Tuesday, June 21, 2022
Gust Writer : गुजरातियों के छत्तीसगढ और मध्य प्रान्त में आने की कहानी
Friday, January 14, 2022
प्रज्ञा प्रसाद के वॉल से : कितना जरूरी है पैसा?
Thursday, August 22, 2019
दोस्तनामा : महोदय अपनी गाड़ी लेकर आएं...और मैं देखकर दंग रह गया...
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| बाएं से रामकृष्ण और संजय। नागपुर के येवले चाय शॉप पर 20 अगस्त 2019 को। |
आपकासंजय अप्तुरकर
Sunday, August 26, 2018
वाट्सएप ग्रुप में लेफ्ट का विकल्प कोई विकल्प नहीं होता...
ग्लोबल विलेज की तरफ कदम बढ़ाते हुए इस पोस्ट को जरूर पढ़े और विचार कीजिए...
*सोशल मीडिया खासकर वाट्सएप पर हमारा व्यवहार कैसा हो....*
गाँव और ग्रुप छोड़े नहीं जाते -
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दाल में कंकड़ की तरह नहीं, दाल की तरह रहें -
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ग्रुप हो या समाज, आपकी चरित्रावली भी लिखता है
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गाँव और ग्रुप छोड़े नहीं जाते।
गाँव में कुछ अच्छे तो कुछ ख़राब लोग भी होते हैं ,पर कुछ खराब लोगों के कारण हम अपना गाँव नहीं छोड़ देते।
गाँव की तरह ही ग्रुप में भी सब एक जैसे लोग नहीं होते।उसमें कुछ साक्षर ,कुछअर्द्ध शिक्षित ,कुछ शिक्षित , कुछ उच्च शिक्षित होते हैं। ग्रुप चाहे कर्मचारियों या शासकीय कर्मचारियों का ही क्यों न हों ,उसमें भी हर स्तर और हर प्रकार के कर्मचारी और अधिकारी होते हैं। स्पष्ट है सबका स्तर ,सबकी सोच ,सबका विचार रखने का तरीका एक सा नहीं हो सकता। हर सदस्य की शिक्षा ,पद ,अनुभव ,कार्य क्षेत्र ,कार्य अनुभव अलग अलग होना स्वाभाविक है। ऐसी स्थिति में हर सदस्य से स्तरीय पोस्ट की अपेक्षा करना न्यायसंगत और तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता। कुछ भाग्यशाली सदस्यों के पास स्मार्ट मोबाइल पहले से हैं और वे पहले से व्हाट्सप्प पर सक्रिय है,अतः स्वाभाविक है वे उन पोस्ट से गुजर चुके हैं जिनसे नए सदस्य आज गुजर रहे हैं। अतः ऐसी स्थिति में पोस्ट का दोहराव स्वाभाविक है। और पुराने सदस्यों का इस स्थिति में संयम बनाये रखना जरुरी है। पुराने जब नए का स्वागत करते हैं तो नए सम्मान की संस्कृति सीखते हैं और पुराने उनसे सम्मान पाते रहते हैं। जो ऐसी स्थिति में सामंजस्य स्थापित कर लेते हैं वे टिक जाते हैं और जो दाल में कंकड़ की तरह उनपके और अनघुले रह जाते हैं वे बाहर फिक जाते हैं।
इसे और अधिक स्पष्ट समझने के लिए इस वृतांत से गुजरना सुखद और समीचीन होगा -
