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Sunday, November 30, 2025

रायपुर डायरी : मुक्तिबोध जी की स्मृतियों में एक शाम

पत्रकारिता एक ऐसा पेशा है जहां आपको हर वर्ग के लोगों से मेलजोल करना होता है, हर विषय का थोड़ा-बहुत ज्ञान अनिवार्य है। लेकिन दिल हमेशा अपनी पसंद की तरफ झुकता है। मेरे लिए वह विषय हमेशा से कला, साहित्य और संस्कृति रहा है।
जब मैं वर्ष 2004-07 के बीच भोपाल में रहा करता था, तब वहाँ के साहित्यकारों से मिलना-जुलना मेरी दिनचर्या का हिस्सा था। अक्सर अपनी एटलस साइकिल से मैं उनसे मिलने उनके घर तक पहुंच जाता था। वह दौर था ज्ञान की भूख शांत करने का।

वर्ष 2013 में जब मैं रायपुर आया, तो यह सिलसिला थमा नहीं। यहाँ सबसे पहली मुलाकात साहित्यकार गिरीश पंकज जी से हुई थी; संयोग से वे मेरे किराए के घर के नज़दीक ही रहते थे।
छत्तीसगढ़ के बड़े साहित्यकारों की बात हो, तो गजानन माधव मुक्तिबोध एक ऐसा नाम है, जो था, है और हमेशा रहेगा। मुझे जब पता चला कि उनके सुपुत्र, दिवाकर मुक्तिबोध Diwakar Muktibodh सर, पत्रकारिता जगत में हैं, तो उनसे मिलने का अवसर अक्सर मिलता रहा। पर, इस बार पहली बार उनके निवास स्थान पर जाना हुआ।

[अंधेरे में, चांद का मुंह टेढ़ा, ब्रह्मराक्षस जैसी कविताओं के रचयिता मुक्तिबोध जी की स्मृतियों से मुलाकात] 

रायपुर में विधानसभा रोड पर स्थित सड्डू इलाके की मेट्रो ग्रीन सोसाइटी में उनका घर है। घर के प्रवेश द्वार पर ही आपको मुक्तिबोध की स्मृतियों का एहसास होने लगता है। अंदर पूरा घर उनकी विरासत को सहेजे हुए है — उनकी तस्वीरें, उनकी रचनाओं के अंश... हर जगह उनकी उपस्थिति महसूस होती है।

पिछले 12 वर्षों से मैं रायपुर में हूँ। पहले वे देवेंद्र नगर में रहा करते थे, तब भी कई बार दिवाकर सर से घर पर मुलाकात को लेकर बातचीत हुई, पर व्यस्तता के कारण घर पहुंचना नहीं हुआ। पर इस बार, माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय की हमारी वरिष्ठ साथी, सुमिता जायसवाल मैडम की वजह से यह सार्थक संयोग बन गया।

मुलाकात का विषय व्यक्तिगत कुशलक्षेम के अलावा मुख्य रूप से पत्रकारिता और उसके बदलते स्वरूप पर केंद्रित रहा।

दिवंगत गजानन माधव मुक्तिबोध जी की विरासत को सहेजते हुए, उनके पुत्र दिवाकर मुक्तिबोध सर से यह मिलन मेरे साहित्यिक अनुराग को एक नई दिशा देने वाला साबित हुआ। 

छत्तीसगढ़ की पावन माटी में जन्मे मूर्धन्य लेखक-साहित्यकारों में कुछ नाम मुझे हमेशा स्मृत रहते हैं—पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, गजानन माधव मुक्तिबोध, माधवराव सप्रे, मुकुटधर पांडे आदि। उनके परिवारजनों से भेंट आज भी मुझे हृदयस्पर्शी लगती है। इसी कड़ी में मुक्तिबोध जी के पुत्र दिवाकर मुक्तिबोध सर से यह संक्षिप्त मुलाकात अत्यंत सौहार्दपूर्ण रही। भविष्य में उनसे और गहन, लंबी चर्चाओं की आशा करता हूँ।
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*गजानन माधव मुक्तिबोध का संक्षिप्त परिचय*
गजानन माधव मुक्तिबोध (1917-1964) हिंदी साहित्य के प्रगतिशील कवि, आलोचक और कहानीकार थे। उनकी रचनाएँ मध्यमवर्गीय बुद्धिजीवी के आंतरिक द्वंद्व, सामाजिक विषमता और मानवीय संघर्ष को प्रतीकात्मक गहराई से उकेरती हैं। अंधेरे में उनकी शिखर कविता है, जो 55 पृष्ठों में आत्मसंघर्ष का चित्रण करती है। अन्य चर्चित कविताएँ हैं—भूरी-भूरी खाक धूल, देवी मुझे न जला दे, प्रलाप और जीने की आस। मुख्य पुस्तक चाँद का मुँह टेढ़ा है (1964) हिंदी काव्य की मील का पत्थर है।

'चांद का मुंह टेढ़ा है' से:

"चांद का है टेढ़ा मुँह!!"
"ज़िन्दगी में झोल है!!"
"गड़ गये, गाड़े गये !! झड़ गये, झाड़े गये !! चीरी गयीं, फाड़ी गयीं !!"
'ब्रह्मराक्षस' और अन्य कविताओं से:
"विचार आते हैं लिखते समय नहीं, बोझ ढोते वक्त पीठ पर"
"(वह नहीं दीखता... नहीं ही दीखता, किन्तु वह रहा घूम तिलस्मी खोह में ग़िरफ्तार कोई एक...)"
अन्य चर्चित पंक्तियां:
"बैचेनी के साँपों को मैंने छाती से रगड़ा है।"
"हमारी भूख की मुस्तैद आँखें ही थका-सा दिल बहादुर रहनुमाई पास पा के भी बुझा-सा ही रहा इस ज़िन्दगी के कारख़ाने में उभरता भी रहा पर बैठता भी तो रहा बेरुह इस काले ज़माने में।"

~~ रामकृष्ण डोंगरे~~

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Friday, October 17, 2025

सत्ता को दो-टूक जवाब: 'मैं संपादक हूँ, खबर मैं तय करूँगा, आप नहीं!’

किस्सा संपादक का : पहली किस्त

आज मैं तेज-तर्रार पत्रकार और संपादक आनंद पांडे जी से जुड़ा एक रोचक किस्सा साझा करना चाहता हूं। पांडे जी, जो वर्तमान में 'द सूत्र' से जुड़े हैं और चर्चा में हैं, उस समय रायपुर के एक प्रतिष्ठित अखबार के संपादक थे।
यह बात उस वक्त की है जब मैंने अमर उजाला, नोएडा छोड़कर उस अखबार में नौकरी शुरू की थी। वहां के संपादक आनंद पांडे जी के तेवर देखते ही बनते थे। एक बार हमारे होनहार रिपोर्टर गोविंद पटेल ने एक सनसनीखेज खबर फाइल की। 

खबर थी कि तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष और भाजपा के बड़े नेता गौरीशंकर अग्रवाल के बंगले में 48 एयर कंडीशनर (एसी) लगे थे। यह खबर सरकारी बंगलों में रखरखाव और मरम्मत के नाम पर होने वाली फिजूलखर्ची को उजागर करती थी।

खबर छपते ही रायपुर के राजनीतिक गलियारों में हड़कंप मच गया, चर्चाएं गर्म हो गईं और स्वाभाविक रूप से गौरीशंकर जी नाराज हो गए। अगले दिन सुबह की मीटिंग के दौरान पांडे जी के पास गौरीशंकर अग्रवाल का फोन आया।

उन्होंने सवाल किया, 

“आनंद जी, क्या आपको लगता है कि मेरे बंगले की यह खबर पहले पेज पर टॉप बॉक्स में छपने लायक थी? क्या यह इतनी बड़ी खबर थी?” 

पांडे जी ने तुरंत सख्त लहजे में जवाब दिया, 

“गौरीशंकर जी, आप राजनेता हैं, अपना काम करें। मैं संपादक हूँ, मेरा काम करूँगा। कौन सी खबर कहाँ छपेगी, यह मैं तय करूँगा, आप नहीं।” 

यह सुनते ही गौरीशंकर जी की बोलती बंद हो गई और बातचीत आगे बढ़ना मुश्किल था। 

इस घटना ने मुझे पांडे जी के बेबाक तेवर दिखाए। एक सच्चा संपादक वही होता है जो सच का साथ दे और झूठ को बर्दाश्त न करे, चाहे सामने कितना बड़ा व्यक्ति क्यों न हो। 

इसी तरह का एक और किस्सा भोपाल के प्रतिष्ठित संपादक गिरीश मिश्र जी का है। जब वे एक अखबार के संपादक थे, तब मालिक ने उनसे कहा कि वे मुख्यमंत्री निवास जाकर मुख्यमंत्री से मुलाकात करें। 

मिश्र जी ने दो टूक जवाब दिया, “मैं संपादक हूँ, मेरा काम अखबार को बेहतर बनाना है। अगर किसी को मुझसे मिलना है, तो वे मेरे दफ्तर आएँ। मैं किसी के पास नहीं जाऊँगा।” 

