Friday, January 16, 2009

मेल-मिलाप और परिचित का अपरिचित सा वो ख़्वाब

मेल-मिलाप और परिचित का अपरिचित सा वो ख़्वाब

शनिवार की देर रात तक काम करने के बाद मैं रविवार की छुट्टी यानी मस्ती, सोना, घूमना, जो मन करे वो करने का अहसास लिए दिल में अपने रूम तक आया. अगले दिन की छुट्टी है ही तो क्यों न देर रात को भी टेलीविजन देख ही लिया जाए. यूँ भी देर रात टेलीविजन देखना एक अलग बात ही है. देर रात टेलीविजन यानी देर रात के कार्यक्रम. आह और ये तन्हाई! आप यकीन करें लोग जो महसूस करते हैं तन्हाई को, लोग जो भीड़ में होके भी अकेले रहते हैं...उनके लिए ये साधन वाकई लाज़बाब है।



सबसे पहले तो "डोंगरे" भाई से माफ़ी चाहूँगा कि उनके कहे मुताबिक मैं यह पोस्ट रविवार को ही न लिख सका. मेरा मन तो था मगर शाम ढलते ढलते दिल किन्हीं और ख़यालों व मुश्किलों की गिरफ़्त में कुछ ऐसा आया कि दिल में फ़िर अहसास भी नहीं पनपे कि कुछ लिखा जाए. लिखने को तो अभी भी दिल बहुत नहीं मग़र बहाव हो पड़ेगा ऐसा मुझे महसूस रहा है. ख़ैर, "डोंगरे" भाई की डायरी...! में लिखना यानी ख़ुद की डायरी की याद भी है. मैं ख़ुद भी अपनी डायरी आजकल नहीं लिख पाता. चाह कर भी नहीं. बस कभी-कभार ही लिख लिया करता हूँ. और आज अपने मित्र की डायरी में लिखने के लिए कलम पकड़ा दी गई है तो माज़रा भी कुछ न कुछ तो खास होगा ही. यूँ भी "डोंगरे" भाई आजकल व्यस्तता के चलते अपनी डायरी ख़ुद नहीं लिख पा रहे. माफ़ करना, थोड़ी सी हंसी आ रही है. सोच रहा हूँ, ये कितना अद्भुत और अलहदा अहसास है कि आप अपनी डायरी ख़ुद नहीं लिख पाते मगर दूसरों की डायरी लिखने का निमंत्रण पाके लिखना ही पड़ता है. बहरहाल, "डोंगरे" भाई की डायरी में लिखने का सुअवसर मुझे प्राप्त हुआ तो मैं अब "डोंगरे" भाई की ही बातें लिखूँ तो ज्यादा रोचक रहेगा.
"बकौल डोंगरे जी मेरे शब्दों में"

शनिवार की देर रात तक काम करने के बाद मैं रविवार की छुट्टी यानी मस्ती, सोना, घूमना, जो मन करे वो करने का अहसास लिए दिल में अपने रूम तक आया. अगले दिन की छुट्टी है ही तो क्यों न देर रात को भी टेलीविजन देख ही लिया जाए. यूँ भी देर रात टेलीविजन देखना एक अलग बात ही है. देर रात टेलीविजन यानी देर रात के कार्यक्रम. आह और ये तन्हाई! आप यकीन करें लोग जो महसूस करते हैं तन्हाई को, लोग जो भीड़ में होके भी अकेले रहते हैं...उनके लिए ये साधन वाकई लाज़बाब है. बेशक आँखों का क्षणिक सुख हो. सो, डोंगरे भाई देर रात ड्यूटी से वापस आने के बाद मन की तन्हाई को टेलीविजन का साज़ देते हुए और भी देर कर देते हैं सोने में. रविवार का दिन छुट्टी वाला होने की वजह से अगले दिन ड्यूटी की बाबत कोई चिंता का विषय नहीं है. इसलिए ये रात भी आजाद है और रविवार अर्थ से भी आज़ाद. यह तर्क बहुत ज़्यादा ठीक तो नहीं मग़र काम-चलाऊ तो है ही. चूँकि लोग इस दिन भी किसी न किसी कारण से परतंत्र ही होते हैं.

