Monday, December 12, 2022

Rachna Dairy : मेरी कविता - खबरों का नशा

| मेरी कविता - खबरों का नशा |

खबरों में भी, 
नशा होता है।
कुछ खबरों को पढ़ने
से नशा हो जाता है।

लेकिन उस नशे से कुछ नहीं मिलता।
ऐसी नशीली खबरों की संख्या बढ़ रही है,
बढ़ाई जा रही है
ताकि आप पर इसका नशा
एक बार चढ़ जाए तो उतरे ना।
ऐसी नशीली खबरों से बचें।

नशा कीजिए
अच्छी खबरों का, 
जिससे आपको कुछ हासिल हो।
ज्ञान मिले, प्रेरणा मिले, 
आनंद मिले, मन को शांति मिले।

बुरी खबरों की
दुनिया से दूर रहे।
क्योंकि खबरों में भी
नशा होता है।

©® *रामकृष्ण डोंगरे Ramkrishna Dongre Pawar तृष्णा*

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Sunday, December 11, 2022

Naidunia Raipur : नईदुनिया, नवदुनिया और जागरण के देशभर के संस्करणों में प्रकाशित - मेरा हौसला बड़ा है... स्टोरी

लोकप्रिय समाचार पत्र दैनिक जागरण, नईदुनिया, नवदुनिया के देशभर में प्रकाशित संस्करणों में आज मेरी स्टोरी 'मेरा हौसला बड़ा है'... प्रकाशित हुई है।

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अंतर्राष्ट्रीय पर्वत दिवस विशेष इस स्टोरी में मैंने देशभर की महिला पर्वतारोहियों से बात की है। इनमें हरियाणा की आदरणीय संतोष यादव, झारखंड की प्रेमलता अग्रवाल, उत्तर प्रदेश की अरुणिमा सिन्हा, मध्यप्रदेश की बेटियों मेघा परमार, भावना डेहरिया (छिंदवाड़ा), हरियाणा की शिवांगी पाठक, छत्तीसगढ़ की अंकिता गुप्ता शामिल है।

सभी से बात करके अहसास हुआ कि पुरुषों के लिए माने जाने वाले इस फील्ड में महिलाओं ने किस तरह अपना वर्चस्व कायम किया है। अपनी पहचान बनाने के लिए लालायित महिलाओं में ऐसा जुनून होता है, जो पर्वत को भी डिगा देता है। किसी ने 16 साल की उम्र में, किसी ने 48 साल की उम्र में तो किसी ने एक पैर नहीं होने के बावजूद दुनिया की ऊंची ऊंची चोटियों पर देश का तिरंगा लहराया है। 

कहते है ना कि... 
मंजिलें क्या है, रास्ता क्या है, 
हौसला हो तो फासला क्या है...
(आलोक श्रीवास्तव जी का शेर) 

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 Via  Dainik Jagran App.

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Wednesday, November 23, 2022

दिल्ली- नोएडा डायरी 2022 : आदरणीय देवप्रिय अवस्थी Devpriya Awasthi सर से आत्मीय मुलाकात ...

पत्रकारिता के वरिष्‍ठजनों से मुलाकात के क्रम में मैंने परम आदरणीय श्री देवप्रिय अवस्‍थी सर से मुलाकात की। अवस्‍थी सर से मेरी पहली मुलाकात साल 2006-07 में दैनिक भास्‍कर भोपाल में हुई थी, जब मैं माखनलाल यूनिवर्सिटी की ओर से लिखित परीक्षा देने गया था। यहां टेस्‍ट हमारा श्री अरुण आदित्‍य Arun Aditya सर ने लिया था। टेस्‍ट पास करने के बावजूद किन्‍हीं कारणों से हमारी ज्‍वाइनिंग अटक गई। इस बीच मई, 2007 मैंने अमर उजाला नोएडा ज्‍वाइन कर लिया। अगले साल ही अवस्‍थी सर भी बतौर एग्‍जीक्‍युटिव एडिटर अमर उजाला नोएडा में आ गए।

लगभग पांच-छह वर्ष तक यहां सर से सीखने का मौका मिला। वे कभी डांटते नहीं थे। भाषायी, वाक्य रचना संबंधी त्रुटियों को इस तरह समझाते थे कि एक बार जानने के बाद आप कभी  दोबारा वह गलती नहीं दोहराएंगे। मुझे याद है कि वे भाषीय त्रुटियों पर पैनी नजर रखते थे और संपादकीय सहयोगियों को समझाते थे कि ऐसा नहीं, ऐसा लिखना चाहिए। उन्‍होंने मुझे पहली बार बताया था कि अगर आप वाक्‍य में कामा लगाकर लिखेंगे तो जिससे, जिसमें लिखा जाएगा। अगर आप फुल स्‍टॉप लगाकर नया वाक्‍य बना रहे हो तो आपको इससे, इसमें लिखकर अपनी बात आगे बढ़ाना चाहिए।
पत्रकारिता या जीवन में इंसान सारी उम्र सीखता रहता है। अलग-अलग तरह की गलतियां हर कोई करता है लेकिन आपकी किसी गलती की तरफ जब कोई ध्‍यान दिलाता है तो आपका कर्तव्‍य बनता है कि दोबारा वह गलती आप न दोहराए। जैसे- भोपाल में मेरे पहले पत्रकारिता संस्‍थान दैनिक समाचार पत्र स्‍वदेश में साल 2004 में बताया गया था कि जब एक्‍शन की बात होगी तो हम कार्रवाई लिखते है लेकिन जब बात प्रोसिडिंग की आती है तो हम कार्यवाही लिखेंगे। अवस्‍थी सर ने दैनिक भास्‍कर और अमर उजाला सभी जगह शब्‍दावली और वर्तनी पर काफी काम किया था।

आदरणीय अवस्‍थी सर के पत्रकारीय सफर की बात करें तो उन्‍होंने 1976 में दैनिक जागरण से शुरुआत की थी। 1979 में नवभारत टाइम्स,दिल्‍ली आए. फिर  1983 से श्री प्रभाष जोशी जी के सान्निध्‍य में जनसत्ता में काम किया. वे जनसत्ता, दिल्ली के न्यूज रूम की धूरी तो रहे ही. उसके चंडीगढ़ और मुंबई संस्करणों के पहले समाचार संपादक भी रहे. सर चार दशक से ज्‍यादा समय तक पत्रकारिता में सक्रिय रहे। आपने दैनिक भास्‍कर. रायपुर में भी एक साल तक स्थानीय संपादक के रूप में जिम्‍मेदारी संभाली।  भास्कर समूह की भास्कर समाचार सेवा (सेंट्रल डेस्क) की शुरुआत भी उन्होंने ही की.  नईदुनिया, चौथा संसार और राजस्‍थान पत्रिका में भी अपनी सेवाएं दी। 
इन दिनों आप गाजियाबाद में रहकर परिवार के साथ वक्‍त बिता रहे हैं। आप सोशल मीडिया पर सक्रिय रहते थे। समसामयिक मुद्दों पर बिना किसी संकोच के अपनी राय जाहिर करते हैं। आपके सोशल मीडिया अकाउंट से जुड़कर कई युवा पत्रकारों को हमेशा कुछ नया सीखने और समझने को मिलता है। अवस्‍थी सर ने बताया कि दैनिक भास्‍कर समूह ने नए पत्रकारों के प्रशिक्षण के लिए भोपाल में भास्कर पत्रकारिता अकादमी खोली थी. शुरुआत में उसकी जिम्मेदारी भी उनके पास थी. पहले बैच के 18 प्रशिक्षुओं में से लगभग आधे में  लोग उच्‍च पदों पर कार्यरत हैं। उन्‍होंने कहा कि पत्रकारिता के कालेजों, विश्वविद्यालयो से निकले वही लोग सफल होते है, जिनका इस पेशे के प्रति अतिरिक्‍त लगाव होता है। बाकी लोग ऐसे शिक्षा संस्‍थानों से पढ़कर पत्रकारिता में सफल हो जाएंगे, इसकी कोई गारंटी नहीं है। उनका मानना है कि मीडिया संस्‍थानों को ही पत्रकारों की नई पीढ़ी तैयार करने की पहल करना चाहिए।

लगभग एक दशक के बाद आदरणीय अवस्‍थी सर से मुलाकात हुई। हालांकि इस दौरान मोबाइल पर संपर्क बना हुआ था। सर स्‍वस्‍थ हैं और कुशलतापूर्वक जीवन बिता रहे हैं। ईश्‍वर से कामना है कि आपको हमेशा यूं ही बनाए रखें। ईश्‍वर ने चाहा तो जल्‍द ही मिलने का अवसर मिलेगा।

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Monday, November 14, 2022

पिताजी की पुण्यतिथि : काश आप आज हमारे बीच होते...

|| ॐ || पिताजी की 16 वीं पुण्यतिथि || ॐ |

आज मेरे पिताजी स्व. श्री संपतराव डोंगरे की 16 वीं पुण्यतिथि है। साल 2006 में 15 नवंबर को ही वे अचानक हम सभी को छोड़कर इस दुनिया से दूर चले गए। 

मुझे याद है वो मनहूस दिन। जब मुझे भोपाल में एमजे की पढ़ाई के दौरान खबर मिली कि पिताजी (भाऊ) को अटैक आया है। जल्दी घर आ जाओ। किसी तरह देर रात को छिंदवाड़ा पहुंचा। फिर सुबह गांव। 

घर पहुंचते तक मेरी आंखों में आंसू का नामोनिशान नहीं था। मुझे इस बात पर यकीं नहीं हो रहा था कि पिताजी नहीं रहे। घर पहुंचकर जब वहां का माहौल और पिताजी का मृत शरीर देखा तो मेरे आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। बहुत मुश्किल से मुझे लोगों ने संभाला। 

हालांकि मेरा लगाव हमेशा मां से ज्यादा रहा। मां जहां प्रेरणास्त्रोत है। वहीं पिता की तरफ से हमेशा मुझे आजादी मिली। मन मुताबिक सब काम करने की। उनकी तरफ से कभी कोई रोक-टोक नहीं होती थी। एक बार वे मेरे लिए कुछ हजार रुपए लेकर भोपाल आए थे। ट्रेन में चोरी के डर से सारी रात जागते रहे। 

बड़ी बहन और हम तीन भाइयों की सभी जरूरतों वे बराबर ख्याल रखते थे। कभी किसी बात के लिए उन्होंने हमें मना नहीं किया। वे आज होते तो शायद घर-परिवार का माहौल अलग होता। उनके बगैर अब मां परिवार को संभाल रही है। अपनी जीविका के लिए हम दो छोटे भाई घर से दूर है। कभी बहुत याद आता है वो अपना घर- परिवार और सबको जोड़कर रखने वाले भाऊ। कहां चले गए वो दिन और वो लम्हें। 

पिताजी को सादर नमन और भावभीनी श्रद्धांजलि।
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आज पिताजी की पुण्यतिथि है।
उन्हें मैं हृदय से नमन करता हूं। 

