Sunday, October 18, 2026

Bastar Tour : बस्तर को एक बार देखकर मन भर जाए, ऐसा बस्तर है ही नहीं!

यूं तो पत्रकारों को काम के सिलसिले में नई-नई जगहों पर घूमने का मौका मिल ही जाता है, लेकिन जब बात परिवार की आती है तो अक्सर पत्रकारों को इस मामले में थोड़ी कंजूसी करनी पड़ती है। कभी आफिस में काम का दबाव, कभी चुनाव की कवरेज, कभी कोई बड़ा आयोजन तो कभी अचानक कोई ऐसी खबर आ जाती है कि परिवार के साथ घूमने का प्लान फिर अगले महीने, अगले साल पर टल जाता है।
मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।

छत्तीसगढ़ आए हुए मुझे 13 साल हो चुके हैं। बस्तर की खूबसूरती के बारे में सुनता रहा, लेकिन परिवार को लेकर घूमने जाने का संयोग ही नहीं बन पा रहा था। नईदुनिया परिवार से जुड़ने के बाद विधानसभा और लोकसभा चुनाव की कवरेज के सिलसिले में मुझे बस्तर जाने का मौका जरूर मिला, लेकिन हर बार अकेला ही गया। अब पत्नी और परिवार के ताने सुनने की बारी मेरी थी। उनका सवाल भी जायज था कि भई, बस्तर इतना घूम आए, लेकिन हमें कब लेकर जाओगे?

बस, इसी सवाल का जवाब देने में कई साल लग गए।

आखिरकार वह तारीख आ ही गई, जब हमने परिवार के साथ बस्तर घूमने का प्लान जमीन पर उतार दिया। तारीख थी 7 अक्टूबर 2026। रात 11:45 बजे हमारी बस रायपुर से रवाना होनी थी। हम दो परिवार थे और कुल आठ लोग। सबके मन में उत्साह था। बच्चों को घूमने की खुशी थी और हम बड़ों को इस बात का सुकून कि चलो, इस बार खबरों के पीछे नहीं, परिवार के साथ बस्तर देखने जा रहे हैं।

लेकिन भैया, यात्रा की शुरुआत में ही केशकाल घाटी ने हमारा स्वागत अपने अंदाज में किया। रात का सफर था, ऊपर से घाटी में जाम लग गया। सुबह 5:50 बजे जगदलपुर पहुंचने की उम्मीद थी, लेकिन जाम ने करीब साढ़े तीन घंटे का अतिरिक्त समय ले लिया। अब आप समझ सकते हैं कि जिस यात्रा की शुरुआत ही जाम से हो, वहां कार्यक्रम में थोड़ा-बहुत बदलाव तो होना ही था।

खैर, सुबह जगदलपुर पहुंचे और बिना समय गंवाए निकल पड़े बस्तर की खूबसूरती देखने।

बस्तर प्रवास : पहला दिन 
सबसे पहले पहुंचे तीरथगढ़ जलप्रपात। अब बस्तर आएं और तीरथगढ़ न देखें, तो समझिए यात्रा की शुरुआत में ही कुछ छूट गया। कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान के क्षेत्र में स्थित यह जलप्रपात अपनी सीढ़ीनुमा चट्टानों से नीचे गिरते पानी के कारण अलग पहचान रखता है। बारिश के बाद यहां पानी का प्रवाह और आसपास की हरियाली मन मोह लेती है। परिवार के साथ ऐसी जगह पहुंचने का अपना ही आनंद है। बच्चे आसपास के नजारे देखकर खुश और हम लोग तस्वीरें खींचने में व्यस्त। पत्रकारिता में तस्वीरें खबर के लिए लेते हैं, लेकिन इस बार तस्वीरें अपनी यादों के लिए ले रहे थे।

यहां से निकले और गीदम होते हुए बारसूर पहुंचे।
बारसूर को यूं ही मंदिरों का नगर नहीं कहा जाता। कभी यह क्षेत्र प्राचीन नागवंशी शासन और मंदिर स्थापत्य के लिए प्रसिद्ध रहा है। यहां के पुराने मंदिर बस्तर के समृद्ध इतिहास की कहानी कहते हैं। हम पहुंचे मामा-भांजा मंदिर और जुड़वां गणेश मंदिर के दर्शन किए। बारसूर का गणेश मंदिर अपने विशाल गणेश प्रतिमा के लिए प्रसिद्ध है। यहां आकर लगता है कि बस्तर की पहचान सिर्फ जंगल, झरने और आदिवासी संस्कृति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी ऐतिहासिक विरासत भी उतनी ही समृद्ध है।

बारसूर से लौटते हुए हमारा अगला पड़ाव था दंतेवाड़ा।

और भला दंतेवाड़ा जाएं तो मां दंतेश्वरी के दरबार में हाजिरी लगाए बिना कैसे लौट सकते हैं?
मां दंतेश्वरी बस्तर की आराध्य देवी हैं। उनका मंदिर धार्मिक आस्था के साथ-साथ बस्तर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपरा का भी महत्वपूर्ण केंद्र है। मंदिर से जुड़ी मान्यता है कि माता सती का दांत यहां गिरा था, इसलिए इस स्थान का नाम दंतेवाड़ा पड़ा। मां के दरबार में पहुंचकर हमने दर्शन किए और अपनी एक मनोकामना पूरी करने की विनती की।

अब मनोकामना क्या मांगी, यह तो मां और मेरे बीच की बात है। हां, इतना जरूर है कि जब आप परिवार के साथ किसी धार्मिक स्थल पर पहुंचते हैं तो मन में कई भाव एक साथ उमड़ते हैं। अपने लिए, परिवार के लिए और अपनों की खुशहाली के लिए बहुत कुछ मांगने का मन करता है।

दर्शन के बाद वापस जगदलपुर लौटे। दिन भर घूमने के बाद शरीर थक चुका था, इसलिए रात को आराम किया। अगले दिन फिर एक नया पड़ाव हमारा इंतजार कर रहा था।


