कथाकार अलका सरावगी से विशेष बातचीत
पहले शॉट में-
इवनिंग
न्यूजपेपर अग्निबाण में रिपोर्टिंग के दौरान मुझे वरिष्ठ कथाकार अलका
सरावगी जी का इंटरव्यू लेने का मौका मिला। भोपाल स्थित भारत भवन में अलका
जी ने मुझसे अलग से बातचीत की थी। इस खबर का दिलचस्प पहलू यह है कि
इंटरव्यू के दौरान उन्होंने मुझसे कहा था- 'आपने ज्यादा कुछ पढ़ा नहीं है।'
इसकी वजह यह थी कि मैं बहुत ज्यादा सवाल नहीं कर पाया था। सच कहा था अलका
जी ने। हां, मैंने उनके कलिकथा ः वाया बाईपास, शेष कादम्बरी उपन्यास नहीं
पढ़े थे। मैंने दूसरी महिला कथाकारों जैसे कृष्णा सोबती का 'मित्रो
मरजानी', सूरजमुखी अंधेरे में, मृदुला गर्ग का कठगुलाब आदि जरूर पढ़े थे।
अब विस्तार से-
आर्ट एंड कल्चर की रिपोर्टिंग के दौरान मैंने झीलों की नगरी भोपाल के लगभग सारे 'भवनों' के चक्कर लगाए थे। इनमें भारत भवन, हिंदी भवन, रविंद्र भवन और मानस भवन आदि प्रमुख है। मैं अपनी हरक्यूलस साइकिल से ही रिपोर्टिंग किया करता था। यानी करीब दो साल तक मैंने साइकिल से ही रिपोर्टिंग की थी। इन सालों में मुझे अपने वरिष्ठ पत्रकार साथियों से काफी कुछ सीखने को मिला। इनमें विनय उपाध्याय (राज्य की नई दुनिया), वसंत सकरगाए (राज्य एक्सप्रेस), राकेश सेठी, सौरभ कुमार (जागरण), शकील जी (दैनिक भास्कर), बद्र वास्ती, अरुण कुमार (नवभारत) आदि शामिल है।
पहले शॉट में-
सांध्य दैनिक अग्निबाण, भोपाल, 9 जुलाई, 2005 |
अब विस्तार से-
आर्ट एंड कल्चर की रिपोर्टिंग के दौरान मैंने झीलों की नगरी भोपाल के लगभग सारे 'भवनों' के चक्कर लगाए थे। इनमें भारत भवन, हिंदी भवन, रविंद्र भवन और मानस भवन आदि प्रमुख है। मैं अपनी हरक्यूलस साइकिल से ही रिपोर्टिंग किया करता था। यानी करीब दो साल तक मैंने साइकिल से ही रिपोर्टिंग की थी। इन सालों में मुझे अपने वरिष्ठ पत्रकार साथियों से काफी कुछ सीखने को मिला। इनमें विनय उपाध्याय (राज्य की नई दुनिया), वसंत सकरगाए (राज्य एक्सप्रेस), राकेश सेठी, सौरभ कुमार (जागरण), शकील जी (दैनिक भास्कर), बद्र वास्ती, अरुण कुमार (नवभारत) आदि शामिल है।
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