ी संख्या में गुजराती समुद्र पार गये। लेकिन उतनी ही संख्या में लोगों ने देश के भीतर पूर्व की दिशा में - बंगाल और बर्मा तक - पलायन किया। ऐसे लोगों का बड़ा हिस्सा अंग्रेज़ों के सेन्ट्रल प्राॅविन्सेज़ (सी.पी.) में आया। 

सन 1870 में जब नागपुर और मुम्बई के बीच रेलमार्ग बनना शुरू हुआ, तब तक नागपुर से आगे छत्तीसगढ की ओर रेल लाईन लाने का अंग्रेज़ों का कोई ठोस इरादा नहीं बन पाया था। लेकिन यहां लाईन जनता की मांग के कारण नहीं बल्कि अंग्रेज़ों की मजबूरी और उनके स्वार्थ के चलते आयी। मध्य प्रान्त में रेल लाना अपरिहार्य हो गया था।  
* दो रेल पटरियों को जोड़ने के लिए बीच में बिछाई जाने वाली पट्टी - रेल्वे स्लीपर - जो अब कांक्रीट की होती हैं, कुछ समय पहले तक लोहे की और उससे भी पहले - शुरुआती दौर में - लकड़ी की बनी होती थी। वनों को काटकर बड़े वृक्षों से स्लीपर बनाये जाते थे। भारत भर में इनकी भारी मांग थी और अधिकांश जंगल मध्य भारत में थे। इंजिन भाप से चलते थे और इसी इलाके में कोयला के भंडार भी थे। 

* छत्तीसगढ के महानदी कछार में, विशेषकर धमतरी-राजिम-कुरुद इलाके में सरप्लस धान पैदा हो रहा था। इसे गुजरात जैसे उन इलाकों में भेजा जा सकता था जहां के खेत अफ़ीम, कपास, तम्बाखू और नील से पाट दिये गये थे और जहां खाने के लिए अनाज नहीं था। साथ ही यहां की वनोपजों का तब तक व्यापारिक दोहन शुरू नहीं हुआ था लेकिन इसकी असीम सम्भावनाएं जगजाहिर थी। प्रमुख था तेन्दू पत्ता जिससे बीड़ी बनती थी। 

इस पृष्ठभूमि में नागपुर और राजनांदगांव के बीच रेल लाईन की शुरुआत हुई थी। बनाने की जिम्मेदारी दी गयी सी.पी. सरकार की छत्तीसगढ स्टेट रेल्वे को (1888 में बंगाल-नागपुर रेल्वे ने इसे खरीदकर ब्राॅडगेज में बदला और हावड़ा से जोड़ा)। 
--------

गुजरातियों की कहानी रेल लाईन, वनोपज, चावल मिलों और बीड़ी के बिना बताना संभव नहीं है। 

यहां "गुजराती" शब्द उन लोगों के लिए प्रयुक्त है जिनकी भाषा, बोली, खान-पान की पद्धतियां, जीवन-शैली आदि समान थीं। लेकिन एक और समानता इन्हे आपस में बांधती थी। ये सारे परिस्थितियों के मारे, मजबूरी में, अपनी जड़ों से उखड़कर आजीविका की तलाश में यहां आये थे। सब ने गरीबी देखी थी। कुछ ने भुखमरी की हद तक। अनेक के पास हुनर और सब के पास भविष्य के लिए सपने और विश्वास था। इन गुजरातियों में जैन, वैष्णव हिन्दू, पाटीदार, कच्छी मेमन, खोजा, पारसी और दाऊदी बोहरा परिवार शामिल हैं। केवल एक समुदाय था जो आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत खुशहाल था। फिर भी बेहतर भविष्य की तलाश में बाहर निकला था। यही वह समाज था जो बाकी गुजरातियों की उंगली पकड़ उन्हे रास्ता दिखाते इस इलाके में लाया था। यह समुदाय था "कच्छी गुर्जर क्षत्रिय" समुदाय। 
-------
गुजरात के कच्छ और सौराष्ट्र इलाके में बसे कच्छी-गुर्जर-क्षत्रिय समाज को निर्माण (कन्स्ट्रक्शन) और माईनिंग के क्षेत्र में पुश्तैनी महारत हासिल थी। जिन दिनों भारत में इंजीनियरिंग काॅलेज नहीं खुले थे, इस समाज के बच्चे पैदा होते ही, पिता, भाई और समुदाय के अन्य लोगों के साथ सिविल इंजीनियरिंग का काम सीखने में जुट जाते थे। और यह परम्परा सदियों से चली आ रही थी। कच्छ और सौराष्ट्र में महलों, किलों, नहरों आदि का निर्माण यही समाज करता आया था। समय के साथ देश में इनकी ख्याति आर्किटेक्ट और निर्माण-ठेकेदार के रूप में स्थापित हो गयी थी। स्थानीय लोग इन्हे "मिस्त्री" या "ठेकेदार" के रूप में संबोधित करते थे। कच्छ के राजा साहब के दिये धनोटी, कुम्भारिया, लोवारिया, मालपार, मेघपार, जैसे अठारह गांवों में बसा यह समुदाय राठौड़, सोलंकी, परमार, चौहान, सावरिया जैसी उपजातियों में बंटा रहा है। सरनेम का चलन आने पर अनेक लोग "मिस्त्री" शब्द का प्रयोग भी करते हैं। 
उन्नीसवीं सदी में गुजरात के दूसरे लोगों की तरह यह समुदाय भी बेहतर जीवन की संभावनाएं कच्छ के बाहर तलाश रहा था। 1850 के दशक में जब अंग्रेज़ों ने रेल निर्माण का फ़ैसला किया तो इस समुदाय ने लपक कर इस अवसर को जकड़ लिया और समय के साथ रेलमार्गों पर अपना लगभग एकाधिकार स्थापित कर लिया। सिन्ध और रावलपिंडी से लेकर असम और चेन्नई तक इन्होने रेल लाईनों में और झारखण्ड की कोयला खदानों तक में इन्होने ठेकेदारी की। किन्तु लेख की बढ़ती लम्बाई मुझे विवश करती है मैं फ़ोकस छत्तीसगढ और मध्य प्रान्त पर रखूं। 

रेल से पहुंचे गुजरातियों के शुरुआती जत्थे में अनेक मिस्त्री ठेकेदार परिवार थे। इनमें कुम्भरिया (कच्छ) के गंगानी परिवार के सात भाईयों का समूह भी था, जिनमें से एक भाई जगमल गांगजी सावरिया ने जयराम मंदान के साथ मिलकर 1890 में बिलासपुर का स्टेशन बनाया। इनमें वालजी रतनजी चौहान भी थे। जगमल सावरिया के बेटे मूलजी सावरिया के साथ साथ वालजी के बेटे जयराम वालजी चौहान को आगे चलकर अंग्रेज़ों ने "राय साहब" के ख़िताब से नवाज़ा। रेल्वे ने अपने ठेकेदार के सम्मान में बम्बई-हावड़ा लाईन पर बिलासपुर के पास एक स्टेशन पाराघाट का नाम बदलकर जयरामनगर रखा। टाटानगर के अलावा संभवतः यह एकमात्र स्टेशन है जिसका नाम अंग्रेज़ों ने किसी भारतीय पर रखा। सावरिया भाईयों में वालजी मेघजी सावरिया ने रायपुर का रेलवे-स्टेशन बनाया और वहीं बसे, श्यामजी गांगजी सावरिया ने रायगढ़ का स्टेशन बनाया और वहीं बसे और वस्ता गांगजी सावरिया ने खरसिया का स्टेशन बनाया। सिंगूरा गांव के रघु पान्चा टांक ने राजनांदगांव स्टेशन बनाया। बहुत लम्बी लिस्ट हैं मिस्त्री समाज के लोगों की उपलब्धियों की। 