आज मेरे पिताजी (भाऊ) श्री सम्पतराव डोंगरे जी को इस संसार को छोड़े हुए 16 बरस हो गए। उनकी याद हमेशा आती है। उस पल का याद नहीं करना चाहता, जब आप हमें छोड़कर हमेशा के लिए जा रहे थे। क्योंकि उस वक्त मैं सिर्फ रो रहा था। अपने आप को संभाल नहीं पा रहा था। 

आप रहते थे तो देखते कि आपके बच्चे क्या कर रहे हैं। काश आप होते तो हमें आपकी सेवा का अवसर मिलता।

अगर आप आज हमारे बीच होते तो हम
आपका 72वां जन्मदिन मना रहे होते।

आपने कभी कोई निर्णय या बंधन हम पर नहीं थोपा।
आप हमेशा मुझे खुद से फैसले लेने के प्रेरित करते थे।

कोशिश करता हूं कि आपकी तरह बनूँ।
मुझसे कभी किसी को बुरा नहीं हो।
हमेशा दूसरों की सहायता करूं।

विनम्र श्रद्धांजलि

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Tuesday, June 21, 2022

Gust Writer : गुजरातियों के छत्तीसगढ और मध्य प्रान्त में आने की कहानी


डाॅ. परिवेश मिश्रा 
सन् 1882 में नागपुर से राजनांदगांव के बीच जब मीटरगेज रेल लाईन बिछाने का काम शुरू हुआ तब बीच का इलाका घने जंगलों और नदी नालों वाला, किन्तु आमतौर पर सपाट था। लाईन आसानी से बिछ गयी। सिर्फ एक हिस्सा छूट रहा था। गोंदिया के पास जहां मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ और महाराष्ट्र की सीमाएं मिलती हैं, वहां पहाड़ था और बिना सुरंग (बोगदा) बने लाईन नहीं जा सकती थी। 

प्रचलित कहानी के अनुसार बड़े इंजीनियर ने दीवार पर टंगे नक्शे पर निशान लगाते कर कहा था यहां से पहाड़ खोदना शुरू करो। किन्तु युवा अंग्रेज़ इंजीनियर अनुभवहीन था और काम शुरू करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। उसे किसी जबर्दस्त मोटिवेशन की आवश्यकता थी। सो बड़े ने सुझाव दिया :  कल्पना करो कि पहाड़ के उस पार तुम्हारी पत्नी खड़ी है। तुम्हे वहां पहुंचना है और उसे "किस" करना है। लेकिन इंजीनियर के लिए हिम्मत जुटाना आसान नहीं था। काम शुरू करने से पहले मजदूरों ने अपने साहब को दसियों बार बड़बड़ाते सुना - "शैल आय किस हर ?" "शैल आय किस हर ?" (मैं उस छोर को "किस" कर पाऊंगा?)। युवा इंजीनियर के तमाम अविश्वास और शंकाओं के बावज़ूद काम शुरू हुआ। तब तक यह वाक्य, मजदूरों की अपनी जुबान में, उनके उच्चारण में, उनका नारा बन गया था। 

और एक दिन मजदूरों ने वह पत्थर हटाया जिसके दूसरी ओर रौशनी थी, सिरा मिल गया था। युवा इंजीनियर खुशी के मारे चीख उठा -"देयर आय किस हर" ( मैंने सही सिरा चूम ही लिया)। खुश मजदूर भी थे। उनके बीच भी नारा उठा, उनकी जुबान में, - "देअर आय किस हर"। पहले छोर की तरह यहां भी मजदूरों की दूसरी बस्ती बसी। दोनों बस्तियों के स्थान पर - सुरंग के दोनों सिरों पर - स्टेशन बने। इनके नाम मजदूरों ने पहले ही तय कर दिये थे। सलेकसा (शैल आय किस हर) और दरेकसा (देअर आय किस हर)। 

नागपुर-राजनांदगांव सेक्शन शुरू होते ही छत्तीसगढ को अपना घर बनाने वाले गुजरातियों के आगमन का मार्ग खुल गया। 
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उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध का समय, विशेषकर 1870 के बाद का, गुजरातियों के लिए बहुत कष्ट का दौर था। सूखे और अकाल के इन वर्षों में अंग्रेज़ों के व्यवसायिक लालच का दुष्परिणाम कृषि पर दिखने लगा था। आमदनी के स्रोत घटने पर राज्य ने भूमि, नमक और शराब पर टैक्स अनाप-शनाप बढ़ा दिये थे। गरीबी, बेरोजगारी और भुखमरी से लड़ाई हारते हज़ारों परिवार गुजरात छोड़ने के लिए मजबूर हुए। उन्नीसवीं सदी के "द ग्रेट इंडियन माईग्रेशन" में बड़ी संख्या में गुजराती समुद्र पार गये। लेकिन उतनी ही संख्या में लोगों ने देश के भीतर पूर्व की दिशा में - बंगाल और बर्मा तक - पलायन किया। ऐसे लोगों का बड़ा हिस्सा अंग्रेज़ों के सेन्ट्रल प्राॅविन्सेज़ (सी.पी.) में आया। 

सन 1870 में जब नागपुर और मुम्बई के बीच रेलमार्ग बनना शुरू हुआ, तब तक नागपुर से आगे छत्तीसगढ की ओर रेल लाईन लाने का अंग्रेज़ों का कोई ठोस इरादा नहीं बन पाया था। लेकिन यहां लाईन जनता की मांग के कारण नहीं बल्कि अंग्रेज़ों की मजबूरी और उनके स्वार्थ के चलते आयी। मध्य प्रान्त में रेल लाना अपरिहार्य हो गया था।  
* दो रेल पटरियों को जोड़ने के लिए बीच में बिछाई जाने वाली पट्टी - रेल्वे स्लीपर - जो अब कांक्रीट की होती हैं, कुछ समय पहले तक लोहे की और उससे भी पहले - शुरुआती दौर में - लकड़ी की बनी होती थी। वनों को काटकर बड़े वृक्षों से स्लीपर बनाये जाते थे। भारत भर में इनकी भारी मांग थी और अधिकांश जंगल मध्य भारत में थे। इंजिन भाप से चलते थे और इसी इलाके में कोयला के भंडार भी थे। 

* छत्तीसगढ के महानदी कछार में, विशेषकर धमतरी-राजिम-कुरुद इलाके में सरप्लस धान पैदा हो रहा था। इसे गुजरात जैसे उन इलाकों में भेजा जा सकता था जहां के खेत अफ़ीम, कपास, तम्बाखू और नील से पाट दिये गये थे और जहां खाने के लिए अनाज नहीं था। साथ ही यहां की वनोपजों का तब तक व्यापारिक दोहन शुरू नहीं हुआ था लेकिन इसकी असीम सम्भावनाएं जगजाहिर थी। प्रमुख था तेन्दू पत्ता जिससे बीड़ी बनती थी। 

इस पृष्ठभूमि में नागपुर और राजनांदगांव के बीच रेल लाईन की शुरुआत हुई थी। बनाने की जिम्मेदारी दी गयी सी.पी. सरकार की छत्तीसगढ स्टेट रेल्वे को (1888 में बंगाल-नागपुर रेल्वे ने इसे खरीदकर ब्राॅडगेज में बदला और हावड़ा से जोड़ा)। 
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गुजरातियों की कहानी रेल लाईन, वनोपज, चावल मिलों और बीड़ी के बिना बताना संभव नहीं है। 

यहां "गुजराती" शब्द उन लोगों के लिए प्रयुक्त है जिनकी भाषा, बोली, खान-पान की पद्धतियां, जीवन-शैली आदि समान थीं। लेकिन एक और समानता इन्हे आपस में बांधती थी। ये सारे परिस्थितियों के मारे, मजबूरी में, अपनी जड़ों से उखड़कर आजीविका की तलाश में यहां आये थे। सब ने गरीबी देखी थी। कुछ ने भुखमरी की हद तक। अनेक के पास हुनर और सब के पास भविष्य के लिए सपने और विश्वास था। इन गुजरातियों में जैन, वैष्णव हिन्दू, पाटीदार, कच्छी मेमन, खोजा, पारसी और दाऊदी बोहरा परिवार शामिल हैं। केवल एक समुदाय था जो आर्थिक रूप से अपेक्षाकृत खुशहाल था। फिर भी बेहतर भविष्य की तलाश में बाहर निकला था। यही वह समाज था जो बाकी गुजरातियों की उंगली पकड़ उन्हे रास्ता दिखाते इस इलाके में लाया था। यह समुदाय था "कच्छी गुर्जर क्षत्रिय" समुदाय। 
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गुजरात के कच्छ और सौराष्ट्र इलाके में बसे कच्छी-गुर्जर-क्षत्रिय समाज को निर्माण (कन्स्ट्रक्शन) और माईनिंग के क्षेत्र में पुश्तैनी महारत हासिल थी। जिन दिनों भारत में इंजीनियरिंग काॅलेज नहीं खुले थे, इस समाज के बच्चे पैदा होते ही, पिता, भाई और समुदाय के अन्य लोगों के साथ सिविल इंजीनियरिंग का काम सीखने में जुट जाते थे। और यह परम्परा सदियों से चली आ रही थी। कच्छ और सौराष्ट्र में महलों, किलों, नहरों आदि का निर्माण यही समाज करता आया था। समय के साथ देश में इनकी ख्याति आर्किटेक्ट और निर्माण-ठेकेदार के रूप में स्थापित हो गयी थी। स्थानीय लोग इन्हे "मिस्त्री" या "ठेकेदार" के रूप में संबोधित करते थे। कच्छ के राजा साहब के दिये धनोटी, कुम्भारिया, लोवारिया, मालपार, मेघपार, जैसे अठारह गांवों में बसा यह समुदाय राठौड़, सोलंकी, परमार, चौहान, सावरिया जैसी उपजातियों में बंटा रहा है। सरनेम का चलन आने पर अनेक लोग "मिस्त्री" शब्द का प्रयोग भी करते हैं। 
उन्नीसवीं सदी में गुजरात के दूसरे लोगों की तरह यह समुदाय भी बेहतर जीवन की संभावनाएं कच्छ के बाहर तलाश रहा था। 1850 के दशक में जब अंग्रेज़ों ने रेल निर्माण का फ़ैसला किया तो इस समुदाय ने लपक कर इस अवसर को जकड़ लिया और समय के साथ रेलमार्गों पर अपना लगभग एकाधिकार स्थापित कर लिया। सिन्ध और रावलपिंडी से लेकर असम और चेन्नई तक इन्होने रेल लाईनों में और झारखण्ड की कोयला खदानों तक में इन्होने ठेकेदारी की। किन्तु लेख की बढ़ती लम्बाई मुझे विवश करती है मैं फ़ोकस छत्तीसगढ और मध्य प्रान्त पर रखूं। 