ऐसे तेवर वाले संपादक कम ही देखने को मिलते हैं, लेकिन अक्सर ऐसे लोग मालिकों को पसंद नहीं आते। बाद में मिश्र जी को उस अखबार से हटना पड़ा, हालांकि वे दूसरे अखबार के संपादक बने। 

आनंद पांडे जी और 'द सूत्र' की खबरों को देखकर लगता है कि वे केवल वही दिखाते हैं जो जनता को जानना चाहिए। राजस्थान के घटनाक्रम “दीया तले अंधेरा” सीरीज को आप देखेंगे तो समझ पाएंगे कि जो दिखाया गया है, वह जनता को जरूर देखना चाहिए। 

 'द सूत्र' के वीडियो देखकर आप भी अपनी राय बना सकते हैं कि क्या वे कुछ गलत कर रहे हैं। 

कृपया अपनी राय जरूर बताएं कमेंट में आपका स्वागत है….। 

~~ रामकृष्ण डोंगरे, पत्रकार व यूट्यूबर, डोंगरेजी ऑनलाइन ~~

Saturday, October 4, 2025

डेढ़ दशक बाद डॉ. लक्ष्मीचंद सर से मुलाकात: पीजी कॉलेज, छिंदवाड़ा की स्मृतियां

भाग-दौड़ भरे दिन के पश्चात कल (चार अक्टूबर, 2025) रात लगभग 8:30 बजे एमए हिंदी के मेरे प्रिय शिक्षक आदरणीय डॉ. लक्ष्मीचंद सर से मुलाकात हुई। यह मिलन लगभग डेढ़ दशक के अंतराल के बाद हुआ। छिंदवाड़ा के पीजी कॉलेज से वर्ष 2004 में एम.ए. हिंदी की पढ़ाई पूरी करने के बाद मैं (रामकृष्ण डोंगरे) भोपाल चला गया था।
सर ने बताया कि नरसिंहपुर रोड पर स्थित बिंद्रा कॉलोनी का यह नया मकान उन्होंने वर्ष 2005 में बनवाया था। मुझे याद है कि मैं कॉलेज के दिनों में उनके पुराने निवास पर भी जा चुका हूँ, जहां सर ने अपनी लाइब्रेरी से मुझे कुछ पुरानी और मूल्यवान किताबें भेंट की थीं, जो आज भी मेरे संग्रह का हिस्सा हैं। 

मुझे याद है कि मैं एक बार पहले भी इस नए मकान में आ चुका हूं। 2011 के बाद मैंने अपना फेसबुक अकाउंट खोला था। इसका मतलब है कि उसके बाद मेरी मुलाकात नहीं हुई है, क्योंकि मैं हर मुलाकात की यादें फेसबुक पर जरूर लिखता हूं। 
यद्यपि इस डेढ़ दशक के दौरान फोन पर हमारा लगातार संपर्क बना रहा, परंतु व्यक्तिगत रूप से मिलना एक सुखद अनुभव था। इस अवधि में सर ने छिंदवाड़ा जिले के विभिन्न कॉलेजों में अपनी उत्कृष्ट सेवाएं दी हैं।

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हिंदी विभाग की यादें
डॉ. लक्ष्मीचंद सर का व्यक्तित्व सरल और सहज है। उन्होंने हिंदी विभाग के कई सफल बैचों को पढ़ाया है। 
एक विशेष बात यह है कि आदरणीय सर रोज अपने गार्डन के फूलों की तस्वीर के साथ सुप्रभात का मैसेज भेजते हैं। हमें याद है कि वर्ष 2002-2004 के सत्र में सर के साथ-साथ गुप्ता मैडम, अवस्थी मैडम, पटवारी मैडम भी हमें पढ़ाया करती थीं। यह मेरे लिए गर्व का विषय था कि मैंने 73% के साथ अपनी कक्षा में टॉप किया था।

मुझे याद है कि हमसे पहले वाले बैच से इमरान खान जी पास आउट हुए थे, जो वर्तमान में हिंदुस्तान डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। यह भी गौरतलब है कि पीजी कॉलेज छिंदवाड़ा की गिनती उन प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में होती है, जहां छत्तीसगढ़ की पूर्व राज्यपाल अनुसूइया उइके जी भी शिक्षा ग्रहण कर चुकी हैं।

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सांस्कृतिक और साहित्यिक उपलब्धियां 
कॉलेज से जुड़ी मेरी यादों में साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियां सर्वोपरि हैं। कॉलेज की पत्रिका 'निर्झरी' में मेरे आलेख और कविताएं प्रकाशित हुई थीं। इससे पहले डीसी कॉलेज की पत्रिका में भी मेरी कविता को स्थान मिला था। सांस्कृतिक प्रतियोगिताओं में भाग लेना एक महत्वपूर्ण अनुभव रहा। मैंने अपने मित्र दिग्विजय सिंह के साथ सामान्य ज्ञान प्रश्न मंच प्रतियोगिता में छिंदवाड़ा जिले का प्रतिनिधित्व किया था और सागर विश्वविद्यालय में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी। जिले से प्रतिनिधि चयन के लिए गर्ल्स कॉलेज में एक कड़ी प्रतिस्पर्धा आयोजित की गई थी।

हमारा पीजी कॉलेज धर्म टेकरी पर स्थित है, जिसके नज़दीक ही आकाशवाणी छिंदवाड़ा और ऐतिहासिक राज्य बादल भोई संग्रहालय भी मौजूद हैं, जो इस क्षेत्र के सांस्कृतिक महत्व को बढ़ाते हैं।

- वरिष्ठ पत्रकार रामकृष्ण डोंगरे, पूर्व विद्यार्थी, पीजी कालेज छिंदवाड़ा

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Thursday, October 2, 2025

School Life : गांव तंसरामाल के प्राइमरी स्कूल के दोस्तों से मुलाकात

मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में स्थित तंसरामाल गांव में गुरुवार 2 अक्टूबर 2025 को बचपन के यारों कैलाश डोंगरे, पंचम महोबिया और प्रीतम डोंगरे से एक साथ मुलाकात हुई तो मानो समय की मशीन में सवार होकर सीधे 1985 में पहुंच गया! जिस समय शासकीय प्राथमिक शाला तंसरामाल में हमारी स्कूल लाइफ शुरू हुई थी। 


कैलाश से तो मुलाकातें होती रहती हैं, लेकिन पंचम से मिलना? अरे, वो तो दो दशक बाद हुआ! पंचम, जो कभी कोर्ट की नौकरी में, कभी टीचर की भूमिका में मध्यप्रदेश के अलग-अलग शहरों में रहे। इन दिनों विदिशा जिले में शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। 
हमारा प्राइमरी स्कूल का जमाना, वो तो बस एक अलग ही दुनिया थी! हमारा दोस्तों का गैंग—कैलाश, पंचम, शंकर, आरिफ, प्रीतम, सुभाष—जैसे सात समंदर के रत्न! हर दिन नई शरारत, नई मस्ती।
कैलाश के साथ तो एक खास किस्सा है, जो आज भी हंसी ला देता है। स्कूल के सांस्कृतिक कार्यक्रम में कैलाश के साथ मुझे स्टेज पर चढ़ने का मौका मिला। असल में, कोई और आने वाला था, लेकिन उसकी 'गैरहाजिरी' ने मुझे स्टार बना दिया! वो मेरी जिंदगी का पहला और आखिरी स्कूल स्टेज परफॉर्मेंस था। इनाम में मिला एक चमचमाता गिलास, जिसे मैंने बरसों तक ट्रॉफी की तरह संभाला।

स्कूल की वो गलियां, वो क्लासरूम, वो सैयद सर की डांट और देशमुख सर का वो दमदार अंदाज—कैसे भूलें? गुप्ता सर और मर्सकोले मैडम की पढ़ाई ने तो हमें जिंदगी की पहली सीढ़ियां चढ़ाईं। और हां, हमारे गैंग का शंकर सिरसाम तो बाद में गांव का सरपंच बना, वो भी दो-दो बार! गर्व की बात, है न?

ये मुलाकात बस एक मुलाकात नहीं थी, बल्कि उन पुराने दिनों की एक झलक थी—जब जिंदगी बस हंसी-मजाक, दोस्तों की यारी और मासूम सपनों का पीछा करना थी। तंसरामाल के स्कूल की वो यादें, वो दोस्ती, आज भी दिल में उतनी ही ताजा है, जितनी उस गिलास की चमक!

~ रामकृष्ण डोंगरे, तंसरामाल ~

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Wednesday, October 1, 2025

सब फोन देखने में बिजी हैं, रामलीला देखने कौन जाएगा?

मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में स्थित मेरा ग्राम तंसरामाल, जहां कभी दुर्गोत्सव और मंडई मेलों की रौनक पूरे क्षेत्र में प्रसिद्ध थी, आज एक अजीब सी खामोशी में डूबा हुआ है।

पहले इन मेलों में रंग-बिरंगे मंच सजते थे, गांव के लोग रामलीला और नाटकों के लिए उत्साह से इकट्ठा होते थे। बच्चे, बूढ़े, जवान—सब एक साथ बैठकर रामायण के चरित्रों को जीवंत होते देखते थे। ढोल-मंजीरे की आवाज, राम-सीता के संवाद और रावण के दहाड़ते किरदार गांव की फिजा में गूंजते थे। लेकिन आज, यह सब एक धुंधली याद बनकर रह गया है। मंच खाली हैं, दर्शक गायब हैं, और गांव की सांस्कृतिक धरोहर धीरे-धीरे विलुप्त हो रही है। 

कारण? हर हाथ में स्मार्टफोन और हर आंख स्क्रीन पर टिकी हुई है। 

शायद आपके पिताजी, चाचा जी या आपके बड़े भाई कभी रामलीला के किरदारों को जीवंत करते रहे होंगे। हमारे गांव के भी कई नाम मुझे याद आते हैं। जैसे- मयाराम काका, अर्जुन काका, छोटू काका, शिवपाल काका आदि। 

तंसरामाल में दुर्गोत्सव और मंडई मेलों का समय गांव वालों के लिए उत्सव का पर्याय था। रामलीला के मंच पर स्थानीय कलाकार अपने अभिनय से रामायण को जीवंत करते थे। बच्चे राम के बाण चलाने का दृश्य देखकर तालियां बजाते, तो बुजुर्ग राम-सीता के आदर्शों पर चर्चा करते। ये आयोजन केवल मनोरंजन नहीं थे, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक मूल्यों को जीवित रखने का माध्यम थे। गांव के लोग महीनों पहले से तैयारी में जुट जाते—मंच सजाना, वेशभूषा तैयार करना और किरदारों के लिए अभ्यास करना। यह सब गांव की सामूहिकता का प्रतीक था। 

आज समय बदल गया है। स्मार्टफोन ने न केवल हमारा समय, बल्कि हमारी संस्कृति को भी अपने आगोश में ले लिया है। युवा अब रामलीला के मंच के बजाय यूट्यूब और सोशल मीडिया पर वीडियो देखने में मशगूल हैं। बच्चे गेमिंग ऐप्स में खोए रहते हैं, और बड़े-बूढ़े भी व्हाट्सएप और फेसबुक की स्क्रॉलिंग में समय बिता रहे हैं। 

~ वरिष्ठ पत्रकार रामकृष्ण डोंगरे ~

Photo Credit : Google

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Sunday, September 21, 2025

Dongre ki Diary डोंगरे की डायरी के अंश



रामकृष्ण डोंगरे का ब्लॉग "DONGRE की डायरी" (dongretrishna.blogspot.com) उनकी व्यक्तिगत स्मृतियों, पत्रकारिता के अनुभवों और साहित्यिक संस्मरणों का संग्रह है। यह एक डिजिटल डायरी की तरह है, जहाँ वे अपने जीवन के विभिन्न चरणों—जैसे भोपाल के साहित्यिक कार्यालय में काम, आकाशवाणी के दिन और पुरानी यादों को ताजा करने—के बारे में लिखते हैं। ब्लॉग की थीम मुख्य रूप से आत्मकथात्मक है, जिसमें किताबों की खुशबू, साहित्यकारों की चर्चाएँ और जीवन के छोटे-छोटे क्षण प्रमुख हैं। नीचे कुछ प्रमुख अंश दिए गए हैं, जो उनके ब्लॉग से लिए गए हैं। ये अंश हिंदी में हैं और उनके मूल भाव को बनाए रखते हुए संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किए गए हैं:

1. **साहित्यिक कार्यालय की यादें (भोपाल के दिनों से)
 
 - **तिथि/संदर्भ**: हालिया पोस्ट (2020-2025 के बीच की यादें)।
   - **अंश**:  
     "कार्यालय में प्रवेश करते ही किताबों और कागज़ों की सौंधी खुशबू, साहित्यकारों की गहन चर्चाएं-ये सब मेरे रोज़मर्रा का हिस्सा थे। मैं, रामकृष्ण डोंगरे, वहां कार्यालय प्रबंधक के रूप में था, मगर मेरी भूमिका सिर्फ प्रशासनिक कार्यों तक सीमित नहीं थी। मैं उन शब्द शिल्पियों का साक्षी था, जो अपने विचारों से समाज को नई दिशा दे रहे थे।"  
     *(यह अंश उनके प्रारंभिक करियर की सादगी और साहित्यिक वातावरण की जीवंतता को दर्शाता है।)*

2. **विष्णु प्रभाकर जी के दर्शन

   - **तिथि/संदर्भ**: भोपाल कार्यालय की पुरानी घटना (लगभग 2004-2005)।
   - **अंश**:  
     "इसी जगह मैंने पहली बार लेखक साहित्यकार श्री विष्णु प्रभाकर जी के दर्शन किए थे। उस वक्त उनकी उम्र करीब 93 साल थी। मुझे उन्हें इतने करीब से देखकर भरोसा नहीं हो रहा था कि मैंने उनकी कहानियों को बचपन में स्कूल की किताबों में पढ़ा था।"  
     *(यह संस्मरण साहित्यिक हस्तियों से उनके व्यक्तिगत जुड़ाव को उजागर करता है, जो बचपन की यादों से जुड़ता है।)*

3. **पुरानी मैगज़ीन की यादें और मित्रता**
   - **तिथि/संदर्भ**: हालिया (2025 के आसपास, व्हाट्सएप के माध्यम से ताजा हुई याद)।
   - **अंश**:  
     "दैनिक भास्कर रतलाम के स्थानीय संपादक, मेरे मित्र और बड़े भाई श्री संजय पांडेय Sanjay Pandey जी ने आज मुझे व्हाट्सएप पर इस मैगजीन का स्क्रीनशॉट भेजा तो मैं अचानक पुरानी यादों में खो गया।"  
     *(यह छोटा अंश पत्रकारिता के पुराने साथियों से जुड़ी भावुकता को व्यक्त करता है।)*

ये अंश डोंगरे जी की डायरी के सार को दर्शाते हैं—एक साधारण जीवन की गहराई, जहाँ साहित्य और पत्रकारिता के अनुभव भावनाओं का स्रोत बनते हैं। ब्लॉग पर और भी कई पोस्ट हैं, जैसे आकाशवाणी के दिनों की डायरी और साहित्यिक चर्चाओं के वर्णन।

हिंद युग्म का युगपुरुष: शैलेश भारतवासी Shailesh Bharatwasi जी से एक यादगार मुलाकात"

शैलेश भारतवासी Shailesh Bharatwasi जी... हिंद-युग्म के प्रकाशक... मेरे आभासी मित्र...
मेरा परिचय शैलेश जी से ब्लॉगिंग के शुरुआती दौर से है। वर्ष 2007 में दैनिक समाचार पत्र अमर उजाला की नौकरी के सिलसिले में दिल्ली पहुंचा था, तब से ही मैं ब्लॉगिंग की दुनिया से जुड़ गया था। उस समय मैंने 'डोंगरे की डायरी', 'छिंदवाड़ा छवि' और और अन्य ब्लॉग बनाए थे। 

शैलेश जी के ब्लॉग 'हिंदी युग्म' पर हम तकनीकी आलेख और अन्य रुचिकर सामग्री पढ़ते थे। बाद में शैलेश जी ने अपनी वेबसाइट तैयार की और फिर अपना प्रकाशन शुरू कर दिया है। 

इस तरह हमारा परिचय गहरा होता गया। हालांकि, दिल्ली में रहते हुए भी हमारी कभी आमने-सामने मुलाकात नहीं हो पाई।

'हिंदी युग्म' की चर्चा युवा लेखकों के बीच सबसे ज्यादा है, क्योंकि आज की सबसे ज़्यादा चर्चित किताबें उन्हीं के प्रकाशन से प्रकाशित होती हैं। 'हिंदी युग्म' अपनी टैगलाइन 'नई वाली हिंदी' के साथ युवा लेखकों की सबसे अधिक किताबों को प्रकाशित करने के लिए जाना जाता है।
ठीक 18 साल के लंबे अंतराल के बाद, रायपुर में उनसे हमारी मुलाकात कुछ इस तरह हुई: वे बेहद सरल और सहज हृदय वाले हैं। उनसे मिलने के लिए साहित्य प्रेमियों में गजब का उत्साह था। यह उत्साह स्वाभाविक भी था, क्योंकि 'हिंदी युग्म' और शैलेश भारतवासी हिंदी साहित्य जगत में एक-दूसरे के पर्याय बन चुके हैं। यह मुलाकात साहित्यिक, सहज और यादगार रही।

~ रामकृष्ण डोंगरे ~

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Wednesday, August 6, 2025

मेरी डिजिटल डायरी : bhopal City और "आसपास" की याद आ गई...