गैर-मिस्त्री परिवार आमतौर पर धान/चावल और वनोपज (हर्रा, बेहरा, चिरौंजी, शहद आदि के अलावा मुख्य रूप से तेन्दू पत्ता) के व्यापार में रहे। ऐसे अधिकांश गुजराती कच्छ और सौराष्ट्र जैसी पृष्ठभूमि से आये थे और छत्तीसगढ के राजे-रजवाड़ों के माहौल में घुलमिल जाने में उन्हे परेशानी नहीं हुई। कुछ मदद अंग्रेज़ों ने भी की। 

जैसे सौराष्ट्र के राजकोट के पास उपलेटा से निकलकर आये हाजी अब्बाहुसैन हाजी मोहम्मद दल्ला जिन्होने शुरुआत सुहेला में की थी, वनोपज और चावल के व्यापार के साथ। पड़ोसी राज्य फुलझर के राजा साहब लालबहादुर सिंह जी से परिचय करा कर उन्हे राज्य मुख्यालय सरायपाली में बसाने में अंग्रेज़ मददगार रहे। बाद में इनका और राजा साहब का संबंध घनिष्ठ हुआ और हाजी अब्बाहुसैन के पुत्र हाजी अब्दुल सत्तार दल्ला बसना में स्थापित हुए। हाजी अब्दुल सत्तार के पुत्र डाॅ. अब्दुल रज़्ज़ाक (ऐ.आर.) दल्ला छत्तीसगढ के ख्यातनाम वरिष्ठ सर्जन हैं। अपनी पत्नी डाॅ. नूरबानो दल्ला तथा बहू डाॅ. तबस्सुम दल्ला के साथ रायपुर में ज़ुबेस्ता अस्पताल का संचालन करते हैं। सिकल-सेल बीमारी पर इनके किये काम की देश भर में प्रशंसा हुई है। 

युवा गुजराती गोरधनदास भगवानदास दोशी जी ने हर्रा का व्यवसाय करने के इरादे से धमतरी से जगदलपुर पहुंच कर बस्तर राजा साहब से जंगल ठेके पर ले लिया। किन्तु अनुभव न होने के कारण पहले ही साल गहरे नुकसान में चले गये। तब राजा साहब के सामने वकालत करने अंग्रेज़ अधिकारी ही आया। उसने समझाया कि यदि इस युवा को हतोत्साहित होने दिया गया तो आगे और कोई इतनी दूर जंगल में आये, इसकी संभावना कम ही है। गोरधनदास जी के लिये अगले दो साल तक जंगल टैक्स-फ्री कर दिया गया। उनका व्यवसाय चल निकला।  उस ज़माने में लगभग चालीस हज़ार वर्ग किलोमीटर के जंगल को एक अंग्रेज़ अधिकारी मात्र दो डी.एफ.ओ. और 12 रेन्जरों की मदद से संभालता था। गोरधनदास जी के बेटे श्री किरीट दोशी (श्री भूजीत दोशी के पिता) प्रख्यात पत्रकार रहे। इसी दोशी परिवार की श्रीमती जयाबेन धमतरी से विधायक रहीं। 

गुजरात के मेहसाणा इलाके से निकलकर खरसिया के पास बंजारी गांव में आकर बसे छन्नालाल मेहता के परिवार ने बिलासपुर से आगे की यात्रा बैलगाड़ी पर की थी। रायगढ़ के श्री यतीश गांधी की दादी श्रीमती समरत बेन और खरसिया के श्री हितेंद्र मोदी की दादी श्रीमती तारा बेन छन्नालाल मेहता जी की बेटियां थीं। 

हंसराज राकुण्डला जी के परिवार की बैलगाड़ी यात्रा रायपुर तक रेल पहुंचने के बाद हुई थी। वे रायपुर से कोई तेरह मील पर रसनी गांव में बसे। कुछ वर्षों के बाद- सन् 1901 में - रायपुर से धमतरी तक रेल लाईन बनी और धान की पैदावार बढ़ाने के लिए अंग्रेज़ों ने घमतरी के पास नदी पर एक बांध भी बना दिया। उद्धाटन करने पहुंचे सी.पी. के गवर्नर सर फ्रैंक जाॅर्ज स्ली। इंजीनियर ने सुझाव दिया नये बांध का नाम गवर्नर की पत्नी - मैडम स्ली  के नाम पर रखा जाये। सबने हामी भरी। और "मैडम स्ली" बांध उद्धाटित हो गया। समय के साथ "मैडम" और "स्ली" का स्थानीयकरण हुआ। अब यह बांध "माड़म सिल्ली" के नाम से जाना जाता है। खेती बढ़ी तो किसान मेढ़ों पर दाल उगाने लगे और राकुण्डला परिवार ने रसनी से वहां पहुंच कर पहली दाल मिल स्थापित कर दी। 

इन गुजरातियों ने छत्तीसगढ में चावल मिलों की स्थापना में भी अगुवाई की। सरायपाली-बसना की पहली मिल दल्ला परिवार ने, रायगढ़ के खरसिया के पास पहली मिल छन्नालाल मेहता के परिवार ने और सारंगढ़ की पहली चावल मिल पारसी खुदादाद डूंगाजी ने स्थापित की। 

गोंदिया से नैनपुर और वहां से जबलपुर जुड़ते ही तब तक गोंदिया पहुंचे गुजरातियों के लिए जबलपुर के साथ साथ आगे दमोह और सागर जैसे तेन्दूपत्ता से समृद्ध वनाच्छादित इलाकों में पहुंचने का मार्ग प्रशस्त हुआ। 

1919 में गुजरात के खैरा (नादियाड) ज़िले से छोटाभाई पटेल अपने बेटे जेठाभाई के साथ व्यवसाय करने गोंदिया पहुंचे। गुजरात में खैरा, वदोडरा और आणन्द ज़िलों में ही तम्बाखू ही मुख्य पैदावार होती रही है। कर्णाटक जैसे अन्य इलाकों की तम्बाखू जहां सिगरेट के लिए उपयुक्त माना जाता है, वहीं गुजरात की तम्बाखू बीड़ी के लिए प्रयुक्त होती रही है। अधिकांश तम्बाखू उत्पादक पाटीदार हैं। इन्होने अपने फ़र्म की एक शाखा मध्यप्रदेश के सागर में खोली और उसे अपना मुख्यालय बना लिया। लगभग एक दशक के बाद छोटाभाई के भतीजे मनोहरभाई भी गुजरात से आ गये और गोंदिया का काम भतीजे ने सम्भाल लिया। तम्बाखू गुजरात से मंगा कर यहीं बीड़ी बनाने और बेचने का क्षेत्र और काम बढ़ गया। एक समय इनकी 27 नम्बर (और बंदर छाप) बीड़ी देश की दूसरी सबसे अधिक बिकने वाली बीड़ी  थी। मनोहरभाई ने कम समय में बहुत सफलताएं पायीं। एक समय चालीस से अधिक फैक्ट्रियों में पांच से छह करोड़ बीड़ियां रोज बनती थीं। उनका अपना "सेसना" विमान और अपनी हवाई पट्टी भी थी। समय के साथ बीड़ी का चलन कम होता गया और छोटाभाई जेठाभाई के नाम पर शुरू हुए सीजे ग्रुप का कारोबार अब बीड़ी से हट कर दवा-उत्पादन, रियल एस्टेट, पैकेजिंग, फायनेन्स, और तेल के क्षेत्रों में फैल चुका है। लगभग साठ हज़ार लोग अब भी रोजगार पा रहे हैं। मनोहरभाई के बेटे हैं सांसद श्री प्रफुल्ल पटेल जो विदर्भ (महाराष्ट्र) के बीड़ी-किंग कहलाते हैं। 