रेल से पहुंचे गुजरातियों के शुरुआती जत्थे में अनेक मिस्त्री ठेकेदार परिवार थे। इनमें कुम्भरिया (कच्छ) के गंगानी परिवार के सात भाईयों का समूह भी था, जिनमें से एक भाई जगमल गांगजी सावरिया ने जयराम मंदान के साथ मिलकर 1890 में बिलासपुर का स्टेशन बनाया। इनमें वालजी रतनजी चौहान भी थे। जगमल सावरिया के बेटे मूलजी सावरिया के साथ साथ वालजी के बेटे जयराम वालजी चौहान को आगे चलकर अंग्रेज़ों ने "राय साहब" के ख़िताब से नवाज़ा। रेल्वे ने अपने ठेकेदार के सम्मान में बम्बई-हावड़ा लाईन पर बिलासपुर के पास एक स्टेशन पाराघाट का नाम बदलकर जयरामनगर रखा। टाटानगर के अलावा संभवतः यह एकमात्र स्टेशन है जिसका नाम अंग्रेज़ों ने किसी भारतीय पर रखा। सावरिया भाईयों में वालजी मेघजी सावरिया ने रायपुर का रेलवे-स्टेशन बनाया और वहीं बसे, श्यामजी गांगजी सावरिया ने रायगढ़ का स्टेशन बनाया और वहीं बसे और वस्ता गांगजी सावरिया ने खरसिया का स्टेशन बनाया। सिंगूरा गांव के रघु पान्चा टांक ने राजनांदगांव स्टेशन बनाया। बहुत लम्बी लिस्ट हैं मिस्त्री समाज के लोगों की उपलब्धियों की। 

गैर-मिस्त्री परिवार आमतौर पर धान/चावल और वनोपज (हर्रा, बेहरा, चिरौंजी, शहद आदि के अलावा मुख्य रूप से तेन्दू पत्ता) के व्यापार में रहे। ऐसे अधिकांश गुजराती कच्छ और सौराष्ट्र जैसी पृष्ठभूमि से आये थे और छत्तीसगढ के राजे-रजवाड़ों के माहौल में घुलमिल जाने में उन्हे परेशानी नहीं हुई। कुछ मदद अंग्रेज़ों ने भी की। 

जैसे सौराष्ट्र के राजकोट के पास उपलेटा से निकलकर आये हाजी अब्बाहुसैन हाजी मोहम्मद दल्ला जिन्होने शुरुआत सुहेला में की थी, वनोपज और चावल के व्यापार के साथ। पड़ोसी राज्य फुलझर के राजा साहब लालबहादुर सिंह जी से परिचय करा कर उन्हे राज्य मुख्यालय सरायपाली में बसाने में अंग्रेज़ मददगार रहे। बाद में इनका और राजा साहब का संबंध घनिष्ठ हुआ और हाजी अब्बाहुसैन के पुत्र हाजी अब्दुल सत्तार दल्ला बसना में स्थापित हुए। हाजी अब्दुल सत्तार के पुत्र डाॅ. अब्दुल रज़्ज़ाक (ऐ.आर.) दल्ला छत्तीसगढ के ख्यातनाम वरिष्ठ सर्जन हैं। अपनी पत्नी डाॅ. नूरबानो दल्ला तथा बहू डाॅ. तबस्सुम दल्ला के साथ रायपुर में ज़ुबेस्ता अस्पताल का संचालन करते हैं। सिकल-सेल बीमारी पर इनके किये काम की देश भर में प्रशंसा हुई है। 

युवा गुजराती गोरधनदास भगवानदास दोशी जी ने हर्रा का व्यवसाय करने के इरादे से धमतरी से जगदलपुर पहुंच कर बस्तर राजा साहब से जंगल ठेके पर ले लिया। किन्तु अनुभव न होने के कारण पहले ही साल गहरे नुकसान में चले गये। तब राजा साहब के सामने वकालत करने अंग्रेज़ अधिकारी ही आया। उसने समझाया कि यदि इस युवा को हतोत्साहित होने दिया गया तो आगे और कोई इतनी दूर जंगल में आये, इसकी संभावना कम ही है। गोरधनदास जी के लिये अगले दो साल तक जंगल टैक्स-फ्री कर दिया गया। उनका व्यवसाय चल निकला।  उस ज़माने में लगभग चालीस हज़ार वर्ग किलोमीटर के जंगल को एक अंग्रेज़ अधिकारी मात्र दो डी.एफ.ओ. और 12 रेन्जरों की मदद से संभालता था। गोरधनदास जी के बेटे श्री किरीट दोशी (श्री भूजीत दोशी के पिता) प्रख्यात पत्रकार रहे। इसी दोशी परिवार की श्रीमती जयाबेन धमतरी से विधायक रहीं। 

गुजरात के मेहसाणा इलाके से निकलकर खरसिया के पास बंजारी गांव में आकर बसे छन्नालाल मेहता के परिवार ने बिलासपुर से आगे की यात्रा बैलगाड़ी पर की थी। रायगढ़ के श्री यतीश गांधी की दादी श्रीमती समरत बेन और खरसिया के श्री हितेंद्र मोदी की दादी श्रीमती तारा बेन छन्नालाल मेहता जी की बेटियां थीं। 

हंसराज राकुण्डला जी के परिवार की बैलगाड़ी यात्रा रायपुर तक रेल पहुंचने के बाद हुई थी। वे रायपुर से कोई तेरह मील पर रसनी गांव में बसे। कुछ वर्षों के बाद- सन् 1901 में - रायपुर से धमतरी तक रेल लाईन बनी और धान की पैदावार बढ़ाने के लिए अंग्रेज़ों ने घमतरी के पास नदी पर एक बांध भी बना दिया। उद्धाटन करने पहुंचे सी.पी. के गवर्नर सर फ्रैंक जाॅर्ज स्ली। इंजीनियर ने सुझाव दिया नये बांध का नाम गवर्नर की पत्नी - मैडम स्ली  के नाम पर रखा जाये। सबने हामी भरी। और "मैडम स्ली" बांध उद्धाटित हो गया। समय के साथ "मैडम" और "स्ली" का स्थानीयकरण हुआ। अब यह बांध "माड़म सिल्ली" के नाम से जाना जाता है। खेती बढ़ी तो किसान मेढ़ों पर दाल उगाने लगे और राकुण्डला परिवार ने रसनी से वहां पहुंच कर पहली दाल मिल स्थापित कर दी। 

इन गुजरातियों ने छत्तीसगढ में चावल मिलों की स्थापना में भी अगुवाई की। सरायपाली-बसना की पहली मिल दल्ला परिवार ने, रायगढ़ के खरसिया के पास पहली मिल छन्नालाल मेहता के परिवार ने और सारंगढ़ की पहली चावल मिल पारसी खुदादाद डूंगाजी ने स्थापित की। 

गोंदिया से नैनपुर और वहां से जबलपुर जुड़ते ही तब तक गोंदिया पहुंचे गुजरातियों के लिए जबलपुर के साथ साथ आगे दमोह और सागर जैसे तेन्दूपत्ता से समृद्ध वनाच्छादित इलाकों में पहुंचने का मार्ग प्रशस्त हुआ। 

1919 में गुजरात के खैरा (नादियाड) ज़िले से छोटाभाई पटेल अपने बेटे जेठाभाई के साथ व्यवसाय करने गोंदिया पहुंचे। गुजरात में खैरा, वदोडरा और आणन्द ज़िलों में ही तम्बाखू ही मुख्य पैदावार होती रही है। कर्णाटक जैसे अन्य इलाकों की तम्बाखू जहां सिगरेट के लिए उपयुक्त माना जाता है, वहीं गुजरात की तम्बाखू बीड़ी के लिए प्रयुक्त होती रही है। अधिकांश तम्बाखू उत्पादक पाटीदार हैं। इन्होने अपने फ़र्म की एक शाखा मध्यप्रदेश के सागर में खोली और उसे अपना मुख्यालय बना लिया। लगभग एक दशक के बाद छोटाभाई के भतीजे मनोहरभाई भी गुजरात से आ गये और गोंदिया का काम भतीजे ने सम्भाल लिया। तम्बाखू गुजरात से मंगा कर यहीं बीड़ी बनाने और बेचने का क्षेत्र और काम बढ़ गया। एक समय इनकी 27 नम्बर (और बंदर छाप) बीड़ी देश की दूसरी सबसे अधिक बिकने वाली बीड़ी  थी। मनोहरभाई ने कम समय में बहुत सफलताएं पायीं। एक समय चालीस से अधिक फैक्ट्रियों में पांच से छह करोड़ बीड़ियां रोज बनती थीं। उनका अपना "सेसना" विमान और अपनी हवाई पट्टी भी थी। समय के साथ बीड़ी का चलन कम होता गया और छोटाभाई जेठाभाई के नाम पर शुरू हुए सीजे ग्रुप का कारोबार अब बीड़ी से हट कर दवा-उत्पादन, रियल एस्टेट, पैकेजिंग, फायनेन्स, और तेल के क्षेत्रों में फैल चुका है। लगभग साठ हज़ार लोग अब भी रोजगार पा रहे हैं। मनोहरभाई के बेटे हैं सांसद श्री प्रफुल्ल पटेल जो विदर्भ (महाराष्ट्र) के बीड़ी-किंग कहलाते हैं। 

सागर की फ़र्म छोटाभाई जेठाभाई ही कहलायी। हालांकि बाद में परिवार के मुखिया मणिभाई पटेल हुए किन्तु उनके परिवार के विट्ठल भाई पटेल को फिल्म गीतकार के रूप में अधिक प्रसिद्धि मिली। वे बाॅबी फ़िल्म में "झूठ बोले कौवा काटे" के अलावा अनेक गानों के रचयिता के रूप में याद किये जाते हैं। 

श्री मोहनलाल जबलपुर में सड़क के किनारे बैठकर बीड़ी बनाया करते थे। यह सन् 1902 की बात है। और फिर उन्होने अपनी बीड़ी को "शेर" ब्रैन्ड के साथ बेचना शुरू किया।  मेहनत रंग लायी और "मोहनलाल हरगोविंद दास"  देश की "नम्बर वन" बीड़ी उत्पादक फ़र्म बनी। मोहनलाल ने अपना कारोबार दत्तक पुत्र परमानन्द भाई को सौंपा। उनके बाद पुत्र श्रवण पटेल ने कमान सम्भाली। 
1930 के आसपास जिन दिनों मोहनलाल हरगोविंद दास फ़र्म अपना कारोबार बढ़ा रही थी, प्रभुदास भाई फ़र्म में मुनीम थे। उन्होने काम छोड़ अपना कारोबार शुरू किया। बेटों जसवन्तलाल और प्रह्लाद भाई ने कुछ समय पिता के साथ काम करने के बाद दमोह में एक बीड़ी फैक्टरी स्थापित की। एक समय ऐसा आया जब इनके "टेलीफोन" छाप की प्रतिदिन दस करोड़ बीड़ियां बनने लगीं और फ़र्म लगभग चार लाख रुपये प्रतिदिन एक्साइज ड्यूटी के रूप में पटाने लगी।  

