Sunday, November 27, 2016

युवा कवयित्री विभूति की नोटबंदी पर कविताएं- 2

कालेधन को सफेद बनाने के जुगाड़ पर लिखी ये कविता...

जुगाड़ ही लगाना है तो सही जगह लगाओ

जुगाड़ ही लगाना है तो सही जगह लगाओ
आम आदमी की तकलीफ देखी नहीं जा रही
तो उठो मदद के लिए हाथ आगे बढाओ
युवा कवयित्री विभूति दुग्गड़ मुथा

ये डर है जो दिख रहा है
गुस्सा दिखा के अंदर कोने में छुप रहा है
आप जानते है जो लाइन अभी शुरू हुई है वो ख़तम नहीं होगी
आप अच्छी तरह जानते हैं ये लाइन यहां खत्म नहीं होगी



अब जो बदलाव की हवा चली है वो
अपना रुख नहीं बदलेगी
कौन सा डर है जो छुपा रहे हो
अराजकता कह कर अंदर
कौन सी चिंता है जो दबा रहे हो
नेता डर रहा है धन कैसे बनाएगा
इलेक्शन में भीड़ कैसे जुटाएगा
बाबू डर रहा है ऊपर की इनकम कैसे कमाएगा
बिज़नेसमैन डर रहा है टैक्स कैसे बचाएगा
आतंकवादी डर रहा है
दहशत कैसे फैलाएगा

ये क्या कम है कि वादी में आज शांति है
पत्थर फेंकने वालों के मन में अशांति है

हम एनआरआई लोग जब दूसरे देशों में रहने जाते हैं
लाइनों में खड़े होकर ही कह जाते हैं
अपने देश में होते तो जुगाड़ लगा लेते
ले देके काम निकलवा लेते

अब डर है घर जाके भी लाइन में खड़े होना होगा
सालों की आदत को अब बदलना होगा
जुगाड़ ही लगाना है ना
तो सही जगह लगओ
आम आदमी की तकलीफ देखी नहीं जा रही
तो मदद के लिए हाथ आगे बढाओ

कुछ करना है तो हल बताओ,
दुखती रग को और मत दबाओ

फिर वही हाल है
ब्लैम गेम का सारा धमाल है
नेता चिल्ला रहा है रोलबैक- रोलबैक
आम आदमी तिलमिला रहा है-नीड कैश, नीड कैश

काश एक स्कीम होती
50 दिन बार्टर एक्सचेंज की थीम होती
बर्तन के बदले सब्ज़ी
सब्ज़ी के बदले चावल
फिर कहां है कैश का सवाल
सोचो ऐसे कितने आइडियाज होंगे
50 दिन यूं ही कैश के बिना निकल जाएंगे

जुगाड़ ही लगाना है ना तो सोलूशन्स बताओ
आम आदमी की तकलीफ देखी नहीं जा रही
तो उठो मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाओ

जिसके पास ग्रॉसरी है
कुछ दिन सस्ती बेच दो
उधार के नए अकाउंट खोल दो
जो पैसे नहीं दे पा रहा
उसे 50 दिन का टाइम दे दो
धार्मिक स्थलों में ढेरों चिल्लर है
छोटे-छोटे नोट पेटियों में बंद हैं
चाहो तो उन्हें गरीबों में बंटवा दो
छोटे दुकानदारों को दिलवा दो
कुछ करना है तो सोलूशन्स बताओ

जुगाड़ लगाना है तो सही जगह लगाओ

सुना है बंगलूरू में कोई फ्री पिज़्ज़ा बांट रहा है
पंजाब में लाइन पे खड़े लोगों को चाय पिला रहा है
बॉम्बे में चना बांट रहा है
ऐसी बातें न्यूज़ चैनल वाले कभी तो दिखाओ
हर सिक्के के दो पहलू होते हैं
दिखाना है तो दोनों तरफ दिखाओ
अपना उल्लू सीधा करने के लिए न्यूज़ चैनल मत चलाओ

जुगाड़ ही लगाना है ना तो सही जगह लगाऒ
आम आदमी की तकलीफ देखी नहीं जा रही
तो मदद के लिए हाथ आगे बढ़ाओ

विभूति दुग्गड़ मुथा
https://www.facebook.com/poetrywithpurposebyvibhuti/

विभूति का सवाल : देश बदल रहा है, आप कब बदलोगे...