एक 20 वर्ष का लड़का ट्रैन की खिड़की से बाहर झाँककर खेत ,पहाड़ ,नदी ,नाले ,पशु -पक्षी,आसमान ,बादल ,बारिश देखता और ख़ुशी से छोटे बच्चे की तरह उछल पड़ता। उसकी हरकत देखकर बर्थ पर बैठे अन्य लोग लड़के के पिता से बोले- 20 साल का लड़का अभी भी किसी छोटे बच्चे की तरह हरकत कर रहा है इसका इलाज क्यों नहीं कराते ? लड़के का पिता बोला -जी ,इसका इलाज करा कर ही आ रहा हूँ। यह जन्म से देख नहीं पाता था। सौभाग्य से इलाज (ऑपरेशन) सफल रहा और आज यह पहली बार अपनी आँखों से देख पा रहा है। पहली बार आँखों से देखने की ख़ुशी वह अपने व्यवहार से साँझा कर रहा है। जीवन में कई बार हमारे साथ भी ऐसा होता है हम बिना कुछ जाने विचारे किसी को कुछ कह देते हैं और जब वास्तविकता का पता चलता है तब हम माफ़ी माँगते हैं। पर कई बार माफ़ी भी काफी नहीं होती क्योंकि दिवार में ठोकी गई कील निकाले जाने पर भी दिवार में छेद तो छोड़ ही जाती है।
अनुज श्री बलवंत कडवेकर ,श्री राजेश बारंगे ,श्री महेंद्र डिगरसे ,श्री रमेश भादे और इन जैसे और भी कई सजग सदस्य ग्रुप को एक गाँव, बल्कि कहें कि ग्लोबल गाँव बनाने में लगे हुए हैं तो कृपया उनके इस प्रयास को वृतांत के उस लड़के की तरह गलत लेने से बचने का अनुरोध है ताकि ग्रुप बचा रह सके। ग्रुप बचा रह सका तो निश्चित ही भविष्य में कुछ सार्थक कर दिखाया जा सकेगा। लेफ्ट का विकल्प कोई विकल्प नहीं है। लेफ्ट हमारी कमजोरी है कि हम सामंजस्य बिठा पाने में सक्षम नहीं है। लेफ्ट करने वालों को आने वाले समय में ग्रुप के सदस्य जो जवाब देंगे उसकी आपके मन में कल्पना भी नहीं होगी। ग्रुप हो या समाज आपकी चरित्रावली भी लिखता है। सादर।
*वल्लभ डोंगरे ,सुखवाड़ा ,सतपुड़ा संस्कृति संस्थान ,भोपाल।*
Saturday, June 9, 2018
डब्बू अंकल एंड बॉलीवुड
बीते जमाने के एक हीरो के आमंत्रण पर डब्बू अंकल ऐरोप्लेन से मुम्बई पधारे। इस हीरो को भी आखिरकार MP के पॉलिटिशियन्स की तरह VDV(viral dance video) स्टार डब्बू अंकल का सहारा लेना पड़ा ताकि खड्डे में पड़ा उसका फ़िल्मी कैरियर डब्बू नामकी रस्सी के सहारे बाहर आ सके। डब्बू अंकल के आते ही जुहू के उन बंगलों के बाहर भी ट्रैफिक जाम होने लगा जिनमें बहुत पुराने जमाने के हीरो रहते हैं और उनके लॉन मे चिड़िया भी बीट करने नही आती। ये सब इस चहलकदमी से खुश हैं। इन्हें लग रहा है कि इनकी किस्मत बदलने के लिए किसी नए डांसर बाबा का अवतरण हुआ है। भाड़े पर दी गयी प्रॉपर्टी से घरखर्च चलाने वाले और झुर्रियों भरा चेहरा लेकर अभी भी हीरो बनने का ख्वाब देखने वाले इन बहुत पुराने जमाने के हीरोज़ को कौन समझाये की जमाना अब हीरो का नही VDV स्टार का है।
FB न्यूजफीड पे डब्बू अंकल के बम्बई लैंडिंग की खबर सुनते ही लाखों की तादाद में मौजूद स्ट्रगलर्स को अपनी रोज़ी रोटी की चिंता सताने लगी है। इन्हें लगता है कि जनसंख्या में हुई इस अस्वाभाविक वृद्धि से उनके रोज़ के दारू मुर्गे में बेतहाशा कमी पैदा हो जाएगी। कुछ को तो चिंता के मारे मिर्गी के दौरे पड़ गए है, कुछ को जूता सुंघा कर होश में लाना पड़ा है। कोलीवाड़ा में दो-दो हाथ के कमरों में सदियों से रह रहे कुछ एक्टर तंग, बदबूदार, मच्छी-मुर्गे के मांस और गंदगी से बजबजाती गलियों से निकल कर वर्सोवा बीच पहुच