Thursday, January 28, 2021

किसानआंदोलन2020 : क्या आप किसान परिवार से नहीं हो?

©® पत्रकार और ब्लॉगर रामकृष्ण डोंगरे 
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दिल्ली और किसान आंदोलन… पिछले 2 माह से दिल्ली के आसपास किसानों का आंदोलन चल रहा है. तीन कृषि कानूनों की वापसी को लेकर 27 नवंबर 2020 से चल रहे इस आंदोलन में 26 जनवरी को दिल्ली का घटनाक्रम लोगों के लिए आश्चर्यजनक रहा। एक तरह से किसान आंदोलन से मुंह फेरने जैसा रहा। 

असलियत तो यही है कि देश में किसानों का मुद्दा है और रहेगा और इसे लेकर चल रहा आंदोलन भी सही है। अब बात करते हैं कि 26 जनवरी को दिल्ली में क्या हुआ… 26 जनवरी को दिल्ली में ट्रैक्टर रैली की जो योजना बुजुर्ग किसान नेता ने बनाई थी, उसमें कहीं कोई गड़बड़ी नहीं थी। युवाओं ने, युवा जोश ने उस दिन का माहौल खराब कर दिया। वे रैली निकालने के लिए जल्दबाजी में थे। इसके अलावा तय रूट को छोड़कर अन्य रास्तों से आगे बढ़ना चाहते थे। और किन्हीं 1-2 खुराफाती युवाओं के दिमाग में यह बात आई होगी कि दिल्ली के लाल किले तक चलते हैं. और इस तरह आंदोलन को बिगाड़ने की कोशिश की गई. 

… जैसा कि सभी जानते हैं देश में दो विचारधाराएं काम करती है. एक हमेशा सत्ता पक्ष का सपोर्ट करती है। और दूसरी विपक्ष के साथ खड़ी नजर आती है। सत्ता पक्ष के पास अपना गणित है, वह अपना स्वार्थ देखते हैं. उन्हें हर उस बात से नाराजगी है जो सरकार से सवाल करें या सरकार के खिलाफ बोले। 

वहीं विपक्ष किसानों या आम लोगों के साथ है। जहां तक किसानों का मुद्दा था, ज्यादातर मध्यमवर्ग किसानों के साथ ही है। लेकिन विचारधारा के खूंटे से बंधे कुछ लोग, जो स्वयं देश की सबसे बड़ी आबादी किसान परिवार से आते हैं, बावजूद इसके वे किसानों के साथ खड़े नहीं होना चाहते। 

अब लोग कहते हैं कि जो दिल्ली में किसान आंदोलन चल रहा है, उसमें हमारे यहां का किसान नहीं है तो हम उनके साथ क्यों खड़े हो। तो असलियत सब जानते है कि दिल्ली के किसान आंदोलन में पंजाब, हरियाणा, यूपी और राजस्थान के सबसे ज्यादा किसान हैं। इसकी वजह है दिल्ली के आसपास होना। और बाकी राज्यों के किसानों की तुलना में उनकी मजबूत आर्थिक स्थिति। …क्योंकि इस आंदोलन में बहुत पैसा खर्च हो रहा है। इतना समय और पैसा खर्च करने की हैसियत सच कहे तो मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों के छोटे किसानों में नहीं है। 
2 महीने से जारी किसान आंदोलन में जिस तरह से रोज खबरें आ रही थी, देश का हर नागरिक इसकी तारीफ ही कर रहा था। शांतिपूर्ण ढंग से, बिना किसी शोर-शराबे के किसानों का धरना जारी था। वार्ता चल रही थी। सरकार बातचीत कर रही थी। हां एक बात यह है कि किसान कृषि बिलों की वापसी के अलावा किसी और बात पर तैयार नहीं है। और सरकार भी बिल वापस नहीं करना चाहती। यहीं पर पेंच फंसा हुआ है। इतना सब होने के बाद भी लोग किसान के साथ है और किसान के साथ रहेंगे। 