युवा कवयित्री विभूति दुग्गड़ मुथा
  • दुबई में रह रहीं रायपुर की युवा कवयित्री विभूति मुथा की कविताओं ने लोगों के दिलों को छुआ
  • लोगों ने कविताओं के वीडियो को वाट्सएप, फेसबुक और यूट्यूब पर खूब शेयर किया
रामकृष्ण डोंगरे

रायपुर। नोटबंदी के पक्ष में सोशल मीडिया पर कई कविताएं काफी वायरल हो रही हैं। इनमें से कुछ कविताएं हमारे शहर की मूल निवासी युवा कवयित्री विभूति दुग्गड़ मुथा की भी हैं। उनकी ज्यादातर कविताएं अभी वीडियो के रूप में ही मौजूद हैं। देशभर में सबसे ज्यादा शेयर हो रही उनकी कविता, बदलाव भी चाहते हैं और बदलना भी नहीं चाहते...को अब तक डेढ़ लाख से ज्यादा लोगों ने देखा है। उनके यूट्यूब चैनल और फेसबुक पेज से लोग वीडियो डाउनलोड करके शेयर कर रहे हैं।
केंद्र सरकार के विमुद्रीकरण के फैसले को लेकर लोगों में उम्मीद जगाने वाली इन कविताओं ने लोगों के दिलों को छू लिया है। उनकी कुछ कविताओं की बानगी देखिए- जुगाड़ लगाना है तो सही जगह लगाओ, क्या-क्या बंद करोगे, लोगों की आवाज कैसे बंद करोगे, नहीं मैं नेता नहीं बनना चाहती, देश बदल रहा है, आप कब बदलोगे....

छत्त्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कलेक्टोरेट के पीछे स्थित रविनगर निवासी समाजसेवी विजय दुग्गड़ और साधना दुग्गड़ की बेटी विभूति इन दिनों दुबई में रहती हैं। मोटिवेशनल ट्रेनर विभूति बताती हैं कि 8 नवंबर को प्रधानमंत्री मोदी ने जब इस फैसले का ऐलान किया तो देशभर में काफी चर्चाएं होने लगीं। इनमें दोनों तरफ से लोगों की प्रतिक्रिया आ रही थी। मुझे लगा कि पहली बार हमारे देश में किसी नेता ने इस दिशा में गंभीरतापूर्वक सोचा है। तब मैंने 12 नवंबर को इस पर पहली कविता लिखी- बदलाव भी चाहते हो और बदलना भी नहीं चाहते... इस कविता को हजारों लोगों ने पसंद किया। मेरे फेसबुक पेज और यूट्यूब चैनल पर लोगों के काफी अच्छे कमेंट्स आए। इसके बाद मैंने कई कविताएं लिखीं।

बुजुर्ग सीए ने फोन करके आशीर्वाद दिया
विभूति ने बताया कि उनसे देश के कई शहरों से लोग संपर्क कर रहे हैं। अहमदाबाद के एक बुजुर्ग सीए ने उन्हें फोन करके कहा कि बिटिया आपकी कविता ने मुझे झकझोर दिया है। आप लोगों को प्रेरित कर रही हैं। मेरी शुभकामनाएं और आशीर्वाद आपके साथ है। वे कहती हैं कि अहमदाबाद, हैदराबाद, बेंगलूरू, जयपुर, रायपुर, मुंबई, दिल्ली, चेन्नई,वडोदरा से लोग वाट्सएप के स्क्रीनशॉट टैग कर रहे हैं। फेसबुक मैसेंजर पर भेज रहे हैं।

बेटी ने देश के लिए लिखा, बहुत खुश हूं
विभूति के पिता विजय दुग्गड़ कहते हैं, बेटी ने दुबई में रहकर भी देश के माहौल को लेकर सोचा और अच्छी कविताएं लिखीं, मैं बहुत खुश हूं। हमें गर्व है। मैंने विभूति का वीडिया अपने मित्रों को भी भेजा है, सभी उसे पसंद कर रहे हैं।

2004 से लिख रहीं कविताएं
मोटिवेशनल कविताओं के सफर के बारे में विभूति ने बताया कि उन्होंने 2004 से कविताएं लिखना शुरू किया। इसकी प्रेरणा उन्हें अपने कॉलेज में एक सहपाठी से मिली। उनके यूट्यूब चैनल को 2 हजार 62 लोगों ने सब्सक्राइब किया है। बदलाव वाली कविता को डेढ़ लाख से ज्यादा पेज व्यू मिले हैं। वहीं, जुगाड़ वाली कविता को अब 50 हजार लोगों ने पसंद किया है।
  1. यूट्यूब चैनल को 2062 लोगों ने सब्सक्राइब किया है।
  2. बदलाव वाली कविता को डेढ़ लाख से ज्यादा पेज व्यू मिले है।
  3. जुगाड़ वाली कविता को अब 50 हजार लोगों ने पसंद किया है।
  4. सभी कविताओं को अब तक चार लाख से ज्यादा लाइक-कमेंट्स।
विभूति का फेसबुक पेज
https://www.facebook.com/poetrywithpurposebyvibhuti/