रायपुर में डी.एम. ग्रुप रियल एस्टेट सेक्टर में बहुत बड़ा नाम है। डायालाल मेघजी भाई के नाम से स्थापित यह कम्पनी किसी समय अपनी मशहूर बादशाही बीड़ी के लिए जानी जाती थी। धमतरी के मीरानी परिवार की गोला बीड़ी हो या रायगढ़ के पास भूपदेवपुर की बाबूलाल बीड़ी, अनेक गुजराती परिवार बीड़ी उद्योग से जुड़े और सफल हुए। इनमें गैर-पाटीदार भी शामिल हैं। 
बीड़ी व्यवसाय में उतरे गुजरातियों में से अनेक मध्य प्रान्त की राजनीति में भी आये। आर्थिक सम्पन्नता के साथ साथ हज़ारों की संख्या में रोज़गार के लिये बीड़ी पर आश्रित ग्रामीण आमतौर पर इनके राजनैतिक करियर का आधार बने। उदाहरण अनेक हैं (पर स्थान कम है)। गुजराती समाज छत्तीसगढ और मध्य प्रान्त की संस्कृति में रच-बस जाने के बावज़ूद अपनी भाषा, खान-पान और सांस्कृतिक परम्पराओं को सहेज कर रखने में काफी हद तक सफल रहा है। इनकी जीवनशैली में सादगी आमतौर पर अब भी बरकरार है। 
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डाॅ. परिवेश मिश्रा
गिरिविलास पैलेस 
सारंगढ़  

साभार : फेसबुक वाल
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Tuesday, May 3, 2022

Women Journalist : भास्कर समूह के ऐलान से महिला पत्रकारों में नई उम्मीदें

"महिलाएं काम के मामले में बहुत सिंसियर, ईमानदार होती है। वे हर टास्क को सिंसेरली पूरा करती है। जबकि पुरुष वर्ग के कई साथी हमेशा लापरवाही करते नजर आते हैं।" -

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हिंदी के एक बड़े समाचार पत्र समूह ने ऐलान किया है कि अगले 1 वर्ष में प्रिंट और डिजिटल के लिए 50 महिला पत्रकारों की नियुक्ति करेगा। पत्रकारिता में महिला की स्थिति बाकी फील्ड की तरह ही है। मतलब उंगलियों पर गिनने लायक नाम। और कुछ जगह तो एक बड़ा शून्य…। 

लगभग दो दशक के अपने पत्रकारिता सफर के आधार पर ही इस पर चर्चा करता हूं। 2003-04 में आकाशवाणी छिंदवाड़ा के इंटरव्यू के दौरान का किस्सा है। वहां एनाउंसर, कंपेयर के रूप सबसे ज्यादा महिलाओं का ही सलेक्शन हुआ था। यह अच्छा संकेत माना जा सकता है कि लगभग 40 नियुक्तियों में 36 महिलाएं थी। 

जब मैंने 2003 में लोकमत समाचार छिंदवाड़ा ज्वाइन किया। वहां पर भी कोई महिला पत्रकार नहीं थीं। लोकमत ब्यूरो में लगभग 8-10 लोगों का स्टाफ था। भोपाल के स्वदेश समाचार पत्र में भी साल 2004 के दौरान कोई महिला पत्रकार नहीं थीं। अगले संस्थान सांध्य दैनिक अग्निबाण में जरूर एकमात्र महिला पत्रकार आरती शर्मा थीं। 

इसके बाद मेरे अगले संस्थान 'राज्य की नई दुनिया भोपाल' में एक महिला पत्रकार स्नेहा खरे की एंट्री हुई, इसमें छोटी सी भूमिका मेरी भी रही। मुझसे कहा गया था कि एक महिला पत्रकार चाहिए। उस वक्त स्नेहा किसी छोटे अखबार या मैग्जीन में थीं। इन दिनों वे मध्यप्रदेश के किसी सरकारी कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर है। सबसे बड़े समाचार पत्र दैनिक भास्कर में उन दिनों दो महिला पत्रकार काफी सीनियर थीं, जिनमें नीलम शर्मा और रानी शर्मा का नाम है। इसके अलावा दिव्याज्योति पाल जैसे और भी कुछ नाम है। साल 2007 में मैंने अमर उजाला नोएडा ज्वाइन किया। यहां कुछ साल बाद दिव्याज्योति पाल ने भी ज्वाइन किया था। इस बड़े संस्थान में आधा दर्जन के करीब महिला पत्रकार रही होगी। इधर दैनिक भास्कर रायपुर में फिलहाल एक महिला पत्रकार लक्ष्मी कुमार है, जो कि सिटी भास्कर में कार्यरत है। और मेरे नए संस्थान में कोई महिला पत्रकार नहीं है।। 

… तो महिला पत्रकारों की संख्या मीडिया में, खासकर प्रिंट मीडिया में काफी कम है। जब उन्हें मौका ही नहीं दिया जाएगा तो उनकी तादाद कैसे बढ़ेगी। महिला पत्रकारों को हमेशा हेल्थ बीट, एजुकेशन बीट या लाइफस्टाइल या आर्ट एंड कल्चर कवर करने के लिए ही कहा जाता है। बहुत कम नाम ऐसे होते हैं छोटे शहरों में, जिन्हें क्राइम बीट या पॉलिटिकल बीट या बड़ी और बीट भी दी जाती हो। 

दूसरा उन्हें समय-समय पर प्रमोशन भी नहीं मिलता। अगर वह देर तक काम करने को खुद तैयार हैं तो उन्हें इसकी भी इजाजत नहीं दी जाती। जबकि हम समानता की बात करते हैं तो आज के समय में महिला - पुरुष में कोई अंतर नहीं है। जितना श्रम पुरुष करते हैं, उतना ही श्रम महिलाएं भी कर सकती है। और करती ही है। अमर उजाला नोएडा में हम जब 2:30 बजे रात को ऑफिस से घर के लिए निकलते थे, तो हमारे साथ दो-तीन महिला पत्रकार हुआ करती थीं। बकायदा उनको सबसे पहले ड्रॉप किया जाता था। 

महिलाओं का ख्याल रखना। या महिलाओं की सुरक्षा का ध्यान रखना, यह सब तो जरूरी है ही लेकिन उन्हें अवसर प्रदान करना और उनकी योग्यता का यथोचित सम्मान करते हुए उन्हें आगे बढ़ाना भी जिम्मेदारी बनती है सभी संस्थानों की। लेकिन पत्रकारिता फील्ड ही क्यों, सभी सेक्टर इसमें पीछे ही रहते है। महिलाओं को पुरुषों के समान वेतन भी नहीं दिया जाता। और मौके तो क्या ही दिए जाएंगे। 

महिलाओं के नाम से कुछ सीनियर्स को 'डर' भी लगता है। इस वजह से भी उन्हें मौके नहीं दिए जाते। दूसरा महिलाओं पर इस तरह के आरोप भी लगाए जाते हैं कि वे आगे बढ़ने के लिए 'दूसरे' रास्ते अपनाती है। जबकि यह अपवाद ही होगा। आगे बढ़ना तो हर व्यक्ति चाहता है। लेकिन हम यह नहीं कह सकते कि कौन या सिर्फ महिला गलत रास्ते अपनाती है। पुरुष भी इस मामले में पीछे नहीं हैं, जो कि अपने बॉस, सीनियर्स की 'अनावश्यक तारीफ', चापलूसी, टीटीएम करके अपने नंबर बढ़ाने में लगे रहते हैं। जबकि उनका काम देखा जाए तो 'शून्य' होता है। वहीं महिलाएं काम के मामले में बहुत सिंसियर, ईमानदार होती है। वे हर टास्क को सिंसेरली पूरा करती है। जबकि पुरुष वर्ग के कई साथी हमेशा लापरवाही करते नजर आते हैं। 

अब हम मीडिया में हाई लेवल पर महिला पत्रकारों की संख्या गिनते हैं। तो पूरे इंडिया में दो-चार या आधा दर्जन नाम ही होंगे है, जो प्रिंट में संपादक के स्तर पर पहुंचे होंगे। लेकिन हम अगर हिंदी पत्रकारिता के प्रमुख राज्य चाहे वह यूपी-बिहार या मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब देखें तो अभी भी कोई बड़ा नाम हमें नजर नहीं आता। जो संपादक लेवल पर हो। हालांकि दैनिक भास्कर समूह ने अच्छी शुरुआत की है भोपाल में उपमिता वाजपेयी को स्थानीय संपादक बनाकर। अब एक साल में 50 महिला पत्रकारों की नियुक्ति के ऐलान ने नई उम्मीद जगाई है। दैनिक भास्कर समूह की यह बेहतरीन पहल दूसरे पत्रकारिता संस्थानों को भी प्रेरित करेगी कि अपने यहां ज्यादा से ज्यादा महिला पत्रकारों को स्थान दें। साथ ही उन्हें आगे बढ़ाने के लिए अवसर भी प्रदान करें। उन्हें पुरुषों के समान वेतन भी दें। 

(लेखक रामकृष्ण डोंगरे करीब दो दशक से प्रिंट मीडिया में सक्रिय है। आपने पत्रकारिता की शुरुआत मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के लोकमत समाचार से की थी। इन रायपुर छत्तीसगढ़ के प्रतिष्ठित अखबार में डीएनई के रूप में कार्यरत है।)

Wednesday, April 27, 2022

Bad Uncle: बैड अंकल से मम्मी को बचाओ, छत्तीसगढ़ महिला आयोग में नाबालिग बच्चियों ने लगाई गुहार

इस खबर को ध्यान से पढ़िए। यह बेहद महत्वपूर्ण खबर है। विवाहेत्तर संबंध (extramarital affairs) का दर्द बच्चों को किस तरह से झेलना पड़ता है। इसका सटीक उदाहरण है। 
छत्तीसगढ़ महिला आयोग (CHHATTISGARH Mahila Ayog) के पास कल एक अजीब मामला पहुंचा। इसमें दो बच्चियों ने आवेदन लगाया कि "बैड अंकल को हमारी मम्मी के पास से दूर करो"... रिपोर्टर ने इसी पंच लाइन से हमें इस खबर को बताया था।

पूरी खबर को देखने के बाद एहसास हुआ कि यह महत्वपूर्ण खबर है। इसलिए इसे प्रमुखता से प्रकाशित किया गया। 

मामला कुछ इस तरह है कि रायपुर नगर निगम Raipur Nagar Nigam में कार्यरत एक महिला के तीन बच्चे हैं, जिनमें दो बच्चियां है जो कि नाबालिग है। एक बेटा डेढ़ साल का है।

महिला अपने पति को छोड़कर किसी अन्य पुरुष के साथ रह रही है। उसने सिर्फ डेढ़ साल के बेटे को अपने पास रखा है। वहीं दोनों बेटियां अपने पिता के साथ है। महिला ने 4 महीने से अपना घर छोड़ दिया है। 

कहीं से कोई उम्मीद नहीं दिखाई दी तो *बेटियों ने इस मामले में महिला आयोग से गुहार लगाई है। उन्होंने कहा है कि हमारी मम्मी को वापस बुलाया जाए। और "बैड अंकल को हमारी मम्मी के पास से दूर किया जाए"...*

इस मामले की सुनवाई चल रही है। छत्तीसगढ़ महिला आयोग ने अब बाल संरक्षण आयोग को मामला सौंपा है।

आज यह खबर तमाम वेबसाइट और नेशनल न्यूज़ का हिस्सा बन गई है। 

पूरी खबर..... 

