Tuesday, August 27, 2024
नईदुनिया में दूसरी पारी : इनपुट एडिटर की जिम्मेदारी, चुनाव में ग्राउंड रिपोर्ट से लेकर विशेष खबरों का प्रकाशन
Sunday, December 11, 2022
Naidunia Raipur : नईदुनिया, नवदुनिया और जागरण के देशभर के संस्करणों में प्रकाशित - मेरा हौसला बड़ा है... स्टोरी
Tuesday, May 3, 2022
Women Journalist : भास्कर समूह के ऐलान से महिला पत्रकारों में नई उम्मीदें
"महिलाएं काम के मामले में बहुत सिंसियर, ईमानदार होती है। वे हर टास्क को सिंसेरली पूरा करती है। जबकि पुरुष वर्ग के कई साथी हमेशा लापरवाही करते नजर आते हैं।" -
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हिंदी के एक बड़े समाचार पत्र समूह ने ऐलान किया है कि अगले 1 वर्ष में प्रिंट और डिजिटल के लिए 50 महिला पत्रकारों की नियुक्ति करेगा। पत्रकारिता में महिला की स्थिति बाकी फील्ड की तरह ही है। मतलब उंगलियों पर गिनने लायक नाम। और कुछ जगह तो एक बड़ा शून्य…।
लगभग दो दशक के अपने पत्रकारिता सफर के आधार पर ही इस पर चर्चा करता हूं। 2003-04 में आकाशवाणी छिंदवाड़ा के इंटरव्यू के दौरान का किस्सा है। वहां एनाउंसर, कंपेयर के रूप सबसे ज्यादा महिलाओं का ही सलेक्शन हुआ था। यह अच्छा संकेत माना जा सकता है कि लगभग 40 नियुक्तियों में 36 महिलाएं थी।
जब मैंने 2003 में लोकमत समाचार छिंदवाड़ा ज्वाइन किया। वहां पर भी कोई महिला पत्रकार नहीं थीं। लोकमत ब्यूरो में लगभग 8-10 लोगों का स्टाफ था। भोपाल के स्वदेश समाचार पत्र में भी साल 2004 के दौरान कोई महिला पत्रकार नहीं थीं। अगले संस्थान सांध्य दैनिक अग्निबाण में जरूर एकमात्र महिला पत्रकार आरती शर्मा थीं।
इसके बाद मेरे अगले संस्थान 'राज्य की नई दुनिया भोपाल' में एक महिला पत्रकार स्नेहा खरे की एंट्री हुई, इसमें छोटी सी भूमिका मेरी भी रही। मुझसे कहा गया था कि एक महिला पत्रकार चाहिए। उस वक्त स्नेहा किसी छोटे अखबार या मैग्जीन में थीं। इन दिनों वे मध्यप्रदेश के किसी सरकारी कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर है। सबसे बड़े समाचार पत्र दैनिक भास्कर में उन दिनों दो महिला पत्रकार काफी सीनियर थीं, जिनमें नीलम शर्मा और रानी शर्मा का नाम है। इसके अलावा दिव्याज्योति पाल जैसे और भी कुछ नाम है। साल 2007 में मैंने अमर उजाला नोएडा ज्वाइन किया। यहां कुछ साल बाद दिव्याज्योति पाल ने भी ज्वाइन किया था। इस बड़े संस्थान में आधा दर्जन के करीब महिला पत्रकार रही होगी। इधर दैनिक भास्कर रायपुर में फिलहाल एक महिला पत्रकार लक्ष्मी कुमार है, जो कि सिटी भास्कर में कार्यरत है। और मेरे नए संस्थान में कोई महिला पत्रकार नहीं है।।
… तो महिला पत्रकारों की संख्या मीडिया में, खासकर प्रिंट मीडिया में काफी कम है। जब उन्हें मौका ही नहीं दिया जाएगा तो उनकी तादाद कैसे बढ़ेगी। महिला पत्रकारों को हमेशा हेल्थ बीट, एजुकेशन बीट या लाइफस्टाइल या आर्ट एंड कल्चर कवर करने के लिए ही कहा जाता है। बहुत कम नाम ऐसे होते हैं छोटे शहरों में, जिन्हें क्राइम बीट या पॉलिटिकल बीट या बड़ी और बीट भी दी जाती हो।