… गांव से निकलकर शहर में पहुंचने वाला हर कोई शख्स जानता है कि उसके माता-पिता ने उसे शहर क्यों भेजा। गांव में क्या दिक्कत है। किसानों की क्या समस्या है। सब जानते हैं लेकिन भक्त बनकर अपने तथाकथित भगवान के लिए तालियां बजाना, किसे अच्छा नहीं लगता। तो जिसे अच्छा लगता है। वो बजाते रहे। लेकिन सच्चाई यही है कि किसानों की समस्याएं विकराल है। और उसका हल कोई नहीं निकालना चाहता। इसीलिए हमारे किसानों को इतना बड़ा आंदोलन चलाना पड़ रहा है। 
#किसानआंदोलन  #KisanAndolan 

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Wednesday, January 27, 2021

साईं सिमरन सोसाइटी में 72 वें गणतंत्र दिवस पर ध्वजारोहण

उत्कृष्ट कार्यों के लिए रामदुलारी कुमारी और भारती डोंगरे सम्मानित 

रायपुर। शंकर नगर इलाके में भावना नगर स्थित साईं सिमरन सोसाइटी में गणतंत्र दिवस पर अध्यक्ष मुकुल वर्मा ने ध्वजारोहण किया। इस दौरान बेहतर काम के लिए रामदुलारी कुमारी, भारती डोंगरे, सुनीता सिंह, सोसाइटी के कर्मचारी राजू और कमला को सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में कुशाग्र, रीति टांक आदि बच्चों ने देशभक्ति गीतों की प्रस्तुति दी। इस मौके पर स्वर्ण सिंह चावला, संजय सिंह, भूपेंद्र परमार, विकास पाठक, प्रसाद कामाविसदार, उज्जवल चक्रवर्ती, चंद्रशेखर पांडेय, वायपीएस परिहार, ज्योति टांक, कविता त्रिपाठी, मौसमी रानी, माधुरी टांक आदि रहवासी मौजूद थे।

Tuesday, January 26, 2021

डायरी : हम आपस में मिलना-जुलना क्यों नहीं चाहते?