'बैड अंकल को हमारी मम्मी के पास से दूर करो'

रायपुर (नईदुनिया प्रतिनिधि)। बैड अंकल को मम्मी से दूर रखने के लिए दो बच्चियों ने महिला आयोग से गुहार लगाई है। आयोग ने बच्चियों की मां को पति के पास वापस जाने के लिए काफी समझाया लेकिन वह नहीं मानी। बताया जा रहा है कि पिछले चार महीने से बच्चियों को पति के पास छोड़कर आज महिला दूसरे आदमी के साथ रहने लगी है। महिला आयोग ने मामले को बाल संरक्षण आयोग को सौंप दिया है। बुधवार को एकबार फिर इस मामले को सुलझाने का प्रयास होगा।

मंगलवार को दोनों बच्चियां महिला आयोग के सामने उपस्थित हुई और बैड अंकल को मम्मी से दूर रखने के लिए आवेदन प्रस्तुत किया। उन्होंने गुहार भी लगाई कि उनकी मम्मी को वापस बुलाया जाए। महिला नगर निगम जोन कार्यालय में एआरआइ के पद पर कार्यरत है। 

आयोग की अध्यक्ष डा. किरणमयी नायक ने मामले की गंभीरता को देखते हुये तत्काल रायपुर नगर निगम कमिश्नर को फोन कर महिला को बुलवाया। महिला के साथ जोन कमिश्नर को भी बुलाया गया। 

जोन कमिश्नर की मौजूदगी में महिला को समझाया गया कि वह अपने पति और बच्चों के पास चली जाए। समझाने के बावजूद महिला पर कोई असर नहीं हुआ और उसने स्पष्ट कह दिया कि वह पति के पास वापस नहीं जाएगी।

4 माह से बेटियों को छोड़ा, दूसरे आदमी संग रहने लगी

नगर निगम जोन कार्यालय में पदस्थ महिला के तीन बच्चे है। डेढ़ साल के बच्चे को अपने साथ लेकर वह दूसरे व्यक्ति के साथ रहती है। वहीं, 11 और सात साल की दो बेटियों को पिछले चार महीने छोड़ दिया है। बेटिया फिलहाल अपने पिता के पास है। दोनों मासूम बच्चिया कहती है कि मम्मी के बिना उन्हें कुछ भी अच्छा नहीं लगता है।

©® *पत्रकार रामकृष्ण डोंगरे की कलम से*
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Friday, April 22, 2022

Naidunia Story : मां- बाप के रिश्ते हुए खराब, 17 साल का नाबालिग आठ साल तक रहा अपनों की 'कैद' में

Please call... प्लीज कॉल...

मीडिया के साथियों को आने वाले फोन कॉल और ऐसे मैसेज कई बार किसी की कितनी मदद कर सकते हैं. इसका अंदाजा नहीं लगा सकते. अगर आपने समय पर उनका रिप्लाई कर दिया या उनसे बात कर ली तो....
📝 पत्रकार रामकृष्ण डोंगरे की कलम से... 

आज इस कहानी को शेयर कर रहा हूं. उसकी शुरुआत होती है 17 अप्रैल 2022 को जब मेरे एक परिचित का लगातार मेरे पास कॉल आ रहा था. जब मैं बात नहीं कर पाया तो मैंने व्हाट्सएप पर मैसेज छोड़ा कि... प्लीज व्हाट्सएप कीजिए... फिर 2 दिन बाद उनका फिर मैसेज आता है. क्या मैं बात कर सकता हूं. और इसी के साथ उनका एक टेक्स्ट मैसेज भी आ गया... 

मैसेज ये था... 

नमस्ते।

हमारे सोसाइटी में एक फैमिली है, जिसमें एक लड़का अपने रिलेटिव के साथ रहता है, उसकी मां कभी कभी आती, पर सब उसको बहुत मारते है और खाने भी नहीं देते, और भी बहुत तकलीफ देते है। उसको बाहर से ताला लगा के जाते है और कई बार बाथरूम में बंद रखते है, सोसाइटी के बच्चे उसकी मदद कर रहे , child abuse कॉल सेन्टर में कांटेक्ट किये थे पर मदद नहीं मिली।

कृपया मदद के लिए कोई NGO या कोई मदद करने वाले मिले तो बच्चे को निकाला जा सकता है। बच्चे ने बताया कि वो ऐसा पिछले 10 साल से झेल रहा है।
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मामले की गंभीरता को समझते हुए मैंने तत्काल क्राइम रिपोर्टर साथी @deepak Shukla दीपक शुक्ला जी को इसे फॉरवर्ड किया। उन्होंने भी बच्चे का मामला देख कर सीधे पुलिस अफसरों और संबंधित एजेंसी से संपर्क किया। आखिर एक-दो दिन की मेहनत के बाद बच्चे को गुरुवार को रेस्क्यू किया गया।

जो कहानी सामने आई वह आपकी आंखों में आंसू ला सकती है....

उस नाबालिग बच्चे ने 4 पेज का एक पत्र लिखा था, सोसाइटी के बच्चों के नाम। जिसमें उसने अपने आपको छुड़ाने के लिए गुहार लगाई थी। पत्र बेहद मार्मिक है....

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कहानी बहुत लंबी है. इस कहानी की शुरुआत एक हंसते खेलते परिवार से होती है। जहां एक बच्चा है उसके माता-पिता है। लेकिन उनके खराब रिश्तों की वजह से बच्चा पिछले 8 साल से अपने ही रिश्तेदारों की कैद में था। जहां उसे मारा पीटा जाता था। और हर तरह की तकलीफ दी जाती थी। इसमें उसकी सगी मां और उसके संबंधी शामिल थे।

शादी के कुछ समय बाद मां-बाप के खराब रिश्तों का खामियाजा इस बच्चे को भुगतना पड़ा। पिता ओडिशा चले गए। और मां ने भी बच्चे को यूं ही छोड़कर किसी और से शादी कर ली।

बच्चे से संपर्क रखा जरूर। लेकिन दूसरों को सौंप दिया गया। बच्चे को जिस तरह की यातना झेलनी पड़ी है, वह एक मार्मिक कहानी है। इससे सबक लिया जाना चाहिए। अगर हम अपने बच्चों को इस तरह से तकलीफ देंगे तो उनके मन में रिश्तों के प्रति क्या छवि बनेगी। वह अपने ही मां-बाप को लेकर क्या सोचेगा।

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राजधानी रायपुर की सोलस हाइट्स सोसायटी के जागरूक बच्चों और वहां के जागरूक रहवासियों को धन्यवाद और बधाई। उनके प्रयासों से ही इस बच्चे को कैद से आजाद कराया जा सका।

.... ऐसा ही उदाहरण हमें पेश करना चाहिए। दूसरों की मदद के लिए आगे आना चाहिए। और सभी अपार्टमेंट रहवासियों के लिए यह कहानी एक सबब भी है कि जब किसी को फ्लैट या मकान किराए पर देते हैं तो पुलिस वेरिफिकेशन जरूर करवाएं। इसके अलावा तमाम जांच पड़ताल के बाद ही किसी को फ्लैट मकान किराए पर दें वरना आप किसी भी तरह की मुसीबत में फंस सकते हैं।

©® रामकृष्ण डोंगरे, पत्रकार, रायपुर

THANKS to Satish Pandey Rajkumar Dhar Dwivedi deepak shukla 

Thursday, March 31, 2022

Goodbye Bhaskar : अलविदा भास्कर... दैनिक भास्कर के साथ अपनी पहली पारी को फिलहाल देता हूं विराम...

दैनिक भास्कर रायपुर में अपने 8 साल से ज्यादा लंबे सफर को फिलहाल विराम दे रहा हूं। सितंबर 2013 में मैंने दैनिक भास्कर रायपुर ज्वाइन किया था। यहां मैं बतौर "सिटी डेस्क हेड" अपनी जिम्मेदारी निभाता रहा। 

(दैनिक भास्कर रायपुर में आखिरी दिन। 31 मार्च 2022)

इस दौरान भास्कर रायपुर में कई चेंजेज हुए, कई बदलाव हुए… *बदलाव, परिवर्तन प्रकृति का नियम है, जिसे शायद ही कोई रोक पाया है। 

(परीक्षित त्रिपाठी जी के साथ) 

जब मैंने ज्वाइन किया था। तब श्री आनंद पांडेय जी, संपादक स्टेट एडिटर हुआ करते थे। उसके बाद श्री राजेश उपाध्याय सर आए और अब श्री शिव दुबे सर के मार्गदर्शन में दैनिक भास्कर रोज नई ऊंचाइयों को छू रहा है। 

(विनोद कुमार जी और आकाश धनगर) 

मेरी ज्वाइनिंग के बाद ही मुझे पता चला था कि श्री नवाब फाजिल सर यहां ज्वाइन कर रहे हैं। या ज्वाइन कर चुके हैं। वे ट्रेनिंग पर गए हुए थे। *नवाब सर चूंकि मेरे बॉस थे। इसलिए उनका मुझे हमेशा सपोर्ट मिला। शुक्रिया नवाब सर।* 

हमेशा से आकर्षित करते रहा है भास्कर 


मैं मूलतः जिला छिंदवाड़ा मध्यप्रदेश से हूं। बचपन में जरूर नवभारत, नईदुनिया या लोकमत अखबार पढ़ें होंगे। लेकिन जबसे मीडिया से जुड़ा हूं, दैनिक भास्कर हमेशा से आकर्षित करते रहा है। जब सन 2004 में मैं भोपाल पहुंचा तो मेरा भी सपना था दैनिक भास्कर में जॉब करना। उस वक्त दैनिक भास्कर मेरे लिए बहुत दूर की बात थी। मैंने सभी संस्थानों में अपना रिज्यूमे सबमिट किया। अंत में मुझे एक अन्य अखबार में मौका मिल गया। और इस तरह मेरा भोपाल में पत्रकारिता का सफर शुरू हुआ। जो कि लगभग 3 साल तक पार्ट टाइम और फुल टाइम चलता रहा। 

अमर उजाला नोएडा में थी 7 साल की पहली लंबी पारी 

(भाई मनोज व्यास और हम) 

साल 2007 में देश की राजधानी दिल्ली पहुंचा, जहां एक अन्य प्रतिष्ठित अखबार अमर उजाला दैनिक के साथ मेरी 7 साल की पारी रही। उसके बाद दूसरी सबसे लंबी पारी दैनिक भास्कर रायपुर के साथ ही थी, जो कि 16 सितंबर 2013 से लेकर 31 मार्च 2022 तक थी। 

भास्कर में ज्वाइनिंग अटक गई थी साल 2006-07 में 

(डीबी स्टार वाले संजय पाठक जी और उनकी टीम) 

भास्कर को अलविदा कहते वक्त मैं उन सभी लोगों को याद करना चाहूंगा, जिनमें तमाम वे संपादकगण और सीनियर साथी है, जो आज भास्कर में है या भास्कर छोड़ चुके हैं। जिनसे मुझे कुछ ना कुछ सीखने को मिला। जब 2006-07 में भास्कर भोपाल में मेरी ज्वाइनिंग की प्रक्रिया चल रही थी तब श्री श्रवर्ण गर्ग से मुलाकात हुई थी। श्री देवप्रिय अवस्थी सर से हमेशा सीखने को मिला। हालांकि उस वक्त किन्हीं कारणों से मेरी ज्वाइनिंग नहीं हो पाई थी। 

नवनीत सर से पहली मुलाकात रायपुर आफिस में हुई 

(पहले सिटी भास्कर और अब डिजिटल के स्टार सुमन पांडेय जी) 

श्री नवनीत गुर्जर सर से मेरी पहली मुलाकात श्री आनंद पांडेय जी ने रायपुर आफिस में ही करवाई थी। हालांकि सर का मैंने पहले से ही नाम सुन रखा था। भोपाल या मध्यप्रदेश में कार्यरत सभी सीनियर्स से मेरा थोड़ा या ज्यादा परिचय पहले से ही रहा है। 

(सिटी डेस्क का ये कोना अब छूट रहा है...  Goodbye) 

दैनिक भास्कर रायपुर में आने के बाद श्री आनंद पांडेय सर, श्री राजेश उपाध्याय सर, श्री शिव दुबे सर, श्री नवाब फाजिल सर, श्री यशवंत गोहिल जी और तमाम सीनियर्स और साथियों से सीखने और समझने का अवसर मिला। आप सभी का मैं तहेदिल से शुक्रिया अदा करता हूं. 