सागर की फ़र्म छोटाभाई जेठाभाई ही कहलायी। हालांकि बाद में परिवार के मुखिया मणिभाई पटेल हुए किन्तु उनके परिवार के विट्ठल भाई पटेल को फिल्म गीतकार के रूप में अधिक प्रसिद्धि मिली। वे बाॅबी फ़िल्म में "झूठ बोले कौवा काटे" के अलावा अनेक गानों के रचयिता के रूप में याद किये जाते हैं। 

श्री मोहनलाल जबलपुर में सड़क के किनारे बैठकर बीड़ी बनाया करते थे। यह सन् 1902 की बात है। और फिर उन्होने अपनी बीड़ी को "शेर" ब्रैन्ड के साथ बेचना शुरू किया।  मेहनत रंग लायी और "मोहनलाल हरगोविंद दास"  देश की "नम्बर वन" बीड़ी उत्पादक फ़र्म बनी। मोहनलाल ने अपना कारोबार दत्तक पुत्र परमानन्द भाई को सौंपा। उनके बाद पुत्र श्रवण पटेल ने कमान सम्भाली। 
1930 के आसपास जिन दिनों मोहनलाल हरगोविंद दास फ़र्म अपना कारोबार बढ़ा रही थी, प्रभुदास भाई फ़र्म में मुनीम थे। उन्होने काम छोड़ अपना कारोबार शुरू किया। बेटों जसवन्तलाल और प्रह्लाद भाई ने कुछ समय पिता के साथ काम करने के बाद दमोह में एक बीड़ी फैक्टरी स्थापित की। एक समय ऐसा आया जब इनके "टेलीफोन" छाप की प्रतिदिन दस करोड़ बीड़ियां बनने लगीं और फ़र्म लगभग चार लाख रुपये प्रतिदिन एक्साइज ड्यूटी के रूप में पटाने लगी।  

रायपुर में डी.एम. ग्रुप रियल एस्टेट सेक्टर में बहुत बड़ा नाम है। डायालाल मेघजी भाई के नाम से स्थापित यह कम्पनी किसी समय अपनी मशहूर बादशाही बीड़ी के लिए जानी जाती थी। धमतरी के मीरानी परिवार की गोला बीड़ी हो या रायगढ़ के पास भूपदेवपुर की बाबूलाल बीड़ी, अनेक गुजराती परिवार बीड़ी उद्योग से जुड़े और सफल हुए। इनमें गैर-पाटीदार भी शामिल हैं। 
बीड़ी व्यवसाय में उतरे गुजरातियों में से अनेक मध्य प्रान्त की राजनीति में भी आये। आर्थिक सम्पन्नता के साथ साथ हज़ारों की संख्या में रोज़गार के लिये बीड़ी पर आश्रित ग्रामीण आमतौर पर इनके राजनैतिक करियर का आधार बने। उदाहरण अनेक हैं (पर स्थान कम है)। गुजराती समाज छत्तीसगढ और मध्य प्रान्त की संस्कृति में रच-बस जाने के बावज़ूद अपनी भाषा, खान-पान और सांस्कृतिक परम्पराओं को सहेज कर रखने में काफी हद तक सफल रहा है। इनकी जीवनशैली में सादगी आमतौर पर अब भी बरकरार है। 
---------------------
डाॅ. परिवेश मिश्रा
गिरिविलास पैलेस 
सारंगढ़  

साभार : फेसबुक वाल
--------

Friday, January 14, 2022

प्रज्ञा प्रसाद के वॉल से : कितना जरूरी है पैसा?

"रिश्ते-नाते सब हों, लेकिन भूख से बिलबिलाते या फिर अभावों में जीते, छोटी-छोटी खुशियों के लिए तरसते क्या हम प्यार कर सकते हैं? बच्चे को प्यार करें और उसे खराब स्थिति में देखें तो क्या अच्छा लगेगा? मां-बाप को ही प्यार करें और उनका टूटा चश्मा बनाने के लिए पैसे न हों, तो अच्छा लगेगा?"

अक्सर प्यार, पैसे और रिश्तों की तुलना होते हुए आपने सुना होगा. अधिकतर लोगों का कहना है कि रिश्तों और प्यार से बढ़कर कुछ भी नहीं होता है, लेकिन कभी-कभी मेरे मन में कई ख्याल आते हैं, तो सोचा कि आपसे भी इन्हें बांटूं और आपकी भी राय इस पर जानूं... 

दरअसल परिवार की शुरुआत होती है विवाह नाम की संस्था से, क्योंकि विवाह होगा, तभी संतान होगी, फिर वही पति-पत्नी माता-पिता बन जाएंगे और फिर जब उनके बच्चे बड़े होंगे तब वे अपना परिवार कहेंगे अपने माता-पिता, भाई-बहन, पत्नी/पति और फिर उनकी खुद की संतान को...

अब आते हैं प्यार और पैसे पर.. हम जैसे ही जन्म लेते हैं वैसे ही हमें लगती है भूख, जिसके लिए चाहिए दूध तो वो दूध आता है पैसे से... क्योंकि मां की छाती में भी दूध तभी उतरता है जब उसे पौष्टिक या फिर चाहे जैसा भी आहार मिला हो, तो वो भोजन भी आता है पैसे से... इससे भी पहले जब महिला गर्भवती होती है, तो सबसे पहले उसे डॉक्टर को दिखाने की जरूरत होती है और डॉक्टर को देनी पड़ती है फीस .. फीस मतलब पैसा.. अगर आप सरकारी अस्पताल में निःशुल्क इलाज कराने भी जाएं, तो ऑटो या रिक्शा करने के लिए चाहिए होगा पैसा... दवाई लाने के लिए चाहिए होगा पैसा.. 9 महीने महिला को अच्छी देखभाल यानि अच्छा आहार मिले, तो उसके लिए भी चाहिए पैसा. जब बच्चे के जन्म का समय आया, तो फिर अस्पताल में भर्ती होने के लिए चाहिए पैसा.. बच्चा पैदा हो गया, उसे पहनाने के लिए कपड़ा चाहिए, उसकी दवाई चाहिए, टीकाकरण चाहिए, तेल-पाउडर शैंपू चाहिए, इन सबके लिए चाहिए पैसा.. मां स्वस्थ हो पाए, तो उसे अच्छा खिलाने के लिए, कंफर्ट फील कराने के लिए चाहिए पैसा.. बच्चे को जब भूख लगती है, उस वक्त मां का अथाह प्रेम भी सिर्फ थोड़ी देर ही उसे चुप करा सकता है.. उसे सबसे पहले चाहिए दूध.. इसका मतलब कि जब पेट भरा होता है, जरूरतें पूरी रहती हैं, तभी आप प्रेम को भी महसूस कर पाते हैं. भूख से तड़पने पर केवल खाना चाहिए होता है, उस वक्त न तो किसी का प्रेम अच्छा लगता है और न तो किसी की बातें...

जब बच्चा थोड़ा सा बड़ा हुआ तो उसे पढ़ाने के लिए चाहिए पैसा.. स्कूल भेजने के लिए चाहिए पैसा.. किताब-कॉपी खरीदने के लिए चाहिए पैसा... उसके खिलौने खरीदने के लिए चाहिए पैसा... किसी अलग तरह के फील्ड में करियर बनाना चाहता हो तो उसकी कोचिंग के लिए चाहिए पैसा.. बच्चा जब बड़ा होता है और जब नौकरी के लिए फॉर्म भरना हो तो चाहिए पैसा, जॉब इंटरव्यू के लिए जाना हो तो पैसा.. वर्क फ्रॉम होम करना हो, तो लैपटॉप के लिए चाहिए पैसा.. बात करने के लिए मोबाइल चाहिए वो आएगा पैसे से...