गए हैं। इनका मानना है कि डब्बू अंकल की बॉलीवुड एंट्री ने उनके सपनों पर ग्रहण लगा दिया है। इसलिए अब उनके पास गंदगी से भरपूर इस कॉस्मोपॉलिटन दरिया मे अपने सपने को सुसाइड कराने के अलावा कोई और रास्ता नहीं है। इनमे से कुछ मरियल सिर्फ वड़ापाव के बल पर सालों से जिंदा है। पर्याप्त न्यूट्रिशन के बिना ज़िंदा रह कर इन लोगों ने मेडिकल साइंस को अचम्भे में डाल रक्खा है। इनसे गिरती सेहत के बारे में पूछने पर जवाब मिलता है कि जनाब एक फ़िल्म के लिए रोल प्रिपेयर कर रहे हैं। अरे ऐसा कौन सा रोल जिसकी प्रिपरेशन दस साल चलती है और ये बक*** अपना जीना मरना भूल सिर्फ उसी में लगा है।
कई बार तो इन्हें देख ऐसा लगता है कि ये अभी-अभी हेल हिटलर के यातना कैम्प से निकल कर बाहर आये है। कोलीवाड़ा के लोगों को इनके लिए सरकार से एक आंगनवाड़ी केंद्र खोलने की मांग करनी चाहिए, ताकि इन्हें दोनों वक़्त वडापाव की बजाय पर्याप्त मात्रा में पोषित आहार मिले और ये दुनिया के सबसे स्वस्थ और स्वच्छ देश के ऊपर कुपोषित होने का धब्बा न लगा पाएं। इन्हें देख मुझे कई बार खुद के ऊपर भ्रम होने लगता है लेकिन ये लोग न जाने किस फौलाद के बने है कि दशको की मुफलिसी भी मार ना पाई। इतनी गरीबी तो कालाहांडी में कई पीढ़ियाँ खा जाती है। इतना स्ट्रगल UPSC की परीक्षा में कर लोग IAS बन जाते है। और वो भी नही तो कम से कम अपने शहरों के छोटे-मोटे स्टीव जॉब्स तो हो ही जाते हैं।
खैर इतने सालों से इस शहर और इन एक्टरों के बीच रहने के बाद एक बात तो मुझे अच्छे से समझ मे आ गयी है कि इनकी इस दुर्दशा के पीछे कुछ खास लोगों का हाथ है। इन खास लोगों में से मैं सबके नाम नही ले पाऊंगा क्योंकि कुछ परलोकवासी हो गए है और परलोकवासियों से मुझे बहुत डर लगता है। न जाने कब ये अपनी अलौकिक शक्तियों का प्रयोग कर मेरे दस साल पुराने लैपटॉप की हार्डडिस्क उड़ा दें, जिसमे मुझे अमर बनाने वाली अनगिनत कहानियां सेव हैं। इसलिए मैं सिर्फ उन खास लोगो के नाम लूंगा जो ज़िंदा है। क्योंकि इस मायावी शहर में एक मच्छर भी खास लोगों को उनकी औकात दिखा देता है। यहां अब लोग भाई से नहीं मच्छरों से डरते हैं इसलिए मैं भी अब खुद को मच्छर मानकर उन खास लोगों के नाम लेता हूँ जिनकी वजह से इस शहर में लाखों की तादाद में मौजूद एक्टरों का बेड़ा गर्क हुआ है।
सबसे पहले तो बच्चन साब, नवाज़ुद्दीन, कंगना, अनुष्का, प्रियंका और राजकुमार राव सरीखे एक्टरों ने देशभर के लाखों करोड़ों नौजवानों को एक्टर बनने का सपना देकर भरमाया फिर रही सही कसर SRK ने ये कह कर पूरी कर दी कि अगर शिद्दत से किसी को चाहो तो सारी कायनात उसे आपसे मिलाने को साजिश में जुट जाती है। इसी साजिश का नतीजा है ये बेतहाशा भीड़ और भाड़ा, कोलीवाड़ा का। जिस कमरे की औकात 5000 रु महीने की नही, इस भीड़ की वजह से वो 12 हजार रुपये महीना मिलता है। पूरी कमाई भाड़े में घुस जाएगी तो आदमी खायेगा क्या, वड़ापाव!!!