(भाई अभिषेक तिवारी) 

इसके अलावा और तमाम साथियों जैसे श्री निजामुद्दीन... निजाम भाई और वीरेंद्र शुक्ला जी, यशवंत गोहिल जी, निकष परमार जी, असगर भाई, ठाकुरराम यादव, मेरे दोस्त और भाई जैसे अमिताभ अरुण दुबे जी, पीलूराम साहू जी, प्रमोद साहू, सुधीर उपाध्याय, जॉन राजेश पाल सर, कौशल भाई, मनोज भाई, राकेश पांडेय जी, नीरज मिश्रा, राजीव शुक्ला जी, सतीश चंद्राकर, सुमयकर, फोटो जर्नलिस्ट भूपेश केसरवानी जी, सुधीर सागर मैथिल जी, सिटी भास्कर टीम से तन्मय अग्रवाल, मनीष, अनुराग, लक्ष्मी मैडम, रीजनल से परीक्षित त्रिपाठी जी, अभिषेक, डिजिटल टीम से श्री विश्वेश ठाकरे सर, सुमन पांडेय भाई, मिथिलेश जी और सिटी डेस्क टीम से डिजाइनर तरुण साहू, विजय जी, विनोद कुमार जी, आकाश, गौरव, डिजाइनिंग टीम से युनूस अली, विपिन पांडेय, प्रवीण, हेमंत साव, हेमंत साहू, धर्मेंद्र वर्मा, बब्बू जी तमाम साथियों का मुझे स्नेह मिला। सहयोग मिला। समर्थन मिला। 

आप सभी से मुझे जो प्यार-स्नेह और आशीर्वाद मिला है, यही मेरे जीवन की अमूल्य पूंजी है। इसे मैं ताउम्र संजोकर रखूंगा।

Wednesday, March 30, 2022

Mulaqaton ke Silsile : पूर्व वरिष्ठ रेडियो उद्घोषक अवधेश तिवारी जी से एक यादगार मुलाकात

(रेडियो के पूर्व वरिष्ठ उद्घोषक अवधेश तिवारी के साथ) 

पिछली छिंदवाड़ा यात्रा में 19 मार्च 2022 को इस बार श्री अवधेश तिवारी जी से मुलाकात करने का मौका मिला. अवधेश तिवारी जी से साल 2000 में पहली बार रूबरू मिलने का मौका मिला था। वैसे सन 1995 से उन्हें रेडियो पर सुना करते थे। 

आप रेडियो के जाने-माने एनाउंसर रहे हैं।

इन दिनों सेवानिवृत्त होने के बाद साहित्य साधना में लगे हुए हैं। आपसे मिलकर बेहद खुशी हुई। वे दिन भी याद आ गए। जब मैं पहली बार आकाशवाणी छिंदवाड़ा पहुंचा था। युववाणी प्रोग्राम में सामान्य ज्ञान प्रश्नोत्तरी "सात सवाल" के विजेता होने पर मुझे इंटरव्यू के लिए इनवाइट किया गया था।

और मेरा पहला इंटरव्यू 9 अगस्त 2000 को टेलीकास्ट हुआ था, जोकि श्री अवधेश तिवारी जी ने ही लिया था। उस इंटरव्यू के दौरान की यादें भी ताजा हुई। और अवधेश तिवारी जी का हमने भी वीडियो इंटरव्यू लिया, जो आप देख पाएंगे।

उन्होंने कई मुद्दों पर बातचीत की। वे लोकल भाषा पर साहित्य सृजन करते रहते हैं। इसके अलावा उन्होंने कई कविताएं भी लिखी है। कुल मिलाकर उनसे मिलकर नई बातें, विषय मिले, जिन पर मुझे आगे काम करना है।
(धर्मेंद्र पवार और मैं। अवधेश तिवारी के साथ।) 

मुलाकात में मेरे साथ थे मेरे भांजे श्री धर्मेंद्र पवार भी थे। वे भी मिलकर गदगद हो गए। आकाशवाणी छिंदवाड़ा रेडियो स्टेशन से हमेशा श्री अवधेश तिवारी जी को सुना करते थे। संभवत पहली बार उनकी रूबरू मुलाकात भी हुई...
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*मैंने तो बचपन में ही कह दिया था*
*एक दिन रेडियो में उद्घोषक बनूंगा*

*DongreJi Online* पर
मिलिए आकाशवाणी के
*जाने-माने पूर्व वरिष्ठ उद्घोषक*
*श्री अवधेश तिवारी जी से।*

उनका जन्म ग्राम पिपरिया रत्ती में हुआ। उन्होंने अंडमान निकोबार द्वीप समूह से लेकर आकाशवाणी छिंदवाड़ा तक अपनी सेवाएं दी।

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*रामकृष्ण डोंगरे*

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Thursday, March 24, 2022

'बाबा' श्री संपतराव 'धरणीधर' : कविता में जीवन वृत्त

दस मार्च उन्नीस सौ चौबीस मोहखेड़ में जन्में थे संपतराव धरणीधर।

 इन्हें प्रोत्साहित करने वाले थे, पिता इनके श्री बापूराव उर्फ तुकड़ों जी धरणीधर। 


मात्र एक वर्ष की आयु में छोड़ गयी थी, माता इनकी अनुसुईया जी धरणीधर। 

पढ़ाई के लिए भटके थे आप, कभी मोहखेड़, कभी छिन्दवाड़ा तो कभी नागपुर। 


बी.ए. की उपाधि हासिल की थी आपने, उन्नीस सौ पैंसठ में विश्वविद्यालय सागर से।

उब्बीस सौ छियालिस, सेण्ट्रल जेल नागपुर में, 'मुझे फाँसी पे लटका दो...' गाते थे जोर-शोर से।


उल्नीस सौ छियालिस में ही मोहगांव स्कूल में, एक वर्ष अंग्रेजी शिक्षक रहे श्री धरणीधर । 

उन्नीस सौ अइतालिस से तक चौरई हाईस्कूल में, अध्यापन कार्य में लगे रहे श्री धरणीधर ।


उन्नीस सौ पचहत्तर में जुट गये थे पूर्णतः साहित्य साधना में। 

स्थानीय कलेक्ट्रेट से क्लर्क के कार्य से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर। 

बालक संपत की पहली रचना हुई थी प्रकाशित, 'बालक' श्री संतराम बी. ए. के अखबार में।

तभी से डटे हुए हैं धरणीधर, साहित्य साधना के दरबार में। 


इनका नहीं कोई घर-द्वार, फिर भी नहीं करते ये किसी से कोई तकरार |


उन्नीस सौ नब्बे दिल्ली में सम्मानित हुए थे धरणीधर, डॉ. बाबा साहब आम्बेडकर राष्ट्रीय पुरस्कार से।

उन्नीस सौ चौरासी में चुने गये थे धरणीधर, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की ओर से प्रदेश के साहित्यकार में।


बीते आठ वर्षों से जिला चिकित्सालय छिन्दवाड़ा में डाले अपना डेरा पड़े हैं मझधार में। 

आज भी होती है इनकी गिनती, सतपुड़ा के महान साहित्यकार में। 


इनकी प्रकाशित कृतियाँ हैं, 'किस्त-किस्त जिंदगी' और 'महुआ केसर'। 

आज भी करते हैं, रचना धरणीधर, ताजा-तरीन है इनकी रचना 'अपनी मौत पर'। 


धर्म, साहित्य, कला, राजनीति, या हो कोई अन्य विषय रखते हैं ये अपने विचार, तब गर्व महसूस होता है हमें इनकी सोच पर। 

याद रखें इनको हर शख्स कहता है ये 'तृष्णा' क्योंकि इनके जैसा नहीं कोई दूसरा साहित्य जगत का मुरलीधर। 

ये है 'बाबा' हमारे श्री संपतराव धरणीधर

©® रामकृष्ण डोंगरे "तृष्णा", कला तृतीय वर्ष, डीडीसी कॉलेज, साल 2002


Friday, March 11, 2022

Transgender : समाज की नफरत का परिणाम है ट्रांसजेंडर की हरकत... जानिए आखिर पूरा सच क्या है...


( तस्वीर साभार : गूगल से) 

(हमारे ये ट्रांसजेंडर साथी समाज की नफरत का परिणाम है। जब यह पैदा होते हैं तो समाज इन्हें नफरत भरी निगाहों से देखता है। और अपने घर से समाज से अलग कर देता है। बचपन से इन्हें प्रेम नहीं मिलता और यही वजह है कि इनके अंदर धीरे धीरे नफरत का गुबार भरते रहता है। और यह गुबार, गुस्सा जब तक सोसायटी के लोगों पर ही फूटते रहता है.)