दूसरा उन्हें समय-समय पर प्रमोशन भी नहीं मिलता। अगर वह देर तक काम करने को खुद तैयार हैं तो उन्हें इसकी भी इजाजत नहीं दी जाती। जबकि हम समानता की बात करते हैं तो आज के समय में महिला - पुरुष में कोई अंतर नहीं है। जितना श्रम पुरुष करते हैं, उतना ही श्रम महिलाएं भी कर सकती है। और करती ही है। अमर उजाला नोएडा में हम जब 2:30 बजे रात को ऑफिस से घर के लिए निकलते थे, तो हमारे साथ दो-तीन महिला पत्रकार हुआ करती थीं। बकायदा उनको सबसे पहले ड्रॉप किया जाता था।
महिलाओं का ख्याल रखना। या महिलाओं की सुरक्षा का ध्यान रखना, यह सब तो जरूरी है ही लेकिन उन्हें अवसर प्रदान करना और उनकी योग्यता का यथोचित सम्मान करते हुए उन्हें आगे बढ़ाना भी जिम्मेदारी बनती है सभी संस्थानों की। लेकिन पत्रकारिता फील्ड ही क्यों, सभी सेक्टर इसमें पीछे ही रहते है। महिलाओं को पुरुषों के समान वेतन भी नहीं दिया जाता। और मौके तो क्या ही दिए जाएंगे।
महिलाओं के नाम से कुछ सीनियर्स को 'डर' भी लगता है। इस वजह से भी उन्हें मौके नहीं दिए जाते। दूसरा महिलाओं पर इस तरह के आरोप भी लगाए जाते हैं कि वे आगे बढ़ने के लिए 'दूसरे' रास्ते अपनाती है। जबकि यह अपवाद ही होगा। आगे बढ़ना तो हर व्यक्ति चाहता है। लेकिन हम यह नहीं कह सकते कि कौन या सिर्फ महिला गलत रास्ते अपनाती है। पुरुष भी इस मामले में पीछे नहीं हैं, जो कि अपने बॉस, सीनियर्स की 'अनावश्यक तारीफ', चापलूसी, टीटीएम करके अपने नंबर बढ़ाने में लगे रहते हैं। जबकि उनका काम देखा जाए तो 'शून्य' होता है। वहीं महिलाएं काम के मामले में बहुत सिंसियर, ईमानदार होती है। वे हर टास्क को सिंसेरली पूरा करती है। जबकि पुरुष वर्ग के कई साथी हमेशा लापरवाही करते नजर आते हैं।
अब हम मीडिया में हाई लेवल पर महिला पत्रकारों की संख्या गिनते हैं। तो पूरे इंडिया में दो-चार या आधा दर्जन नाम ही होंगे है, जो प्रिंट में संपादक के स्तर पर पहुंचे होंगे। लेकिन हम अगर हिंदी पत्रकारिता के प्रमुख राज्य चाहे वह यूपी-बिहार या मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब देखें तो अभी भी कोई बड़ा नाम हमें नजर नहीं आता। जो संपादक लेवल पर हो। हालांकि दैनिक भास्कर समूह ने अच्छी शुरुआत की है भोपाल में उपमिता वाजपेयी को स्थानीय संपादक बनाकर। अब एक साल में 50 महिला पत्रकारों की नियुक्ति के ऐलान ने नई उम्मीद जगाई है। दैनिक भास्कर समूह की यह बेहतरीन पहल दूसरे पत्रकारिता संस्थानों को भी प्रेरित करेगी कि अपने यहां ज्यादा से ज्यादा महिला पत्रकारों को स्थान दें। साथ ही उन्हें आगे बढ़ाने के लिए अवसर भी प्रदान करें। उन्हें पुरुषों के समान वेतन भी दें।