इस साजिश में सिर्फ ये खास लोग शामिल नहीं है, इसमे इनके माँ-बाप, यार-दोस्त, चाचा, ताऊ, मामू भी बराबरी के हिस्सेदार हैं। बच्चा जरा सा गोरा क्या हुआ ये लोग उसे अंग्रेज समझने लगते हैं। भले ही उसकी नाक पकोड़ा हो और आंखे एक दूसरे को तिरछी रेखा में काटती हों लेकिन ये लोग तुरंत उसकी तुलना हीरो हेरोइन से कर बैठते हैं। अब ऐसा बच्चा जिसे बचपन से ही स्टारडम की लत लग गयी हो उसका मन भला स्कूल की बासी किताबों में लगेगा?? उसका मन तो अभिषेक, जैकी, कुमार गौरव, लव, मिमोह, आर्य, ईशा, उदय, अध्यन, तुषार, फरदीन, हरमन की तरह स्टारडम के पीछे ही भागेगा। सोते जागते जब उसे यही सुनने को मिले भाई तू अभी तक मुम्बई नहीं गया!! तो क्या वो अपने गांव में बैठ लिट्टी चोखा खायेगा??? उसका मन तो किसी अवार्ड सेरेमनी में गूंज रही तालियों की गड़गड़ाहट में अटका होगा।
बंबई आते ही सबसे पहले ये लोग एक्टिंग सीखने के लिए जिम जॉइन करते हैं। सालों साल लगातार एक्टिंग सीखने के दौरान माँ बाप की मोटी सेलरी कब पेंशन में बदल जाती है, लोखंडवाला की चमचमाती लेन्स से भागकर ये कब कोलीवाड़ा की बदबू मारती गलियों में पहुच जाते है, ज़िन्दगी कैसे सड़ा-गला मिस्सल बन जाती है इन्हें पता ही नहीं चलता। इनमे से कई आजीवन ब्रम्हचारी रह कर त्याग की भावना से ओतप्रोत रहते हैं। कई बहुत सारे रिलेशन और डिवोर्स के बाद बलिदानी की भूमिका में अदा करते हैं। फिर एक ऐसा वक़्त आता है जब ये घर के रहते है ना घाट के, तब ना शरीर साथ देता है ना मुखड़ा। तब इनमें एक अलग तरह का आत्मज्ञान जाग्रत होता है जो दबी कुचली आवाज़ में कहता है कि तू इस पके बाल और झुर्रीदार थोबड़े को किस मुह से अपने यार-दोस्तो, चाचा, ताऊ, मामू को दिखायेगा। पूरी लाइफ के स्ट्रगल के बाद यहीं हमारा हीरो हार मान जाता है। वो निराशा के समंदर में डुबकियां लगाते हुए डब्बू अंकल जैसे VDV स्टार से जलने लगता है। उसके मन मे इस उभरते हुए स्टार के लिए बुरी भावनाएं पनपती है जिन्हें वो रोकने में नाकामयाब रहता है, फिर वो सार्वजनिक तौर पर VDV स्टार्स का विरोध शुरू कर देता है।
ऐसे ही एक्टरों के एक दल ने बीते जमाने के उस हीरो के साथ अपने यूनियन की शरण ली है जिसके डांस की कॉपी कर डब्बू अंकल VDV स्टार बने हैं। इस हीरो का कहना है कि उसे भी डब्बू अंकल की पॉपुलैरिटी और कमाई में से कुछ हिस्सा मिलना चाहिए क्योंकि ओरिजिनल वो है, डब्बू उसका डुप्लीकेट। अब इन नामुरादों को कौन समझाए की ओरिजिनल/डुप्लीकेट कुछ नहीं होता। होती बस एक चीज़ है - एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट और सिर्फ एंटरटेनमेंट।
VDV स्टार अमर रहे। डब्बू अंकल अमर रहें!!!!
|© *Chinmay Sankrit* |
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=10214132234072188&id=1003276729
Friday, March 2, 2018
पत्रकार की होली
लाइव से एडिट तक
इनपुट से आउटपुट तक
न्यूज में प्रोग्राम में
गेस्ट के तामझाम में
डेस्क से रिपोर्टर तक
असाइनमेंट से स्ट्रिंगर तक
एंकर के टॉकबैक पे
स्क्रिप्ट की चिकचिक पे
पीसीआर रन डाउन पे
सर्वर ब्रेकडाउन पे
बाइट में देरी पर
टीआरपी हेराफेरी पर
गुस्से में हुए लाल
न्यूज रुम में बवाल
तमतमाए चेहरे बेरंग
शिकायती लहजे बदरंग
एक्शन पे रीएक्शन
शाबाशी का टशन
बैकबाइटिंग के दौर में
कांपीटिशन के जो़र में
किसी का क्रेडिट खा गए
किसी की बैंड बजा गए
अपनी गलती दूसरों पे ठोंकी
सिगरेट पे सिगरेट झोंकी
कभी उसने तो कभी हमने
फ्रस्टेशन निकाला
टेंशन का हरेक रंग
एक दूसरे पे डाला
किसी ने लकड़ी टिकाई
तो किसी ने आग लगाई
इसी तरह हमने
साल भर होली मनाई .