*हम लोग एक- दूसरे से बात क्यों नहीं करते?*

*हम आपस में मिलना-जुलना क्यों नहीं चाहते?* 

~~~*पत्रकार व ब्लॉगर रामकृष्ण डोंगरे* ~~~ 
---मेरी डायरी के पन्नों से---

जीवन में अगर हम लोगों से मिलेंगे नहीं, बात नहीं करेंगे तो हमारे इंसान होने का क्या मतलब. हम इंसान होने की वजह से एक दूसरे के साथ अपनी फीलिंग को शेयर कर सकते हैं। लेकिन आज के दौर में हम शेयर नहीं कर रहे हैं। 

एक वह दौर था, जब हम चिट्ठी लिखा करते थे. चिट्ठी के जरिए अपने विचारों को दूसरों तक पहुंचाया करते थे. फिर उनके उत्तर का इंतजार करते थे. ऐसे में अगर हमारी दोस्ती हो जाती थी तो हम उनसे मिलने के लिए कई किलोमीटर का फासला तय करते थे. मैं अपनी बात करूं तो मैंने अपने मोहल्ले, गांव या स्कूल के बाहर लोगों से दोस्ती के लिए पहला माध्यम आकाशवाणी यानी रेडियो को चुना. जब हम फरमाइशी प्रोग्राम में चिट्ठी लिखा करते थे तो वहां से हम नए मित्र तलाशते थे. जिनके नाम याद रह जाते थे। उन्हें बार बार याद करते थे। इसके अलावा कार्यक्रमों की प्रतिक्रिया के पत्र पहुंचते थे, और जब लोगों के विचार हमें अच्छे लगते थे, तो हम उनकी तरफ चिट्ठी लिखकर दोस्ती का हाथ बढ़ाते थे. कई चिट्ठियों तक सिलसिला चलने के बाद मिलने का समय आता था.

एक वाकया मुझे याद आता है। ऐसे ही एक रेडियो मित्र, पेन फ्रेंड से मिलने के लिए हमने जिला मुख्यालय छिंदवाड़ा से तामिया के पातालकोट का 60 किमी का सफर यूं ही तय कर लिया था। बिना किसी खास वजह के। पातालकोट पहुंचने के बाद हमें पता चला कि उस मित्र का घर जंगल वाले पैदल रास्ते में कई किलोमीटर दूर है। तो बड़ी मुश्किल से हमने उसका घर खोजा। मिलते ही हमारी सारी थकान दूर हो गई। मित्र ने तुरंत हमें गरमा गरम पकौड़े खिलाएं. 

… तो एक दौर वह था। और आज जब एक मोबाइल हमारे हाथ में है और हमें "कर लो दुनिया मुट्ठी में" कहकर यह मोबाइल थमाया गया है, वाकई पूरी दुनिया हमारी मुट्ठी में है. हम मात्र एक क्लिक से हमारे देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री से लेकर किसी भी अपने परिचित या किसी भी क्षेत्र में सक्रिय या हमारे आदर्श व्यक्ति से हम मैसेज पर बातचीत कर सकते हैं। कॉल भी कर सकते हैं। लेकिन आज के दौर में देखा जा रहा है कि हम किसी से भी दिल से बातें नहीं करना चाहते। मिलना नहीं चाहते। अगर किसी को यूं ही फोन लगा लो तो उधर से तुरंत पूछा जाता है कि कोई काम था क्या। 

ऐसे में मिलने की और रिश्ता बनाने की बात क्या करें। 
ज्यादा दूर की बात ना कि जाए तो शहरी जिंदगी में अपार्टमेंट कल्चर में हम अपने पड़ोसियों से भी करीबी रिश्ता नहीं रख पाते। इसमें कहां कमी है। इस पर हमें विचार करना चाहिए। इसके अलावा अपने दोस्तों से और रिश्तेदारों से भी हमें गाहे-बगाहे बातचीत करते रहना चाहिए। साथ ही किसी ना किसी बहाने मिलना भी चाहिए। 


~~~*आपका दोस्त रामकृष्ण डोंगरे* ~~~
---मेरी डायरी के पन्नों से/26 जनवरी, 2021---

Wednesday, December 2, 2020

|| आकाशवाणी छिंदवाड़ा, रेडियो एनाउंसर गीतांजलि गीत और मैं ||

102.2 मेगाहर्ट्ज पर ये आकाशवाणी का छिंदवाड़ा केंद्र है… स्टूडियो की घड़ी में शाम के 5 बजकर 30 मिनट हो चुके हैं। आइए सुनते हैं आपका पसंदीदा कार्यक्रम...युववाणी। 

आज हम मुलाकात करते हैं एक ऐसी शख्सियत से जो बहुमुखी प्रतिभा संपन्न है। इनका नाम है गीतांजलि गीत। जी हां लेखिका, पत्रकार, कार्टूनिस्ट, कमेंटेटर और रेडियो एनाउंसर गीतांजलि गीत...। हम सभी श्रोताओं की तरफ से आपका स्वागत करते हैं।

…इस पोस्ट का अंदाज रेडियो वाला है। 

आप इशारा समझ ही गए होंगे... आज मैं मुलाकात करने पहुंचा हूं मशहूर रेडियो एनाउंसर गीतांजलि गीत मैडम से। दोपहर के 12:00 बजे है. तारीख 22 नवंबर 2020. स्थान है मिश्रा कॉलोनी, बरारीपुरा छिंदवाड़ा।

इस नए मकान में ये पहली मुलाकात है। यहां मौजूद हैं श्री राजेंद्र राही जी, वरिष्ठ पत्रकार और कवि। साथ में उनकी बिटिया गौरंगी मिश्रा।