दैनिक भास्कर रायपुर में रामकृष्ण डोंगरे की रिपोर्ट, 27 नवंबर, 2016

युवा कवयित्री विभूति दुग्गड़ मुथा की नोटबंदी पर कविताएं : 1

युवा कवयित्री विभूति दुग्गड़ मुथा
बदलाव भी चाहते हैं और बदलना भी नहीं चाहते
ये कैसी चाहत है,

सालों के बाद एक नेता आया
जो बोला, वो कर दिखाया
125 करोड़ लोग हैं 125 नहीं

हां, तो मैं क्या कह रही थी
सालों बाद एक नेता आया जो बोला वो कर दिखाया
देश तो ठीक ही था 60 साल पहले भी
लोग बदल जाते तो बात होती
खुद को सम्मान दो तो सम्मान मिलेगा
गलत को सही बता के कब तक खोटा सिक्का चलेगा

चलता है थोड़ा बहुत ऊपर नीचे
चला लेंगे कुछ ले देके
आदत सी पड़ गई थी काले धन की
ऊपर की इनकम की
झटका मिला देश हिला
पर अब भी सब परेशां हैं
सफाई की कीमत दे के
सब हैरां हैं

न चाहते हुए भी धन जला रहे हैं लोग
नोटों की गड्डियां गंगा में बहा रहे हैं लोग

बदलाव भी चाहते हैं
और बदलना भी नहीं चाहते, ये कैसी चाहत है

मन नहीं, मानसिकता बदलनी होगी

बदलाव की कीमत हमें भी कुछ तो चुकानी होगी

(भारतीय मूल की दुबई निवासी युवा कवयित्री की कविता के संपादित अंश) 

Monday, October 24, 2016

किस्सा तीन तलाक का- 1

तीन तलाक के ताजा मामले को समझने के लिए तहलका की यह रिपोर्ट आपके लिए काफी है। अगर तीन तलाक....जैसी कुप्रथा को और समझना है तो आप कुरान में उसका सही रूप पढ़ लीजिए। लेकिन होता कुछ और ही है। 

हिंदू धर्म में विधवाओं की संख्या प्रति 1000 88.3, मुसलमानों में 72 है। जबकि अलग रहने वाले महिलाओं की संख्या हिंदुओं में प्रति 1000 पर 5.5 तो मुसलमानों में 4.8 है। वहीं तलाक के आंकड़ों पर नजर डालें तो हिंदुओं में प्रति 1000 यह 1.8 तो मुसलमानों में यह 3.4 है। 

धर्म पहले नहीं है। इंसान या इंसानियत पहले हैं। इंसान पहले आया। धर्म बाद में। धर्म ने इंसान को नहीं बनाया। इंसानों की शुरुआती बिरादरी ने ही अपने लिए अलग-अलग धर्म बनाए। कुप्रथाएं किसी भी धर्म या सम्प्रदाय में हो। खत्म होनी चाहिए। भारत में अगर सती प्रथा, बाल विवाह जैसी बुराइयों को खत्म किया गया है। तो मुस्लिम धर्म की तीन तलाक जैसी प्रथा-कुप्रथा को भी खत्म किया जाना चाहिए।

अगर मेरे परिवार में, मेरे परिचितों में महिलाओं के साथ, बच्चों के साथ कोई अन्याय-मारपीट नहीं हो रही है। तो मैं दावे के साथ ऐसा कैसे कह सकता हूं कि दुनिया की सारी महिलाओं के साथ कोई जुल्म नहीं हो रहा है। इसलिए पढ़े-लिखे मुस्लिम तबके को यह सोचना छोड़ देना चाहिए कि तीन तलाक सही है। क्योंकि उनकी जानकारी या उनके परिचितों में किसी के साथ कोई गलत नहीं हुआ है। तीन तलाक पर बैन लगने से उनका धर्म खतरे में नहीं पड़ जाएगा।

देशभर में देखिए... अपनी आंखें खोलिए...किस-किस तरह से... कितनी मुस्लिम औरतों को तीन तलाक का अभिशाप झेलना पड़ रहा है।

देश में अगर कोई कानून है तो सब कुछ कानून के मुताबिक ही होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट या सरकार अगर कोई कदम उठाएगी तो किसी की सुनी- सुनाई बातों के आधार पर नहीं। उनके सामने तमाम उदाहरण है....रोती...बिलखती औरतों की जिंदा कहानियां है जो उन मुर्दा सोच वाले लोगों की वजह से ऐसी जिंदगी जी रही है। चाहे फिर वह औरत शायरा बानो, फातिमा, नायरा या कुछ भी....