जब बच्चे की शादी करनी हो, तो लड़का या लड़की ढूंढने के लिए या फिर बात-वात चलाने के लिए इधर-उधर जाना पड़ता है, उसके लिए चाहिए पैसा.. शादी तय हो गई, तो शादी करवाने के लिए चाहिए पैसा.. गृहस्थी शुरू कराने के लिए जो सामान देते हैं उसके लिए चाहिए पैसा.. भोज-भात कराने के लिए चाहिए पैसा.. बेहतर जिंदगी के लिए भी चाहिए पैसा... माता-पिता बुजुर्ग हो जाते हैं उनकी देखभाल, उनके भोजन-दवा के लिए भी चाहिए पैसा... 

रिश्ते-नाते सब हों, लेकिन भूख से बिलबिलाते या फिर अभावों में जीते, छोटी-छोटी खुशियों के लिए तरसते क्या हम प्यार कर सकते हैं? बच्चे को प्यार करें और उसे खराब स्थिति में देखें तो क्या अच्छा लगेगा? मां-बाप को ही प्यार करें और उनका टूटा चश्मा बनाने के लिए पैसे न हों, तो अच्छा लगेगा? 

हर मां-बाप ये क्यों सोचते हैं कि बच्चे का करियर अच्छा बन जाए.. अच्छा करियर मतलब जिसमें अच्छे पैसे मिलते हों.... अच्छा खाए स्वस्थ रहे.. अच्छा खाना दूध-फल अनाज सबके लिए चाहिए पैसा.... 

न्यूज की हेडलाइन बनती है-

रिक्शेवाले का बेटा बना कलेक्टर, 
खुद से लिखी अपनी तकदीर
या 
चौकीदार की बेटी जाएगी IIT, 
गरीबी को मात देकर बनाया भविष्य

ये हेडलाइन कहां बनती है...

रिक्शेवाले के बेटे ने पाए बहुत अच्छे संस्कार, 
कभी नहीं बोलता है झूठ

अंबानी के बेटे ने पकड़ी 
ईमानदारी की राह, सादा जीवन उच्च विचार
-----
यहां भी अच्छा करियर, सुनहरे भविष्य के पीछे का मतलब पैसा और उसके साथ मिलने वाला पावर ही है... 
अरे, लड़की की तो किस्मत ही चमक गई.. गरीब की लड़की इतने अच्छे (अमीर) घर में चली गई... 

यानी गरीब की लड़की की किस्मत भी तभी चमकती हुई मानी जाती है, जब अच्छा कमाने-खाने वाला लड़का मिल जाए...   

रिश्ते संतोष देते हैं, प्यार खुशी देता है, लेकिन उसे एंजॉय तभी किया जा सकता है, जब पैसे से बुनियादी जरूरतें (ठीकठाक भोजन, छोटा मगर अच्छा आवास, करियर ओरिएंटेड शिक्षा, ढंग के कपड़े और सुविधासहित चिकित्सा) पूरी हो चुकी हों... 

मैं खुद को तब रिलैक्स फील करती हूं, जब खा-पीकर, नहा-धोकर बच्चे को बढ़िया ऑनलाइन क्लास करते हुए देखती हूं, तब लगता है अब शांति से बैठती हूं.. लेकिन खा-पीकर यानी अनाज आया पैसे से, नहा-धोकर यानी साबुन-शैंपू आया पैसे से यहां तक कि वॉटर भी आया पैसे से, क्योंकि कॉलोनी मेंटेनेंस में इन्क्लूडेड है... ऑनलाइन क्लास यानी बच्ची के पास मोबाइल है, जो आया है पैसे से.. इतना सबकुछ हो जाने के बाद अब रिलैक्स हो सकी... 

कहीं घूमने जाना है तो चाहिए पैसा (जगह सस्ती-महंगी हो सकती है), किसी के यहां शादी-छठी, बर्थडे में भी जाना हो तो चाहिए पैसा, रिश्तेदारों के यहां जाना हो तब भी चाहिए पैसा.. 

आखिर में मरने के बाद कफन के लिए भी चाहिए पैसा... श्मशान ले जाने के लिए जो चचरी बनेगी उसके लिए भी चाहिए पैसा... जलाने के लिए चाहिए लकड़ी वो आएगा पैसे से.. पंडित क्रियाकर्म कराएगा... उसके लिए लेगा दक्षिणा यानी पैसा....

अब पता नहीं कि पैसा महत्वपूर्ण है या इंसान.. रिश्ता या प्रेम... अगर आपलोग कुछ प्रकाश डाल सकें तो बताएं... 

बाकी मकर संक्रांति की बहुत-बहुत शुभकामनाएं... 
और हां, जो दही-चूड़ा, तिल-लाई, खिचड़ी जो भी खाई हूं, 
उन सबमें भी लगा है पैसा...

(ये आलेख वरिष्ठ पत्रकार प्रज्ञा प्रसाद के फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है। प्रज्ञा मूलतः पूर्णिया बिहार की रहने वाली है। वे डेढ़ दशक से ज्यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय है। दूरदर्शन, ईटीवी, ईटीवीभारत, आईबीसी24 में अपनी सेवाएं दे चुकी है। फिलहाल रायपुर में न्यूज24 मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ के साथ जुड़ी हुई है।) 

Thursday, August 22, 2019

दोस्तनामा : महोदय अपनी गाड़ी लेकर आएं...और मैं देखकर दंग रह गया...

बाएं से रामकृष्ण और संजय। नागपुर के येवले चाय शॉप पर 20 अगस्त 2019 को। 
भोपाल, सन 2004, मैं मप्र विज्ञान एवं प्रोद्यौगिकी परिषद (मेपकास्टमें काम करता था. अप्रैल का महीना, तीसरे सप्ताह में लगातार चार दिन की छुट्टी थी. न्यू मार्केट (भोपाल का मुख्य बाजार) में घूमते हुये एक बैनर पर नजर रुख गई...कवि सम्मेलन, मुशायरा, नाटक और क्लासिक फिल्म का मंचन, स्थान भारत भवन (कला के प्रति समर्पित, प्रख्यात केंद्र) और मजे की बात सब ‘फ्री’ में... अपनी तो लॉटरी लग गई थी.

शायरी की दुनिया का जाना-माना नाम बशीर बद्र साहब उनको 10 फीट की अंतर से देखना और सुनना ‘अद्भूत’ था, इनके साथ भारत भर से आए और भी कवि, शायर इनसे रूबरू होने को मिलेगा। एक दिन शाम 7 बजे श्री फणीश्वरनाथ रेणुजी का प्रसिद्ध उपन्यास ‘मारे गये गुलफाम’ से प्रेरित श्री बासू भट्टाचार्य जी की राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म ‘तीसरी कसम’ का मंचन हो रहा था. पहले सोचा, रहने दे, रात घर जाने के लिए अाटो या भट नहीं मिलेगा. मैं यहां भट के बारे में बता दूं, ये पुराना तीन पहिया वाला अाटो, जो शोर और धुंआ फेंकते हुए अपनी प्रस्तुति देता था. आज ये वाहन इतिहास की बात है, लगभग सभी शहरों से लुप्त हो गए. फिर हिम्मत करते हुए बैठ गया...देख लेंगे जो भी होगा.