जब भी मन पुरानी यादों की गलियों में भटकता है, तो कुछ चित्र ऐसे उभरते हैं, जो समय के साथ और गहरे हो जाते हैं। एक ऐसी ही याद है मेरे उन दिनों की, जब मैं आकाशवाणी भोपाल में लंबे समय तक कार्यरत रहे वरिष्ठ उद्घोषक और लेखक श्री राजुरकर राज जी की संस्कृतिकर्मियों की संवाद पत्रिका “शब्द शिल्पियों के आसपास” और पड़ाव प्रकाशन में कार्यालय प्रबंधक के रूप में कार्यरत था।
दैनिक भास्कर रतलाम के स्थानीय संपादक, मेरे मित्र और बड़े भाई श्री संजय पांडेय Sanjay Pandey जी ने आज मुझे व्हाट्सएप पर इस मैगजीन का स्क्रीनशॉट भेजा तो मैं अचानक पुरानी यादों में खो गया। 

यह वर्ष 2004-2005 की बात है, जब भोपाल में दैनिक समाचार पत्र स्वदेश से मेरा पहला जॉब छूट गया था और मैंने 1,000 रुपये मासिक वेतन पर यहां काम शुरू किया था। वह दौर मेरे जीवन का एक अनमोल अध्याय था, जो न सिर्फ मेरे पेशेवर अनुभव को समृद्ध करता है, बल्कि मेरे भीतर की रचनात्मकता को भी जगाता है।
इसी दौरान मुझे देशभर के साहित्यकारों से जुड़ने का अवसर मिला, क्योंकि मैं देशभर से आने वाले आलेख, पत्र को पढ़ता था। यहां से हमने डायरेक्टरी भी तैयार की थी। इसमें साहित्यकारों, संस्कृत कर्मियों का नाम, पता, मोबाइल नंबर या लैंडलाइन नंबर दर्ज होता था। 

"शब्द शिल्पियों के आसपास" एक ऐसी पत्रिका थी, जो जो लेखक, साहित्यकार, संस्कृति कर्मियों के जीवन और उनके सुख-दुख के समाचार की जानकारी देती थी। उनकी नई किताबों का प्रकाशन, उनके जीवन की उपलब्धि, घटना दुर्घटना, बच्चों का जन्मदिन, विवाह जैसी छोटी-छोटी सूचनाओं इसमें होती थी। इसमें साहित्यिक आलेख और साक्षात्कार भी होते थे। 
राजुरकर जी का मानना था कि समाचार पत्र राजनेताओं या अपराध की खबरों से भरे होते हैं। इनमें साहित्यिक समाचारों के लिए स्पेस बहुत कम होता है। अगर किसी बड़े लेखक साहित्यकार का किसी कार्यक्रम में आना हुआ तो साहित्यिक समाचारों को स्पेस मिलता है लेकिन साहित्यकारों से जुड़े छोटे-छोटे समाचार तो अखबारों का हिस्सा बनते ही नहीं है। 

दुष्यंत कुमार पांडुलिपि संग्रहालय उस वक्त नेहरू नगर स्थित उनके आवास पर ही था। वहां मुख्यतः पत्र, पत्रिकाओं का काम मुझे करना होता था। इसके अलावा अन्य और भी काम थे। मुझे लगता है इसी दौरान मैंने सबसे ज्यादा भोपाल के गली- मोहल्लों को अपनी एटलस साइकिल से नापा था। ज्यादातर अपनी साइकिल से ही मैं जाता था या कभी बस या टेम्पो का सहारा लेता था। 

कार्यालय में प्रवेश करते ही किताबों और कागज़ों की सौंधी खुशबू, साहित्यकारों की गहन चर्चाएं-ये सब मेरे रोज़मर्रा का हिस्सा थे। मैं, रामकृष्ण डोंगरे, वहां कार्यालय प्रबंधक के रूप में था, मगर मेरी भूमिका सिर्फ प्रशासनिक कार्यों तक सीमित नहीं थी। मैं उन शब्द शिल्पियों का साक्षी था, जो अपने विचारों से समाज को नई दिशा दे रहे थे।
इसी जगह मैंने पहली बार लेखक साहित्यकार श्री विष्णु प्रभाकर जी के दर्शन किए थे। उस वक्त उनकी उम्र करीब 93 साल थी। मुझे उन्हें इतने करीब से देखकर भरोसा नहीं हो रहा था कि मैंनै उनकी कहानियों को बचपन में स्कूल की किताबों में पढ़ा था। 

पड़ाव प्रकाशन में काम करना अपने आप में एक साहित्यिक यात्रा थी। हर किताब, हर पांडुलिपि के पीछे लेखक की मेहनत और सपनों की कहानी होती थी। मैं कार्यालय के दैनिक कामों को संभालता, लेखकों से संवाद करता, और उनके रचनात्मक सफर का हिस्सा बनता। उन पलों में मैंने सीखा कि साहित्य सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि भावनाओं और विचारों का जीवंत दस्तावेज़ है। राजुरकर जी कहा करते थे कि जब वे छोटे थे, तो किताबें पढ़ने पर उन्हें ऐसा एहसास होता था कि यह किताबें कोई ईश्वर ही लिखना होगा। लगभग मेरी भी भावनाएं कुछ ऐसी थी। क्योंकि मैं मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव तंसरामाल में पला- बढ़ा था। 
आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो "आसपास की याद आ गई" । वो सुबहें, जब मैं कार्यालय में सबसे पहले पहुंचकर मेज़ पर बिखरी पांडुलिपियों को सहेजता। वो दोपहरें, जब लेखकों के साथ चाय की चुस्कियों के बीच साहित्यिक चर्चाएं होतीं। और वो शामें, जब नया अंक छपकर आता और हम सब उसकी सफलता पर गर्व करते। ये यादें मेरे लिए किसी ख़ज़ाने से कम नहीं। आज सोचता हूं तो लगता है कि भोपाल में बिताया मेरा समय, मेरे जीवन का सबसे अनमोल क्षण है। चाहे वह समय मात्र तीन-चार साल का क्यों ना रहा हो। 

“शब्द शिल्पियों के आसपास” और पड़ाव प्रकाशन ने मुझे न सिर्फ़ एक पेशेवर के रूप में गढ़ा, बल्कि एक इंसान के रूप में भी समृद्ध किया। आज भी जब मैं कोई किताब खोलता हूं या कोई कविता पढ़ता हूं, उन दिनों की गूंज मेरे कानों में सुनाई देती है। सचमुच, आसपास की याद आ गई... और मन फिर से उन गलियों में खो गया।

~~पत्रकार रामकृष्ण डोंगरे~~

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Friday, January 31, 2025

आज की कविता : केवल स्वयं को ढूंढना 👁️‍🗨️👁️‍🗨️ है, बाकी सब तो गूगल पर है

केवल स्वयं को ढूंढना 👁️‍🗨️👁️‍🗨️ है
बाकी सब तो गूगल पर है !
जीवन की खोज में, स्वयं को ढूंढना है,
बाकी सब तो गूगल पर है!

समय की बहती नदी में,
अपनी पहचान का मोती ढूंढना है,
भीतर छिपा हुआ सत्य,
जिसे न तो कोई एल्गोरिदम,
न ही कोई सॉफ्टवेयर पढ़ सकता है।

गूगल पर हैं सारे जवाब,
पर अपने प्रश्न का सच्चा आधार कहाँ?
हृदय की गहराइयों में,
अपने सपनों का आलम ढूंढना है।

खोया हुआ आत्मा जब लौटे,
तब समझ आएगी स्वयं की खोज की महिमा,
आभासी दुनिया के भ्रम में न खो जाए,
असली खजाना तो अंदर ही छिपा है।

तो आओ, स्वयं को ढूंढें,
बाकी सब तो गूगल पर है!

©® content creator #dongrejionline ~~रामकृष्ण डोंगरे

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Monday, December 12, 2022

Rachna Dairy : मेरी कविता - खबरों का नशा

| मेरी कविता - खबरों का नशा |

खबरों में भी, 
नशा होता है।
कुछ खबरों को पढ़ने
से नशा हो जाता है।

लेकिन उस नशे से कुछ नहीं मिलता।
ऐसी नशीली खबरों की संख्या बढ़ रही है,
बढ़ाई जा रही है
ताकि आप पर इसका नशा
एक बार चढ़ जाए तो उतरे ना।
ऐसी नशीली खबरों से बचें।

नशा कीजिए
अच्छी खबरों का, 
जिससे आपको कुछ हासिल हो।
ज्ञान मिले, प्रेरणा मिले, 
आनंद मिले, मन को शांति मिले।

बुरी खबरों की
दुनिया से दूर रहे।
क्योंकि खबरों में भी
नशा होता है।

©® *रामकृष्ण डोंगरे Ramkrishna Dongre Pawar तृष्णा*

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Monday, November 14, 2022

पिताजी की पुण्यतिथि : काश आप आज हमारे बीच होते...

|| ॐ || पिताजी की 16 वीं पुण्यतिथि || ॐ |

आज मेरे पिताजी स्व. श्री संपतराव डोंगरे की 16 वीं पुण्यतिथि है। साल 2006 में 15 नवंबर को ही वे अचानक हम सभी को छोड़कर इस दुनिया से दूर चले गए। 

मुझे याद है वो मनहूस दिन। जब मुझे भोपाल में एमजे की पढ़ाई के दौरान खबर मिली कि पिताजी (भाऊ) को अटैक आया है। जल्दी घर आ जाओ। किसी तरह देर रात को छिंदवाड़ा पहुंचा। फिर सुबह गांव। 

घर पहुंचते तक मेरी आंखों में आंसू का नामोनिशान नहीं था। मुझे इस बात पर यकीं नहीं हो रहा था कि पिताजी नहीं रहे। घर पहुंचकर जब वहां का माहौल और पिताजी का मृत शरीर देखा तो मेरे आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। बहुत मुश्किल से मुझे लोगों ने संभाला। 