बस्तर प्रवास : दूसरा दिन 

सुबह-सुबह निकल पड़े चित्रकूट जलप्रपात देखने।
चित्रकूट को छत्तीसगढ़ का नियाग्रा भी कहा जाता है। इंद्रावती नदी पर स्थित यह जलप्रपात अपनी चौड़ाई और घोड़े की नाल जैसी बनावट के लिए प्रसिद्ध है। बारिश के मौसम में जब नदी पूरे वेग से बहती है तो इसका दृश्य देखने लायक होता है। दूर से गिरते पानी की आवाज, हवा में उड़ती पानी की फुहारें और सामने फैला विशाल जलप्रपात... कुछ देर तक आप बस उसे देखते रह जाते हैं।
सच कहूं तो तस्वीरों में चित्रकूट जितना सुंदर दिखाई देता है, सामने पहुंचकर उसका अनुभव उससे कहीं ज्यादा बड़ा होता है। यही तो यात्रा की खूबी है। मोबाइल में तस्वीर देखकर किसी जगह को जानना अलग बात है और वहां खड़े होकर उसकी खूबसूरती महसूस करना बिल्कुल अलग।

चित्रकूट से लौटते समय रास्ते में विष्णु मंदिर के दर्शन किए। बस्तर की ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल यह मंदिर प्राचीन स्थापत्य का उदाहरण है। स्थानीय लोगों के बीच इसकी पहचान है और इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए यह एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। बस्तर जिले में चित्रकोट जलप्रपात के पास स्थित नारायणपाल का प्राचीन विष्णु मंदिर क्षेत्र की ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लगभग 11वीं शताब्दी में निर्मित इस मंदिर का संबंध छिंदक नागवंशी राजवंश से माना जाता है। 

इसके बाद हम जगदलपुर शहर लौट आए।

जगदलपुर को सिर्फ बस्तर घूमने का प्रवेश द्वार समझना ठीक नहीं होगा। यह अपने आप में इतिहास, संस्कृति और स्थानीय जीवन का जीवंत केंद्र है। शहर में घूमते हुए हमने एयरपोर्ट का क्षेत्र देखा, रेलवे के अमृत भारत स्टेशन के विकास कार्यों पर नजर डाली और दूसरे प्रमुख स्थानों को भी देखा।

लौटते समय दलपत सागर देखने पहुंचे।

दलपत सागर जगदलपुर की पहचान से जुड़ा ऐतिहासिक तालाब है। स्थानीय लोगों के लिए यह केवल जलाशय नहीं, बल्कि शहर की सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा भी है। हालांकि, वहां जलकुंभी का फैलाव देखकर मन में एक बात आई। इतनी बड़ी जलराशि, आसपास का प्राकृतिक वातावरण और शहर के बीच इसकी मौजूदगी... यदि नियमित सफाई, संरक्षण और योजनाबद्ध विकास पर ध्यान दिया जाए तो यहां पर्यटन की गतिविधियों को और बढ़ाया जा सकता है।

जरा सोचिए, साफ-सुथरा तालाब, सुंदर किनारे और व्यवस्थित पर्यटन सुविधाएं हों तो स्थानीय लोगों के साथ बाहर से आने वाले पर्यटकों के लिए भी यह शानदार जगह बन सकती है।

दोपहर में कुछ घंटे आराम करने के बाद हम फिर निकल पड़े बस्तर की ऐतिहासिक विरासत देखने।

इस बार हमारा पड़ाव था बस्तर का राजमहल और दशहरा से जुड़ी परंपराओं के महत्वपूर्ण स्थल।

75 दिन चलने वाला बस्तर दशहरा देश के दूसरे दशहरा आयोजनों से काफी अलग है। यहां इसका मुख्य संबंध भगवान राम की रावण पर विजय की परंपरा से नहीं, बल्कि मां दंतेश्वरी की आराधना और स्थानीय जनजातीय परंपराओं से है। यह पर्व लंबे समय तक चलने वाली रस्मों, विभिन्न समुदायों की भागीदारी और राजपरंपरा से जुड़े आयोजनों के लिए प्रसिद्ध है।
हमने काछन गादी भी देखी, जो बस्तर दशहरा की महत्वपूर्ण परंपराओं से जुड़ा स्थल है। यहां काछन देवी की आराधना और उनसे अनुमति लेने की परंपरा का विशेष महत्व है। बस्तर दशहरा को समझना हो तो इन रस्मों को जानना जरूरी है, क्योंकि इनके भीतर यहां की आस्था, इतिहास और सामुदायिक जीवन की झलक मिलती है। काछन गादी की रस्म जगदलपुर शहर में भंगाराम चौक के पास कांचनगुड़ी (पथरागुड़ा) में निभाई जाती है। इस परंपरा के तहत पनका समाज की एक छोटी कुंवारी कन्या (बालिका) पर मां काछनदेवी की सवारी आती है। देवी का रूप धारण करने वाली कन्या को बेल के नुकीले कांटों से तैयार किए गए एक झूले पर लिटाया या बैठाया जाता है।

बस्तर प्रवास : तीसरा दिन 

तीन दिन की यात्रा का आखिरी दिन भी कम दिलचस्प नहीं था।

अब लौटना था रायपुर, लेकिन रास्ते में केशकाल को देखने का मन था। सोचा, जब आए ही हैं तो इस इलाके को भी थोड़ा समय दिया जाए।
सुबह लगभग 8:00 बजे बस से हम रवाना हुए और दोपहर 11:00 बजे तक पहुंच गए केशकाल शहर। और सबसे पहले पहुंचे गढ़ धनोरा गांव के पास स्थित गढ़ गोबरहीन। 
प्राकृतिक वातावरण के बीच स्थित यह स्थान अपनी स्थानीय धार्मिक और ऐतिहासिक पहचान के लिए जाना जाता है। यहां शिव मंदिर, शिवलिंग और आसपास की प्राचीन धरोहरों के दर्शन किए। चारों ओर हरियाली और शांत वातावरण था। शहर की भागदौड़ से दूर ऐसी जगह पर कुछ देर बैठना भी अपने आप में सुकून देता है।


