Thursday, March 4, 2010

बीस रुपये, एक थाली, एक रूमाल तो नहीं मिला ... मिली सिर्फ मौत

बाबा के पुण्य के चक्कर गई दर्जनों की जान

दर्जनों, सैकड़ों और हजारों की तादाद में होने वाली मौतों पर हम मातम करें या मंथन। हासिल कुछ भी नहीं होने वाला। अब तक कई धार्मिक आयोजनों में हजारों की संख्या में लोग मारे गए है। मगर ये सिलसिला बदस्तूर जारी है। शायद धार्मिक आयोजनों में जाने से न तो लोगों को रोका जा सकता है, और न वहां होने वाले ऐसे हादसों को।


बीस रुपये, एक थाली, एक रूमाल, एक लड्डू को लेने की खातिर गए इन लोगों को मौत मिली। कोई यह भी कह सकता है कि इन्हें कृपालु महाराज का आशीर्वाद पाने का लोभ था।


अब लोगों को भगवान याद आ गया। वही भगवान जिससे उम्मीद की जाती है वह सबकी रक्षा करेगा। क्या सचमुच ऐसी जगहों पर होता है कोई भगवान ? मनगढ़ के भक्ति धाम में बाबा कृपालु जी महाराज ने अपनी पत्नी की पहली बरसी पर पुण्य कमाने के लिए यह भंडारा आयोजित किया था। तो बाबा के पुण्य के चक्कर ६३ लोगों ने अपनी जान गंवा दी।

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सवाल- ६३ लोगों की मौत का जिम्मेदार कौन? जवाब- बाबा, प्रशासन और स्वयं वे लोग। हम सब के मन में पहला सवाल यही उठा होगा। आखिर प्रतापगढ़ के मनगढ़ में कृपालु महाराज के आश्रम में गईं इतनी जिंदगियों का जिम्मेदार कौन है? मैंने भी यही सहज सवाल एक शख्स से पूछा था।

धर्म के नाम पर दुनिया में क्या कुछ नहीं चल रहा है। आखिर चले भी क्यों न। दूसरे क्षेत्रों शिक्षा, मनोरंजन, खेल की तरफ धर्म भी अब कारोबार का रूप ले चुका है। मगर सवाल यह है कि मंदिरों, मेलों, आश्रमों में होने वाली मौत का जिम्मेदार कौन है? एक सुर में सभी का कहना होता है कि जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की बनती है। क्योंकि सुरक्षा और व्यवस्था देखना इनका काम है। नाकामी प्रशासन की ही है।

बीस रुपये, एक थाली, एक रूमाल, एक लड्डू को लेने की खातिर गए इन लोगों को मौत मिली। कोई यह भी कह सकता है कि इन्हें कृपालु महाराज का आशीर्वाद पाने का लोभ था। बताया जा रहा है कि भंडारे में बंटने वाला भोग हर हाल में पाने के लिए लोग समय से दो तीन घंटा पहले ही मनगढ़ आश्रम के सामने जुटने लगे थे। महाराज से 'सुखी रहो, जीते रहो का आशीष लेने पहुंचे थे लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था। प्रसाद की जगह मौत मुंह बाए उनका इंतजार कर रही थी। अपने बेटे, बेटियों और मां बहनों को गंवा चुके लोगों के सामने एक ही सवाल था कि हे ईश्वर यह कैसा न्याय है।

अब लोगों को भगवान याद आ गया। वही भगवान जिससे उम्मीद की जाती है वह सबकी रक्षा करेगा। क्या सचमुच ऐसी जगहों पर होता है कोई भगवान? मनगढ़ के भक्ति धाम में बाबा कृपालु जी महाराज ने अपनी पत्नी की पहली बरसी पर पुण्य कमाने के लिए यह भंडारा आयोजित किया था। तो बाबा के पुण्य के चक्कर ६३ लोगों ने अपनी जान गंवा दी। भंडारे में करीब पंद्रह से पच्चीस हजार लोग पहुंचे थे। आखिर इन बाबाओं के आयोजनों में लोग जाते ही क्यों है? ऐसा क्या है जो लोग सम्मोहित से खिचें चले जाते हैं। 'भक्ति' या तथाकथित भक्ति ऐसी होती है...। जान गंवाने के लिए जाते है लोग...। मंदिरों और मेलों में अफवाहों से भगदड़ मचना समझ में आता है, लेकिन इन बाबाओं के आश्रमों में ये सब...।

एक सवाल यह भी है आखिर ऐसे कार्यक्रमों में इतनी भीड़ उमड़ती क्यों है। क्या आस्था, भक्ति या श्रद्धा के नाम पर...। भूख और चीजों को दान में पाने का लालच में इन बेतहाशा लोगों को यहां खींच लाता है। साफ जाहिर होता है कि हजारों की तादाद में उमड़ती भीड़ के लिए भक्ति की भावना से ज्यादा भूख-गरीबी जिम्मेदार है।

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बाबा कृपालु जी महाराज का सच

  • आलीशान रहन-सहन का आदी हैं कृपालु महाराज
  • इटैलियन मार्बल से चकाचौंध है भक्ति धाम
  • त्रिनिदाद में कथित रेप से हो चुकी है किरकिरी
  • महज ३४ साल की आयु में पांचवें जगद्गुरु की उपाधि

महज ३४ साल की आयु में कृपालु जी महराज को पांचवें जगद्गुरु की उपाधि दी गई थी। वह देश-विदेश में घूमकर प्रवचन और लोगों को राधा-कृष्ण भक्ति का संदेश देने लगे। प्रसिद्धि फैली तो मनगढ़ भक्ति धाम में देश-विदेश से भक्तों की भीड़ जमा होने लगी। कृपालु जी महाराज ने पंचम जगद्गुरु की उपाधि मिलने के बाद अपनी जन्मस्थली भक्तिधाम मनगढ़ को सजाना-संवारना शुरू कर दिया था। कृपालु जी महाराज का जन्म वर्ष १९२२ में मनगढ़ में हुआ। उन्होंने इंदौर, चित्रकूट, वाराणसी में साहित्य, आयुर्वेद का अध्ययन किया। १६ वर्ष की उम्र में राधा कृष्ण भक्ति का प्रचार शुरू किया।

2 comments:

Suman said...

# त्रिनिदाद में कथित रेप से हो चुकी है किरकिरी.nice

Udan Tashtari said...

बहुत दुखद और अफसोसजनक रहा हादसा...