(लेखक रामकृष्ण डोंगरे करीब दो दशक से प्रिंट मीडिया में सक्रिय है। आपने पत्रकारिता की शुरुआत मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के लोकमत समाचार से की थी। इन रायपुर छत्तीसगढ़ के प्रतिष्ठित अखबार में डीएनई के रूप में कार्यरत है।)
Friday, December 3, 2021
DNE FB Post : ट्रेनी से डीएनई तक का सफर
दैनिक भास्कर रायपुर से पहले मेरा सबसे लंबा समय हिंदी दैनिक अमर उजाला नोएडा में बीता। माखनलाल पत्रकारिता यूनिवर्सिटी भोपाल से 2005 साथ में एमजे की डिग्री कंप्लीट होने के बाद हमारा कैंपस अमर उजाला में हुआ था। मैंने 7 मई 2007 को अमर उजाला, नोएडा ज्वाइन किया था। प्रताप सोमवंशी सर ने हमारा कैंपस भोपाल आकर लिया था। जॉइनिंग के दिन हमारा इंटरव्यू ग्रुप एडिटर श्री शशि शेखर जी ने लिया था।
उस दौरान काफी सारे क्वेश्चन पूछे गए थे. मेरा एक्सपीरियंस जानने के बाद मैंने उनसे कहा कि आप मुझे Sub Editor ज्वाइन करवाएं तो उन्होंने इंकार कर दिया था. और मुझे नए सिरे से बतौर ट्रेनी यहां से नई शुरुआत करनी पड़ी। हालांकि इससे पहले मैं करीब आधा दर्जन संस्थानों में काम कर चुका था। यानी पत्रकारिता में अलग अलग फील्ड की रिपोर्टिंग और डेस्क पर काम करने का लगभग 3 साल का अनुभव मुझे हो चुका था। लेकिन इन संस्थानों में मेरा जॉब पार्ट टाइम जैसा ही रहा। क्योंकि मैं पढ़ाई के साथ ये काम कर रहा था।
साल 2003 में लोकमत समाचार पत्र छिंदवाड़ा से शुरुआत रिपोर्टिंग से हुई। इसके बाद 2004 में स्वदेश समाचार पत्र भोपाल में रिपोर्टिंग के साथ डेस्क की जिम्मेदारी मिली। बीच में कुछ वक्त "शब्द शिल्पियों के आसपास" में काम किया। इसके बाद 2005 में सांध्य दैनिक अग्निबाण में आर्ट एंड कल्चर रिपोर्टर के रूप में काम किया। साल 2006 में राज्य की नई दुनिया में आर्ट एंड कल्चर रिपोर्टर और डेस्क की जिम्मेदारी निभाई।
*अब बात विस्तार से करते हैं अमर उजाला नोएडा की...*
यहां पर हमने बतौर ट्रेनी ज्वाइन किया. सबसे पहले मुझे बिजनेस डेस्क पर रखा गया। इसके बाद जनरल डेस्क पर मेरी नियुक्ति की गई। जहां मुझे सबसे ज्यादा समय तक काम करने का मौका मिला।
अमर उजाला का हेड ऑफिस नोएडा में था। इसीलिए मुझे उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर आदि राज्यों के एडिशन से कोडिनेट करना पड़ता था। हमारी टीम में दो से चार साथी ही थे। लेकिन सबसे शुरुआत से जुड़े होने की वजह कई बार बॉस की अनुपस्थिति में मुझे ही जिम्मेदारी संभालनी पढ़ती थी। इसी दौरान श्री राम शॉ जी जनरल डेस्क में शामिल हुए थे। वे पेज वन पर भी काम करते थे। लेकिन बॉस के नहीं रहने पर वे मेरे साथ भी होते थे।
*मेरे बॉस चूंकि DNE थे. और मैं ट्रेनी था तो वे (श्री राम शॉ) मुझे कहते थे कि तुमको तो ट्रेनी नहीं DNE होना चाहिए... क्योंकि आप ट्रेनी होकर डीएनई का काम करते हो...खैर...।*
जनरल डेस्क पर मेरे सहयोगी थे - चंद्रशेखर राय जी, धर्मनाथ प्रसाद जी, मनीष मिश्रा जी, हरिशंकर त्रिपाठी जी, मनीष, दीपक कुमार जी आदि। और बॉस थे राधारमण जी।