यहां से आगे बढ़े तो हमारा अगला पड़ाव था टाटामारी।
अब टाटामारी को लेकर जितना सुना था, उसे देखने की उत्सुकता भी उतनी ही थी। केशकाल के पास स्थित यह पहाड़ी पर्यटन स्थल अपनी हरियाली, प्राकृतिक वातावरण और घाटियों के दृश्यों के लिए जाना जाता है। यहां पहुंचकर लगा कि छत्तीसगढ़ में पर्यटन की संभावनाएं कितनी व्यापक हैं। लोग अक्सर घूमने के लिए दूसरे राज्यों के हिल स्टेशन तलाशते हैं, जबकि हमारे अपने प्रदेश में भी ऐसे कई स्थान हैं, जिन्हें सही तरीके से विकसित किया जाए तो वे पर्यटकों को आकर्षित कर सकते हैं।
टाटामारी में अभी पर्यटन सुविधाओं को विकसित करने का काम चल रहा है। यहां महिला स्व सहायता समूह के द्वारा संचालित भोजनालय में छत्तीसगढ़ी व्यंजनों का स्वाद लेने का मौका मिलता है। इसके अलावा ग्लास हाउस कैफे, बच्चों के लिए बाल उद्यान और ठहरने के लिए बने कॉटेज जैसी सुविधाएं भी हैं। यानी यह जगह धीरे-धीरे परिवार के साथ घूमने और कुछ समय बिताने के लिए तैयार हो रही है।

हम पहुंचे तो वहां छत्तीसगढ़ी फिल्म की शूटिंग भी चल रही थी। इसे देखकर लगा कि आने वाले समय में टाटामारी फिल्मों की शूटिंग और पर्यटन, दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण स्थान बन सकता है। 

हां, अभी यहां और सुविधाएं विकसित करने की गुंजाइश है। बेहतर सड़क संकेतक, पर्यटकों के लिए व्यवस्थित सुविधाएं, साफ-सफाई और स्थानीय व्यंजनों को बढ़ावा दिया जाए तो यह जगह और निखर सकती है। प्रकृति ने तो यहां अपना खजाना पहले से खोल रखा है, अब जरूरत है उसे सहेजने और बेहतर ढंग से पर्यटकों के सामने लाने की।

कुल मिलाकर तीन दिन की यह बस्तर यात्रा हमारे लिए बेहद खास रही।

एक तरफ तीरथगढ़ और चित्रकूट जैसे जलप्रपातों की खूबसूरती, दूसरी तरफ बारसूर के प्राचीन मंदिर, मां दंतेश्वरी का दरबार, जगदलपुर की सांस्कृतिक विरासत, दलपत सागर और बस्तर दशहरा की परंपराएं। फिर केशकाल और टाटामारी का प्राकृतिक सौंदर्य।

तीन दिन में हमने बस्तर के कई प्रमुख पर्यटन स्थलों को देखने की कोशिश की। यह पूरी तरह संभव नहीं कि इतने बड़े और विविधतापूर्ण क्षेत्र को तीन दिन में जान लिया जाए, लेकिन शुरुआत जरूर हो गई।

और सबसे अच्छी बात यह रही कि इस बार बस्तर की खबरें करने नहीं, परिवार के साथ बस्तर को जीने पहुंचे थे। बस्तर के हमारे इस प्रवास को यादगार, सुखद और सहज बनाने में जगदलपुर के वरिष्ठ पत्रकार श्री विनोद सिंह जी, पत्रकार श्री अनूप श्रीवास्तव जी, केशकाल के पत्रकार श्री चिराग उपाध्याय जी और हमारे सारथी श्री गुप्ता जी का विशेष सहयोग रहा। आप सभी ने जिस आत्मीयता, स्नेह और अपनत्व के साथ हमारा साथ दिया, उसके लिए हृदय से आभारी हूं। आपके सहयोग से बस्तर को करीब से जानने, यहां की प्राकृतिक सुंदरता, संस्कृति और लोगों की आत्मीयता को महसूस करने का अवसर मिला। सच है, यात्राएं स्थानों से पहचानी जाती हैं, लेकिन उन्हें यादगार बनाते हैं वहां मिलने वाले लोग और उनसे जुड़े रिश्ते।
पत्रकारिता में घूमते हुए कई जगहों की खबरें बनती हैं, लेकिन परिवार के साथ उन्हीं जगहों पर बिताए पल जीवन की अपनी खबर बन जाते हैं। ऐसी खबर, जिसे किसी पेज पर लगाने की जरूरत नहीं होती, बस दिल में संभालकर रखना होता है।

अब पत्नी और परिवार के ताने भी कुछ समय के लिए बंद होने चाहिए। आखिर बस्तर दिखा तो दिया!

हां, एक बात जरूर है। तीन दिन में इतना कुछ देखने के बाद भी लगता है कि बस्तर में अभी बहुत कुछ बाकी है। अबकी बार कुछ और जगहों के लिए समय निकालना पड़ेगा।

क्योंकि बस्तर को एक बार देखकर मन भर जाए, ऐसा बस्तर है ही नहीं!

~~वरिष्ठ पत्रकार रामकृष्ण डोंगरे ~~

Friday, October 16, 2026

Bastar Diaries : 'नार' में छिपी आदिवासी गांवों की कहानी,

आदिवासी क्षेत्रों में गांवों के नाम बताते हैं जंगल, नदी और जनजातीय जीवन की कहानी
किसी गांव का नाम नगरनार क्यों पड़ा? बास्तानार और कोड़ेनार के नामों में बार-बार आने वाला 'नार' आखिर क्या कहता है? क्या इन नामों के पीछे कोई कहानी है, किसी पुरानी बसाहट की स्मृति है या फिर सदियों से चली आ रही भाषा और संस्कृति की कोई निशानी?