दिल्ली जैसे शहर में सुबह होते वक़्त चिडियाएँ, कोयल, मुर्गे आवाज़ नहीं करते. बस आपकी घड़ी या फ़िर आपका मोबाइल बताता है कि सुबह हो गई मामू. अब तो जागो! और सर्दियों के मौसम में तो बिस्तर से वाहर आने का मन नहीं होता. मग़र आदत! इंसान को आदतन अपनी तरह चलाती रहती है. अब यह आदत पर डिपेंड करता है कि वो आदत अच्छी है या बुरी.

खैर, सुबह ९ बजे तक "डोंगरे" भाई आदतन जग गए. नित्य-कर्म किए. चूँकि इस रविवार न तो मेरा या किसी अन्य मित्र के साथ कहीं घूमने या फ़िर कोई फ़िल्म वगैराह देखने का प्रोग्राम था न कुछ प्रायोजन ही. तो बड़ा मुश्किल था कि आज क्या किया क्या जाए. ये दिक्कत है उस शख्स के साथ होती होगी जो दूसरे शहरों से दूसरे शहरों में आके किसी भी कारणवश रह रहे हैं. वाकी ५- या ६ दिन तो ऑफिस में गुज़र जाते हैं. शेष बचे हुए एक छुट्टी वाले दिन का अगर आपने प्रोग्राम नहीं सोचा है तो दिमाग पर दिन हावी हो जाता है जैसे छुट्टी के दिन का होना दुश्वारी हो कोई.

बकौल "डोंगरे" भाई के मोबाइल इनबोक्स में दो रोज़ पहले का इक खूबसूरत सँदेस पडा था, संदेश किसी परिचित का था मग़र अपरिचित सा. व्यस्तता इतनी रही कि न तो उस संदेश वाले नंबर पर "डोंगरे" भाई न तो फोन ही कर सके और नाहीं संदेश का जवाब ही तलब कर पाए. संदेश में आज मिलने की बाबत भी लिखा था. रविवार को मेल-मिलाप. खाली दिन खाली दिमाग. कुछ तो सूझेगा ही.

नहा धोके "डोंगरे" भाई यूँ ही रूम से वाहर निकल पड़े, कुछ न सूझा तो मोबाइल में ही घुस गए. एक जानकार लड़की का अनजाना सा संदेश फ़िर से देखकर डोंगरे भाई चौंके...लगा जैसे कोई चमत्कार हुआ है. मोबाइल में. कितने बरस हो गए हैं जब से "डोंगरे" भाई "मैं और मेरी तन्हाई" का आलम लिए फिरते हैं. मग़र कोई ऐसा अब तक नहीं मिला कि दो पल बाँट ही लेता तन्हाई को. मग़र इस संदेश में तन्हाई के बांटने की संभावना झलक रही थी. मिलन की बात लिखी थी. वाव! दिल खुश हो गया एक अनजान से संदेश का. कहीं ये कोई किसी का मजाक तो नहीं जो तन्हाई पर और भी भरी पड़े. इसी सोचा-विचारी में "डोंगरे भाई" ने मुझे फोन किया. जो भी था सब बताया, संदेश भी भेजा. जुम्मे की रात का ज़िक्र था उसमें...डोंगरे भाई का दिल कुलान्चों से फुदक रहा था. दिल से एक दुआ निकल रही थी...हे, भगवान्, ये सच हो जाए...तो क्या हो जाए! आह! इक मीठी सी आह! उस अपरचित खुशी के अहसास में डूब पडी...जिसके अहसास ने "डोंगरे भाई" को भिगो दिया.