अमर उजाला नोएडा में मुझे ग्रुप एडिटर श्री शशि शेखर जी, श्री देवप्रिय अवस्थी सर, संजय पांडेय जी, श्री निशीथ जोशी जी, श्री शंभूनाथ शुक्ला जी, श्री यशवंत व्यास जी, श्री राधारमण सर, श्री अरुण आदित्य सर, श्रीचंद सर, श्री भूपेन जी, श्री आलोक चंद्र जी आदि का सानिध्य मिला। यहां मैंने बतौर ट्रेनी ज्वाइन किया. उसके बाद सब एडिटर और सीनियर सब एडिटर बना।
पत्रकारिता में मेरे पहले मार्गदर्शक बड़े भैया जगदीश पवार जी हैं, जिन्होंने मुझे इस राह पर चलने के लिए प्रेरित किया. लोकमत समाचार छिंदवाड़ा में श्री धर्मेंद्र जायसवाल के नेतृत्व में बतौर ट्रेनी काम करने के दौरान ही मुझे छिंदवाड़ा दैनिक भास्कर के लिए ऑफर मिला. मुझे परासिया ब्लॉक में ब्यूरो चीफ की जिम्मेदारी दी जा रही थी। लेकिन चूंकि में MA फाइनल ईयर में था. मैंने इस ऑफर को अस्वीकार कर दिया. उसके बाद मुझे दैनिक भास्कर से जुड़ने में कई साल लग गए। जब मैं भोपाल पहुंचा तो ज्यादा किसी से पहचान ना होने के चलते मैंने एक के बाद एक सारे समाचार पत्रों में अपना रिज्यूमे दिया। जहां मुझे स्वदेश समाचार पत्र में तत्काल ही जॉब मिल गई। 3 साल भोपाल में रहने के दौरान मेरा सभी समाचार पत्र के साथियों के साथ परिचय हो गया था।
भोपाल में अलग-अलग संस्थानों में काम के दौरान मुझे श्री अवधेश बजाज जी, अजय बोकिल जी, विनय उपाध्याय जी, पंकज शुक्ला जी, गौरव चतुर्वेदी जी, गीत दीक्षित जी के साथ काम करने और सीखने का मौका मिला।
भोपाल में मेरे कई साथ रहे… जैसे श्री संजय पांडेय जी, हरीश बाबू, जितेंद्र सूर्यवंशी, निश्चय कुमार बोनिया, जुबैर कुरैशी, खान आशु भाई आदि। श्री संजय पांडे जी, जो इन दिनों जमशेदपुर दैनिक भास्कर में बतौर स्थानीय संपादक कार्यरत है. वे मेरे बड़े भाई और मार्गदर्शक है। दैनिक भास्कर रायपुर में मुझे ज्वाइन कराने में उनका बड़ा योगदान रहा है।
आज जबकि में प्रमोट हुआ हूं तो यह खुशी आप सभी के साथ शेयर कर रहा हूं। आप सभी मेरी इस सफलता में सहभागी रहे है।
DNE - Dis (this) is Not the End...
this is just the beginning
अभी तो शुरुआत है…
तो सफलता का यह सिलसिला यूं ही चलता रहे. और आप सभी का स्नेह, आशीर्वाद मुझे मिलता रहे. यही कामना करता हूं… इसी के साथ उम्मीद करता हूं कि और भी नए दोस्त और सीनियर साथी मेरे इस कारवां का हिस्सा बनेंगे…
#DNE_POST #Facebook #डोंगरे_की_डायरी #फेसबुक_पोस्ट
Sunday, June 20, 2021
फेसबुक पोस्ट : मेरे पत्रकारिता जीवन की शुरुआत...
Tuesday, September 11, 2018
दैनिक भास्कर : फेक न्यूज जान लेती है
*फेक न्यूज़ जान लेती है...*
WhatsApp, Facebook या किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर शेयर की जा रही फेक पोस्ट, फेक न्यूज़, फेक वीडियो किसी की जान भी ले सकती है.
*अगर इस बात को आप जान जाएंगे* तो फारवर्ड करने से पहले सौ बार सोचेंगे...