ऐसे सवालों के जवाब तलाशने की जिज्ञासा मुझे बस्तर के गांवों के नामों तक ले गई।

मेरा जन्म मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के तंसरामाल गांव में हुआ। पिछले 13 वर्षों से छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में रह रहा हूं। यहां टिकरापारा, बढ़ईपारा, तात्यापारा, बूढ़ापारा, आमापारा, नयापारा, बैजनाथपारा और मौदहापारा जैसे नामों से गुजरते हुए अक्सर मन में सवाल उठता था कि आखिर इन गांवों और मोहल्लों के नाम कैसे पड़े होंगे? इनके पीछे कोई व्यक्ति, भौगोलिक विशेषता या इतिहास जरूर रहा होगा।
यह जिज्ञासा मन में बनी रही।

फिर बस्तर में आठ से 10 अक्टूबर 2026 तक, तीन दिवसीय प्रवास का अवसर मिला। जगदलपुर से दंतेवाड़ा और चित्रकोट जाते समय बास्तानार, कोड़ेनार जैसे गांवों से गुजरना हुआ। हर बार नामों में उभरता 'नार' शब्द ध्यान खींचता रहा। लगा कि इन नामों के पीछे कोई दिलचस्प कहानी जरूर छिपी होगी। बस, यहीं से शुरू हुई बस्तर के गांवों के नामों की कहानी जानने की कोशिश।

बस्तर के गांवों के नामों पर नजर डालें तो 'नार' से जुड़े कई नाम मिलते हैं। नगरनार, नेतानार, मड़ानार, चोलनार, पालनार, पीरनार, कोड़ेनार, कावनार, कपानार, तोयनार और उलनार ऐसे ही कुछ नाम हैं। बड़े अलनार, छोटे अलनार, बड़े बोदेनार और छोटे बोदेनार जैसे नाम भी इस क्षेत्र की बसाहटों की विविधता सामने लाते हैं।

स्थानीय गोंडी और हल्बी भाषाओं में 'नार' शब्द का अर्थ गांव या बस्ती होता है। हालांकि, इस शब्द की भाषाई उत्पत्ति और प्रत्येक गांव के नाम का वास्तविक अर्थ समझने के लिए गोंडी और हल्बी भाषा के जानकारों, स्थानीय बुजुर्गों और ऐतिहासिक दस्तावेजों की मदद लेना जरूरी है। केवल नाम के आधार पर किसी गांव के इतिहास का अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

बस्तर की खासियत यही है कि यहां के गांवों के नाम केवल भौगोलिक पहचान नहीं हैं। वे स्थानीय भाषाओं, जनजातीय परंपराओं, प्राकृतिक परिवेश और पीढ़ियों से चली आ रही स्मृतियों को भी अपने भीतर समेटे हो सकते हैं। किसी नाम के पीछे जंगल, नदी, पहाड़ी, पेड़-पौधे, खेती या किसी पुरानी बसाहट का संदर्भ हो सकता है। ऐसे नामों को समझना दरअसल उस क्षेत्र के समाज और संस्कृति को समझने की एक कोशिश है।

छिंदवाड़ा के अपने गांव तंसरामाल से रायपुर के मोहल्लों और फिर बस्तर के गांवों तक फैली यह जिज्ञासा अब एक बड़े सवाल में बदल गई है।

क्या हम अपने आसपास के स्थानों के नामों के पीछे छिपी कहानियों को जानते हैं? शायद इन नामों को समझने की शुरुआत स्थानीय बुजुर्गों से बातचीत और लोकस्मृतियों को दर्ज करने से हो सकती है।

आखिर गांव का नाम केवल नक्शे पर दर्ज एक पहचान नहीं, बल्कि उस जगह के अतीत तक पहुंचने का एक रास्ता भी हो सकता है।

~~वरिष्ठ पत्रकार रामकृष्ण डोंगरे ~~

#bastartour #बस्तरडायरी #डोंगरे_की_डायरी #dongrejionline #villagelife

Saturday, February 7, 2026

मेरी पहली दक्षिण भारत की यात्रा : तीन राज्य और पांच शहर

29 जनवरी से 4 फरवरी 2026 तक आयोजित सात दिवसीय एक्सपोजर विजिट की यादें 
छत्तीसगढ़ जनसंपर्क विभाग की ओर से 29 जनवरी से 4 फरवरी 2026 तक आयोजित सात दिवसीय एक्सपोजर विजिट के दौरान हमें तमिलनाडु में कोयंबटूर के ईशा फाउंडेशन, ऊटी के प्रमुख टूरिस्ट प्लेस जैसे– चाय फैक्ट्री संग्रहालय, बोटैनिकल गार्डन, पाइन फॉरेस्ट, शूटिंग स्थल, पायकारा जलप्रपात, कर्नाटक में मैसूर पैलेस, श्री चामुंडेश्वरी मंदिर, बेंगलुरु में कर्नाटक विधानसभा और आंध्रप्रदेश में तिरुपति बालाजी मंदिर आदि स्थानों पर जाने का अवसर मिला। 
दक्षिण भारत की यह यात्रा सिर्फ शहरों के बीच की दूरी नहीं थी, बल्कि संस्कृति, प्रकृति और आस्था के संगम की एक जीवंत कहानी बन गई। कोयंबटूर से तिरुपति बालाजी तक का यह सफर हर मोड़ पर नया अनुभव देता है—कहीं हरियाली, कहीं इतिहास, तो कहीं श्रद्धा की गहराई।
कोयंबटूर से यात्रा की शुरुआत हुई। तमिलनाडु का यह औद्योगिक शहर अपनी सादगी और सुव्यवस्थित जीवनशैली के लिए जाना जाता है। कोयंबटूर से निकलते ही जैसे-जैसे सड़क नीलगिरि की ओर बढ़ती है, मौसम और मिजाज दोनों बदलने लगते हैं। रास्ते में 40 किमी की दूरी पर स्थित ईशा फाउंडेशन एक ऐसी आध्यात्मिक यात्रा पर ले जाता है, जहां 112 फीट ऊंची आदियोगी शिव की भव्य प्रतिमा स्थापित है। यह स्थान न केवल ध्यान और साधना का केंद्र है, बल्कि शांति, आत्मबोध और आध्यात्मिक ऊर्जा का अनूठा अनुभव भी कराता है।
कुछ ही घंटों में ऊटी का ठंडा अहसास यात्रियों को घेर लेता है। घुमावदार पहाड़ी सड़कें, चाय बागानों की हरी चादर और बादलों की ओट में छिपे पहाड़—ऊटी को यूं ही ‘पहाड़ों की रानी’ नहीं कहा जाता। बोटैनिकल गार्डन की सैर हो या ऊटी झील में नौकायन, हर दृश्य कैमरे में कैद करने लायक लगता है। डोड्डाबेट्टा पीक से नीचे फैली वादियों को देखना मानो प्रकृति का विराट कैनवास हो। यहां की शांति मन को ठहराव देती है, जो आगे की यात्रा के लिए ऊर्जा बन जाती है।