फिल्म रात करीब 11 बजे खत्म हो गई.
वापस घर मतलब किराए के कमरे तक जाने की चिंता सता रही थी
कि एक लगभग ‘पांच’ फीट के सज्जन सामने आकर पूछने लगे... 

भाई साहब, आपको ये फिल्म कैसी लगी? 
हमने भी हमारे ‘फिल्मी’ ज्ञान को प्रस्तुत करना शुरू किया... 
ये भाई साहब के ‘सवाल’ खत्म नहीं हो रहे थे...
आखिर हमने कहा... यार आप तो पत्रकार जैसे सवाल पूछ रहे हो...! 
एक प्यारी मुस्कान के साथ कहा... 
’जी...हम पत्रकार है और नई दुनिया (पत्रिका का नाम मुझे ठीक से याद नहीं) के साथ काम करते है! 

हमने कहा....
बेहतरीन काम है ! फिल्म देखने के पैसे मिलते है आपको...! एक हंसी....!
मुझे अपनी चिंता सताये जा रही थी...घर कैसे पहुंचे....!
हमने पत्रकार महोदय से पूछ लिया... भाई, कहां रहते हो...? 

जवाब मिला...नेहरू नगर...
...अरे मैं भी नेहरू नगर रहता हूं...!
कैसे जाओगे....?
पत्रकार...मेरे पास गाड़ी है...? ओ...हो...
मुझे लिफ्ट दोगे क्या...?
पत्रकार: हां क्यूं नहीं...बस थोड़ी मेहनत करनी पड़ेगी...!
हां...जरूर...!

दरअसल, भारत भवन बड़ी झील के किनारे है और मुख्य सडक तक आने के लिए एक बड़ी चढ़ाई को पार करना पड़ता है. मुझे लगा, पत्रकार महोदय की गाड़ी थोड़ी ‘कमजोर’ होगी, इसलिए थोडी दूर मुझे पैदल चलना पड सकता है. मैं निश्चिंत था, अपना काम हो गया...! सोचा दस रुपये बच गये, तो हमने ‘दो’ आइसक्रीम कोन लेकर ‘पत्रकार’ महोदय के साथ ‘बतियाते’ हुए आइसक्रीम का लुफ्त उठाया...तब तक 11:45 हो गए थे...! महोदय बोले…मैं गाड़ी लेकर आता हूं..! 

मजेदार बात...आगे है...

महोदय अपनी गाड़ी लेकर आएं...और मैं देखकर दंग रह गया...ये और पास आए...तो दोनों भी...खिलखिला कर हंसने लगे... हां भाई यही मेरी गाड़ी है...! ये जनाब ‘साइकिल’ लेकर आए...!

मैं लंबाई में इनसे बड़ा था...तो फ्रंट ‘सीट’ का ‘सम्मान’ मुझे मिला... ये पीछे के सीट (?) पर विराजमान हो गए. दोनों डबल पैडल लागते हुए रात एक बजे नेहरू नगर पहुंचे. महोदय ने बताया ये मेरा कमरा है...! मैं दो तीन गल्ली पीछे रहता था, सो धन्यवाद देकर अपनी रूम तक जाने लगा.

कहानी में ट्वीस्ट...

मेरे रूम तक जाने के लिये दो रास्ते थे. पहले रास्ते से गया तो... ‘प्रहरी’ याने गली के 4-5 कुत्ते मेरे पीछे लग गये. मैंने दूसरा रास्ता आजमाकर देखा...मेरे जाने से पहले ‘इनके’ साथी वहां भी मौजूद थे...! मैं वहा से भागा...सीधा पत्रकार महोदय के कमरे पर...
पत्रकार : क्या हुआ भाई...?
यार कुत्ते पीछे लग गये....!
कोई दिक्कत ना हो तो रातभर मैं यही सो जाऊं...?
पत्रकार : हां क्यू नहीं!
पत्रकार जी ने हमारे लिये अपने कमरे में जगह बनाई और हमने उनके लिये हमारे दिल में... हमेशा के लिये..!

रोजी रोटी के चक्कर में 2006 तक भोपाल में रहा, 2007 में अहमदनगर और वहां से दिल्ली...2008 से नागपुर में हूं. वो भी काम के सिलसिले में भोपाल, दिल्ली, छिंदवाडा, रायपुर इत्यादी शहर में अपनी सेवाएं दे चुके है...! फिलहाल रायपुर में है...! कल यानी 20 अगस्त 2019 को नागपुर में मुलाकात हुई...! 

पत्रकार महोदय का नाम है श्री रामकृष्ण डोंगरे जी, प्यार से वो ‘तृष्णा’ कहलाना भी पसंद करते हैं, मैं उन्हें आरके कहना पसंद करता हूं...! बहुत मेहनती, जमीन से जुड़े है, जब भी नागपुर आते हैं...हम मिलते रहते है...! इस दोस्ती के लिए कोई तय दुनियादारी का ‘पैमाना’ नहीं है...प्योर दोस्ती..!

नोट: ये बात मैं पहले कहना चाहता था...पर कलम के जादूगार बाजी मार गए...पहला पोस्ट आरके ने लिखा..!

अनेक – अनेक धन्यवाद...!


आपकासंजय अप्तुरकर


फेसबुक वॉल से साभार
https://www.facebook.com/sanjay.apturkar.9/posts/2430524267030157

Sunday, August 26, 2018

वाट्सएप ग्रुप में लेफ्ट का विकल्प कोई विकल्प नहीं होता...



ग्लोबल विलेज की तरफ कदम बढ़ाते हुए इस पोस्ट को जरूर पढ़े और विचार कीजिए...

*सोशल मीडिया खासकर वाट्सएप पर हमारा व्यवहार कैसा हो....*

गाँव और ग्रुप छोड़े नहीं जाते -
--------------------------------
दाल में कंकड़ की तरह नहीं, दाल की तरह रहें -
----------------------------------------
ग्रुप हो या समाज, आपकी चरित्रावली भी लिखता है
----------------------------------------
गाँव और ग्रुप छोड़े नहीं जाते।

गाँव में कुछ अच्छे तो कुछ ख़राब लोग भी होते हैं ,पर कुछ खराब लोगों के कारण हम अपना गाँव नहीं छोड़ देते।

गाँव की तरह ही  ग्रुप में भी सब एक जैसे लोग नहीं होते।उसमें कुछ साक्षर ,कुछअर्द्ध शिक्षित ,कुछ शिक्षित , कुछ उच्च शिक्षित होते हैं। ग्रुप चाहे कर्मचारियों या शासकीय कर्मचारियों का ही क्यों न हों ,उसमें भी हर स्तर और हर प्रकार के कर्मचारी और अधिकारी होते हैं। स्पष्ट है सबका स्तर ,सबकी सोच ,सबका विचार रखने का तरीका एक सा नहीं हो सकता। हर सदस्य की शिक्षा ,पद ,अनुभव ,कार्य क्षेत्र ,कार्य अनुभव अलग अलग  होना स्वाभाविक है। ऐसी स्थिति में हर सदस्य से स्तरीय पोस्ट की अपेक्षा करना न्यायसंगत और तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता।  कुछ भाग्यशाली सदस्यों के पास स्मार्ट मोबाइल पहले से हैं और वे पहले से  व्हाट्सप्प पर सक्रिय है,अतः स्वाभाविक है वे उन पोस्ट से गुजर चुके हैं जिनसे नए सदस्य आज गुजर रहे हैं। अतः ऐसी स्थिति में पोस्ट का  दोहराव स्वाभाविक है। और पुराने सदस्यों का इस स्थिति में संयम बनाये रखना जरुरी है। पुराने जब नए का स्वागत करते हैं तो नए सम्मान की संस्कृति सीखते हैं और  पुराने उनसे सम्मान पाते रहते हैं। जो ऐसी स्थिति में सामंजस्य स्थापित कर लेते हैं वे टिक जाते हैं और जो दाल में कंकड़ की तरह उनपके और अनघुले रह जाते हैं वे  बाहर फिक जाते हैं। 