हालांकि मेरा लगाव हमेशा मां से ज्यादा रहा। मां जहां प्रेरणास्त्रोत है। वहीं पिता की तरफ से हमेशा मुझे आजादी मिली। मन मुताबिक सब काम करने की। उनकी तरफ से कभी कोई रोक-टोक नहीं होती थी। एक बार वे मेरे लिए कुछ हजार रुपए लेकर भोपाल आए थे। ट्रेन में चोरी के डर से सारी रात जागते रहे। 

बड़ी बहन और हम तीन भाइयों की सभी जरूरतों वे बराबर ख्याल रखते थे। कभी किसी बात के लिए उन्होंने हमें मना नहीं किया। वे आज होते तो शायद घर-परिवार का माहौल अलग होता। उनके बगैर अब मां परिवार को संभाल रही है। अपनी जीविका के लिए हम दो छोटे भाई घर से दूर है। कभी बहुत याद आता है वो अपना घर- परिवार और सबको जोड़कर रखने वाले भाऊ। कहां चले गए वो दिन और वो लम्हें। 

पिताजी को सादर नमन और भावभीनी श्रद्धांजलि।
------------
आज पिताजी की पुण्यतिथि है।
उन्हें मैं हृदय से नमन करता हूं। 

आज मेरे पिताजी (भाऊ) श्री सम्पतराव डोंगरे जी को इस संसार को छोड़े हुए 16 बरस हो गए। उनकी याद हमेशा आती है। उस पल का याद नहीं करना चाहता, जब आप हमें छोड़कर हमेशा के लिए जा रहे थे। क्योंकि उस वक्त मैं सिर्फ रो रहा था। अपने आप को संभाल नहीं पा रहा था। 

आप रहते थे तो देखते कि आपके बच्चे क्या कर रहे हैं। काश आप होते तो हमें आपकी सेवा का अवसर मिलता।

अगर आप आज हमारे बीच होते तो हम
आपका 72वां जन्मदिन मना रहे होते।

आपने कभी कोई निर्णय या बंधन हम पर नहीं थोपा।
आप हमेशा मुझे खुद से फैसले लेने के प्रेरित करते थे।

कोशिश करता हूं कि आपकी तरह बनूँ।
मुझसे कभी किसी को बुरा नहीं हो।
हमेशा दूसरों की सहायता करूं।

विनम्र श्रद्धांजलि

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Monday, March 7, 2022

Family Tree : *डोंगरे की परिवार की वंशावली... 10 पीढ़ियों का इतिहास, नारी शक्ति ही हर पीढ़ी की धुरी रही...*

📝 *वरिष्ठ पत्रकार रामकृष्ण डोंगरे की कलम से*

राजा भोज के वंशज और क्षत्रिय पवार (पंवार/परमार/भोयर) समाज से ताल्लुक रखने वाले हमारे परिवार की 10 पीढ़ियां का लेखा जोखा यहां दिया जा रहा है... *कामन महाजन डोंगरे और रे बाई डोंगरे* से लेकर अब तक के सभी परिवारजनों का रिकॉर्ड मौजूद है। कहने को हमारा समाज पितृसत्तात्मक है लेकिन परिवार को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी महिलाएं ही संभालती है। ये बात अलग है कि उन्हें इसका क्रेडिट नाम नहीं मिलता।
(कांसेप्ट एंड रिसर्च : रामकृष्ण डोंगरे मोबाइल : 8103689065) 

हमारा खानदान कई पीढ़ियों से *मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के मोहखेड़ ब्लॉक में ग्राम तंसरामाल में रहता आ रहा है।* मूलतः खेती-बाड़ी ही हमारा पुस्तैनी काम रहा है। लेकिन अगर सदियों पहले की बात की जाए तो *डोंगरे खानदान की शुरुआत होती है सन 1010-1055 के कालखंड में। यानी राजा भोज के समय से। वहां पर प्रताप सिंह डोंगरे नाम के व्यक्ति थे। उन्हीं से डोंगरदिया यानी डोंगरे वंश चालू हुआ।* डोंगरे समेत तमाम गोत्र के लोग पहले सैनिक हुआ करते थे। माना जा सकता है खेती किसानी से भी जुड़े रहे होंगे। लेकिन मालवा से विस्थापित होकर मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा, बैतूल, सिवनी, बालाघाट और महाराष्ट्र के वर्धा, गोदिंया, यवतमाल समेत देशभर में जाकर बसने के बाद सभी मूल रूप से कृषि कार्य से ही जुड़ गए। 

गौरतलब है कि मालवा इलाके में धारा नगरी हुआ करती थी, जिसका वर्तमान नाम धार जिला मध्यप्रदेश है। यहां पर परमार पंवार राजाओं का राज्य था, जिसके नौवें राजा राजा भोज (सन् 1010-1055 ई.) हुए। तब से लेकर अब तक का लिखित इतिहास हमारे पास मौजूद है। 

*प्रताप सिंग डोंगरे के 2 बेटे थे, कारू सिंग और महाप्रयाग सिंग। उन्होंने मुसलमानों से खूब युद्ध किया था। कारू सिंग का बेटा नांद देव, बेटी रुपला बाई और पत्नी झमीया थी। नांददेव का बेटा सुमन सिंग था। सुमन सिंग धार के राजा राय महल देव के पास वजीर थे। जब मुसलमानों ने धार पर आक्रमण किया तो उनसे युद्ध में सुमन सिंग मारे गए। उन्होंने पवारों से कहा था कि यहां से सब छोड़कर चले जाओ। तब पवार इधर उधर जाकर बस गए।* (सुमनसिंग-जोधी) के बेटे नारूदेव, वीरदेव, गोरदेव थे। फिर नारूदेव और लखाई को गौलु सिंग, नौलु सिंग बेटे हुए। तथा गौलु सिंग को देवल्या देव पुत्र हुआ। देवल्या देव और हाराई को खोकल्या भाई, चिमना भाई, खंगू भाई, घुड़या पुत्र थे। इनका वंश देवगढ़ छिंदवाड़ा में रहे। मोतीराव भाट भी इनके साथ इधर ही आ गए थे। इनका वंश भी इधर ही है। नौलु सिंग का बेटा हिरन्या था। इनका वंश बैतूल और वर्धा में है। 

*मेरी माताजी गौरा बाई डोंगरे ने बताया कि तंसरा के सारे डोंगरे एक ही है। ईकलबिहरी में दो डोंगरे भाई थे। उनमें झगड़ा हुआ तो एक भाई भागकर तंसरा आ गया। शायद उसके ही खानदान के सारे लोग हो।*
मुझे यह बताने में गर्व महसूस होता है कि हमारा परिवार शायद कई पीढ़ियों से मातृसत्तामक ही रहा है। जहां तक मुझे जानकारी है *मेरे पिताजी स्व. श्री संपतराव डोंगरे की दादी मां यानी श्रद्धेय पूनी बाई ने अपनी पाई-पाई जमा की गई रकम से हमारी पुस्तैनी जमीन खरीदी। जहां आज हमारे परिवार रहते हैं। उसी जमीन को हमारी दादी मां ने अपने सीधे और सज्जन पति स्व. किसन डोंगरे के साथ मिलकर सजाया-संवारा। यानी मरते दम तक खेतों में बैलगाड़ी चलाने से लेकर हर तरह के काम किए।*

मेरी सबसे बड़ी प्रेरणास्त्रोत दादी (डोकरी माय) ही थीं। उनकी परंपरा को मेरी मां श्रीमती गौरा बाई और भाभी जी कैकई (चमेली) बाई आगे बढ़ा रही है।
जब भी कोई दुख की घड़ी आती है तो मेरे मुंह से "ओ मां" ही शब्द निकलते हैं। मां मेरी कमजोरी और ताकत भी है। घर से दूर रहने के कारण बरबस ही मां की याद आ जाती है, आंखों में आंसू झरने लगते हैं। लेकिन तभी मां के वे शब्द कान में गूंजने लगते हैं। बेटा- तुम दोनों भाइयों को बाहर निकलकर कुछ करना है। अपना और हमारा नाम बढ़ाना है।

शायद यही वजह है हम आज भी मुश्किलों से घबराते नहीं, जूझते है और अपने आप को संभाल लेते हैं।

मां से मिली मुझे प्रेरणा, ताकत और भरोसा 

ओ मां.... तुझे सौ सौ सलाम... 
महिला दिवस पर नारी शक्ति को सलाम। 

*( वरिष्ठ पत्रकार और ब्लॉगर रामकृष्ण डोंगरे के द्वारा मदर्स डे पर 8 मई 2016 की लिखी मूल पोस्ट। इस पोस्ट में 8 मार्च 2022 को संशोधन किया गया है।)*

_नोट : अपने परिवार की ऐसी वंशावली (फैमिली ट्री) आप भी बना सकते है। एक तस्वीर की तरह आपके घर की दीवार में लगाने से आपके परिजनों को कई पीढ़ियों की जानकारी मिल सकेगी।_

©® *वरिष्ठ पत्रकार व ब्लॉगर रामकृष्ण डोंगरे*
Website : http://dongretrishna.blogspot.com/
FB PAGE : https://www.facebook.com/dongreonline/
लेआउट-डिजाइन : तरुण साहू

Thursday, December 30, 2021

मेरी कविता : हिंदू राष्ट्र

हर कोई
हिंदू राष्ट्र बनाने में जुटा है... 
पूरी दुनिया को
हिंदू राष्ट्र बना दो। 
(फोटो प्रतीकात्मक) 

मिटा दो
पूरी दुनिया को।
फिर अपने हाथ से बना दो।

बना सकते हो?