मुलाकात में अलग-अलग टॉपिक पर चर्चा हुई, जिसमें पहला टॉपिक आकाशवाणी छिंदवाड़ा था। आकाशवाणी की चर्चा शुरू होते ही बतौर श्रोता मेरी पहली पहचान को गीतांजलि गीत मैडम ने याद किया। यहां कई कंपेयर और एनाउंसर के नामों की चर्चा भी निकली, जिनमें धीरेंद्र दुबे जी, प्रमोद डबली जी, नरेंद्र सकरवार जी, प्रशांत नेमा, इमरान खान, सारंग काले, शिवानी श्रीवास्तव आदि नाम प्रमुख थे। आकाशवाणी के वरिष्ठ एनाउंसर अवधेश तिवारी जी और डहेरिया सर, कमल सागरे आदि नामों पर भी चर्चा हुई।

कमल सागरे जी के कार्यकाल में मेरा (रामकृष्ण डोंगरे) का आकाशवाणी छिंदवाड़ा के कंपेयर और कुछ कुछ एनाउंसर में थोड़ा खौफ था. उसकी चर्चा मैं इस पोस्टर करना चाहूंगा। 

*युववाणी कार्यक्रम और सातसवाल*

आकाशवाणी छिंदवाड़ा का युववाणी प्रोग्राम और इसमें मेरा सबसे पसंदीदा कार्यक्रम सात सवाल मैं 1995 से लगातार सुन रहा था। इस प्रोग्राम में जनरल नॉलेज के 7 क्वेश्चन, 7 सवाल पूछे जाते थे, जिनके जवाब श्रोताओं को एक हफ्ते में लिखकर पोस्ट करना होता था। बाद में सही जवाब वाले श्रोताओं के नाम अनाउंस किए जाते थे। प्रथम, द्वितीय, तृतीय विजेताओं को आकाशवाणी की तरफ से इंटरव्यू के लिए आमंत्रित किया जाता था। इसी प्रोग्राम की बदौलत में दो बार इंटरव्यू में शामिल हुआ।

इसी प्रोग्राम में सवालों के गलत जवाब को सही बताने की वजह से मेरा आकाशवाणी छिंदवाड़ा से विवाद चलता था। कई बार टेलीफोन पर भी मेरी कमल सागरे सर और वहां के कई एनाउंसर कंपेयर से बात होती थी। बार-बार टोका टोकी से तंग आकर कमल सागरे जी ने टेलीफोन पर बातचीत में मुझसे यह तक कह दिया था कि --- 

"हमारे यहां जो एनाउंसर और कंपेयर काम करते हैं वे भी इसी दुनिया से है और आपके जैसे ही है। उनसे गलतियां हो रही है। हो जाती है तो मैं क्या करूं। तुम क्या चाहते हो कि मैं आकाशवाणी छिंदवाड़ा में एक ताला लगाकर स्टेशन बंद कर दूं।"

तब मैंने महसूस किया कि और ज्यादा टीका टिप्पणी करने का कोई फायदा नहीं है. सच्चाई से मैं भी वाकिफ था, सभी कंपेयर एनाउंसर अपनी व्यस्त लाइफ में से कुछ समय निकालकर वहां ड्यूटी करने जाते थे। और जनरल नॉलेज की जो भी किताब उनके हाथ में लगती थी, उसी से वे सवाल पूछते थे और जवाब चुनते थे। तो अगर उन किताबों में ही गलत जवाब लिखे हैं तो वे गलत जवाब को ही सही बता देते थे।

...लेकिन जैसा कि हम बचपन से सुनते आ रहे हैं न्यूज़पेपर और रेडियो उस जमाने में हर तरह की जानकारी का पुख्ता सोर्स होते थे। अगर पाठक या श्रोता, अखबार या रेडियो से गलत जानकारी प्राप्त करेगा तो उसका असर उसके फ्यूचर पर भी पड़ेगा। इसीलिए मैं गलत जवाब को बर्दाश्त नहीं कर पाता था। 

इस चर्चा में गीतांजलि गीत मैडम ने शिवानी श्रीवास्तव मैडम का खास जिक्र किया। गीतांजलि मैडम ने बताया कि शिवानी श्रीवास्तव मैडम आप को लेकर खौफ़जदा रहती थी। तब मैंने (गीतांजलि गीत) उन्हें बताया कि -- "वह अच्छा लड़का है. वह सिर्फ यही चाहता है कि रेडियो के जरिए गलत जानकारी प्रसारित ना हो."