मुझे सुबह ही पहले तो संदेश मिला फ़िर कुछ देर बाद (किसी कारणवश जब मैंने कोई जवाब तलब न किया तो) "डोंगरे" भाई ने मुझे फोन ही कर डाला...और लगे तन्हाई का रोना...इस बीच पूछ ही लिया "सागर" भाई क्या किया जाए...कहीं ये मजाक तो नहीं...जो हम पर हंस रहे हैं...उन्हें और हंसनी की कोई नई खुराक तो नहीं...मैं भी सोच में पढ़ गया...दरअसल, नव वर्ष के अगले दिन यानी २ जनवरी २००९ को मुझे भी एक खूबसूरत सा संदेश आया...नव वर्ष की वधाइयां थी, साथ में ई-मेल पता भी लिखा था. पर मैंने संदेश का जवाब मोबाइल से संदेश कर के नहीं दिया. मैंने कोशिश की जो भी ये अपरिचित है, क्यों न इनसे बात की जाए...दो बार नंबर मिलाया...१ बार फोन काट दिया गया तो दूसरी बार किसी ने फ़िर उठाया ही नहीं. ये आलम था कि फ़िर हमने भी सोच लिया, दिए गए ई-मेल पर नव वर्ष की वधाई व शुक्रिया कहा जाए और फ़िर कभी इस नंबर पर बात करने की कोशिश न की जाए. ये वाकया मुझे "डोंगरे" भाई के संदेश के कारण सहज ही याद आ गया. मैंने फोन पर ही "डोंगरे" भाई को इस बाबत बताया भी. और अंततः मैंने सलाह दी: आपको फोन ही कर लेना चाहिए. बात होगी तो बस हो ही पडेगी...फ़िर जो होगा..अच्छा होगा. इसी सिद्धांत पर डोंगरे भाई ने फोन कर ही डाला. वाव! मैं इंतज़ार में था...देखें तो सही क्या हुआ...?

बहुत देर के बाद "डोंगरे" भाई का फोन आया. "डोंगरे" भाई की आवाज़ से ही पता चल रहा था कि जो भी हुआ है बड़ा सुखद हुआ है. "डोंगरे" भाई की खुशी का कोई ठिकाना नहीं लग रहा था. बहुत खुश! अरे क्या हुआ भाई! "डोंगरे" भाई ने बताया- मेरी उस लडकी से बात हो गई...अरे यार में उसको अच्छी तरह जानता हूँ. अब मेन बात ये है कि वो लड़का तलाश रही है और मैं लडकी...

इस पर मैंने जो दो मिसरे लिखे वो कुछ यूँ हैं:
यूँ जो आपसे मुलाक़ात हुई सहरा में जैसे बरसात हुई
---
"डोंगरे" भाई के लिए तमाम दुआएं...
आगे-आगे जो ही मग़र हमें ज़रूर बताएं.
होनी हो अच्छे तो हो जाए शुरुआत अभी,
हो जो भी मग़र तन्हाइयां कट जाएँ
--
आपका;
अमित के सागर
उल्टा तीर मौजे-सागर

Saturday, December 27, 2008

कहानी तृष्णा की ...

दोस्तों PLZ READ...

कहानी तृष्णा की ...

तिलिस्म सात सवाल का ...


http://umranala-post.blogspot.com/2008/12/blog-post_24.html

कहानी FM की ... रेडियो की कहानी
CHHINDWARA आकाशवाणी
यानी .... मेरी कहानी ....

ब्लॉग - उमरानाला पोस्ट पर
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Thanks
RAMKRISHNA DONGRE
Mob : +91-98730 74753
Blog: http://chhindwara-chhavi.blogspot.com/

Sunday, December 21, 2008

बाबा विष्णु खरे, मुलाक़ात, मेट्रो में राधेश्याम

आज दोपहर हम लोग घूमने निकले ... प्लान पहले से तय नहीं था ... रविवार है इसलिए मेरे पास भी पूरा वक्त था . पहले प्लान फिल्म सिटी , सेक्टर -१६ नॉएडा जाने का था फिर प्लान ... मंडी हाउस का बन गया . वहां बाबा श्री विष्णु खरे जी से मुलाकात करना था ।