एक छोटे से वाकये के बाद आज दिल में ये बात उठी कि ट्रांसजेंडर (Transgender) के लीडर से उनकी समस्या पर बात की जाए। 

सबसे पहले तो हमसे रूबरू हुए और कंट्रोवर्सी के कारण बने दो ट्रांसजेंडर से पहली बार बात हुई। हालांकि जिस तरह की शिकायत थी। उसके बावजूद यह लोग बेहद शालीनता से पेश आएं। 

‌अब मामला यह था कि क्यों ना इनके सीनियर से बात करके इस समस्या का स्थायी समाधान निकाला जा सके। 
जब इस बारे में ट्रांसजेंडर (Transgender) की भलाई के लिए काम करने वाले उनके लीडर से बात की गई तो इस समस्या का एक अलग ही पहलू सामने आया। बकौल लीडर, ये लोग हमारी बात क्यों मानेंगे। यह भी एक इंसान हैं। अगर यह कुछ गलत कर रहे हैं तो जैसा कि एक आम आदमी गलत करता है तो उसको दूसरा आम आदमी समझाए तो वह नहीं समझता।

उन्होंने भरे गले से कहा कि हम जब इन गलत प्रवृत्ति के ट्रांसजेंडर को समझाते हैं कि आप चंदा मत मांगिए तो यह लोग सबसे पहले हमसे सवाल करते हैं कि हमारा पेट कैसे भरेगा। आप हमें पहले रोजगार दीजिए। फिर हमें समझाइए। हम घर घर से मांगना बंद कर देंगे।

सवाल और जवाब दोनों ही बड़े हैं। अब असली वजह क्या है इन ट्रांसजेंडर की। 

उन्होंने बताया कि 
हमारे ये ट्रांसजेंडर साथी समाज की नफरत का परिणाम है। जब यह पैदा होते हैं तो समाज इन्हें नफरत भरी निगाहों से देखता है। और अपने घर से समाज से अलग कर देता है। बचपन से इन्हें प्रेम नहीं मिलता और यही वजह है कि इनके अंदर धीरे धीरे नफरत का गुबार भरते रहता है। और यह गुबार, गुस्सा जब तक सोसायटी के लोगों पर ही फूटते रहता है. 

हर जगह अच्छे और बुरे लोग होते हैं. ट्रांसजेंडर में भी कुछ अच्छे लोग होते हैं तो कुछ बुरे भी होते हैं. 

अब हमें मंथन करना चाहिए और समाज से अलग-थलग पड़े इन ट्रांसजेंडर को रोजगार मिले ऐसी पहल करना चाहिए. ताकि ये घर घर पैसे मांगकर लोगों को परेशान और प्रताड़ित ना करें.

©® रामकृष्ण डोंगरे की फेसबुक वॉल से, 11 मार्च 2019

Monday, March 7, 2022

Family Tree : *डोंगरे की परिवार की वंशावली... 10 पीढ़ियों का इतिहास, नारी शक्ति ही हर पीढ़ी की धुरी रही...*

📝 *वरिष्ठ पत्रकार रामकृष्ण डोंगरे की कलम से*

राजा भोज के वंशज और क्षत्रिय पवार (पंवार/परमार/भोयर) समाज से ताल्लुक रखने वाले हमारे परिवार की 10 पीढ़ियां का लेखा जोखा यहां दिया जा रहा है... *कामन महाजन डोंगरे और रे बाई डोंगरे* से लेकर अब तक के सभी परिवारजनों का रिकॉर्ड मौजूद है। कहने को हमारा समाज पितृसत्तात्मक है लेकिन परिवार को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी महिलाएं ही संभालती है। ये बात अलग है कि उन्हें इसका क्रेडिट नाम नहीं मिलता।
(कांसेप्ट एंड रिसर्च : रामकृष्ण डोंगरे मोबाइल : 8103689065) 

हमारा खानदान कई पीढ़ियों से *मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के मोहखेड़ ब्लॉक में ग्राम तंसरामाल में रहता आ रहा है।* मूलतः खेती-बाड़ी ही हमारा पुस्तैनी काम रहा है। लेकिन अगर सदियों पहले की बात की जाए तो *डोंगरे खानदान की शुरुआत होती है सन 1010-1055 के कालखंड में। यानी राजा भोज के समय से। वहां पर प्रताप सिंह डोंगरे नाम के व्यक्ति थे। उन्हीं से डोंगरदिया यानी डोंगरे वंश चालू हुआ।* डोंगरे समेत तमाम गोत्र के लोग पहले सैनिक हुआ करते थे। माना जा सकता है खेती किसानी से भी जुड़े रहे होंगे। लेकिन मालवा से विस्थापित होकर मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा, बैतूल, सिवनी, बालाघाट और महाराष्ट्र के वर्धा, गोदिंया, यवतमाल समेत देशभर में जाकर बसने के बाद सभी मूल रूप से कृषि कार्य से ही जुड़ गए। 

गौरतलब है कि मालवा इलाके में धारा नगरी हुआ करती थी, जिसका वर्तमान नाम धार जिला मध्यप्रदेश है। यहां पर परमार पंवार राजाओं का राज्य था, जिसके नौवें राजा राजा भोज (सन् 1010-1055 ई.) हुए। तब से लेकर अब तक का लिखित इतिहास हमारे पास मौजूद है। 

*प्रताप सिंग डोंगरे के 2 बेटे थे, कारू सिंग और महाप्रयाग सिंग। उन्होंने मुसलमानों से खूब युद्ध किया था। कारू सिंग का बेटा नांद देव, बेटी रुपला बाई और पत्नी झमीया थी। नांददेव का बेटा सुमन सिंग था। सुमन सिंग धार के राजा राय महल देव के पास वजीर थे। जब मुसलमानों ने धार पर आक्रमण किया तो उनसे युद्ध में सुमन सिंग मारे गए। उन्होंने पवारों से कहा था कि यहां से सब छोड़कर चले जाओ। तब पवार इधर उधर जाकर बस गए।* (सुमनसिंग-जोधी) के बेटे नारूदेव, वीरदेव, गोरदेव थे। फिर नारूदेव और लखाई को गौलु सिंग, नौलु सिंग बेटे हुए। तथा गौलु सिंग को देवल्या देव पुत्र हुआ। देवल्या देव और हाराई को खोकल्या भाई, चिमना भाई, खंगू भाई, घुड़या पुत्र थे। इनका वंश देवगढ़ छिंदवाड़ा में रहे। मोतीराव भाट भी इनके साथ इधर ही आ गए थे। इनका वंश भी इधर ही है। नौलु सिंग का बेटा हिरन्या था। इनका वंश बैतूल और वर्धा में है। 

*मेरी माताजी गौरा बाई डोंगरे ने बताया कि तंसरा के सारे डोंगरे एक ही है। ईकलबिहरी में दो डोंगरे भाई थे। उनमें झगड़ा हुआ तो एक भाई भागकर तंसरा आ गया। शायद उसके ही खानदान के सारे लोग हो।*
मुझे यह बताने में गर्व महसूस होता है कि हमारा परिवार शायद कई पीढ़ियों से मातृसत्तामक ही रहा है। जहां तक मुझे जानकारी है *मेरे पिताजी स्व. श्री संपतराव डोंगरे की दादी मां यानी श्रद्धेय पूनी बाई ने अपनी पाई-पाई जमा की गई रकम से हमारी पुस्तैनी जमीन खरीदी। जहां आज हमारे परिवार रहते हैं। उसी जमीन को हमारी दादी मां ने अपने सीधे और सज्जन पति स्व. किसन डोंगरे के साथ मिलकर सजाया-संवारा। यानी मरते दम तक खेतों में बैलगाड़ी चलाने से लेकर हर तरह के काम किए।*

मेरी सबसे बड़ी प्रेरणास्त्रोत दादी (डोकरी माय) ही थीं। उनकी परंपरा को मेरी मां श्रीमती गौरा बाई और भाभी जी कैकई (चमेली) बाई आगे बढ़ा रही है।
जब भी कोई दुख की घड़ी आती है तो मेरे मुंह से "ओ मां" ही शब्द निकलते हैं। मां मेरी कमजोरी और ताकत भी है। घर से दूर रहने के कारण बरबस ही मां की याद आ जाती है, आंखों में आंसू झरने लगते हैं। लेकिन तभी मां के वे शब्द कान में गूंजने लगते हैं। बेटा- तुम दोनों भाइयों को बाहर निकलकर कुछ करना है। अपना और हमारा नाम बढ़ाना है।

शायद यही वजह है हम आज भी मुश्किलों से घबराते नहीं, जूझते है और अपने आप को संभाल लेते हैं।

मां से मिली मुझे प्रेरणा, ताकत और भरोसा 

ओ मां.... तुझे सौ सौ सलाम... 
महिला दिवस पर नारी शक्ति को सलाम। 

*( वरिष्ठ पत्रकार और ब्लॉगर रामकृष्ण डोंगरे के द्वारा मदर्स डे पर 8 मई 2016 की लिखी मूल पोस्ट। इस पोस्ट में 8 मार्च 2022 को संशोधन किया गया है।)*

_नोट : अपने परिवार की ऐसी वंशावली (फैमिली ट्री) आप भी बना सकते है। एक तस्वीर की तरह आपके घर की दीवार में लगाने से आपके परिजनों को कई पीढ़ियों की जानकारी मिल सकेगी।_

©® *वरिष्ठ पत्रकार व ब्लॉगर रामकृष्ण डोंगरे*
Website : http://dongretrishna.blogspot.com/
FB PAGE : https://www.facebook.com/dongreonline/
लेआउट-डिजाइन : तरुण साहू

Saturday, February 19, 2022

भागवत गीता सुनाने वाली अनोखी किताब, जानिए सबकुछ इसके बारे में || talking bhagavad gita

दुनिया की पहली बोलती Talking भागवत गीता... * (संपर्क : 8103689065 वाट्सएप & फोन)*


भागवत गीता... 

*अब सिर्फ पढ़े नहीं बल्कि सुने भी...*

11,200 रुपये मूल्य की ये श्रीमद भागवत गीता (Talking Bhagavad Gita with Wisdom Flute) बोलने वाली बांसुरी यानी इलेक्ट्रानिक डिवाइस के साथ आती है। 


चिप और सेंसर युक्त इस भागवत में कमाल की टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया है। ये भागवत गीता संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी के अलावा *मराठी, गुजराती, उड़िया, बांग्ला, तमिल, तेलगू और कन्नड़ समेत 14 भाषाओं में आपको भागवत कथा सुनाती है।* इसमें कई और फीचर है। भगवान श्रीकृष्ण के 108 भजन है। इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस या Wisdom Flute 30 मिनट की चार्जिंग के बाद 8 घंटे तक चलता है। 


*विश्व की अनोखी व पहली इस श्रीमद भागवत कथा को प्राप्त करने के लिए नाम और मोबाइल नंबर लिखकर 8103689065 पर वाट्सएप कीजिए या कॉल करें।*


इस भागवत गीता को कर्मयोगी स्व. कल्याण देव वाधवा की प्रेरणा से डीएमपी डिजिटल टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली ने तैयार किया है। सेफ शॉप कंपनी की तरफ से इसकी मार्केटिंग की जा रही है।


*डिजिटल भागवत गीता* 

*बोलती भागवत गीता...* 

*आखिर है क्या??*


_पूरी पोस्ट अंत तक जरूर पढ़ें_


*हम आज भारत की बात करें तो हर घर में भागवत गीता है लेकिन ज्ञान की बात कही जाए तो सिर्फ 1% लोगों को ही इसका ज्ञान होगा l*


डिजिटल भागवत गीता उन सभी के लिए वरदान है---

जिनके पास समय नहीं है l

जो देख नहीं सकते l

जो पढ़ नहीं सकते l

अपने माता-पिता के लिए सुन्दर उपहार l

अपने बढ़ते बच्चों के विकास में सहायक l

*क्योंकि आप इसे सुन सकते हैं*

*14 भाषाओं में सुमधुर संगीत के साथ...*

यह एक ग्रंथ नहीं कर्म ग्रंथ है, 

जिसकी आवश्यकता आज की दौड़ भाग वाली जिंदगी में बहुत है l 


तो अपने घर लाएं 

*दुनिया की पहली*

*बोलने वाली* भागवत गीता.... 


