पत्रकारिता एक ऐसा पेशा है जहां आपको हर वर्ग के लोगों से मेलजोल करना होता है, हर विषय का थोड़ा-बहुत ज्ञान अनिवार्य है। लेकिन दिल हमेशा अपनी पसंद की तरफ झुकता है। मेरे लिए वह विषय हमेशा से कला, साहित्य और संस्कृति रहा है।
जब मैं वर्ष 2004-07 के बीच भोपाल में रहा करता था, तब वहाँ के साहित्यकारों से मिलना-जुलना मेरी दिनचर्या का हिस्सा था। अक्सर अपनी एटलस साइकिल से मैं उनसे मिलने उनके घर तक पहुंच जाता था। वह दौर था ज्ञान की भूख शांत करने का।
वर्ष 2013 में जब मैं रायपुर आया, तो यह सिलसिला थमा नहीं। यहाँ सबसे पहली मुलाकात साहित्यकार गिरीश पंकज जी से हुई थी; संयोग से वे मेरे किराए के घर के नज़दीक ही रहते थे।
छत्तीसगढ़ के बड़े साहित्यकारों की बात हो, तो गजानन माधव मुक्तिबोध एक ऐसा नाम है, जो था, है और हमेशा रहेगा। मुझे जब पता चला कि उनके सुपुत्र, दिवाकर मुक्तिबोध Diwakar Muktibodh सर, पत्रकारिता जगत में हैं, तो उनसे मिलने का अवसर अक्सर मिलता रहा। पर, इस बार पहली बार उनके निवास स्थान पर जाना हुआ।
[अंधेरे में, चांद का मुंह टेढ़ा, ब्रह्मराक्षस जैसी कविताओं के रचयिता मुक्तिबोध जी की स्मृतियों से मुलाकात]
रायपुर में विधानसभा रोड पर स्थित सड्डू इलाके की मेट्रो ग्रीन सोसाइटी में उनका घर है। घर के प्रवेश द्वार पर ही आपको मुक्तिबोध की स्मृतियों का एहसास होने लगता है। अंदर पूरा घर उनकी विरासत को सहेजे हुए है — उनकी तस्वीरें, उनकी रचनाओं के अंश... हर जगह उनकी उपस्थिति महसूस होती है।
पिछले 12 वर्षों से मैं रायपुर में हूँ। पहले वे देवेंद्र नगर में रहा करते थे, तब भी कई बार दिवाकर सर से घर पर मुलाकात को लेकर बातचीत हुई, पर व्यस्तता के कारण घर पहुंचना नहीं हुआ। पर इस बार, माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय की हमारी वरिष्ठ साथी, सुमिता जायसवाल मैडम की वजह से यह सार्थक संयोग बन गया।
मुलाकात का विषय व्यक्तिगत कुशलक्षेम के अलावा मुख्य रूप से पत्रकारिता और उसके बदलते स्वरूप पर केंद्रित रहा।
दिवंगत गजानन माधव मुक्तिबोध जी की विरासत को सहेजते हुए, उनके पुत्र दिवाकर मुक्तिबोध सर से यह मिलन मेरे साहित्यिक अनुराग को एक नई दिशा देने वाला साबित हुआ।
छत्तीसगढ़ की पावन माटी में जन्मे मूर्धन्य लेखक-साहित्यकारों में कुछ नाम मुझे हमेशा स्मृत रहते हैं—पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, गजानन माधव मुक्तिबोध, माधवराव सप्रे, मुकुटधर पांडे आदि। उनके परिवारजनों से भेंट आज भी मुझे हृदयस्पर्शी लगती है। इसी कड़ी में मुक्तिबोध जी के पुत्र दिवाकर मुक्तिबोध सर से यह संक्षिप्त मुलाकात अत्यंत सौहार्दपूर्ण रही। भविष्य में उनसे और गहन, लंबी चर्चाओं की आशा करता हूँ।
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*गजानन माधव मुक्तिबोध का संक्षिप्त परिचय*
गजानन माधव मुक्तिबोध (1917-1964) हिंदी साहित्य के प्रगतिशील कवि, आलोचक और कहानीकार थे। उनकी रचनाएँ मध्यमवर्गीय बुद्धिजीवी के आंतरिक द्वंद्व, सामाजिक विषमता और मानवीय संघर्ष को प्रतीकात्मक गहराई से उकेरती हैं। अंधेरे में उनकी शिखर कविता है, जो 55 पृष्ठों में आत्मसंघर्ष का चित्रण करती है। अन्य चर्चित कविताएँ हैं—भूरी-भूरी खाक धूल, देवी मुझे न जला दे, प्रलाप और जीने की आस। मुख्य पुस्तक चाँद का मुँह टेढ़ा है (1964) हिंदी काव्य की मील का पत्थर है।
'चांद का मुंह टेढ़ा है' से:
"चांद का है टेढ़ा मुँह!!"
"ज़िन्दगी में झोल है!!"
"गड़ गये, गाड़े गये !! झड़ गये, झाड़े गये !! चीरी गयीं, फाड़ी गयीं !!"
'ब्रह्मराक्षस' और अन्य कविताओं से:
"विचार आते हैं लिखते समय नहीं, बोझ ढोते वक्त पीठ पर"
"(वह नहीं दीखता... नहीं ही दीखता, किन्तु वह रहा घूम तिलस्मी खोह में ग़िरफ्तार कोई एक...)"
अन्य चर्चित पंक्तियां:
"बैचेनी के साँपों को मैंने छाती से रगड़ा है।"
"हमारी भूख की मुस्तैद आँखें ही थका-सा दिल बहादुर रहनुमाई पास पा के भी बुझा-सा ही रहा इस ज़िन्दगी के कारख़ाने में उभरता भी रहा पर बैठता भी तो रहा बेरुह इस काले ज़माने में।"
~~ रामकृष्ण डोंगरे~~
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