ऊटी से मैसूर की राह प्रकृति से इतिहास की ओर ले जाती है। रास्ते में मुदुमलाई राष्ट्रीय उद्यान, बांदीपुर वन्यजीव अभयारण्य में बस में बैठे–बैठे ही हाथी, हिरण, मोर आदि वन्य जीवों के दर्शन हो जाते हैं। मुदुमलाई उद्यान की दूरी ऊटी से लगभग 40 किमी है। कर्नाटक का मैसूर शहर अपनी भव्यता और अनुशासन के लिए प्रसिद्ध है। मैसूर पैलेस की रोशनी में डूबती शाम हो या चामुंडी पहाड़ी से शहर का नजारा—हर पल शाही विरासत की याद दिलाता है। मैसूर सिर्फ देखने का शहर नहीं, बल्कि महसूस करने का अनुभव है। मैसूर पैलेस वास्तुकला की विभिन्न शैलियों का मिश्रण है। इसे देखने के लिए रोजाना हजारों लोगों की भीड़ उमड़ती है। इसे ताजमहल के बाद भारत में सबसे अधिक देखा जाने वाला स्मारक भी माना जाता है। मैसूर से 13 किमी दूर स्थित चामुंडेश्वरी मंदिर हमें दक्षिण भारत के द्रविड़ शैली के मंदिरों से रूबरू कराता है। 

यात्रा का सबसे भावनात्मक पड़ाव है आंध्र प्रदेश जिले में स्थित तिरुपति बालाजी (तिरुमला)। बेंगलुरु शहर से इसकी दूरी लगभग 250 किमी है। तिरुपति शहर से 25 किलोमीटर दूर पहाड़ियों पर बसे इस पवित्र धाम की ओर बढ़ते हुए श्रद्धा अपने आप गहराने लगती है। घुमावदार रास्तों पर चलते वाहन, “गोविंदा… गोविंदा…” के जयकारे और भक्तों की आस्था—सब मिलकर माहौल को आध्यात्मिक बना देते हैं। भगवान वेंकटेश्वर के दर्शन मात्र से यात्रा की सारी थकान जैसे समाप्त हो जाती है। यहां की व्यवस्था, अनुशासन और श्रद्धालुओं की आस्था भारत की सांस्कृतिक शक्ति का परिचय देती है।

हमारी यात्रा का अंतिम पड़ाव बेंगलुरु रहा—आधुनिक भारत की तकनीकी राजधानी। समय की सीमाओं के कारण हम कर्नाटक विधानसभा भवन तक ही सीमित रह सके, किंतु शहर की सड़कों से गुजरते हुए बेंगलुरु की तेज़ रफ्तार और आपाधापी भरी जीवनशैली को नज़दीक से महसूस करने का अवसर मिला। लालबाग बोटैनिकल गार्डन, रॉक गार्डन और क्यूबन पार्क जैसे हरित स्थलों को देखने की इच्छा अधूरी ही रह गई। फिर भी यह स्पष्ट होता है कि ऐतिहासिक विधान सौधा और आधुनिक आईटी हब का संतुलित संगम ही बेंगलुरु की विशिष्ट पहचान है। यहां की जीवंत सड़कें, उभरता कैफे कल्चर और युवाओं से भरी ऊर्जा दक्षिण भारत के बदलते और गतिशील चेहरे की सशक्त कहानी कहती है।


इस पूरे सफर में कोयंबटूर की सादगी, ऊटी की ठंडक, मैसूर की शान, बेंगलुरु की आधुनिकता और तिरुपति की भक्ति—पांचों रंग एक साथ उभरकर सामने आते हैं। यह यात्रा सिर्फ पर्यटन स्थलों की नहीं, बल्कि भारत की विविधता को करीब से जानने की एक यादगार दास्तान बन जाती है। कहा जा सकता है कि दक्षिण भारत की सड़कें सिर्फ मंजिल तक नहीं ले जातीं, बल्कि अनुभवों से भर देती हैं।
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जनसंपर्क अधिकारियों और वरिष्ठ पत्रकारों का मिला सान्निध्य

सात दिवसीय शैक्षणिक टूर में जनसंपर्क विभाग, रायपुर से श्री बालमुकुंद तंबोली, श्री अनिल कुमार वर्मा, श्री भवानी सिंह ठाकुर एवं श्री धनेन्द्र कुमार बंजारे शामिल रहे, वहीं जनसंपर्क विभाग बस्तर से श्री कमल बघेल ने सहभागिता की। मीडिया जगत से दैनिक नवप्रदेश रायपुर के श्री चंद्रशेखर घोटे, दैनिक हरिभूमि रायपुर के श्री गुलाल प्रसाद वर्मा, राष्ट्रीय न्यूज सर्विस दुर्ग के श्री हर्ष शुक्ला, दैनिक नवभारत बस्तर के श्री कमलेश बघेल, दैनिक अग्रदूत रायपुर के श्री कृष्ण कुमार शर्मा तथा दैनिक साथी संदेश दुर्ग के श्री मलय बैनर्जी इस शैक्षणिक यात्रा का हिस्सा रहे।