💐💐  

_दुनिया में पहली बार भागवत गीता को वैज्ञानिक तरीके से बनाया गया है. इलेक्ट्रानिक चिप यानी सेंसर युक्त यह किताब *हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत, मराठी, गुजराती, उडिया, बंगाली, तमिल, तेलुगू, कन्नड़* समेत देश-विदेश की 14 भाषाओं में बोलती है।_


सम्पर्क करें :- 


*अधिक जानकारी या श्रीमद् भागवत गीता ग्रंथ को आर्डर करने के लिए कृपया फोन या वाट्सएप करें *8103689065*


*बोलने वाली भागवत गीता...*

 #Talking #bhagavad #gita 


क्या आप अपने बच्चों को अनूठा गिफ्ट देना चाहते हैं? 

क्या आप अपने माता पिता को ऐसा गिफ्ट देना चाहते हैं जो उन्हें धर्म से जोड़ें, गीता का ज्ञान उन तक पहुंचाएं,


वह भी सिर्फ बोलकर।।। 

तो *बोलती भागवत गीता* अपने घर लाइए... 


ऐसा धर्म ग्रंथ जो हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी के अलावा तमाम भारतीय भाषाओं में आपको भागवत गीता सुनाता है।


*अधिक जानकारी के लिए 8103689065 पर कॉल या वाट्सएप पर संपर्क कीजिए* 




Friday, January 14, 2022

प्रज्ञा प्रसाद के वॉल से : कितना जरूरी है पैसा?

"रिश्ते-नाते सब हों, लेकिन भूख से बिलबिलाते या फिर अभावों में जीते, छोटी-छोटी खुशियों के लिए तरसते क्या हम प्यार कर सकते हैं? बच्चे को प्यार करें और उसे खराब स्थिति में देखें तो क्या अच्छा लगेगा? मां-बाप को ही प्यार करें और उनका टूटा चश्मा बनाने के लिए पैसे न हों, तो अच्छा लगेगा?"

अक्सर प्यार, पैसे और रिश्तों की तुलना होते हुए आपने सुना होगा. अधिकतर लोगों का कहना है कि रिश्तों और प्यार से बढ़कर कुछ भी नहीं होता है, लेकिन कभी-कभी मेरे मन में कई ख्याल आते हैं, तो सोचा कि आपसे भी इन्हें बांटूं और आपकी भी राय इस पर जानूं... 

दरअसल परिवार की शुरुआत होती है विवाह नाम की संस्था से, क्योंकि विवाह होगा, तभी संतान होगी, फिर वही पति-पत्नी माता-पिता बन जाएंगे और फिर जब उनके बच्चे बड़े होंगे तब वे अपना परिवार कहेंगे अपने माता-पिता, भाई-बहन, पत्नी/पति और फिर उनकी खुद की संतान को...

अब आते हैं प्यार और पैसे पर.. हम जैसे ही जन्म लेते हैं वैसे ही हमें लगती है भूख, जिसके लिए चाहिए दूध तो वो दूध आता है पैसे से... क्योंकि मां की छाती में भी दूध तभी उतरता है जब उसे पौष्टिक या फिर चाहे जैसा भी आहार मिला हो, तो वो भोजन भी आता है पैसे से... इससे भी पहले जब महिला गर्भवती होती है, तो सबसे पहले उसे डॉक्टर को दिखाने की जरूरत होती है और डॉक्टर को देनी पड़ती है फीस .. फीस मतलब पैसा.. अगर आप सरकारी अस्पताल में निःशुल्क इलाज कराने भी जाएं, तो ऑटो या रिक्शा करने के लिए चाहिए होगा पैसा... दवाई लाने के लिए चाहिए होगा पैसा.. 9 महीने महिला को अच्छी देखभाल यानि अच्छा आहार मिले, तो उसके लिए भी चाहिए पैसा. जब बच्चे के जन्म का समय आया, तो फिर अस्पताल में भर्ती होने के लिए चाहिए पैसा.. बच्चा पैदा हो गया, उसे पहनाने के लिए कपड़ा चाहिए, उसकी दवाई चाहिए, टीकाकरण चाहिए, तेल-पाउडर शैंपू चाहिए, इन सबके लिए चाहिए पैसा.. मां स्वस्थ हो पाए, तो उसे अच्छा खिलाने के लिए, कंफर्ट फील कराने के लिए चाहिए पैसा.. बच्चे को जब भूख लगती है, उस वक्त मां का अथाह प्रेम भी सिर्फ थोड़ी देर ही उसे चुप करा सकता है.. उसे सबसे पहले चाहिए दूध.. इसका मतलब कि जब पेट भरा होता है, जरूरतें पूरी रहती हैं, तभी आप प्रेम को भी महसूस कर पाते हैं. भूख से तड़पने पर केवल खाना चाहिए होता है, उस वक्त न तो किसी का प्रेम अच्छा लगता है और न तो किसी की बातें...

जब बच्चा थोड़ा सा बड़ा हुआ तो उसे पढ़ाने के लिए चाहिए पैसा.. स्कूल भेजने के लिए चाहिए पैसा.. किताब-कॉपी खरीदने के लिए चाहिए पैसा... उसके खिलौने खरीदने के लिए चाहिए पैसा... किसी अलग तरह के फील्ड में करियर बनाना चाहता हो तो उसकी कोचिंग के लिए चाहिए पैसा.. बच्चा जब बड़ा होता है और जब नौकरी के लिए फॉर्म भरना हो तो चाहिए पैसा, जॉब इंटरव्यू के लिए जाना हो तो पैसा.. वर्क फ्रॉम होम करना हो, तो लैपटॉप के लिए चाहिए पैसा.. बात करने के लिए मोबाइल चाहिए वो आएगा पैसे से...

जब बच्चे की शादी करनी हो, तो लड़का या लड़की ढूंढने के लिए या फिर बात-वात चलाने के लिए इधर-उधर जाना पड़ता है, उसके लिए चाहिए पैसा.. शादी तय हो गई, तो शादी करवाने के लिए चाहिए पैसा.. गृहस्थी शुरू कराने के लिए जो सामान देते हैं उसके लिए चाहिए पैसा.. भोज-भात कराने के लिए चाहिए पैसा.. बेहतर जिंदगी के लिए भी चाहिए पैसा... माता-पिता बुजुर्ग हो जाते हैं उनकी देखभाल, उनके भोजन-दवा के लिए भी चाहिए पैसा... 

रिश्ते-नाते सब हों, लेकिन भूख से बिलबिलाते या फिर अभावों में जीते, छोटी-छोटी खुशियों के लिए तरसते क्या हम प्यार कर सकते हैं? बच्चे को प्यार करें और उसे खराब स्थिति में देखें तो क्या अच्छा लगेगा? मां-बाप को ही प्यार करें और उनका टूटा चश्मा बनाने के लिए पैसे न हों, तो अच्छा लगेगा? 

हर मां-बाप ये क्यों सोचते हैं कि बच्चे का करियर अच्छा बन जाए.. अच्छा करियर मतलब जिसमें अच्छे पैसे मिलते हों.... अच्छा खाए स्वस्थ रहे.. अच्छा खाना दूध-फल अनाज सबके लिए चाहिए पैसा.... 

न्यूज की हेडलाइन बनती है-

रिक्शेवाले का बेटा बना कलेक्टर, 
खुद से लिखी अपनी तकदीर
या 
चौकीदार की बेटी जाएगी IIT, 
गरीबी को मात देकर बनाया भविष्य

ये हेडलाइन कहां बनती है...

रिक्शेवाले के बेटे ने पाए बहुत अच्छे संस्कार, 
कभी नहीं बोलता है झूठ

अंबानी के बेटे ने पकड़ी 
ईमानदारी की राह, सादा जीवन उच्च विचार
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यहां भी अच्छा करियर, सुनहरे भविष्य के पीछे का मतलब पैसा और उसके साथ मिलने वाला पावर ही है... 
अरे, लड़की की तो किस्मत ही चमक गई.. गरीब की लड़की इतने अच्छे (अमीर) घर में चली गई... 

यानी गरीब की लड़की की किस्मत भी तभी चमकती हुई मानी जाती है, जब अच्छा कमाने-खाने वाला लड़का मिल जाए...   

रिश्ते संतोष देते हैं, प्यार खुशी देता है, लेकिन उसे एंजॉय तभी किया जा सकता है, जब पैसे से बुनियादी जरूरतें (ठीकठाक भोजन, छोटा मगर अच्छा आवास, करियर ओरिएंटेड शिक्षा, ढंग के कपड़े और सुविधासहित चिकित्सा) पूरी हो चुकी हों... 

मैं खुद को तब रिलैक्स फील करती हूं, जब खा-पीकर, नहा-धोकर बच्चे को बढ़िया ऑनलाइन क्लास करते हुए देखती हूं, तब लगता है अब शांति से बैठती हूं.. लेकिन खा-पीकर यानी अनाज आया पैसे से, नहा-धोकर यानी साबुन-शैंपू आया पैसे से यहां तक कि वॉटर भी आया पैसे से, क्योंकि कॉलोनी मेंटेनेंस में इन्क्लूडेड है... ऑनलाइन क्लास यानी बच्ची के पास मोबाइल है, जो आया है पैसे से.. इतना सबकुछ हो जाने के बाद अब रिलैक्स हो सकी... 

कहीं घूमने जाना है तो चाहिए पैसा (जगह सस्ती-महंगी हो सकती है), किसी के यहां शादी-छठी, बर्थडे में भी जाना हो तो चाहिए पैसा, रिश्तेदारों के यहां जाना हो तब भी चाहिए पैसा.. 

आखिर में मरने के बाद कफन के लिए भी चाहिए पैसा... श्मशान ले जाने के लिए जो चचरी बनेगी उसके लिए भी चाहिए पैसा... जलाने के लिए चाहिए लकड़ी वो आएगा पैसे से.. पंडित क्रियाकर्म कराएगा... उसके लिए लेगा दक्षिणा यानी पैसा....

अब पता नहीं कि पैसा महत्वपूर्ण है या इंसान.. रिश्ता या प्रेम... अगर आपलोग कुछ प्रकाश डाल सकें तो बताएं... 

बाकी मकर संक्रांति की बहुत-बहुत शुभकामनाएं... 
और हां, जो दही-चूड़ा, तिल-लाई, खिचड़ी जो भी खाई हूं, 
उन सबमें भी लगा है पैसा...

(ये आलेख वरिष्ठ पत्रकार प्रज्ञा प्रसाद के फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है। प्रज्ञा मूलतः पूर्णिया बिहार की रहने वाली है। वे डेढ़ दशक से ज्यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय है। दूरदर्शन, ईटीवी, ईटीवीभारत, आईबीसी24 में अपनी सेवाएं दे चुकी है। फिलहाल रायपुर में न्यूज24 मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ के साथ जुड़ी हुई है।)