आप भी पढ़िए इस रिपोर्ट को फिर अपनी राय रखिए... स्वागत है। बिना पढ़े या गुस्से में कोई टिप्प्णी न ही कीजिए तो बेहतर रहेगा....

#teentalaq

कुछ तथ्य

नवंबर, 2015 में भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (बीएमएमए) नाम की संस्था ने एक सर्वे जारी किया. सर्वे में देश के दस राज्यों की तलाकशुदा करीब पांच हजार औरतों से बात की गई. सर्वे में तलाक के तरीके, उनके साथ हुई शारीरिक-मानसिक हिंसा, मेहर की रकम, निकाहनामा, बहुविवाह जैसे कई मुद्दों पर खुलकर बात हुई. जो नतीजे आए, वे बेहद चौंकाने वाले थे. रिपोर्ट में कहा गया कि 92.1 प्रतिशत महिलाओं ने जुबानी या एकतरफा तलाक को गैरकानूनी घोषित करने की मांग की. वहीं 91.7 फीसदी महिलाएं बहुविवाह के खिलाफ हैं. 83.3 प्रतिशत महिलाओं ने माना कि मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलाने के लिए मुस्लिम फैमिली लॉ में सुधार करने की जरूरत है.
 तीन तलाक को लेकर शायरा बानो के सुप्रीम कोर्ट जाने के बाद देश में भी तीन तलाक की व्यवस्था को खत्म करने की आवाज तेज होने लगी है. इसके खिलाफ एक ऑनलाइन याचिका पर करीब 50,000 मुस्लिम महिलाओं ने हस्ताक्षर किए हैं. हस्ताक्षर करने वाले लोगों में बड़ी संख्या में मुस्लिम पुरुष भी शामिल थे. याचिकाकर्ता बीएमएमए चाहता है कि राष्ट्रीय महिला आयोग इसमें हस्तक्षेप करे. बीएमएमए ने महिला आयोग की अध्यक्ष ललिता कुमारमंगलम को लिखे पत्र में कहा कि उसने अपने अभियान के पक्ष में 50,000 से अधिक हस्ताक्षर लिए हैं. हमने यह पाया है कि महिलाएं जुबानी-एकतरफा तलाक की व्यवस्था पर पाबंदी चाहती हैं.

‘सीकिंग जस्टिस विदिन फैमिली’ नामक हमारे अध्ययन में पाया गया कि 92 फीसदी मुस्लिम महिलाएं तलाक की इस व्यवस्था पर पाबंदी चाहती हैं. इस मामले में ललिता कुमारमंगलम का कहना है कि आयोग सुप्रीम कोर्ट में शायरा बानो के मुकदमे का समर्थन करेगा. उनका कहना है, ‘राष्ट्रीय महिला आयोग पहले से ही इस मुकदमे का हिस्सा है. हम इस महीने सुप्रीम कोर्ट में अपना जवाब दाखिल करेंगे. इस मांग का 200 फीसदी समर्थन करते हैं. जो भी बन पड़ेगा, हम करेंगे.’
http://tehelkahindi.com/an-elaborated-report-on-triple-talaq-and-how-muslim-women-are-standing-against-it/

Sunday, July 24, 2016

सुदीप को रायपुर में भी नम आंखों से दी श्रद्धांजलि


  • पत्रकारों को इलाज की सुविधा मुहैया कराने ट्रस्ट बनाने की जरूरत : अनिल पुसदकर
  •  बीमारी के लिए खराब रूटीन जिम्मेदार, अपना और साथियों का ख्याल रखें : जिनेश जैन
रायपुर। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विवि से पढ़ाई करने वाले पत्रकार सुदीप सिन्हा की याद में रायपुर के प्रेसक्लब में श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। इस मौके पर पत्रिका छत्तीसगढ़ के स्टेट एडिटर श्री जिनेश जैन और प्रेस क्लब के अध्यक्ष वरिष्ठ पत्रकार श्री अनिल पुसदकर विशेष तौर पर मौजूद थे।