इसके अतिरिक्त दैनिक जनता से रिश्ता रायपुर से मोहम्मद जाकिर घुरसेना, दैनिक भास्कर रायपुर से श्री नीरज कुमार मिश्रा, नईदुनिया रायपुर से श्री रामकृष्ण डोंगरे, दैनिक विश्व परिवार रायपुर से श्री रत्नेश गुप्ता, दैनिक दावा राजनांदगांव एवं दैनिक बस्तर इम्पैक्ट दंतेवाड़ा से श्री सुरेश महापात्र, दैनिक राजनांदगांव टाइम्स से श्री सूरज बुद्धदेव, राजनांदगांव से श्री उत्तम कुमार पाण्डेय तथा दैनिक छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस से श्री विक्रम तिवारी भी इस भ्रमण में सहभागी रहे।

-रामकृष्ण डोंगरे, वरिष्ठ पत्रकार 
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Sunday, November 30, 2025

रायपुर डायरी : मुक्तिबोध जी की स्मृतियों में एक शाम

पत्रकारिता एक ऐसा पेशा है जहां आपको हर वर्ग के लोगों से मेलजोल करना होता है, हर विषय का थोड़ा-बहुत ज्ञान अनिवार्य है। लेकिन दिल हमेशा अपनी पसंद की तरफ झुकता है। मेरे लिए वह विषय हमेशा से कला, साहित्य और संस्कृति रहा है।
जब मैं वर्ष 2004-07 के बीच भोपाल में रहा करता था, तब वहाँ के साहित्यकारों से मिलना-जुलना मेरी दिनचर्या का हिस्सा था। अक्सर अपनी एटलस साइकिल से मैं उनसे मिलने उनके घर तक पहुंच जाता था। वह दौर था ज्ञान की भूख शांत करने का।

वर्ष 2013 में जब मैं रायपुर आया, तो यह सिलसिला थमा नहीं। यहाँ सबसे पहली मुलाकात साहित्यकार गिरीश पंकज जी से हुई थी; संयोग से वे मेरे किराए के घर के नज़दीक ही रहते थे।
छत्तीसगढ़ के बड़े साहित्यकारों की बात हो, तो गजानन माधव मुक्तिबोध एक ऐसा नाम है, जो था, है और हमेशा रहेगा। मुझे जब पता चला कि उनके सुपुत्र, दिवाकर मुक्तिबोध Diwakar Muktibodh सर, पत्रकारिता जगत में हैं, तो उनसे मिलने का अवसर अक्सर मिलता रहा। पर, इस बार पहली बार उनके निवास स्थान पर जाना हुआ।

[अंधेरे में, चांद का मुंह टेढ़ा, ब्रह्मराक्षस जैसी कविताओं के रचयिता मुक्तिबोध जी की स्मृतियों से मुलाकात] 

रायपुर में विधानसभा रोड पर स्थित सड्डू इलाके की मेट्रो ग्रीन सोसाइटी में उनका घर है। घर के प्रवेश द्वार पर ही आपको मुक्तिबोध की स्मृतियों का एहसास होने लगता है। अंदर पूरा घर उनकी विरासत को सहेजे हुए है — उनकी तस्वीरें, उनकी रचनाओं के अंश... हर जगह उनकी उपस्थिति महसूस होती है।

पिछले 12 वर्षों से मैं रायपुर में हूँ। पहले वे देवेंद्र नगर में रहा करते थे, तब भी कई बार दिवाकर सर से घर पर मुलाकात को लेकर बातचीत हुई, पर व्यस्तता के कारण घर पहुंचना नहीं हुआ। पर इस बार, माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय की हमारी वरिष्ठ साथी, सुमिता जायसवाल मैडम की वजह से यह सार्थक संयोग बन गया।

मुलाकात का विषय व्यक्तिगत कुशलक्षेम के अलावा मुख्य रूप से पत्रकारिता और उसके बदलते स्वरूप पर केंद्रित रहा।

दिवंगत गजानन माधव मुक्तिबोध जी की विरासत को सहेजते हुए, उनके पुत्र दिवाकर मुक्तिबोध सर से यह मिलन मेरे साहित्यिक अनुराग को एक नई दिशा देने वाला साबित हुआ। 

छत्तीसगढ़ की पावन माटी में जन्मे मूर्धन्य लेखक-साहित्यकारों में कुछ नाम मुझे हमेशा स्मृत रहते हैं—पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, गजानन माधव मुक्तिबोध, माधवराव सप्रे, मुकुटधर पांडे आदि। उनके परिवारजनों से भेंट आज भी मुझे हृदयस्पर्शी लगती है। इसी कड़ी में मुक्तिबोध जी के पुत्र दिवाकर मुक्तिबोध सर से यह संक्षिप्त मुलाकात अत्यंत सौहार्दपूर्ण रही। भविष्य में उनसे और गहन, लंबी चर्चाओं की आशा करता हूँ।
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*गजानन माधव मुक्तिबोध का संक्षिप्त परिचय*
गजानन माधव मुक्तिबोध (1917-1964) हिंदी साहित्य के प्रगतिशील कवि, आलोचक और कहानीकार थे। उनकी रचनाएँ मध्यमवर्गीय बुद्धिजीवी के आंतरिक द्वंद्व, सामाजिक विषमता और मानवीय संघर्ष को प्रतीकात्मक गहराई से उकेरती हैं। अंधेरे में उनकी शिखर कविता है, जो 55 पृष्ठों में आत्मसंघर्ष का चित्रण करती है। अन्य चर्चित कविताएँ हैं—भूरी-भूरी खाक धूल, देवी मुझे न जला दे, प्रलाप और जीने की आस। मुख्य पुस्तक चाँद का मुँह टेढ़ा है (1964) हिंदी काव्य की मील का पत्थर है।

'चांद का मुंह टेढ़ा है' से:

"चांद का है टेढ़ा मुँह!!"
"ज़िन्दगी में झोल है!!"
"गड़ गये, गाड़े गये !! झड़ गये, झाड़े गये !! चीरी गयीं, फाड़ी गयीं !!"
'ब्रह्मराक्षस' और अन्य कविताओं से:
"विचार आते हैं लिखते समय नहीं, बोझ ढोते वक्त पीठ पर"
"(वह नहीं दीखता... नहीं ही दीखता, किन्तु वह रहा घूम तिलस्मी खोह में ग़िरफ्तार कोई एक...)"
अन्य चर्चित पंक्तियां:
"बैचेनी के साँपों को मैंने छाती से रगड़ा है।"
"हमारी भूख की मुस्तैद आँखें ही थका-सा दिल बहादुर रहनुमाई पास पा के भी बुझा-सा ही रहा इस ज़िन्दगी के कारख़ाने में उभरता भी रहा पर बैठता भी तो रहा बेरुह इस काले ज़माने में।"

~~ रामकृष्ण डोंगरे~~

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Friday, October 17, 2025

सत्ता को दो-टूक जवाब: 'मैं संपादक हूँ, खबर मैं तय करूँगा, आप नहीं!’