कार्यक्रम शाम ५.३० बजे था , लेकिन हम लोग २ - २.३० बजे ही निकल गए। रास्ते में लक्ष्मीनगर में कुछ काम था । फ़िर हम लोग जनकपुरी वाली बस में बैठ कर मंडी हाउस जा पहुंचे । chhindwara ke बुजुर्ग लेखक , पत्रकार से पहली बार आमने -सामने की मुलाक़ात थी । काफी अच्छी मुलाक़ात रही ... राधेश्याम से भी बाबा ने बात की, जॉब के लिए सलाह दी कि चिंता म़त करो - सब ठीक हो जाएगा । बाबा से मिलकर बहुत खुशी हुई । बाबा कवि, लेखक तो है ही ... वे दिल्ली में हमारे परिवार के बुजुर्ग की तरह है ।

आज राधेश्याम -रामधन को मेट्रो में भी बैठने का मौका मिला । उसे बहुत ही अच्छा लगा । उसके चहरे की खुशी बता रही थी ।

Sunday, December 14, 2008

वेल कम टू शाहपुर जाट....



वेल कम टू शाहपुर जाट....

बिग बी ... यानी अमित जी, मीतू जी, अमिताभ दुबे का आज जन्म दिन है ... हम यानी राधेश्याम डोंगरे और मैं अभी शाहपुर जाट में है ... मीतू ने हमें कहा - वेल कम टू शाहपुर जाट... और हम आ गए


... दोस्त, भाई और मार्गदर्शक अमिताभ दुबे का नाम मेरे लिए बचपन से ... किसी सेलेब्रिटी से कम नहीं था . पापा से पहली बार मैंने सुना की ...दुबे सर के बेटे अमिताभ ने फिफ्थ क्लास में ब्लाक में पहला स्थान हासिल किया है ... फ़िर उमरानाला स्कूल में आने के बाद मैंने इनके जलवे देखे ... इतने इनाम बटोरते थे की ... बस पूछिये ही मत ... उमरानाला स्कूल में जलवा बिखेरने के बाद जनाब ... डीडीसी कॉलेज chhindwara में पहुंचे ... हम भी वहीं जा पहुंचे ... अमिताभ भाई को वहां भाई बेस्ट स्टूडेंट का आवार्ड मिला ... आप सोच सकते ... जनाब में क्या क्वालिटी होगी ... आज बिग बी दिल्ली में ... पिछले ८-९ साल से ... हम भी दिल्ली आ पहुंचे ... मगर इसका मतलब यह हरगिज़ नहीं ... हम उनका पीछा कर रहे है ... जस्ट जोकिंग ...

तो मीतू भाई १४ दिसम्बर , जन्म दिन की अनेक शुभकमानये ... विश यू अ हैप्पी डे ...
जन्म दिन मुबारक हो ...

आपका दोस्त , भाई
तृष्णा , आरके डोंगरे
http://dongretrishna.blogspot.com

Monday, October 27, 2008

हैप्पी दिवाली : अपनों की कमी सिर्फ मुझे ही या आपको भी


हैप्पी दिवाली : अपनों की कमी सिर्फ मुझे ही या आपको भी

अपनों से दूर रहकर शायद ही कभी अपनों की कमी पूरी होती हो...। मुझे तो यही लगता... और आपको ...। अगर कोई उपाय किसी केपास हो मुझे जरूर बताए। मैं आपका शुक्रगुजार रहूंगा।

दीपावली... प्रकाशपर्व यानी दिवाली। आप सब को दीपोत्सव पर हार्दिक शुभकामनाएं। आप में से जो लोग अपने गांव में, अपने परिवार के बीच दिवाली मना रहे हैं वे उन लोगों की बनिस्बत ज्यादा खुश होंगे, जो लोग अपने घर, अपने गांव नहीं जा सकें। मेरे जैसे कुछ लोग उन्हीं लोगों की सूची में आते हैं।
खैर...। हम अपने से दूर रहे या अपनों के करीब ...। हमें दिवाली को इन्जॉय तो करना ही है। मुझे अपने बचपन की दिवाली भी याद है और पिछले साल या उससे पिछले साल की दिवाली भी...।