इस मौके पर पत्रिका में सुदीप के सहकर्मी रहे मिथिलेश मिश्र, अभिषेक राय, संतराम साहू, दयानंद यादव, सुनील नायक, जितेंद्र दहिया, विजय देवांगन ने श्रद्धांजलि अर्पित की। इसके अलावा आईबीसी-24 से राजीव कुमार, प्रज्ञा प्रसाद, दैनिक भास्कर से रामकृष्ण डोंगरे, पंकज साव, पुष्पम कुमार, शेखर झा समेत पत्रकार साथी मौजूद थे। कार्यक्रम का संचालन रामकृष्ण डोंगरे ने किया।

रायपुर प्रेस क्लब के अध्यक्ष पुसदकर ने कहा कि बीमारी के चलते युवा पत्रकार सुदीप सिन्हा की असामयिक मौत काफी दुखद है। हमें पत्रकारों को इलाज की सुविधा उपलब्ध कराने के लिए ट्रस्ट बनाने की पहल करना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि हम पत्रकार पूरे समाज का ख्याल रखते हैं। उनके मुद्दे उठाते हैं मगर खुद अपना या अपने साथियों की खबर नहीं रखते। आखिर में हमें उनकी अर्थी उठाने जैसी नौबत आ जाती है। हमें मिलजुल रहना चाहिए। एक-दूसरे का ख्याल रखना चाहिए।

पत्रिका ने स्टेट एडिटर जिनेश जैन ने सुदीप के जज्बे और लगन को याद करते हुए बताया कि एक बार उन्होंने उससे कहा था कि तुम जहां-जहां जाओगे, मैं वहां-वहां तुम को मिलूंगा। इसके पीछे वजह यह थी कि पत्रिका के जयपुर, भोपाल और रायपुर में सुदीप उनके साथ काम करते रहा।

वे सुदीप सिन्हा की मौत जैसी घटनाओं के लिए पत्रकारों के अनियमित रूटीन को जिम्मेदार मानते हैं। उन्होंने कई बातें शेयर की। बताया कि किस तरह से सुदीप समर्पण के साथ काम करता था। सब मुद्दों पर डिस्कस करता था, गाइडेंस मांगता था। सीनियर साथियों से चर्चा करता था। श्री जैन ने कहा कि सुदीप से उनका 9 साल पुराना परिचय था मगर उसने अपनी बीमारी के बारे में कभी खुलकर नहीं बताया था।

उन्होंने कहा कि जिस दिन सुदीप की मौत की खबर मिली वे गमगीन हो गए। वे कहते हैं कि पत्रकारों को अपने रूटीन का खास ख्याल रखना चाहिए। यानी हमेशा घर से ही खाना खाकर बाहर निकलना चाहिए। चाहे जो भी घर में बना हो। वर्ना बाहर जाने के बाद खाना मिलेगा, कब मिलेगा कुछ भी पक्का नहीं होता।





श्री जैन ने कहा कि सुदीप कभी अपनी बीमारी का बहाना बनाकर कामचोरी नहीं करता था। उसने जिद करके रायपुर पत्रिका में स्टेट ब्यूरो में रिपोर्टिंग करने की जिम्मेदारी मांगी। उसे पूरी तरह से निभाया भी। उन्होंने सुदीप के बारे में कई और बातें शेयर की।