किस्सा संपादक का : पहली किस्त

आज मैं तेज-तर्रार पत्रकार और संपादक आनंद पांडे जी से जुड़ा एक रोचक किस्सा साझा करना चाहता हूं। पांडे जी, जो वर्तमान में 'द सूत्र' से जुड़े हैं और चर्चा में हैं, उस समय रायपुर के एक प्रतिष्ठित अखबार के संपादक थे।
यह बात उस वक्त की है जब मैंने अमर उजाला, नोएडा छोड़कर उस अखबार में नौकरी शुरू की थी। वहां के संपादक आनंद पांडे जी के तेवर देखते ही बनते थे। एक बार हमारे होनहार रिपोर्टर गोविंद पटेल ने एक सनसनीखेज खबर फाइल की। 

खबर थी कि तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष और भाजपा के बड़े नेता गौरीशंकर अग्रवाल के बंगले में 48 एयर कंडीशनर (एसी) लगे थे। यह खबर सरकारी बंगलों में रखरखाव और मरम्मत के नाम पर होने वाली फिजूलखर्ची को उजागर करती थी।

खबर छपते ही रायपुर के राजनीतिक गलियारों में हड़कंप मच गया, चर्चाएं गर्म हो गईं और स्वाभाविक रूप से गौरीशंकर जी नाराज हो गए। अगले दिन सुबह की मीटिंग के दौरान पांडे जी के पास गौरीशंकर अग्रवाल का फोन आया।

उन्होंने सवाल किया, 

“आनंद जी, क्या आपको लगता है कि मेरे बंगले की यह खबर पहले पेज पर टॉप बॉक्स में छपने लायक थी? क्या यह इतनी बड़ी खबर थी?” 

पांडे जी ने तुरंत सख्त लहजे में जवाब दिया, 

“गौरीशंकर जी, आप राजनेता हैं, अपना काम करें। मैं संपादक हूँ, मेरा काम करूँगा। कौन सी खबर कहाँ छपेगी, यह मैं तय करूँगा, आप नहीं।” 

यह सुनते ही गौरीशंकर जी की बोलती बंद हो गई और बातचीत आगे बढ़ना मुश्किल था। 

इस घटना ने मुझे पांडे जी के बेबाक तेवर दिखाए। एक सच्चा संपादक वही होता है जो सच का साथ दे और झूठ को बर्दाश्त न करे, चाहे सामने कितना बड़ा व्यक्ति क्यों न हो। 

इसी तरह का एक और किस्सा भोपाल के प्रतिष्ठित संपादक गिरीश मिश्र जी का है। जब वे एक अखबार के संपादक थे, तब मालिक ने उनसे कहा कि वे मुख्यमंत्री निवास जाकर मुख्यमंत्री से मुलाकात करें। 

मिश्र जी ने दो टूक जवाब दिया, “मैं संपादक हूँ, मेरा काम अखबार को बेहतर बनाना है। अगर किसी को मुझसे मिलना है, तो वे मेरे दफ्तर आएँ। मैं किसी के पास नहीं जाऊँगा।” 

ऐसे तेवर वाले संपादक कम ही देखने को मिलते हैं, लेकिन अक्सर ऐसे लोग मालिकों को पसंद नहीं आते। बाद में मिश्र जी को उस अखबार से हटना पड़ा, हालांकि वे दूसरे अखबार के संपादक बने। 

आनंद पांडे जी और 'द सूत्र' की खबरों को देखकर लगता है कि वे केवल वही दिखाते हैं जो जनता को जानना चाहिए। राजस्थान के घटनाक्रम “दीया तले अंधेरा” सीरीज को आप देखेंगे तो समझ पाएंगे कि जो दिखाया गया है, वह जनता को जरूर देखना चाहिए। 

 'द सूत्र' के वीडियो देखकर आप भी अपनी राय बना सकते हैं कि क्या वे कुछ गलत कर रहे हैं। 

कृपया अपनी राय जरूर बताएं कमेंट में आपका स्वागत है….। 

~~ रामकृष्ण डोंगरे, पत्रकार व यूट्यूबर, डोंगरेजी ऑनलाइन ~~

Saturday, October 4, 2025

डेढ़ दशक बाद डॉ. लक्ष्मीचंद सर से मुलाकात: पीजी कॉलेज, छिंदवाड़ा की स्मृतियां

भाग-दौड़ भरे दिन के पश्चात कल (चार अक्टूबर, 2025) रात लगभग 8:30 बजे एमए हिंदी के मेरे प्रिय शिक्षक आदरणीय डॉ. लक्ष्मीचंद सर से मुलाकात हुई। यह मिलन लगभग डेढ़ दशक के अंतराल के बाद हुआ। छिंदवाड़ा के पीजी कॉलेज से वर्ष 2004 में एम.ए. हिंदी की पढ़ाई पूरी करने के बाद मैं (रामकृष्ण डोंगरे) भोपाल चला गया था।
सर ने बताया कि नरसिंहपुर रोड पर स्थित बिंद्रा कॉलोनी का यह नया मकान उन्होंने वर्ष 2005 में बनवाया था। मुझे याद है कि मैं कॉलेज के दिनों में उनके पुराने निवास पर भी जा चुका हूँ, जहां सर ने अपनी लाइब्रेरी से मुझे कुछ पुरानी और मूल्यवान किताबें भेंट की थीं, जो आज भी मेरे संग्रह का हिस्सा हैं। 