बात पिछले साल की दिवाली की करते हैं। पिछले साल मैं दिल्ली से घर गया था। सभी के लिए कपड़े मैंने खरीदें थे। मेरे घर में एक पीढ़ी अपने बचपन के दौर से गुजर रही है। जिसमें मेरे दो भतीजे और एक भतीजी शामिल है। मैं छोटे- छोटे पटाखें, अनार दाने और फूलझड़ी खरीद कर लाता हू और हां ... साथ में टिकली भी। बड़ा भतीजा सोनू हमेशा इन चीजों से दूर भागता है। अभी वह 6 साल का हो गया है ... कई साल से उसका रवैया ऐसा ही रहा है... ।

अब बात मेरे बचपन की। हम तीन भाई और बड़ी दीदी भी कुछ इसी तरह केस्वभाव केरहे हैं। मैं और मेरा छोटा रामधन छोटे-छोटेपटाखे और लक्ष्मी पटाखे फोड़ा करते थे...। जवार केखेत में पक्षियों को भगाने केलिए कई दिनों तक हम पटाखे फोड़ा करते थे।

खास बात जो मुझे याद आती है वो ये कि मैं रंगोली सजाने, घर की साफ-सफाई करने और सामान को व्यवस्थित करने में सबसे आगे रहता था। कौन- सा सामान कहां होना चाहिए, यह मुझे हमेशा अच्छी तरह याद होता था। इसलिए घर की साफ-सफाई केबाद सामान जमाने की जिम्मेदारी मेरी ही होती थी।
इस बार दिवाली पर मैं घर नहीं गया। ऐसे मौके पर मुझे सभी की याद आ रही है। मोबाइल के चलते सभी से रोज बात हो जाती है। फिर भी मन नहीं भरता। कई दोस्तों, परिचितों को एसएमएस किया, कुछेक को फोन किया फिर भी चैन नहीं मिला। अपनों से दूर रहकर शायद ही कभी अपनों की कमी पूरी होती हो...। मुझे तो यही लगता... और आपको ...। अगर कोई उपाय किसी केपास हो मुझे जरूर बताए। मैं आपका शुक्रगुजार रहूंगा।

एक बार फिर आप सबको दिवाली की हार्दिक शुभकामनाएं। हैप्पी दिवाली।

Friday, October 3, 2008

सरकार की उपेक्षा से गिरमिटिया बनते बिहारी

सरकार की उपेक्षा से
गिरमिटिया बनते बिहारी

विश्वनाथ सुमन

पुराने आंकड़ों पर गौर करें बिहार से बाहर पलायन करने वालों में कोसी क्षेत्र के लोग अधिक हैं। 1954 में कोसी बैराज बनने के बाद अभी तक चार बार तटबंध टूट चुका है और पिछले 50 वर्षों में इस क्षेत्र के लोग पलायन करने वालों में शामिल हैं।
आशंका जताई जा रही है कि इस साल भी इस क्षेत्र से ही पांच लाख लोग उद्योगों वाले शहर में पहुंचेंगे, काम की तलाश में। कहीं काम नहीं करेंगे तो करेंगे क्या? सरकार के पास ऐसी योजना नहीं है, जो इनके कदम रोक ले।


1834 में अंग्रेजों की ज्यादती के कारण पहली बार बिहार के कुछ लोग गिरमिटिया बने, अब कुदरत के कहर और सरकार की उपेक्षा के कारण गिरमिटिया बन रहे हैं, वह भी अपनी मर्जी से। आखिर जीना तो सभी चाहते हैं।

अथ बिहार कथा ...