Tuesday, July 19, 2016

सुदीप कुमार सिन्हा को श्रद्धांजलि : तुम्‍हारा यूं अचानक चले जाना


भोपाल, जयपुर और पटना में तुमसे कई बार मिला. पत्रकारिता के प्रति तुम्‍हारा जुनून और तुम्‍हारी मासूमियत भुलाए न भूलेगी. आई नेक्स्ट के सीनियर रिपोर्टर सुदीप सिन्हा का सोमवार सुबह कंकड़बाग स्थित साईं अस्पताल में दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया. अंतिम संस्कार बांस घाट पर किया गया. छोटे भाई प्रीतम ने मुखाग्नि दी. सुदीप के बड़े भाई प्रदीप सिन्हा ने बताया कि वे कुछ दिन से बीमार चल रहे थे. 16 जुलाई की शाम को उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था. असामयिक मौत से पिता गोपाल कृष्ण सिन्हा, मां माधुरी सिन्हा और बहन कंचन सिन्हा समेत पूरा परिवार सदमे में है. मूल रूप से सहरसा के रहनेवाले सुदीप ने माखनलाल विवि से 2005-2007 एमजे करने के बाद पत्रकारिता में करियर की शुरुआत दैनिक जागरण भोपाल से की थी. उसके बाद राजस्थान पत्रिका ‪#‎जयपुर‬ ‪#‎भोपाल‬ ‪#‎रायपुर‬ के अलावा हरिभूमि भोपाल से भी जुड़े रहे. वर्तमान में आई नेक्स्ट पटना में बतौर सीनियर रिपोर्टर कार्यरत थे. ‪#‎डायबिटीज‬ ने एक युवा पत्रकार को हमसे छीन लिया. हमारे लिए यह सबक भी है. हालांकि सुुदीप अपनी सेहत का ध्‍यान रख रहा था. Sudeep की आत्‍मा को ईश्‍वर शांति प्रदान करे.
          - चंदन शर्मा
 बस दो महीने पहले आपके ऑफिस में मिला था आपसे...पता नहीं था ये आखिरी मुलाकात होगी। मुझे याद है उसदिन पटना के आसपास हाईवे पर लंबा जाम लगा था, आप उस खबर के पीछे पड़ गए...खूब सारा फोन लगाया...और निकल गए रिपोर्टिंग पर। आपके एनर्जी लेवल की तारीफ करता रह गया मैं। एनर्जी के साथ खबर बनाने का सबसे आसान तरीका था आपके पास।
मुझे याद है...हरिभूमि में आपके साथ काम करने का मौका मिला था। मैं नया था...आपने हमेशा मेरी मदद की। एक ही बीट पर थे हम दोनों लेकिन कभी मनमुटाव नहीं होने दिया आपने....तब आपसे सीखा कि कैसे मीटिंग खत्म होते ही फटाफट खबर कंप्लीट करते हैं।
अचानक चले गए आप...ऐसे नहीं जाना था। बहुत अखर रहा है। कुछ लिखा नहीं जा रहा। बड़ी हिम्मत करके याद कर रहा हूं आपको...आपकी याद आएगी।