सोचिए और इन्हें फॉरवर्ड करने से करने से पहले थोड़ा सा वक्त निकालकर Google या YouTube या जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वापस सर्च कीजिए. आपको उनकी सच्चाई - असलियत पता चल जाएगी
... कि क्या आखिर यह पोस्ट, यह खबर हमारे शहर से जुड़ी है. क्या यह असली है. क्या यह गलत न्यूज़ है. यह कितने साल पुरानी है. तमाम बातें...
फेक न्यूज़ को को रोकना सिर्फ सोशल मीडिया एप्स कंपनी और मीडिया का ही काम नहीं है. ऐसी चीजों को रोकने में हर आम आदमी भी अपना योगदान दे सकता है. अगर वह चाहे तो...
*इसके लिए आपको यह करना चाहिए*
👉 सबसे पहले अगर आप WhatsApp इस्तेमाल करते हैं तो WhatsApp पर ऑटो डाउनलोड का ऑप्शन बंद कीजिए
👉 इससे कोई भी इमेज या वीडियो, ऑडियो अपने आप डाउनलोड नहीं होगा, जिससे आप या आपके परिवार आपके परिवार का कोई भी सदस्य देख सुन या पढ़ नहीं पाएगा.
👉 जब किसी वीडियो या पोस्ट के साथ कोई टेक्स्ट मैसेज लिखा होगा तो आप टेक्स्ट मैसेज पढ़ कर एक कर एक मैसेज पढ़ कर एक बार सोचेंगे कि क्या यह असली है या फेक है, इसी के बाद आप उस फाइल को डाउनलोड करेंगे..
दैनिक भास्कर में प्रकाशित इस खबर में पढ़िए दो ऐसे सोशल मीडिया वर्कर या एक्टिविस्ट, *59 साल के अकाउंटेंट श्री रमेश बालानी और 31 साल के असिस्टेंट प्रोफेसर अंशुल गुप्ता की कहानी*... जो अपना कीमती वक्त निकालकर लोगों को फेक न्यूज के प्रति अवेयर कर रहे हैं।
_*थोड़ा सा वक्त निकालकर आप भी पढ़िए दैनिक भास्कर में 10 सितंबर 2018 को प्रकाशित ये मंडे पॉजिटिव स्टोरी...*_
_फेक न्यूज और पोस्ट से क्या आप भी परेशान हैं तो इस पोस्ट को जरूर शेयर कीजिए..._
🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
Sunday, November 27, 2016
विभूति का सवाल : देश बदल रहा है, आप कब बदलोगे...
| युवा कवयित्री विभूति दुग्गड़ मुथा |
- दुबई में रह रहीं रायपुर की युवा कवयित्री विभूति मुथा की कविताओं ने लोगों के दिलों को छुआ
- लोगों ने कविताओं के वीडियो को वाट्सएप, फेसबुक और यूट्यूब पर खूब शेयर किया
रायपुर। नोटबंदी के पक्ष में सोशल
मीडिया पर कई कविताएं काफी वायरल हो रही हैं। इनमें से कुछ कविताएं हमारे शहर की
मूल निवासी युवा कवयित्री विभूति दुग्गड़ मुथा की भी हैं। उनकी ज्यादातर कविताएं
अभी वीडियो के रूप में ही मौजूद हैं। देशभर में सबसे ज्यादा शेयर हो रही उनकी
कविता, बदलाव भी चाहते हैं और बदलना भी नहीं चाहते...को अब तक डेढ़ लाख से ज्यादा लोगों ने
देखा है। उनके यूट्यूब चैनल और फेसबुक पेज से लोग वीडियो डाउनलोड करके शेयर कर रहे
हैं।- यूट्यूब चैनल को 2062 लोगों ने सब्सक्राइब किया है।
- बदलाव वाली कविता को डेढ़ लाख से ज्यादा पेज व्यू मिले है।
- जुगाड़ वाली कविता को अब 50 हजार लोगों ने पसंद किया है।
- सभी कविताओं को अब तक चार लाख से ज्यादा लाइक-कमेंट्स।
Monday, September 14, 2015
दैनिक भास्कर में प्रकाशित खबरें : पवन दुग्गल से बातचीत
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| दैनिक भास्कर, 27 दिसंबर, 2014 को प्रकाशित |
यही नहीं, बैंक अफसर बताकर एटीएम और क्रेडिट कार्ड का पासवर्ड लेने वाले साइबर ठगों ने राज्यभर में दर्जनों लोगों के खाते खाली किए हैं। पुलिस ही नहीं, साइबर मामलों के जानकारों का साफ तौर पर मानना है कि साइबर क्राइम का शिकार कोई भी हो सकता है। जरूरत सिर्फ सावधान रहने की है। दैनिक भास्कर ने देश के जाने वाले साइबर लॉ एक्सपर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट के वकील पवन दुग्गल से बातचीत कर यह पता लगाने की कोशिश की है कि आखिर साइबर अपराधियों से किस तरह सुरक्षित रह सकते हैं
Wednesday, September 4, 2013
पत्रकारिता में मेरे दस साल...