लगभग 10 साल के बाद हो रही हमारी इस मुलाकात में गीतांजलि मैडम ने अपने अब तक के सफर का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि वे इंदौर के एफएम रेडियो ज्ञानवाणी में डायरेक्टर भी रही। इसके अलावा वहां उन्होंने कुछ समय कॉलेज में भी बच्चों को पढ़ाया। वही अलग-अलग सरकारी और प्राइवेट माध्यमों के लिए डॉक्यूमेंट्री और शार्ट वीडियो भी बनाए, जो काम अभी जारी है।

उनकी बिटिया गौरांगी भी उन्हीं की तरह प्रतिभाशाली है। वे पेंटिंग के अलावा स्केच भी बनाती है। जर्नलिज्म की स्टूडेंट है। शॉर्ट फिल्म भी बना चुकी है।

गीतांजलि गीत मैडम रेडियो की तरह बोलती है। क्योंकि वे रेडियो में काम जो करती है। उन्हें सुनना हमेशा अच्छा लगता है। उस दिन भी मैं उन्हें लगातार 1- 2 घंटे तक सुनता रहा। ये मुलाकात यादगार रही। रेडियो की दुनिया के लोग मेरे सबसे बड़े स्टार हुआ करते थे। एक समय मैं मुंबई जाने का ख्वाब देखता था, तो सबसे पहले (अमिताभ और शाहरुख से भी पहले) विविध भारती मुंबई जाकर कमल शर्मा जी और यूनुस खान जी जैसे तमाम वरिष्ठ एनाउंसर से मिलने का सपना देखता था। 

रेडियो सुनना वाकई अच्छा शौक है। यह बच्चों में कल्पना शक्ति को बढ़ाता है। आप काम करते हुए भी अपना मनोरंजन और ज्ञानवर्धन कर सकते हैं। मैं आज के तेज रफ्तार चलने वाले रेडियो चैनल के बारे में ये बात नहीं कहता। मगर जमाने के साथ बदलाव तो आना ही था। ये प्राइवेट एफएम चैनल भी युवाओं के बीच में खासे लोकप्रिय है। और इनके आरजे आज के युवाओं के स्टार भी है, जिनमें *रेडियो मिर्ची वाले आरजे नावेद* पूरे देश में सबसे ज्यादा मशहूर है, क्योंकि उनका प्रोग्राम "मिर्ची मुर्गा" खासा लोकप्रिय है. 

2003 में मैंने भी रेडियो में एनाउंसर कंपेयर के लिए फार्म भरा था, एग्जाम भी हुआ लेकिन अफसोस की बात यह रही कि मेरा सिलेक्शन नहीं हुआ शायद अच्छा ही हुआ। 

गीतांजलि गीत मैडम और आकाशवाणी के दूसरे वरिष्ठजनों, छिंदवाड़ा के डीडीसी कॉलेज, पीजी कॉलेज, गर्ल्स कॉलेज के तमाम प्रोफेसरों और लेखक और साहित्यकारों के मार्गदर्शन की वजह से ही मैं आज जीवन में कुछ कर पा रहा हूं। अगर इनका मार्गदर्शन नहीं मिलता तो मैं अपना यह सफर नहीं तय कर पाता।

...तो दोस्तों, फेसबुक की घड़ी में अभी वक्त हो रहा है शाम के 6 बजकर 27 मिनट और हम अपनी इस चर्चा को यहीं विराम देते हैं। अगली कड़ी में आपसे फिर रूबरू होंगे और मुलाकात करेंगे किसी नई शख्सियत से। तब तक के लिए अपने दोस्त और होस्ट रामकृष्ण डोंगरे को विदा कीजिए… 