इसे और अधिक स्पष्ट समझने के लिए इस वृतांत से गुजरना सुखद और समीचीन होगा -

एक 20 वर्ष का लड़का ट्रैन की खिड़की से बाहर झाँककर खेत ,पहाड़ ,नदी ,नाले ,पशु -पक्षी,आसमान ,बादल ,बारिश  देखता और ख़ुशी से छोटे बच्चे की तरह उछल पड़ता। उसकी हरकत देखकर बर्थ पर बैठे अन्य लोग लड़के के पिता से बोले- 20 साल का लड़का अभी भी किसी छोटे बच्चे की तरह हरकत कर रहा है इसका इलाज क्यों नहीं कराते ? लड़के का पिता बोला -जी ,इसका इलाज करा कर ही आ रहा हूँ। यह जन्म से देख नहीं पाता था। सौभाग्य से इलाज (ऑपरेशन) सफल रहा और आज यह पहली बार अपनी आँखों से देख पा रहा है। पहली बार आँखों से देखने की ख़ुशी वह अपने व्यवहार से साँझा कर रहा है।  जीवन में कई बार हमारे साथ भी ऐसा होता है हम बिना कुछ जाने विचारे किसी को कुछ कह देते हैं और जब वास्तविकता का पता चलता है तब हम माफ़ी माँगते हैं। पर कई बार माफ़ी भी काफी नहीं होती क्योंकि दिवार में ठोकी  गई कील निकाले जाने पर भी दिवार में छेद तो छोड़ ही जाती है।

अनुज श्री बलवंत कडवेकर ,श्री राजेश बारंगे ,श्री महेंद्र डिगरसे ,श्री रमेश भादे और इन जैसे और भी कई सजग सदस्य ग्रुप को एक गाँव, बल्कि कहें कि ग्लोबल गाँव बनाने में लगे हुए हैं तो कृपया उनके इस प्रयास को वृतांत के उस लड़के की  तरह गलत लेने से बचने का अनुरोध है ताकि ग्रुप बचा रह सके। ग्रुप बचा रह सका तो निश्चित ही भविष्य में कुछ सार्थक कर दिखाया जा सकेगा। लेफ्ट का विकल्प कोई विकल्प नहीं है। लेफ्ट हमारी कमजोरी है कि हम सामंजस्य बिठा पाने में सक्षम नहीं है। लेफ्ट करने वालों को आने वाले समय में ग्रुप के सदस्य जो जवाब देंगे उसकी आपके मन में कल्पना भी नहीं होगी। ग्रुप हो या समाज आपकी चरित्रावली भी लिखता है। सादर।

*वल्लभ डोंगरे ,सुखवाड़ा ,सतपुड़ा संस्कृति संस्थान ,भोपाल।*


Saturday, June 9, 2018

डब्बू अंकल एंड बॉलीवुड

बीते जमाने के एक हीरो के आमंत्रण पर डब्बू अंकल ऐरोप्लेन से मुम्बई पधारे। इस हीरो को भी आखिरकार MP के पॉलिटिशियन्स की तरह VDV(viral dance video) स्टार डब्बू अंकल का सहारा लेना पड़ा ताकि खड्डे में पड़ा उसका फ़िल्मी कैरियर डब्बू नामकी रस्सी के सहारे बाहर आ सके। डब्बू अंकल के आते ही जुहू के उन बंगलों के बाहर भी ट्रैफिक जाम होने लगा जिनमें बहुत पुराने जमाने के हीरो रहते हैं और उनके लॉन मे चिड़िया भी बीट करने नही आती। ये सब इस चहलकदमी से खुश हैं। इन्हें लग रहा है कि इनकी किस्मत बदलने के लिए किसी नए डांसर बाबा का अवतरण हुआ है। भाड़े पर दी गयी प्रॉपर्टी से घरखर्च चलाने वाले और झुर्रियों भरा चेहरा लेकर अभी भी हीरो बनने का ख्वाब देखने वाले इन बहुत पुराने जमाने के हीरोज़ को कौन समझाये की जमाना अब हीरो का नही VDV स्टार का है।

FB न्यूजफीड पे डब्बू अंकल के बम्बई लैंडिंग की खबर सुनते ही लाखों की तादाद में मौजूद स्ट्रगलर्स को अपनी रोज़ी रोटी की चिंता सताने लगी है। इन्हें लगता है कि जनसंख्या में हुई इस अस्वाभाविक वृद्धि से उनके रोज़ के दारू मुर्गे में बेतहाशा कमी पैदा हो जाएगी। कुछ को तो चिंता के मारे मिर्गी के दौरे पड़ गए है, कुछ को जूता सुंघा कर होश में लाना पड़ा है। कोलीवाड़ा में दो-दो हाथ के कमरों में सदियों से रह रहे कुछ एक्टर तंग, बदबूदार, मच्छी-मुर्गे के मांस और गंदगी से बजबजाती गलियों से निकल कर वर्सोवा बीच पहुच गए हैं। इनका मानना है कि डब्बू अंकल की बॉलीवुड एंट्री ने उनके सपनों पर ग्रहण लगा दिया है। इसलिए अब उनके पास गंदगी से भरपूर इस कॉस्मोपॉलिटन दरिया मे अपने सपने को सुसाइड कराने के अलावा कोई और रास्ता नहीं है। इनमे से कुछ मरियल सिर्फ वड़ापाव के बल पर सालों से जिंदा है। पर्याप्त न्यूट्रिशन के बिना ज़िंदा रह कर इन लोगों ने मेडिकल साइंस को अचम्भे में डाल रक्खा है। इनसे गिरती सेहत के बारे में पूछने पर जवाब मिलता है कि जनाब एक फ़िल्म के लिए रोल प्रिपेयर कर रहे हैं। अरे ऐसा कौन सा रोल जिसकी प्रिपरेशन दस साल चलती है और ये बक*** अपना जीना मरना भूल सिर्फ उसी में लगा है।

कई बार तो इन्हें देख ऐसा लगता है कि ये अभी-अभी हेल हिटलर के यातना कैम्प से निकल कर बाहर आये है। कोलीवाड़ा के लोगों को इनके लिए सरकार से एक आंगनवाड़ी केंद्र खोलने की मांग करनी चाहिए, ताकि इन्हें दोनों वक़्त वडापाव की बजाय पर्याप्त मात्रा में पोषित आहार मिले और ये दुनिया के सबसे स्वस्थ और स्वच्छ देश के ऊपर कुपोषित होने का धब्बा न लगा पाएं। इन्हें देख मुझे कई बार खुद के ऊपर भ्रम होने लगता है लेकिन ये लोग न जाने किस फौलाद के बने है कि दशको की मुफलिसी भी मार ना पाई। इतनी गरीबी तो कालाहांडी में कई पीढ़ियाँ खा जाती है। इतना स्ट्रगल UPSC की परीक्षा में कर लोग IAS बन जाते है। और वो भी नही तो कम से कम अपने शहरों के छोटे-मोटे स्टीव जॉब्स तो हो ही जाते हैं।