ये देश
ये दुनिया
आज जिस रूप में है
उसे बनने में
सदियां लगी है।

... और सदियों में
कोई बनाता है।

तुम चाहकर भी
पलभर में कुछ नहीं बना सकते. 
इसलिए इस मुगालते में मत रहो।
हिंदू राष्ट्र, हिंदू राष्ट्र, हिंदू राष्ट्र... 

भूल जाओ...

©® रामकृष्ण डोंगरे तृष्णा
रचना काल : 30 दिसंबर 2021, रायपुर

#डोंगरे_की_डायरी #रचना_डायरी #अधूरी_कविता

Monday, December 6, 2021

अच्छे आदमी

अच्छे आदमी
और बुरे आदमी के बीच
जरा-सा अंतर होता है।
मामूली फर्क होता है।

मां-बाप की जरा-सी 
लापरवाही, उनके बच्चों को
अच्छे आदमी से 
बुरे आदमी में बदल देती है।

इसलिए बच्चों को 
अपना दोस्त बनाएं, 
खुलकर बात करें।
उनके मन में उठने वाले
सभी सवालों का 
उन्हें जवाब दीजिए।

बच्चों को गलत दिशा में
जाने से रोकिए।
वर्ना किसी इंजीनियर के लादेन 
या किसी युवा के गोडसे 
बनने में देर नहीं लगती। 