- मनीष चंद्र मिश्रा
अपनी लेखनी से हर खबर में जान डालने वाले आई नेक्स्ट के युवा सीनियर रिपोर्टर सुदीप सिन्हा अब हमारे बीच नहीं रहे. सोमवार की सुबह पटना के कंकड़बाग स्थित साईं अस्पताल में उन्होंने आखिरी सांस ली. बीमारी तो काफी दिनों से पीछा कर रही थी लेकिन वह हर पल उसे मात दे रहे थे. यही कारण था कि डायबिटीज जैसी बीमारी भी उनकी मुस्कान के सामने पस्त हो जाती थी. वह उसे अपनी हंसी में छिपा लिया करते थे, लेकिन सोमवार को बीमारी भारी पड़ गई और वह दुनिया को अलविदा कह गए.
- दुलार बाबू ठाकुर 
दोपहर को बेहद दुखद खबर मिली। सुदीप हमें छोड़कर चला गया। विश्वास ही नहीं हुआ कि वो यूं अचानक कैसे अलविदा कह सकता है.. साल 2005 में भोपाल में पत्रकारिता की पढ़ाई के लिए जाने के दौरान सुदीप पहली बार मुझसे ट्रेन में मिला था और फिर उसके साथ वो सफर कब बीत गया ये पता भी नहीं चला। भोपाल पहुंचने पर हम एक साथ होटल में रुके.. एक साथ रूम सर्च किया और फिर एक साथ ही रहे। सुदीप, मिथिलेश और मैं क्लास के बाद घंटों एक दूसरे से बातचीत करते थे। सुदीप बहुत ही अलहदा था। जोश से भरपूर, साफ दिल और एकदम एक्टिव। कोर्स खत्म होने के बाद हम अलग अलग शहरों में जॉब के लिए चले गए। इस बीच फोन पर कभीकभार बात होती रही। बीते साल 25 फरवरी को रायपुर में सुदीप से आखिरी मुलाकात हुई थी मेरी। सालों बाद मिलने के बाद दोनों ने कई घंटे साथ बिताए और फिर मिलने का वादा कर वो चला गया। सुदीप इसके बाद पटना चला गया और फिर वाट्सएप के जरिए जुड़ा रहा। सुदीप की एक खासियत थी कि वो कभी भी अपनी परेशानी जल्दी शेयर नहीं करता था। इतनी कम उम्र में अचानक उसकी मौत की खबर स्तब्ध कर देने वाली है। पत्रकारिता के क्षेत्र उसकी कमी अपूरणीय है और मेरे लिए ये निजी क्षति है।
 तुम हमेशा याद आओगे सुदीप।
- राजीव कुमार, आईबीसी-24, रायपुर
अरे साला उसको हम देख लेंगे... ये डॉयलॉग आज सुबह से कान में गूंज रहा है...तस्वीर भले मामूली लडके की लगती है...लेकिन अखबार के दफ्तर में घाग रिपोर्टरों के बीच हौंसला बढाने के लिए सुदीप का देख लेंगे काफी था..4 साल सुदीप ओर मैंने एक दूसरे के साथ दिन रात और साथ ना हुए तो फोन पर...बिताए... अजय तुम वो खबर कर लेना हम ये देख लेंगे...सुदीप की हर बात पर हां निकलता था...आज सुबह से आंखे भर रही है जब मालूम पडा की सुदीप ने साथ छोड दिया... वो पूरी टीम मेरे डेस्क इंचार्ज राहुल जी, अतुल भाई, नितिन मेरा छोटा भाई, नीलम राजपूत, राकेश तिवारी, गजेंद्र, आज हर कोई परेशान होगा, क्योंकि सुदीप की हर बात हमारे कानों में गूंज रही होगी...एक ख्वाहिश पूरी ना कर सका सुदीप तुम्हारी वो.. बच्चन सहाब से मुलाकात की...मेरी मुलाकात के बाद तुमने मुझे बोला था अजय मुझे मिलना है...लेकिन दुर्भाग्य जब वक्ता आया था तो तुमने बोला अजय रायपुर में हूं...लेकिन तुम वक्त ना निकला पाए भाई...माफ करना...तुम बहुत याद आओगे...मेरी bollywood की रिपोर्टिंग के तुम मुरीद थे भाई क्या क्या लिखू कुछ समझ नहीं आ रहा है... बस यादें सुदीप
                         - अजय शर्मा 
आज जो खबर मिली है। उस पर यकीन नहीं हो रहा है। Sudeep Sinha सर नहीं रहे। वो हमें छोड़कर चले गए। उन्हें डायबटीज थी जो भोपाल में रहते हुए हुई थी। आज सुबह 10 बजे असामयिक उनकी मौत हो गई। मौत की वजह वायरल और फेफड़े में पानी भर जाना बताया जा रहा है। उन्हें डायबटीज भले थी लेकिन वो खुद का काफी खयाल रखने वालों में से थे। अब इस रोग को अखबारी पेशे की देन कहिये। जो शायद अस्त-व्यस्त दिनचर्या से हुआ। भोपाल में जब इसका उन्हें पता चला था तो बेहद उदास हुए थे, लेकिन खुद को सम्भालते हुए उन्होंने बेहद सख्त परहेज और दवाएं लेना भी शुरू कर दिया था। वो छोटी-छोटी बातों से खुश हो जाते थे और खाना खिलाना उन्हें बेहद पसन्द था। रचना नगर भोपाल के उस कमरे में न जाने कितनी बार दावतें हुईं। इधर काफी दिनों से उनसे मुलाकात न हो पाने का अफ़सोस है। उनका जाना हम सबके लिए किसी सदमे से कम नहीं। वो जो उन्हें जानते हैं, जिन्होंने साथ काम किया है। उन सबकी ये व्यक्तिगत क्षति है जिसे पूरा करना अब सम्भव नहीं है। ये तस्वीर भी पत्रिका के चेतक ब्रिज वाले पुराने कार्यालय में काम करते वक्त की है। शायद 7 से 10 साल पुरानी होगी। अभी सुदीप सर पटना आई नेक्स्ट में सीनियर रिपोर्टर थे। माखनलाल विवि में 2005-07 में एमजे करने के बाद उन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत जागरण भोपाल से की थी। उसके बाद राजस्थान पत्रिका जयपुर, भोपाल, रायपुर के अलावा हरिभूमि भोपाल से भी जुड़े रहे।
- दीपक गौतम आवारा, 

Monday, July 18, 2016

श्रद्धांजलि : बीमारी से हार गया मेरा दोस्त सुदीप कुमार

"और रामकृष्ण".... यही वो शब्द थे,
जिससे सुदीप मुझसे बातचीत की शुरुआत करते थे।

आखिरी बार जब बात हुई तब 26 जून के पहले की कोई तारीख रही होगी। हम एक सीनियर स्व. विनय तरुण की याद में होने वाले कार्यक्रम की तैयारी में लगे थे। रायपुर में इस कार्यक्रम के लिए आने के बहाने वह सबसे मिलना चाहता था।
बाएं से स्व. सुदीप कुमार के साथ।

उसने कहा था- 'रामकृष्ण, मैं आने की कोशिश करूंगा। ताकि इस बहाने सभी से मुलाकात हो जाए।

सुदीप कुमार सिन्हा। एमजे-2005-07। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विवि का छात्र रहा।

जागरण भोपाल में इंटर्नशिप के दौरान ही उसकी कई खबरें सराही गई। फिर उसने वही से अपने करियर की शुरुआत की। सिटी इंचार्ज रवि खरे सर के साथ उसकी अच्छी ट्यूनिंग हो गई थी।