खैर इतने सालों से इस शहर और इन एक्टरों के बीच रहने के बाद एक बात तो मुझे अच्छे से समझ मे आ गयी है कि इनकी इस दुर्दशा के पीछे कुछ खास लोगों का हाथ है। इन खास लोगों में से मैं सबके नाम नही ले पाऊंगा क्योंकि कुछ परलोकवासी हो गए है और परलोकवासियों से मुझे बहुत डर लगता है। न जाने कब ये अपनी अलौकिक शक्तियों का प्रयोग कर मेरे दस साल पुराने लैपटॉप की हार्डडिस्क उड़ा दें, जिसमे मुझे अमर बनाने वाली अनगिनत कहानियां सेव हैं। इसलिए मैं सिर्फ उन खास लोगो के नाम लूंगा जो ज़िंदा है। क्योंकि इस मायावी शहर में एक मच्छर भी खास लोगों को उनकी औकात दिखा देता है। यहां अब लोग भाई से नहीं मच्छरों से डरते हैं इसलिए मैं भी अब खुद को मच्छर मानकर उन खास लोगों के नाम लेता हूँ जिनकी वजह से इस शहर में लाखों की तादाद में मौजूद एक्टरों का बेड़ा गर्क हुआ है।

सबसे पहले तो बच्चन साब, नवाज़ुद्दीन, कंगना, अनुष्का, प्रियंका और राजकुमार राव सरीखे एक्टरों ने देशभर के लाखों करोड़ों नौजवानों को एक्टर बनने का सपना देकर भरमाया फिर रही सही कसर SRK ने ये कह कर पूरी कर दी कि अगर शिद्दत से किसी को चाहो तो सारी कायनात उसे आपसे मिलाने को साजिश में जुट जाती है। इसी साजिश का नतीजा है ये बेतहाशा भीड़ और भाड़ा, कोलीवाड़ा का। जिस कमरे की औकात 5000 रु महीने की नही, इस भीड़ की वजह से वो 12 हजार रुपये महीना मिलता है। पूरी कमाई भाड़े में घुस जाएगी तो आदमी खायेगा क्या, वड़ापाव!!!

इस साजिश में सिर्फ ये खास लोग शामिल नहीं है, इसमे इनके माँ-बाप, यार-दोस्त, चाचा, ताऊ, मामू भी बराबरी के हिस्सेदार हैं। बच्चा जरा सा गोरा क्या हुआ ये लोग उसे अंग्रेज समझने लगते हैं। भले ही उसकी नाक पकोड़ा हो और आंखे एक दूसरे को तिरछी रेखा में काटती हों लेकिन ये लोग तुरंत उसकी तुलना हीरो हेरोइन से कर बैठते हैं। अब ऐसा बच्चा जिसे बचपन से ही स्टारडम की लत लग गयी हो उसका मन भला स्कूल की बासी किताबों में लगेगा?? उसका मन तो अभिषेक, जैकी, कुमार गौरव, लव, मिमोह, आर्य, ईशा, उदय, अध्यन, तुषार, फरदीन, हरमन की तरह स्टारडम के पीछे ही भागेगा। सोते जागते जब उसे यही सुनने को मिले भाई तू अभी तक मुम्बई नहीं गया!! तो क्या वो अपने गांव में बैठ लिट्टी चोखा खायेगा??? उसका मन तो किसी अवार्ड सेरेमनी में गूंज रही तालियों की गड़गड़ाहट में अटका होगा।

बंबई आते ही सबसे पहले ये लोग एक्टिंग सीखने के लिए जिम जॉइन करते हैं। सालों साल लगातार एक्टिंग सीखने के दौरान माँ बाप की मोटी सेलरी कब पेंशन में बदल जाती है, लोखंडवाला की चमचमाती लेन्स से भागकर ये कब कोलीवाड़ा की बदबू मारती गलियों में पहुच जाते है, ज़िन्दगी कैसे सड़ा-गला मिस्सल बन जाती है इन्हें पता ही नहीं चलता। इनमे से कई आजीवन ब्रम्हचारी रह कर त्याग की भावना से ओतप्रोत रहते हैं। कई बहुत सारे रिलेशन और डिवोर्स के बाद बलिदानी की भूमिका में अदा करते हैं। फिर एक ऐसा वक़्त आता है जब ये घर के रहते है ना घाट के, तब ना शरीर साथ देता है ना मुखड़ा। तब इनमें एक अलग तरह का आत्मज्ञान जाग्रत होता है जो दबी कुचली आवाज़ में कहता है कि तू इस पके बाल और झुर्रीदार थोबड़े को किस मुह से अपने यार-दोस्तो, चाचा, ताऊ, मामू को दिखायेगा। पूरी लाइफ के स्ट्रगल के बाद यहीं हमारा हीरो हार मान जाता है। वो निराशा के समंदर में डुबकियां लगाते हुए डब्बू अंकल जैसे VDV स्टार से जलने लगता है। उसके मन मे इस उभरते हुए स्टार के लिए बुरी भावनाएं पनपती है जिन्हें वो रोकने में नाकामयाब रहता है, फिर वो सार्वजनिक तौर पर VDV स्टार्स का विरोध शुरू कर देता है।

ऐसे ही एक्टरों के एक दल ने बीते जमाने के उस हीरो के साथ अपने यूनियन की शरण ली है जिसके डांस की कॉपी कर डब्बू अंकल VDV स्टार बने हैं। इस हीरो का कहना है कि उसे भी डब्बू अंकल की पॉपुलैरिटी और कमाई में से कुछ हिस्सा मिलना चाहिए क्योंकि ओरिजिनल वो है, डब्बू उसका डुप्लीकेट। अब इन नामुरादों को कौन समझाए की ओरिजिनल/डुप्लीकेट कुछ नहीं होता। होती बस एक चीज़ है - एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट और सिर्फ एंटरटेनमेंट।

VDV स्टार अमर रहे। डब्बू अंकल अमर रहें!!!!

|© *Chinmay Sankrit* |

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=10214132234072188&id=1003276729


Friday, March 2, 2018

पत्रकार की होली

लाइव से एडिट तक
इनपुट से आउटपुट तक
न्यूज में प्रोग्राम में
गेस्ट के तामझाम में
डेस्क से रिपोर्टर तक
असाइनमेंट से स्ट्रिंगर तक
एंकर के टॉकबैक पे
स्क्रिप्ट की चिकचिक पे
पीसीआर रन डाउन पे
सर्वर ब्रेकडाउन पे
बाइट में देरी पर
टीआरपी हेराफेरी पर
गुस्से में हुए लाल
न्यूज रुम में बवाल
तमतमाए चेहरे बेरंग
शिकायती लहजे बदरंग
एक्शन पे रीएक्शन
शाबाशी का टशन
बैकबाइटिंग के दौर में
कांपीटिशन के जो़र में
किसी का क्रेडिट खा गए
किसी की बैंड बजा गए
अपनी गलती दूसरों पे ठोंकी
सिगरेट पे सिगरेट झोंकी
कभी उसने तो कभी हमने
फ्रस्टेशन निकाला
टेंशन का हरेक रंग
एक दूसरे पे डाला
किसी ने लकड़ी टिकाई
तो किसी ने आग लगाई
इसी तरह हमने
साल भर होली मनाई .