शुभ रात्रि।

प्रस्तुति और संयोजन - रामकृष्ण डोंगरे

#मुलाकातों_के_सिलसिले_2020



Wednesday, September 9, 2020

मेरी फेसबुक पोस्ट : आज मैंने बीड़ी खरीदी

आज मैंने बीड़ी खरीदी। आप पूछेंगे क्यों? तो आपको मैं विस्तार में बताता हूं। ये बीड़ी मैंने पितृपक्ष में श्राद्ध पूजा के लिए खरीदी थी। समझने वाले, समझ गए होंगे।

पितृपक्ष में हमारे स्वर्गवासी परिजनों के लिए हम श्राद्ध रखते हैं. वे जो चीज इस्तेमाल करते थे, उन चीजों को भी पूजा में रखते हैं. मेरे पिताजी बीड़ी पीते थे. साल 2006 में हार्ट अटैक की वजह से वे हमारे बीच नहीं रहे.

मैंने लगभग 20 से 25 साल के बाद बीड़ी खरीदी होगी. जब मैं गांव में था। छोटा था। तब पिताजी के लिए खरीदकर लाता था। यहां पर मैं यह कहना चाहता हूं कि कभी भी अपने बच्चों से बीड़ी, सिगरेट, शराब नहीं मंगवानी चाहिए। ना ही उनके सामने इनका सेवन करना चाहिए। क्योंकि उनमें भी यह ऐब, नशा लग जाता है।
हालांकि हम सभी भाइयों में ये बुरी आदत नहीं है। ये भी हमारी खुशकिस्मती है।

पता नहीं क्यों? मेरे मन में बार-बार ये सवाल आता है कि लोग नशा क्यों करते क्यों करते हैं? एक बार मेरे एक रिश्तेदार ने मुझे ड्रिंक लाने के लिए भेजा था. जब मुझे इसके बारे में भी ज्यादा कुछ नहीं पता था. उस वक्त मैं कॉलेज में था. साल था 1998. जब मैं एक बियर शॉप में गया तो उन्होंने मुझे खुली शराब एक बोतल में डाल कर दे दी। जब मैं उन रिश्तेदार के पास पहुंचा तो उन्होंने मुझे डांटा, कहा- ऐसे भी कोई शराब लाता है। और फिर यह क्रॉस चेक करने के लिए कि कहीं उस शराब में कोई मिलावट तो नहीं है। वे मुझे लेकर उस बियर शॉप तक लेकर गए, जहां से मैंने वो शराब खरीदी थी। फिर तसल्ली होने के बाद हम वापस आ गए।

बचपन में जब हम बीड़ी पीने का नाटक करते थे। (सचमुच की बीड़ी नहीं, एक सन-पटसन का पेड़ होता है, जिससे जूट रस्सी निकलती है। उसकी लकड़ी सरकंडी को जलाकर धुआं बाहर फेंकते हैं। तब मेरे मोहल्ले के एक चाचा ने मुझे बहुत डांटा। शायद वही एक डांट थी, जिसने मुझे उस राह पर पर जाने से रोका।

जब मैं साल 2004 में भोपाल पहुंचा। तब मेरे आस-पास सारे पत्रकार साथी थे। हमारे रूम में भी आते थे। खूब बीयर पार्टी चलती थी। और सब मुझे मुझे कहते थे- "कैसे  पत्रकार हो। शराब नहीं पीते हो। चलो शराब पियो और मैं हाथ भी नहीं लगाता था. किसी ने मेरे साथ जबरदस्ती नहीं की कि तुमको पीना ही पड़ेगा. अगर आपके दोस्त आपको इस नशेड़ी दुनिया में धकेलना ना चाहे तो आप बच सकते हो।