बाढ़ ने ही बीमारू राज्य बना दिया बिहार को
प्रत्येक वर्ष करीब 55 लाख बिहारी दूसरे राज्यों में रोजी रोटी तलाशने निकलते है
प्लानिंग कमीशन की मानें तो बिहार की 42.6 फीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे जिंदगी गुजार रही
एक रिपोर्ट के अनुसार बिहार की 82 प्रतिशत श्रमिक कृषि, मछली पालन सहित प्राइमरी सेक्टर से जुड़े हैं


बिहार फिर मुसीबत में हैं। इस राज्य के 16 जिले कोसी के कहर की चपेट में हैं। करीब 755 गांवों के 25 लाख लोग प्रत्यक्ष रूप से इस विभिषिका से प्रभावित हैं। टूटी रेल पटरियां, सिर पर गठरी लेकर सुरक्षित ठिकाने की तलाश करते वृद्ध और महिलाएं, जलमग्न खेत, दशहत और बेबसी की कहानी कहतीं इस तरह कितनी तस्वीरें अखबारों के पन्नों पर दिख रहे हैं।

खबरिया टीवी चैनलों में इस भयावह आपदा के दृश्यों को देखकर लोग सिहर जाते हैं। हालात दिन ब दिन बदतर होते जा रहे हैं। बाढ़ में फंसे लोग दो जून की रोटी और पानी के लिए तरस रहे हैं। अब तो बाढ़ से घिरे लोग ही नहीं, दूर परदेस में बैठे लोग भी यह सोचने को मजबूर हो गए कि यह बुरे दिन कब खत्म होंगे। रोज बढ़ रहे कोसी के कहर और सरकारी इंतजामात से यह नहीं लगता है कि यह विपदा जल्द ही खत्म हो जाएगी। इसलिए लोगों ने पलायन करना भी शुरू कर दिया है।

हालांकि यह इस प्रदेश के लिए बाढ़ और पलायन कोई नई समस्या नहीं है। शायद ही कोई ऐसा वर्ष बीता हो, जब बाढ़ ने विकराल रूप नहीं दिखलाया हो।

पिछले वर्षों में कमला, बलान, गंडक, बागमती और अधवारा समूह की नदियां उत्तर बिहार को जलमग्न करती रहीं हैं। बाढ़ ने ही इस राज्य को बीमारू बना दिया और इसका नतीजा यह रहा है कि प्रत्येक वर्ष करीब 55 लाख बिहारी दूसरे राज्यों में रोजी रोटी तलाशने निकल जाते हैं।

प्रदेश के 35 जिलों में से 24 जिले कमोवेश बाढ़ प्रभावित रहे हैं। इनमें से 11 जिलों में तो हर साल बाढ़ पैर पसार ही लेती है। कुल मिलाकर बिहार का 73.6 प्रतिशत हिस्सा बाढ़ से ग्रस्त है। यहां के सिर्फ पांच जिले ही ऐसे हैं, जहां बाढ़ और सूखा का प्रकोप नहीं होता है।

जाहिर तौर पर बाढ़ और सूखे की वजह से फसलें भी चौपट होती रहीं हैं और लोग रोजी-रोटी की तलाश में भागते रहे हैं शहरों की ओर। इस बार भी स्थिति और भी विकराल है और इसका असर काफी लंबे समय तक रहेगा। इस कारण इस बार घर छोड़कर परदेस जाने वालों की तादाद काफी बढ़ेगी। फिर जाएंगे दिल्ली, हरियाणा, मुंबई, सूरत, लुधियाना और इंदौर। खेतिहर श्रमिकों की कमी से जूझ रहे पंजाब और हरियाणा को मजदूर आसानी से मिल जाएंगे। दिल्ली और लुधियाना में बिहार के मजदूरों की खेप आनी शुरू हो गई है। कई परिवार के साथ आए तो कई परिवार को उनके भाग्य के भरोसे छोड़ आए । इस उम्मीद के साथ कि जब वापस जाएंगे तो उनकी जरूरतों को पूरा कर लेंगे। इस दौरान ये श्रमिक कहीं भी, कैसे भी के आधार पर गुजारा कर लेंगे।