©® रामकृष्ण डोंगरे तृष्णा 
रचना समय और स्थान - 1 सितंबर, 2021, रायपुर 

Tuesday, August 31, 2021

मेरी कविता : बच्चों को अपना दोस्त बनाएं

|| बच्चों को अपना दोस्त बनाएं ||
~~~~~~~~~~~~

अच्छे आदमी
और बुरे आदमी के बीच
जरा-सा अंतर, 
मामूली फर्क होता है।

माता-पिता की जरा-सी 
लापरवाही, उनके बच्चों को
अच्छे आदमी से 
बुरे आदमी में बदल देती है।

इसलिए बच्चों को 
अपना दोस्त बनाएं, 
खुलकर बात करें।
उनके मन में उठने वाले
सभी सवालों का 
उन्हें जवाब दीजिए।

बच्चों को गलत दिशा में
जाने से रोकिए।
वर्ना किसी इंजीनियर के लादेन 
या किसी युवा के गोडसे 
बनने में देर नहीं लगती। 

©® रामकृष्ण डोंगरे तृष्णा 
रचना समय और स्थान - 1 सितंबर, 2021, रायपुर

#रचना_डायरी #डोंगरे_की_डायरी #

Tuesday, July 13, 2021

फेसबुक पोस्ट : दूसरों की मदद कीजिए

जब आप दूसरों के लिए कुछ करते हैं,
उसी पल खुशी की शुरुआत हो जाती हैं।

किसी की मदद करने के लिए धन ही जरूरी नहीं होता।
सिर्फ मन, वचन और कर्म से भी आप दूसरों की मदद कर सकते हो।

मैंने अपने जीवन में किसी की भी बहुत बड़ी आर्थिक सहायता की हो। ऐसा मुझे याद नहीं आता। लेकिन किसी भी जरूरतमंद को नौकरी दिलाने में भरपुर मदद करता हूं। मैं पत्रकारिता के पेशे में हूँ और देशभर में जहां भी संभव होता है। वहां लोगों की मदद करने की पूरी कोशिश करता हूं।

कुछ नहीं तो अब तक आधा दर्जन से ज्यादा लोगों को नौकरी दिला चुका हूं। और दर्जनों लोगों के लिए अपने स्तर पर लगातार प्रयास करते रहता हूं।

मेरा मानना है कि हम सिर्फ एक माध्यम है, जिन्हें ईश्वर ने चुना है किसी की मदद करने के लिए। बाकी योग्य व्यक्ति अपनी जगह और अपना भविष्य खुद बनाता है। उसे किसी के सहारे की जरूरत नहीं होती। सहारा तो कमजोर लोगों को दिया जाता है।

पत्रकारिता हो या कोई भी फील्ड हो। मुझे लगता है कि जो भी लोग अगर उस मुकाम पर हो कि आप किसी की मदद कर सकते हो। तो जरूर करना चाहिए। आपको करना भी क्या है। मार्गदर्शन। ईमेल आईडी। राइट पर्सन का नाम बताना। या वहां तक सीधे जरूरतमंद को पहुंचाना है। बस। इतना ही तो करना होता है।

क्या आप इतना भी नहीं कर सकते।

याद रखें, अगर आप दूसरों की मदद करते है
तो ईश्वर भी कभी आपकी मदद जरूर करेगा।

©® रामकृष्ण डोंगरे 
#डोंगरे_की_डायरी #छिंदवाड़ा_डायरी #मदद

Wednesday, June 30, 2021

मेरी मोबाइल गाथा -2: मुझे छह साल लग गए थे 3जी मोबाइल फोन लेने में

मैंने पहला 3G मोबाइल 8 अगस्त 2014 को खरीदा था सैमसंग गैलेक्सी कोर-2

Samsung C170

साल 2007 में माखनलाल यूनिवर्सिटी से MJ पास करने के बाद हम जॉब करने के लिए अमर उजाला नोएडा पहुंचे। तब फिर नए मोबाइल की कशमकश शुरू हुई। उस समय मोबाइल नंबर पोर्ट करने की फैसिलिटी नहीं थी। इसलिए मैंने अपना सिम छिंदवाड़ा में दीदी के दे दिया था। 

नया मोबाइल को परचेस करने के लिए फिर से रिसर्च चालू हुई। कुछ दोस्तों ने कहा कि 3G मोबाइल ही लेना चाहिए, क्योंकि 2008 में 3G लॉन्च होने वाला था. बजट नहीं होने की वजह से आखिर मैंने 3 जून 2007 को सैमसंग C170 हैंडसेट ₹3000 में खरीदा। जो ब्लैक कलर का और काफी स्लिम था.

दुनिया में 3जी मोबाइल सर्विस सबसे पहले जापान में 2001 में शुरू हुई थी। भारत महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड (MTNL) के द्वारा साल 2008 में 3G मोबाइल सेवा शुरू की थी। 

उस समय हम मोबाइल का इस्तेमाल सिर्फ कॉल, मैसेज और एफएम सुनने के लिए करते थे. मोबाइल से कुछ और काम संभव ही नहीं था. 28 दिसंबर 2007 को मैंने अपना पहला ब्लॉग पोस्ट किया। "डोंगरे की डायरी" नाम से बनाया था. इसी के साथ हम इंटरनेट की दुनिया से जुड़ गए. हालांकि इससे पहले माखनलाल यूनिवर्सिटी की पढ़ाई के दौरान ही ऑरकुट orkut पर अपना प्रोफाइल बन चुका था. इसके अलावा याहू पर ईमेल आईडी भी बना था. यह सब 2005 में एमसीयू में एडमिशन के बाद ही हुआ था. 

ऑरकुट प्रोफाइल के जरिए बाहरी दुनिया के कई लोगों से संपर्क होने लगा था. इसी ऑरकुट की बदौलत एक मित्र काशिफ अहमद फराज से दोस्ती हुई, जो झांसी के रहने वाले थे और भी कई लोग होंगे. आर्कुट से याद आया कि फेसबुक से पहले आर्कुट का बहुत क्रेज था। और हम लोग ₹10 प्रति घंटे नेट कैफे का चार्ज देकर खूब सर्फिंग करते थे। लड़कियों से दोस्ती करने के लिए उन्हें रिक्वेस्ट भेजते थे। कई लोगों से चैट भी होती थी। लेकिन उससे ज्यादा कुछ नहीं। हां डोंगरे की डायरी, छिंदवाड़ा छवि ब्लॉग बनने के बाद हर वीकली ऑफ पर कई घंटे कैफे जाते थे। कई बार 2-3 घंटे नेट कैफे में बिता देता था. एक पोस्ट को लिखना और उसे सजाना संवारना, इसी में वक्त बीत जाता था. 

आज का मशहूर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक हालांकि 26 सितंबर 2006 से इंडिया में आ चुका था. लेकिन लोगों के बीच पॉपुलर होने में इसे 1-2 साल लगे. मेरा पहला फेसबुक प्रोफाइल तो साल 2010 में जाकर बना था, जो कि मेरे मित्र श्री अमिताभ अरुण दुबे जी के सौजन्य से तैयार हुआ था। 

2009 में मैंने टाटा डोकोमो का एक मोबाइल लिया था। कीमत थी 1350 रुपये। जिससे सस्ती दरों पर बातचीत होती थी। हालांकि इस मोबाइल से जुड़ी कुछ खास यादें नहीं है। 

Samsung Metro Duos C3322

9 सितंबर 2012 को मैंने सैमसंग DUOS-C3322 मोबाइल में खरीदा था। जो कि डबल सिम वाला और 2 मेगापिक्सल कैमरा वाला मोबाइल था। माखनलाल में पढ़ाई के दौरान ही मैंने देखा कि मेरे कुछ जूनियर के पास Nokia 6600 मोबाइल था। और इससे अच्छी पिक्चर भी आती थी। इसकी फोटो हमने वीकली मैगजीन विकल्प में भी पब्लिश की थी। 

… तो सैमसंग C3322 मोबाइल आने के बाद मैंने छुट्टी में छिंदवाड़ा आने पर कई सारे फोटोग्राफ खीचें और उन्हें मोबाइल से ही फेसबुक पर भी अपलोड किए। 2जी सर्विस का इस्तेमाल करते हुए, इसी मोबाइल से मैं फेसबुक भी ऑपरेट करता था. सितंबर 2013 में रायपुर आने के बाद तक यह मोबाइल मेरे साथ था। 2014 तक यह मोबाइल मेरे पास था। 

अब आते हैं 3G और 4G स्मार्टफोन पर…. 

samsung galaxy core 2
8 अगस्त 2014 को मैंने पहला 3G मोबाइल खरीदा सैमसंग गैलेक्सी कोर 2। इसे मैंने 11500 रुपये में रायपुर में मोबाइल शॉप से खरीदा था। इसी मोबाइल के बाद मैंने व्हाट्सएप यूज करना शुरू किया। वाट्सएप ग्रुप बनाए फैमिली, फ्रेंड और आफिस के लिए। 

फिर 2 साल बाद मैंने ऑनलाइन वेबसाइट से पहला 4जी मोबाइल शाओमी रेडमी नोट 3, 3/32gb खरीदा। 26 सितंबर 2016 को खरीदें इस मोबाइल की कीमत थी 12,999 रुपये। इस मोबाइल को अभी भी यूज कर रहा हूं। रेडमी के मोबाइल से मुझे कभी कोई खास परेशानी नहीं हुई। हां 4G सेवा आने के बाद मोबाइल की बैटरी जरूर जल्दी खत्म हो जाती है।

इस मोबाइल से मैं सब कुछ ऑपरेट कर लेता हूं। किसी तरह की कोई परेशानी नहीं है। बात सिर्फ स्टोरेज की आती है। एक सफर- एक छुट्टी में कुछ फोटोग्राफ और वीडियो बना लिए तो मोबाइल का स्टोरेज फुल हो जाता है। तुरंत ही मोबाइल को खाली करना पड़ता है। एक वजह तो यह थी. लेकिन बड़ी वजह तो बच्चे की ऑनलाइन क्लास है, जिसके लिए मुझे नया मोबाइल लेना ही पड़ेगा। 

अब जब चर्चा 5जी की चल रही है। और 5जी पूरी तरह से इंडिया में आने में 1 से 2 साल का वक्त लग सकता है। लेकिन मोबाइल हैंडसेट तो अभी आ चुके हैं। तो क्या मुझे 5जी मोबाइल ही लेना चाहिए। या फिर 4जी मोबाइल से ही काम चलाना चाहिए। मोबाइल चॉइस करने में ब्रांड के अलावा मोबाइल का प्रोसेसर बहुत मायने रखता है, जिससे आपका मोबाइल स्मूथली चलता है। बाकी बैटरी बैकअप, कैमरा और स्टोरेज तो है ही। लेकिन जब इन सबको एक साथ रखकर हम कोई मोबाइल पसंद करते हैं तो "बड़ा बजट" हमारी जेब को अलाउड नहीं करता।

ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर कौन-सा मोबाइल खरीदें...? 

आप पढ़ रहे थे डोंगरे की डायरी…

अगली किस्त में फिर किसी विषय पर होगी चर्चा… 

#डोंगरे_की_डायरी #छिंदवाड़ा_डायरी #डोंगरी_की_डिजिटल_डायरी #मोबाइलगाथा 

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Monday, June 28, 2021

मेरी मोबाइल गाथा-1 : पहला मोबाइल 2004 में लिया था पेनासोनिक का एंटीना वाला, सेकंड हैंड एक हजार में

panasonic antenna phone

एक मिडिल क्लास फैमिली में जन्म लेने वाले लोगों का जीवन बड़ी मुश्किल से गुजरता है। ज्यादातर लोग अपनी हर जरूरत के लिए कड़ी मेहनत करते हैं। तब उन्हें वो चीजें मिलती है। मेरी जिंदगी में भी अब तक बहुत ज्यादा स्ट्रगल रहा है। सेकंड हैंड चीजों से हम मिडिल क्लास वालों को समझौता करना होता है। पापा ने घर के लिए सबसे पहले टू व्हीलर मोपेड लूना खरीदी थी। वह भी सेकंड हैंड थी। ₹4000 की। उसके बाद हमारे लिए साइकिल खरीदी। वो भी सेकंड हैंड थी। जब मैं कॉलेज पहुंचा तो मैंने छिंदवाड़ा में अपने लिए हरक्यूलिस की 800 रुपये की साइकिल खरीदी। वह भी सेकंड हैंड थी। जब मैं भोपाल पहुंचा तो मोबाइल की जरूरत महसूस हुई। तब 1000 रुपये में सेकंड हैंड मोबाइल खरीदा पैनासोनिक का। 

अभी हमारे पास दो स्मार्टफोन हैं। एक रेडमी नोट-3 3/32जीबी वाला, जो कि मैं इस्तेमाल करता हूं। और दूसरा श्रीमतीजी के पास सैमसंग गैलेक्सी कोर- 2 (512एमबी के स्पेस वाला)। इन मोबाइल के बारे में आपको बाद में बताऊंगा। पहले मूल विषय पर आते हैं। बच्चे की आनलाइन क्लास की वजह से हमें नया मोबाइल खरीदना पड़ रहा है। चूंकि सैमसंग गैलेक्सी मोबाइल में आनलाइन क्लास के लिए Google meet एप सपोर्ट नहीं कर रहा है। इस साल हमने 4 साल के बेटे का एडमिशन पीपीवन में करवाया है। इसलिए उसकी आनलाइन क्लास के चक्कर में जल्दी ही नया फोन लेना हमारी मजबूरी है। 

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ऑनलाइन क्लास के चक्कर में हर पैरेंट्स स्मार्टफोन अपने बच्चों के लिए खरीद रहे है। लेकिन जहां प्राइमरी तक के बच्चों को स्मार्टफोन से कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं होने लगी है। वही कम उम्र से ही स्मार्टफोन रूपी खिलौना मिलने के बाद बच्चों का ध्यान पढ़ाई पर कम रहता है, इसमें कोई शक नहीं है। इसलिए मैं 10वीं तक के बच्चों को स्मार्टफोन देने के पक्ष में नहीं रहता। बच्चों को पहले से ही टीवी देखने की लत लगी हुई है। अब फोन की लत लगेगी। फिर मोबाइल गेम्स की।

… मैं थोड़ा पीछे फ्लैशबैक में जाता हूं। जब मैं 1992 में सातवीं कक्षा में था. तब हमारे घर में पिताजी ने टीवी खरीदा था. उसके पीछे भी एक किस्सा है. दरअसल उस वक्त पूरे मोहल्ले में एक या दो ही टेलीविजन सेट थे. जहां हम रात को सीरियल या पिक्चर देखने के लिए जाया करते थे. एक दिन रात को 9-10 बजे लौटते वक्त किसी ने हमें डरा दिया. उसका शॉक मेरे बड़े भाई को बैठ गया। रातभर हम सभी लोग परेशान रहे। 

… और इस घटना के बाद मेरे पिताजी ने टीवी खरीदने का फैसला किया. टीवी आने के बाद हम लोग घंटों तक हर सीरियल, हर मूवी देखते रहते थे. कभी टीवी से दूर नहीं होते थे. इसका असर हमारे रिजल्ट पर साफ नजर आया. छठवीं क्लास की तुलना में सातवीं में मेरे पर्सेंटेज कम आए थे। इसीलिए बच्चों को मोबाइल से दूर ही रखना चाहिए. …

लेकिन अब ऐसा दौर आया है कि छोटा सा बच्चा भी मोबाइल यूज करने लगा है. आजकल के बच्चे तो आंख खोलते ही सामने मोबाइल देखते है। 

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1998 में जब कॉलेज पहुंचा तब मुझे मोबाइल के बारे में कुछ पता नहीं था. शायद एमए (2003-04) के दौरान एक या दो छात्रों के पास मोबाइल रहा होगा। जब 2004 में भोपाल पहुंचा तब मेरे रूममेट के कहने पर ही मैंने 9 अगस्त को एक हजार रुपए में पैनासोनिक का एंटीना वाला सेकंड हैंड मोबाइल लिया था। उससे भी ठीक ठाक बात नहीं होती थी। उस मोबाइल के कंकाल गांव के घर में कहीं बिखरे पड़े होंगे। जब मेरी सैलरी अठारह सौ रुपये महीना थी। उस वक्त 1000 रुपए का मोबाइल खरीदना, मेरे लिए बहुत बड़ी बात है। घर से संपर्क में रहने के लिए जरूरी था इसलिए मुझे मोबाइल खरीदना पड़ा। 

उस मोबाइल को करीब डेढ़ साल तक यूज किया होगा। 14 जुलाई 2004 को भोपाल में लगी मेरी पहली नौकरी स्वदेश अखबार से लेकर दुष्यंत संग्रहालय में जॉब और फिर सांध्य दैनिक अग्निबाण तक वो मोबाइल मेरे पास था। अग्निबाण मैंने 2005 में ज्वाइन किया था। इसी साल मैंने माखनलाल राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल में एडमिशन लिया। तब तक पैनासोनिक का मोबाइल मेरे पास था। जब मैं गांव जाता था, तब घर की छत पर चढ़कर सिग्नल पकड़ता था। क्योंकि तब तक गांव में टॉवर नहीं लगा था। 

nokia 1600
माखनलाल यूनिवर्सिटी में सुबह से क्लास और अखबार में सुबह की नौकरी… ये सब मैनेज नहीं हो पाया। और मेरी नौकरी छूट गई। उसके बाद साल जनवरी 2006 में मैंने राज्य की नई दुनिया में पार्ट टाइम जॉब शुरू किया। उस वक्त तक मेरा मोबाइल बिगड़ चुका था। 

आफिस में मोबाइल खरीदने के लिए दबाव बनाया जा रहा था। 4500 की सैलरी में कॉलेज का खर्च और घर खर्च किसी तरह संभाल रहा था। फिर मैंने अपने एक रिश्तेदार से पैसे उधार लिए। लेकिन पिताजी ने छिंदवाड़ा से भोपाल तक ट्रेन का सफर करके मुझ तक रकम पहुंचा दी। और तब जाकर मैंने 19 मार्च 2006 को 3350 रुपये में नोकिया-1600 मोबाइल खरीदा। 

इतना लेट कंप्यूटर और मोबाइल यूज करने के बावजूद मेरी रुचि होने की वजह से मैं कंप्यूटर और मोबाइल फ्रेंडली बन गया। एमए फाइनल के दौरान जब हमें कॉलेज में "ओ लेवल" का कंप्यूटर कोर्स कराया जा रहा था तब पहली बार मैंने नजदीक से कंप्यूटर को देखा था. 

लेकिन माखनलाल में एडमिशन लेने के बाद ही कंप्यूटर को ठीक से देखा और यूज किया। हालांकि इससे पहले छिंदवाड़ा में लोकमत समाचार के दफ्तर में, फिर भोपाल में स्वदेश, अग्निबाण और राज्य की नई दुनिया के दफ्तर में दूर से ही कंप्यूटर को निहारते थे।

किताबी कीड़े के बाद हम कंप्यूटर के कीड़े बन गए। आजकल मोबाइल हमारे हाथ से चिपक गया है। 

देखा जाए तो कच्ची उम्र में मोबाइल और कंप्यूटर मिलना नुकसानदायक ही होता है। मोबाइल ऐसा खिलौना है, जिससे खेलना सबको अच्छा लगता है। लेकिन जरा सी चूक होने पर ये खिलौना आपकी लाइफ को बर्बाद कर सकता है। आपका बैंक अकाउंट खाली कर सकता है। आपके बच्चों की खुशहाल जिंदगी को वीरान बना सकता है। इसलिए आपके घर में किसी को भी स्मार्टफ़ोन देने से पहले उसे साइबर शिक्षा यानी तकनीकी ज्ञान देना जरूरी है। 

आप पढ़ रहे थे डोंगरे की डायरी... 

*अगली किस्त में पढ़िए… 3जी से 4जी मोबाइल का सफर*

©® ब्लॉगर और पत्रकार रामकृष्ण डोंगरे

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Tuesday, January 26, 2021

डायरी : हम आपस में मिलना-जुलना क्यों नहीं चाहते?

*हम लोग एक- दूसरे से बात क्यों नहीं करते?*

*हम आपस में मिलना-जुलना क्यों नहीं चाहते?* 