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| अपने संग्रह के साथ मेरी तस्वीर, वर्ष 2001 |
लोकमत के लिए ट्रेनी रिपोर्टर के रूप में मैंने 21 जुलाई को चार खबरें लिखी। जिनमें थी- आकाशवाणी और एआईआर एफएम गोल्ड, प्रोजेक्ट ज्ञानोदय, दीनदयाल पार्क के पास का सब्जी बाजार और पीको फॉल बना रोजगार। उस समय लोकमत के ब्यूरो चीफ थे श्री धर्मेंद्र जायसवाल जी, सिटी रिपोर्टर पंकज शर्मा, मैं और अंशुल जैन। 25 जुलाई को शायद लोकमत में मेरी पहली न्यूज छपी, श्रोताओं की पसंद-नापसंद में उलझा विविध भारती की जगह एफएम गोल्ड। 28 जुलाई को एक और न्यूज प्रकाशित हुई पीको फॉल बना रोजगार..। इसके बाद लगातार कई खबरें छपी। फोटोग्राफर बाबा कुरैशी जी को कैसे भूल सकता हूं जो मेरी खबरों के लिए फोटो लाया करते थे। इस दौरान मैंने सबसे पहले जाना कि फोटो भी मैनेज की जाती है। पंकज भाई मेरी खबरें एडीट किया करते थे।
खबरें लिखने का सिलसिला मैंने सन् 2001 से ही शुरू कर दिया था, जब साहित्यिक संस्था 'अबंध' के समाचार लिखकर अखबारों में देता था। इसके अलावा डीडीसी कॉलेज और पीजी कॉलेज के यूथ फेस्टिवल के समाचार भी मैंने 2000-2002 के बीच में लिखे। इसके अलावा भोपाल से प्रकाशित 'सुखवाड़ा' और संवाद पत्रिका 'शब्द शिल्पियों के आसपास' के लिए अवैतनिक रूप से संवाददाता के रूप में भी इसी दौरान जुड़ गया था।
अगले दस सालों की दास्तान काफी लंबी है। जिस पर विस्तार से फिर कभी बात करूंगा। फिलहाल उन पड़ावों का सिर्फ जिक्र। 2004 में एमए कम्प्लीट करने के बाद जुलाई में छिंदवाड़ा से राजधानी भोपाल आ गया। 14 जुलाई को दैनिक स्वदेश ज्वाइन किया। यहां रिपोर्टिंग और डेस्क दोनों काम शामिल थे। 2005 में संपादक अवधेश बजाज की सांध्य दैनिक अग्निबाण की टीम में शामिल हो गया। यहां आर्ट एंड कल्चर और जनरल रिपोर्टिंग की जिम्मेदारी मिली। इसी साल माखनलाल राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि में एडमिशन लिया। फिर 2006 में राज्य की नईदुनिया में आ गया। यहां अजय बोकिल जी, आशीष्ा दुबे, पंकज शुक्ला, विनय उपाध्याय जी से काफी कुछ सीखने को मिला। 2007 में माखनलाल से एमजे पूरा करते ही कैंपस के जरिए दिल्ली आ पहुंचा। यहां अमर उजाला, नोएडा में नई पारी की शुरुआत हुई। जो अब तक जारी है।
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