मुझे याद है कि मैं एक बार पहले भी इस नए मकान में आ चुका हूं। 2011 के बाद मैंने अपना फेसबुक अकाउंट खोला था। इसका मतलब है कि उसके बाद मेरी मुलाकात नहीं हुई है, क्योंकि मैं हर मुलाकात की यादें फेसबुक पर जरूर लिखता हूं। 
यद्यपि इस डेढ़ दशक के दौरान फोन पर हमारा लगातार संपर्क बना रहा, परंतु व्यक्तिगत रूप से मिलना एक सुखद अनुभव था। इस अवधि में सर ने छिंदवाड़ा जिले के विभिन्न कॉलेजों में अपनी उत्कृष्ट सेवाएं दी हैं।

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हिंदी विभाग की यादें
डॉ. लक्ष्मीचंद सर का व्यक्तित्व सरल और सहज है। उन्होंने हिंदी विभाग के कई सफल बैचों को पढ़ाया है। 
एक विशेष बात यह है कि आदरणीय सर रोज अपने गार्डन के फूलों की तस्वीर के साथ सुप्रभात का मैसेज भेजते हैं। हमें याद है कि वर्ष 2002-2004 के सत्र में सर के साथ-साथ गुप्ता मैडम, अवस्थी मैडम, पटवारी मैडम भी हमें पढ़ाया करती थीं। यह मेरे लिए गर्व का विषय था कि मैंने 73% के साथ अपनी कक्षा में टॉप किया था।

मुझे याद है कि हमसे पहले वाले बैच से इमरान खान जी पास आउट हुए थे, जो वर्तमान में हिंदुस्तान डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। यह भी गौरतलब है कि पीजी कॉलेज छिंदवाड़ा की गिनती उन प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में होती है, जहां छत्तीसगढ़ की पूर्व राज्यपाल अनुसूइया उइके जी भी शिक्षा ग्रहण कर चुकी हैं।

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सांस्कृतिक और साहित्यिक उपलब्धियां 
कॉलेज से जुड़ी मेरी यादों में साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियां सर्वोपरि हैं। कॉलेज की पत्रिका 'निर्झरी' में मेरे आलेख और कविताएं प्रकाशित हुई थीं। इससे पहले डीसी कॉलेज की पत्रिका में भी मेरी कविता को स्थान मिला था। सांस्कृतिक प्रतियोगिताओं में भाग लेना एक महत्वपूर्ण अनुभव रहा। मैंने अपने मित्र दिग्विजय सिंह के साथ सामान्य ज्ञान प्रश्न मंच प्रतियोगिता में छिंदवाड़ा जिले का प्रतिनिधित्व किया था और सागर विश्वविद्यालय में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी। जिले से प्रतिनिधि चयन के लिए गर्ल्स कॉलेज में एक कड़ी प्रतिस्पर्धा आयोजित की गई थी।

हमारा पीजी कॉलेज धर्म टेकरी पर स्थित है, जिसके नज़दीक ही आकाशवाणी छिंदवाड़ा और ऐतिहासिक राज्य बादल भोई संग्रहालय भी मौजूद हैं, जो इस क्षेत्र के सांस्कृतिक महत्व को बढ़ाते हैं।

- वरिष्ठ पत्रकार रामकृष्ण डोंगरे, पूर्व विद्यार्थी, पीजी कालेज छिंदवाड़ा

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Thursday, October 2, 2025

School Life : गांव तंसरामाल के प्राइमरी स्कूल के दोस्तों से मुलाकात

मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में स्थित तंसरामाल गांव में गुरुवार 2 अक्टूबर 2025 को बचपन के यारों कैलाश डोंगरे, पंचम महोबिया और प्रीतम डोंगरे से एक साथ मुलाकात हुई तो मानो समय की मशीन में सवार होकर सीधे 1985 में पहुंच गया! जिस समय शासकीय प्राथमिक शाला तंसरामाल में हमारी स्कूल लाइफ शुरू हुई थी। 


कैलाश से तो मुलाकातें होती रहती हैं, लेकिन पंचम से मिलना? अरे, वो तो दो दशक बाद हुआ! पंचम, जो कभी कोर्ट की नौकरी में, कभी टीचर की भूमिका में मध्यप्रदेश के अलग-अलग शहरों में रहे। इन दिनों विदिशा जिले में शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। 
हमारा प्राइमरी स्कूल का जमाना, वो तो बस एक अलग ही दुनिया थी! हमारा दोस्तों का गैंग—कैलाश, पंचम, शंकर, आरिफ, प्रीतम, सुभाष—जैसे सात समंदर के रत्न! हर दिन नई शरारत, नई मस्ती।
कैलाश के साथ तो एक खास किस्सा है, जो आज भी हंसी ला देता है। स्कूल के सांस्कृतिक कार्यक्रम में कैलाश के साथ मुझे स्टेज पर चढ़ने का मौका मिला। असल में, कोई और आने वाला था, लेकिन उसकी 'गैरहाजिरी' ने मुझे स्टार बना दिया! वो मेरी जिंदगी का पहला और आखिरी स्कूल स्टेज परफॉर्मेंस था। इनाम में मिला एक चमचमाता गिलास, जिसे मैंने बरसों तक ट्रॉफी की तरह संभाला।

स्कूल की वो गलियां, वो क्लासरूम, वो सैयद सर की डांट और देशमुख सर का वो दमदार अंदाज—कैसे भूलें? गुप्ता सर और मर्सकोले मैडम की पढ़ाई ने तो हमें जिंदगी की पहली सीढ़ियां चढ़ाईं। और हां, हमारे गैंग का शंकर सिरसाम तो बाद में गांव का सरपंच बना, वो भी दो-दो बार! गर्व की बात, है न?

ये मुलाकात बस एक मुलाकात नहीं थी, बल्कि उन पुराने दिनों की एक झलक थी—जब जिंदगी बस हंसी-मजाक, दोस्तों की यारी और मासूम सपनों का पीछा करना थी। तंसरामाल के स्कूल की वो यादें, वो दोस्ती, आज भी दिल में उतनी ही ताजा है, जितनी उस गिलास की चमक!

~ रामकृष्ण डोंगरे, तंसरामाल ~

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