( *रचनाकार* - *भूपेंद्र सोनी "शजर"*)
*भूपेंद्र सोनी टीवी पत्रकार है*
Tuesday, December 5, 2017
शशि कपूर: कला चेतना से भरे मासूम चेहरे का खामोश हो जाना
अजय बोकिल
सहजता से बोला गया एक डायलाॅग भी तमाम स्टाइलिश संवादों पर कैसे भारी पड़ सकता है, इसे समझने पहले ‘शशि कपूर स्टाइल आॅफ एक्टिंग’ को समझना होगा। यादगार फिल्म दीवार’में अमिताभ के खाते में दसियों दमदार डायलाॅग थे। उस पर बिग- बी की आवाज उन डायलाॅग्स में और जान डाल देती थी। लगता था छल-प्रपंच भरी इस दुनिया में प्रतिशोध ही जीने का सही रास्ता है। लेकिन सिर्फ और सिर्फ एक डायलाॅग अमिताभ की सारी एक्टिंग को पानी भरने पर मजबूर कर देता है और वह है- मेरे पास मां है! यानी सौ सुनार की और एक लुहार की।
सोमवार (4 दिसंबर, 2017) को दिवंगत अभिनेता शशि कपूर के पास ‘मां’ के अलावा भी बहुत कुछ था। एक मशहूर फिल्मी खानदान में पैदा होने के बाद भी उनमें कोई हेकड़ी नहीं थी। दरअसल 60 के दशक में शशि कपूर फिल्म इंडस्ट्री के चाकलेटी चेहरों के बीच एक ऐसा फेस थे, जो काफी कुछ विदेशी सा लगता था। उनके नाक-नक्श ग्रीक हीरो की तरह लगते थे। मानो कोई गलती से ग्रीक देवताअों के स्वर्ग से हिंदुस्तानी खलिहान में चला आया हो। जो तन से युवा और मन से किशोर हो। यूं शशि कपूर ने ढाई दशक में फिल्मों में कई रोल अदा किए, लेकिन उन्हें याद तो कुछ भूमिकाअो, अपने सामाजिक तथा कला सरोकारों के िलए किया जाएगा। साम्प्रदायिक दंगों पर बनी फिल्म ‘धर्मपुत्र’ में उनका रोल एकदम अलग तरह का था तो हिट फिल्म ‘वक्त’ में ‘जी को मारकर’ जिंदगी बिताने वाले युवा के रूप में उन्हें कभी नहीं भुलाया जा सकेगा। उम्र में बड़े होने के बाद भी शशि कपूर ने पर्दे पर अमिताभ के छोटे भाई का रोल कई फिल्मों में बड़ी शिद्दत से अदा किया था। उन्होने प्ले ब्वाॅय टाइप भूमिकाएं भी कीं। लेकिन यह उनके स्वभाव के अनुकूल कभी नहीं लगीं। कारण कि शशि कपूर के चेहरे में एक स्थायी मासूमियत और दुनिया की चालािकयों से स्तब्ध हो जाने का परमनेंट भाव था। शशि जब पर्दे पर नाचते थे तो लगता था कि यह काम उनसे जबरन कराया जा रहा है। हां, फिल्म ‘जब जब फूल खिले’ में शशि जब ‘हम को तुम पे प्यार आया..प्यार आया..’ चीखते हुए इश्क में बावले हो जाते हैं, तब महसूस होता है कि सच्ची मोहब्बत करने वाला जब प्यार की सार्वजनिक अभिव्यक्ति करना चाहता है तो उसका हाल क्या होता है। शशि कपूर की पर्दे पर और जाती जिंदगी में भी इमेज एक क्लीन और ईमानदार इंसान की रही है। वह जो भी कहता है, सच सच और बेलाग ढंग से कह देता है। जिसमें कोई बनावटीपन नहीं है। शशिकपूर का यह नेचर अपने अग्रज राज कपूर की देसी और गंवई छवि एवं शम्मी कपूर की मस्त मौला तथा चुहलबाज इमेज से बिल्कुल हटकर है। शशि कपूर को देखकर हमेशा यही लगा कि ये आदमी कभी विलेन नहीं हो सकता। वह कांटो पर भी चलेगा तो फूलों की संवेदना के साथ चलेगा।