अभी टीवी पर आशिकी-2 मूवी देख रहा हूं। क्या बकवास मूवी है। (आप समझ गए होंगे मैं कहना क्या चाहता हूं) इसमें गानों के अलावा कुछ भी अच्छा नहीं है। क्या शराबी और शराब की दुनिया दिखाई है इस फिल्म में। नशा कोई भी हो। किसी के लिए भी अच्छा नहीं होता। क्यों हम नशा करते करते हैं? इस नशे से अपनों को बचाने के लिए हमें हर संभव काम करना चाहिए।

नशा कितने घरों को बर्बाद कर देता है। कितने लोगों की खुशहाल जिंदगी को उजाड़ देता है। ये हम सब जानते हैं। मगर फिर भी कुछ लोग नशे की आदत को छोड़ना नहीं चाहते। वे इस दलदल में कितने धंस जाते हैं कि बाहर ही नहीं निकल पाते। अगर आपको नशे की बुरी लत है तो अपने बच्चों को इससे बचाने के लिए हमेशा समझाएं. कि यह बुरी आदत है. इसे कभी ना अपनाए. उनसे कहे कि आप भी यह नशा करना छोड़ना चाहते हैं. छोड़ने की कोशिश कर रहे हैं।

©® रामकृष्ण डोंगरे

(मेरी फेसबुक पोस्ट)


Tuesday, August 18, 2020

मेरी कविता : मैं वेबिनार में हूं

||मैं वेबिनार में हूं||

©® कवि - रामकृष्ण डोंगरे

मुझे ना छेड़ो यारों
मैं वेबिनार में हूं।।

ना मुझे तुम कॉल करो,
ना तुम वाट्सएप करो,
ना ही मुझे मैसेज करो।

समझा करो यारों,
मैं वेबिनार में हूं।।

तुमने सेमिनार का नाम तो सुना ही होगा,
वही जिसमें विद्वान वक्ता 1 घंटे के लेक्चर देते हैं
सेमिनार का समय होता है 11 बजे,
और श्रोता आते हैं 12 बजे तक,
मतलब सेमिनार 12 बजे ही शुरू होता है,
मगर कहने को सेमिनार 11 बजे होता है।

आज भी मैं तैयार हूं.
मैं वेबिनार में हूं।।

अब जमाना ऑनलाइन का है,
वीडियो कॉल, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का है,
इसलिए तो सेमिनार नहीं वेबिनार होते हैं,

तो मैं तैयार हूं, हां मैं वेबिनार में हूं।।

देश-दुनिया में बैठकर
आप बोलते हैं,
आपको कोई भी, कहीं से भी
देखता है और सुनता है।

यह नए जमाने का व्यवहार है,
हां यही तो वेबिनार है।।

एक स्क्रीन पर हजारों चेहरे,
सितारों के जैसे जगमगाते हैं।
म्यूट, अनम्यूट का बटन दबाते ही,
ये सितारे तुरंत बोल पड़ते हैं,
हां यही वेबिनार है यारों।

सेमिनार में बैठकर
आप ऊंघते थे, सो भी जाते थे,
कई बार तो उठकर भाग जाते थे।

मगर यह वेबिनार है यारों,
आप गायब हुए तो पकड़े जाओगे,
इसीलिए अटेंशन रहकर बैठे रहो,
क्योंकि यह वेबिनार है यारों।।

©® रामकृष्ण डोंगरे
रचना समय : 18 अगस्त, 2020, भावना नगर, रायपुर


Monday, July 27, 2020

मध्यप्रदेश अब मक्का प्रदेश...

मक्का प्रदेश : मध्यप्रदेश में अब हर तरफ मक्का ही मक्का

- सोयाबीन की चार कतारों के बाद 2 कतार में बोया जाता था पहले मक्का...

मध्यप्रदेश अब मक्का प्रदेश...
डूब गया सोयाबीन का सूरज....

मध्यप्रदेश ने खोई सोया प्रदेश की पहचान...