इस बीच क्षेत्र विशेष में वहां के उपराष्ट्रवाद और उनके सियासी गुस्से को झेल लेंगे। इसके सिवा उनके पास चारा ही क्या है। इन दिनों उनका साथ उनके पुराने परिचित दे रहे हैं जो उनसे पहले घर छोड़ चुके हैं। पुराने आंकड़ों पर गौर करें बिहार से बाहर पलायन करने वालों में कोसी क्षेत्र के लोग अधिक हैं। 1954 में कोसी बैराज बनने के बाद अभी तक चार बार तटबंध टूट चुका है और पिछले 50 वर्षों में इस क्षेत्र के लोग पलायन करने वालों में शामिल हैं।

आशंका जताई जा रही है कि इस साल भी इस क्षेत्र से ही पांच लाख लोग उद्योगों वाले शहर में पहुंचेंगे, काम की तलाश में। कहीं काम नहीं करेंगे तो करेंगे क्या? सरकार के पास ऐसी योजना नहीं है, जो इनके कदम रोक ले। प्लानिंग कमीशन की मानें तो बिहार की 42.6 फीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे जिंदगी गुजार रही है। राज्य के अन्य जिलों की अपेक्षा कोसी परिक्षेत्र में ही बीपीएल परिवारों की तादाद अधिक है। उदाहरण के तौर पर अररिया की 78.6 फीसदी आबादी बीपीएल पैमाने के नीचे गुजर बसर कर रही है। इंडियन इन्स्तित्युत ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की रिपोर्ट के अनुसार बिहार की 82 प्रतिशत श्रमिक कृषि, मछली पालन सहित प्राइमरी सेक्टर से जुड़े हैं। कल कारखाने हैं नहीं। 2006-07 में इंडटि्रयल डिवेलपमेंट रेट 5.5 फीसद रही (जबकि नैशनल रेट 20.1 है )।
ऐसे हालात में प्राकृतिक आपदा से घिरा यह तबका क्या करें? हाथ पर हाथ धरकर कब तक सरकार की राहत का इंतजार करे? हालांकि इस श्रम पलायन का खामियाजा खुद बिहार को ही उठाना पड़ रहा है। विधानसभा में पेश इननॉमिक सवे 2006-07 मे जब खुलासा हुआ कि पिछले एक साल में खाद्यान्न का उत्पादन स्तर 26.4 फीसदी तक गिर गया है। इसके बावजूद सरकार को कम होती श्रम शक्ति का एहसास नहीं हुआ।

फिलहाल दु:ख की इस घड़ी में पूरा देश बिहार के साथ खड़ा दिख रहा है। हर तरफ से मदद के हाथ बढ़ रहे हैं। मगर इस राज्य के पलायन की समस्या को भी बाढ़ और सूखे की मार से अलग करके देखना सही नहीं होगा। कोई भी अपना घर, अपना गांव नहीं छोड़ना चाहता है और न ही परदेस में दर-दर की ठोकरें खाना।

1834 में अंग्रेजों की ज्यादती के कारण पहली बार बिहार के कुछ लोग गिरमिटिया बने, अब कुदरत के कहर और सरकार की उपेक्षा के कारण गिरमिटिया बन रहे हैं, वह भी अपनी मर्जी से। आखिर जीना तो सभी चाहते हैं।

अब इस पलायन को रोकने की जिम्मेदारी भी समाज और सरकार को मिलकर उठानी होगी।
दो महत्वपूर्ण क्षेत्र में सहयोग और सुविधा से प्राकृतिक आपदाओं से त्रस्त बिहार की इस समस्या का निदान हो सकता है। पहला वहां की कृषि संबंधी सुधार किए जाएं । दूसरा वहां शिक्षा की बेसिक और उच्च शिक्षा की गुणवत्ता सुधारा जाए। शायद बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर के डिवेलप होने के बाद घर छोड़ने वालों के कदम देहरी छोड़ने से पहले ठिठकेंगे तो सही।


विश्वनाथ सुमन



(लेखक दिल्ली के एक राष्ट्रीय अखबार में कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत है . इन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल से वर्ष 2005 में मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म का कोर्स भी किया है . खास बात ये है की लेखक ख़ुद उस राज्य के मूल निवासी है जिसकी कहानी वे बयां कर रहे है .)