शशि कपूर को फिल्मी किरदारों से ज्यादा फिल्म इंडस्ट्री और थियेटर क्षेत्र में किए गए उनके योगदान के लिए याद किया जाएगा। सच्चा कलाकार न तो पैसे से संतुष्ट होता है और न ही प्रसिद्धी से भरमा जाता है। उसके मन में कुछ ऐसा करने की भूख होती है, जिससे सरस्वती संतुष्ट हो। कला की देवी मुस्कुराए। संस्कृति का पैमाना छलके। इतिहास खुद बांहे फैलाकर उसकी तलाश करे। फिल्मी चकाचौंध में रहकर भी शशि कपूर में सच्चे अभिनय की तड़प थी। इसलिए उन्होने अपनी जीवन साथी भी मशहूर अदाकारा जेनिफर कैंडल को बनाया। ’36 चौरंगी लेन’ में जेनिफर का अभिनय भला कौन भूल सकता है। इस फिल्म को ‘सेल्युलाइड पर लिखी कविता’ कहा गया। फिल्मों से नाम और पैसा कमाने के बाद 1978 में शशिकपूर ने दो माइलस्टोन काम किए। उन्होने अपने पिता और महान अभिनेता पृथ्वीराज कपूर की याद में मुंबई में ‘पृथ्वी थियेटर्स’ की स्थापना की। साथ ही खुद की फिल्म कंपनी ‘फिल्म वाला’ भी शुरू की। दोनो प्रयास वास्तव में शशि कपूर के भीतर छुपे और कुलबुलाते कलाकार तथा सर्जक के बैटिंग ग्राउंड थे। उन्होने इसे पूरी तरह भुनाया भी। शशि कुछ ऐसा करना चाहते थे, जो कपूर परिवार के ग्लैमर से हटकर हो और उसके बाद भी याद रखा जाए। ‘फिल्म वाला’ के बैनर तले शुरू हुआ यह ‘जनून’, ‘उत्सव’ तक अपनी पराकाष्ठा पर पहुंचा। दुनिया ने शशि की कला को एक नए शीशे में देखा, उससे अभिभूत हुई। उसके अनोखेपन को महसूस किया।
पिछले कई दिनों से शशि कपूर काफी बीमार चल रहे थे। जीवन संगिनी का जिंदगी की शाम से पहले साथ छोड़ जाने का दर्द तो था ही। शरीर भी थकने लगा था। इस बीच उन्हें पद्म विभूषण और प्रतिष्ठित दादा साहब फालके अवाॅर्ड से नवाजा गया। तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री अरूण जेटली उन्हें यह पुरस्कार देने शशिजी के घर पहुंचे। यह पुरस्कार लेते समय शशि का चेहरा अवाक था। मानो बहुत देर कर दी, हुजर आते-आते। फिर भी पुरस्कार तो पुरस्कार है। उसकी अपनी आत्मा होती है। अगर यह पुरस्कार शशि कपूर को न दिया जाता तो शायद यह पुरस्कार ही ग्लानिभाव से भर जाता। क्योंकि दादा साहब फाल्के की जिंदगी ही कुछ नया करने में बीती। भले ही उन्हें फाके करने पड़े हों। शशि का ‘जुनून’ भी कुछ ऐसा ही था। कुछ अलग और लीक से हटकर करने की जिद और कला को उसने नए रूपों में निखारने की चाह। सिनेमा से उलीचकर थियेटर को सींचने वाले फिल्म इंडस्ट्री में बिरले ही होते हैं। क्योंकि यह घर फूंक तमाशा है। लेकिन शशि कपूर ने यह काम पूरी निष्ठा और प्रतिदान की अपेक्षा के बगैर किया। अगर सलीम जावेद फिर से ‘दीवार’ के लिए डायलाॅग लिखें तो उन्हे शशिकपूर के लिए लिखना पड़ेगा- ‘मेरे पास कला है।‘ और कला कभी काल की गुलाम नहीं होती।
‘राइट क्लिक’
( ‘सुबह सवेरे’ में दि. 5 दिसंबर 2017 को प्रकाशित)