[ मेरी उम्र के मित्रगण अपने बचपन या किशोरावस्था को याद कीजिए। अगर आप कृषक परिवार से हो तो मेरी राय से पूरी तरह से सहमत होंगे। 1980 से पहले तक एमपी के कई जिलों जैसे छिंदवाड़ा- बैतुल में खरीफ की फसलों में ज्वार, बाजरा, मक्का, जगनी, कुटकी, अलसी जैसी फसलें ज्यादातर बोई जाती थी। अचानक से नकदी फसलों में शुमार तिलहन की एक किस्म सोयाबीन का आगमन होता है। फिर देखते ही देखते एमपी को सोया प्रदेश का खिताब मिल जाता है।]

लेकिन इन दिनों सोयाबीन संकट में है, फसल सिमटती गई और चार कतार के बाद दो कतार में बोया जाने वाला मक्का हर तरह छा गया है।

अब विस्तार से पहले सोयाबीन की बात।

माताजी ने बताया कि हमारे यहां 1981 में पहली बार एक कुडो (10 किग्रा) सोयाबीन का बीज लाया था। उसके बाद इसकी बोआई लगातार बढ़ती गई। मुझे ठीक से याद नहीं मगर शायद साल 2010 के आसपास से सोयाबीन का उतार चालू हो गया। यानी उत्पादन कम। खेती कम। कीट का हमला। दाने छोटे बनना। मजदूरी भी महंगी।

जब सोयाबीन का सूरज उग रहा था तभी केंद्र सरकार ने 1986 में तिलहन प्रौद्योगिकी मिशन की स्थापना की थी। उस दौर की बात करें धीरे-धीरे सोयाबीन ने खरीफ की बाकी फसलों को खत्म-सा कर दिया। जैसे- ज्वार, मक्का, धान, जगनी, अलसी।

हमारे यहां लगभग सभी जगह सोयाबीन बोया जाने लगा था। जगनी, अलसी, ज्वार-तुअर वाले सब खेत में। एक दिलचस्प बात ये है कि उन दिनों में मक्का सिर्फ फिलर (न्यूज की भाषा में) फसल थी। यानी सोयाबीन की 4 कतार के बाद 2 कतार-लाइन मक्के की रहती थी। इसके अलावा बहुत थोड़ी सी जगह, आधे एकड़ में मक्का बोया जाता है। आज देखिए हर तरफ मक्का ही मक्का। सोयाबीन के सूरज डूबने की एक वजह है लगातार घटता उत्पादन। कीटों, इल्लियों का हमला। छिंदवाड़ा जिले में पिछले साल (2015) सोयाबीन का रकबा करीब 90 हजार हेक्टेयर तक बोया गया था।
मगर उत्पादन क्या हुआ। 5 एकड़ के खेत में महज तीन बोरा ही सोयाबीन।

किसान परिवार के लोग इसके मायने समझ सकते हैं।

सोयाबीन का उत्पादन जब ज्यादा हो रहा था तब छिंदवाड़ा में सोयाबीन प्लांट भी लगाया गया था। प्रदेश के कई जिलों में भी प्लांट स्थापित किए गए थे।

सोयाबीन पर, सोयाबीन को लाने वालों पर कई आरोप भी लगते रहे हैं। जैसे- सोयाबीन की फसल लगातार लेने से जमीन उपजाऊ नहीं रह पाती। .... 

सोयाबीन की कहानी काफी लंबी है। जिसे शायद दूरबीन वाली दूरदर्शी नजरों से ही जाना और समझा जा सकता है।

पर ये बात तय है अगर मक्का यूं ही बोया जाता रहा तो भविष्य में एक ही फसल का सिक्का चलेगा... मक्का और सिर्फ मक्का। काश कि छिंदवाड़ा में, मेरे गांव तंसरा में सरसों की भी खूब खेती होती तो आपको मक्के की रोटी और सरसों का साग जरूर खिलाता।

**एक किसान का बेटा**
रामकृष्ण डोंगरे
सीनियर जर्नलिस्ट
(27 जुलाई, 2016)
☆☆ जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान☆☆