कोर्स पूरा के बाद उसने राजस्थान पत्रिका जयपुर, भोपाल और रायपुर में भी काम किया। इसके अलावा कुछ समय तक हरिभूमि भोपाल से भी जुड़ा रहा। वे वर्तमान में आई- नेक्स्ट पटना में सीनियर रिपोर्टर के तौर पर पदस्थ थे।

मेरे एक दोस्त और क्लासमेट दुलार बाबू ठाकुर भी उनके साथ आई-नेक्स्ट में काम कर रहे है। उन्होंने बताया कि वे आखिरी बार 12 जुलाई को आफिस आए थे। लगातार बारिश और ठंडे-गरम मौसम की वजह से उन्हें वायरल इंफेक्शन हो गया। वे जल्दी ही आफिस से चले गए थे।

वे इन दिनों अपनी मम्मी और भाई के साथ पटना में रहते थे। डायबिटीज के मरीज थे। खान-पान का खास ख्याल रखते थे। 2-3 दिन तक वे घर पर ही इलाज कराते रहे। अस्पताल चलने के लिए तैयार नहीं थे। फिर भाई ने जिद करके उन्हें 16 जुलाई की शाम को पटना के कंकड़बाग स्थित साईं अस्पताल में भर्ती कराया।

निमोनिया का असर था। कमजोर होने के कारण बीमारी में शरीर साथ नहीं दे रहा था। डॉक्टरों ने उन्हें बचाने की बहुत कोशिश की मगर 18 जुलाई की सुबह करीब 7 बजे अस्पताल में दिल का दौरा पड़ने से 35 वर्षीय सुदीप की मौत हो गई। सोमवार दोपहर पटना के बांस घाट पर उन्हें छोटे भाई प्रीतम ने मुखाग्नि दी। असामयिक मौत से पिता गोपाल कृष्ण सिन्हा, मां माधुरी सिन्हा, बड़े भाई प्रदीप सिन्हा और बहन कंचन सिन्हा समेत पूरा परिवार सदमे में है.

उनकी मम्मी को काफी आघात पहुंचा है। सुदीप घर का सबसे छोटा बेटा था। शायद उससे छोटी एक बहन है। भोपाल में जॉब के दौरान उसकी मम्मी और बहन रचना नगर वाले रूम में साथ ही रहती थीं।

सुदीप के बारे में याद किया जाए। या कुछ कहा जाए।
. .. तो वह बेहद एक्टिव रहता था। उसके काम में, बातचीत में फुर्ती नजर आती थी। पढ़ाई के दौरान हम होशंगाबाद गए थे। शायद उसी ने टूर प्लान किया था। जहां हमने एमजे डिपार्टमेंट के साप्ताहिक विकल्प के लिए स्टोरी की थी। मेरी शादी के दौरान वह छिंदवाड़ा भी आया था। दो-तीन दिन हमारे घर पर रहा था। पूरा परिवार उसे पसंद करने लगा था।

एक अच्छे रिपोर्टर की तरह खबरों के पीछे भागना उसे सबसे ज्यादा प्रिय था। पत्रिका में नौकरी के दौरान रायपुर में वह मेरे साथ वाले कमरे में रहता था। हमारे एक सीनियर और मित्र राकेश मालवीय जी और सुदीप अक्सर बैठा करते थे। कई बातें होती थी। अपनी दीदी की शादी के मौके पर लंबी छुट्टी पर घर गया था। फिर कुछ समय बाद पटना में ही टिक गया।

लिखने के लिए बहुत कुछ है। मगर जो लिखा जाएगा वो कम ही होगा। इंसान बीमारी से हार जाता है। सुदीप को कई बार बीमारी ने घेरा। मगर अपनी जिंदादिली और जूझने की क्षमता की वजह से वह हर बार ठीक हो जाता था।

मगर... इस बार हंसने और हंसाने वाले सुदीप कुमार को बीमारी ने हरा दिया।
अलविदा मेरे दोस्त... तुम हमेशा याद आओगे।


गंगाधर के बाद शायद सुदीप मेरा दूसरा दोस्त था, जो मुझे अचानक छोड़कर चला गया। दुनिया में जो आया है, उसका जाना भी तय है। किसी अपने के चले जाने पर जो दुख होता है, उसको रोका नहीं जा सकता।

किसी की मौत को न यूं दिल से लगाया जाए,
रास्ते में जो भी मिले, उसे अपना बनाया जाए।

श्रद्धांजलि ! नमन  !!!

सुदीप सिन्हा का फेसबुक पेज- https://www.facebook.com/sudeep.sinha.7?fref=pb&hc_location=profile_browser