( *रचनाकार* - *भूपेंद्र सोनी "शजर"*)
*भूपेंद्र सोनी टीवी पत्रकार है*


Tuesday, December 5, 2017

शशि कपूर: कला चेतना से भरे मासूम चेहरे का खामोश हो जाना

अजय बोकिल

सहजता से बोला गया एक डायलाॅग भी तमाम स्टाइलिश संवादों पर कैसे भारी पड़ सकता है, इसे समझने पहले ‘शशि कपूर स्टाइल आॅफ एक्टिंग’ को समझना होगा। यादगार फिल्म दीवार’में अमिताभ के खाते में दसियों दमदार डायलाॅग थे। उस पर बिग- बी की आवाज उन डायलाॅग्स में और जान डाल देती थी। लगता था छल-प्रपंच भरी इस दुनिया में प्रतिशोध ही जीने का सही रास्ता है। लेकिन सिर्फ और सिर्फ एक डायलाॅग अमिताभ की सारी एक्टिंग को पानी भरने पर मजबूर कर देता है और वह है- मेरे पास मां है! यानी सौ सुनार की और एक लुहार की।

सोमवार (4 दिसंबर, 2017) को दिवंगत अभिनेता शशि कपूर के पास ‘मां’ के अलावा भी बहुत कुछ था। एक मशहूर फिल्मी खानदान में पैदा होने के बाद भी उनमें कोई हेकड़ी नहीं थी। दरअसल 60 के दशक में शशि कपूर फिल्म इंडस्ट्री के चाकलेटी चेहरों के बीच एक ऐसा फेस थे, जो काफी कुछ विदेशी सा लगता था। उनके नाक-नक्श ग्रीक हीरो की तरह लगते थे। मानो कोई गलती से ग्रीक देवताअों के स्वर्ग से हिंदुस्तानी खलिहान में चला आया हो। जो तन से युवा और मन से किशोर हो। यूं शशि कपूर ने ढाई दशक में फिल्मों में कई रोल अदा किए, लेकिन उन्हें याद तो कुछ भूमिकाअो, अपने सामाजिक तथा कला सरोकारों के ‍िलए किया जाएगा। साम्प्रदायिक दंगों पर बनी फिल्म ‘धर्मपुत्र’ में उनका रोल एकदम अलग तरह का था तो हिट फिल्म ‘वक्त’ में ‘जी को मारकर’ जिंदगी बिताने वाले युवा के रूप में उन्हें कभी नहीं भुलाया जा सकेगा। उम्र में बड़े होने के बाद भी शशि कपूर ने पर्दे पर अमिताभ के छोटे भाई का रोल कई फिल्मों में  बड़ी शिद्दत से अदा किया था। उन्होने प्ले ब्वाॅय टाइप भूमिकाएं भी कीं। लेकिन यह उनके स्वभाव के अनुकूल कभी नहीं लगीं। कारण कि शशि कपूर के चेहरे में एक स्थायी मासूमियत और दुनिया की चालािकयों से स्तब्ध हो जाने का परमनेंट भाव था। शशि जब पर्दे पर नाचते थे तो लगता था कि यह काम उनसे जबरन कराया जा रहा है। हां, फिल्म ‘जब जब फूल खिले’ में  शशि जब ‘हम को तुम पे प्यार आया..प्यार आया..’ चीखते हुए इश्क में बावले हो जाते हैं, तब महसूस होता है कि सच्ची मोहब्बत करने वाला जब प्यार की सार्वजनिक अभिव्यक्ति करना चाहता है तो उसका हाल क्या होता है। शशि कपूर की पर्दे पर और जाती जिंदगी में भी इमेज एक क्लीन और ईमानदार इंसान की रही है। वह जो भी कहता है, सच सच और बेलाग ढंग से कह देता है। जिसमें कोई बनावटीपन नहीं है। शशिकपूर का यह नेचर अपने अग्रज राज कपूर की देसी और गंवई छवि एवं  शम्मी कपूर की मस्त मौला तथा चुहलबाज इमेज से बिल्कुल हटकर है। शशि कपूर को देखकर हमेशा यही लगा कि ये आदमी कभी विलेन नहीं हो सकता। वह कांटो पर भी चलेगा तो फूलों की संवेदना के साथ चलेगा। 

शशि कपूर को फिल्मी किरदारों से ज्यादा फिल्म इंडस्ट्री और थियेटर क्षेत्र में किए गए उनके योगदान के लिए याद किया जाएगा। सच्चा कलाकार न तो पैसे से संतुष्ट होता है और न ही प्रसिद्धी से भरमा जाता है। उसके मन में कुछ ऐसा करने की भूख होती है, जिससे सरस्वती संतुष्ट हो। कला की देवी मुस्कुराए। संस्कृति का पैमाना छलके। इतिहास खुद बांहे फैलाकर उसकी तलाश करे। फिल्मी चकाचौंध में रहकर भी शशि कपूर में सच्चे अभिनय की तड़प थी। इसलिए उन्होने अपनी जीवन साथी भी मशहूर अदाकारा जेनिफर कैंडल को बनाया। ’36 चौरंगी लेन’ में जेनिफर का अभिनय भला कौन भूल सकता है। इस फिल्म को ‘सेल्युलाइड पर लिखी कविता’ कहा गया। फिल्मों से नाम और पैसा कमाने के बाद 1978 में शशिकपूर ने  दो माइलस्टोन काम किए। उन्होने अपने पिता और महान ‍अभिनेता पृथ्वीराज कपूर की याद में मुंबई में ‘पृथ्वी  थियेटर्स’ की स्थापना की। साथ ही खुद की फिल्म कंपनी ‘फिल्म वाला’ भी शुरू की। दोनो प्रयास वास्तव में ‍शशि कपूर के भीतर छुपे और कुलबुलाते कलाकार तथा  सर्जक के बैटिंग ग्राउंड थे। उन्होने इसे पूरी तरह भुनाया भी। शशि कुछ ऐसा करना चाहते थे, जो कपूर परिवार के ग्लैमर से हटकर हो और उसके बाद भी याद रखा जाए। ‘फिल्म वाला’ के बैनर तले शुरू हुआ यह ‘जनून’, ‘उत्सव’ तक अपनी पराकाष्ठा पर पहुंचा। दुनिया ने शशि की कला को एक नए शीशे में देखा, उससे अभिभूत हुई। उसके अनोखेपन को महसूस किया।

पिछले कई दिनों से शशि कपूर काफी बीमार चल रहे थे। जीवन संगिनी का जिंदगी की शाम से पहले साथ छोड़ जाने का दर्द तो था ही। शरीर भी थकने लगा था।  इस बीच उन्हें पद्म विभूषण और प्रतिष्ठित दादा साहब फालके अवाॅर्ड से नवाजा गया। तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री अरूण जेटली उन्हें यह पुरस्कार  देने शशिजी के घर पहुंचे। यह पुरस्कार लेते समय शशि का चेहरा अवाक था। मानो बहुत देर कर दी, हुजर आते-आते। फिर भी पुरस्कार तो पुरस्कार है। उसकी अपनी आत्मा होती है। अगर यह पुरस्कार शशि कपूर को न दिया जाता तो शायद यह पुरस्कार ही ग्लानिभाव से भर जाता। क्योंकि दादा साहब फाल्के की जिंदगी ही कुछ नया करने में बीती। भले ही उन्हें फाके करने पड़े हों। शशि का ‘जुनून’ भी कुछ ऐसा ही था। कुछ अलग और लीक से हटकर करने की जिद और कला को उसने नए रूपों में निखारने की चाह। सिनेमा से उलीचकर थियेटर को सींचने वाले फिल्म इंडस्ट्री में बिरले ही होते हैं। क्योंकि यह घर फूंक तमाशा है। लेकिन शशि कपूर ने यह काम पूरी निष्ठा और प्रतिदान की अपेक्षा के बगैर किया। अगर सलीम जावेद‍ फिर से ‘दीवार’ के लिए डायलाॅग लिखें तो उन्हे शशिकपूर के लिए लिखना पड़ेगा- ‘मेरे पास कला है।‘ और कला कभी काल की गुलाम नहीं होती।

‘राइट ‍क्लिक’
( ‘सुबह सवेरे’ में दि. 5 दिसंबर 2017 को प्रकाशित)