~~~*पत्रकार व ब्लॉगर रामकृष्ण डोंगरे* ~~~ 
---मेरी डायरी के पन्नों से---

जीवन में अगर हम लोगों से मिलेंगे नहीं, बात नहीं करेंगे तो हमारे इंसान होने का क्या मतलब. हम इंसान होने की वजह से एक दूसरे के साथ अपनी फीलिंग को शेयर कर सकते हैं। लेकिन आज के दौर में हम शेयर नहीं कर रहे हैं। 

एक वह दौर था, जब हम चिट्ठी लिखा करते थे. चिट्ठी के जरिए अपने विचारों को दूसरों तक पहुंचाया करते थे. फिर उनके उत्तर का इंतजार करते थे. ऐसे में अगर हमारी दोस्ती हो जाती थी तो हम उनसे मिलने के लिए कई किलोमीटर का फासला तय करते थे. मैं अपनी बात करूं तो मैंने अपने मोहल्ले, गांव या स्कूल के बाहर लोगों से दोस्ती के लिए पहला माध्यम आकाशवाणी यानी रेडियो को चुना. जब हम फरमाइशी प्रोग्राम में चिट्ठी लिखा करते थे तो वहां से हम नए मित्र तलाशते थे. जिनके नाम याद रह जाते थे। उन्हें बार बार याद करते थे। इसके अलावा कार्यक्रमों की प्रतिक्रिया के पत्र पहुंचते थे, और जब लोगों के विचार हमें अच्छे लगते थे, तो हम उनकी तरफ चिट्ठी लिखकर दोस्ती का हाथ बढ़ाते थे. कई चिट्ठियों तक सिलसिला चलने के बाद मिलने का समय आता था.

एक वाकया मुझे याद आता है। ऐसे ही एक रेडियो मित्र, पेन फ्रेंड से मिलने के लिए हमने जिला मुख्यालय छिंदवाड़ा से तामिया के पातालकोट का 60 किमी का सफर यूं ही तय कर लिया था। बिना किसी खास वजह के। पातालकोट पहुंचने के बाद हमें पता चला कि उस मित्र का घर जंगल वाले पैदल रास्ते में कई किलोमीटर दूर है। तो बड़ी मुश्किल से हमने उसका घर खोजा। मिलते ही हमारी सारी थकान दूर हो गई। मित्र ने तुरंत हमें गरमा गरम पकौड़े खिलाएं. 

… तो एक दौर वह था। और आज जब एक मोबाइल हमारे हाथ में है और हमें "कर लो दुनिया मुट्ठी में" कहकर यह मोबाइल थमाया गया है, वाकई पूरी दुनिया हमारी मुट्ठी में है. हम मात्र एक क्लिक से हमारे देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री से लेकर किसी भी अपने परिचित या किसी भी क्षेत्र में सक्रिय या हमारे आदर्श व्यक्ति से हम मैसेज पर बातचीत कर सकते हैं। कॉल भी कर सकते हैं। लेकिन आज के दौर में देखा जा रहा है कि हम किसी से भी दिल से बातें नहीं करना चाहते। मिलना नहीं चाहते। अगर किसी को यूं ही फोन लगा लो तो उधर से तुरंत पूछा जाता है कि कोई काम था क्या। 

ऐसे में मिलने की और रिश्ता बनाने की बात क्या करें। 
ज्यादा दूर की बात ना कि जाए तो शहरी जिंदगी में अपार्टमेंट कल्चर में हम अपने पड़ोसियों से भी करीबी रिश्ता नहीं रख पाते। इसमें कहां कमी है। इस पर हमें विचार करना चाहिए। इसके अलावा अपने दोस्तों से और रिश्तेदारों से भी हमें गाहे-बगाहे बातचीत करते रहना चाहिए। साथ ही किसी ना किसी बहाने मिलना भी चाहिए। 


~~~*आपका दोस्त रामकृष्ण डोंगरे* ~~~
---मेरी डायरी के पन्नों से/26 जनवरी, 2021---

Tuesday, December 13, 2016

डोंगरे की डिजिटल डायरी : एक अकाउंट में मत रखिए सारा पैसा

FB 3 #डिजिटल_डायरी DD 3

#डोंगरे_की_डिजिटल_डायरी

एक अकाउंट में मत रखिए सारा बैंक...

कम से कम दो या ज्यादा से ज्यादा 5 अकाउंट में बांट दीजिए

अगर आप नेटबैंकिग का इस्तेमाल करते हैं और सारा पैसा आपने एक ही अकाउट में रखा है, तो ये खतरनाक हो सकता है। दरअसल, पेमेंट गेटवे सिस्टम में खामी की वजह से बिना OTP के भी आपका पैसा निकल सकता है। एक साल में करीब एक करोड़ रुपए का इसी तरह से फ्राड हुआ। इसलिए इसके लिए सबसे सुरक्षित तरीका है कि अपने पैसे को किसी एक अकाउंट में मत रखिए। उसको कई पार्ट में करके अलग-अलग खातों में रखें। हालांकि, बैंकों से पेमेंट गेटवे सिस्टम में कमी को दूर करने के लिए कहा गया है।