Saturday, February 7, 2026

मेरी पहली दक्षिण भारत की यात्रा : तीन राज्य और पांच शहर

29 जनवरी से 4 फरवरी 2026 तक आयोजित सात दिवसीय एक्सपोजर विजिट की यादें 
छत्तीसगढ़ जनसंपर्क विभाग की ओर से 29 जनवरी से 4 फरवरी 2026 तक आयोजित सात दिवसीय एक्सपोजर विजिट के दौरान हमें तमिलनाडु में कोयंबटूर के ईशा फाउंडेशन, ऊटी के प्रमुख टूरिस्ट प्लेस जैसे– चाय फैक्ट्री संग्रहालय, बोटैनिकल गार्डन, पाइन फॉरेस्ट, शूटिंग स्थल, पायकारा जलप्रपात, कर्नाटक में मैसूर पैलेस, श्री चामुंडेश्वरी मंदिर, बेंगलुरु में कर्नाटक विधानसभा और आंध्रप्रदेश में तिरुपति बालाजी मंदिर आदि स्थानों पर जाने का अवसर मिला। 
दक्षिण भारत की यह यात्रा सिर्फ शहरों के बीच की दूरी नहीं थी, बल्कि संस्कृति, प्रकृति और आस्था के संगम की एक जीवंत कहानी बन गई। कोयंबटूर से तिरुपति बालाजी तक का यह सफर हर मोड़ पर नया अनुभव देता है—कहीं हरियाली, कहीं इतिहास, तो कहीं श्रद्धा की गहराई।
कोयंबटूर से यात्रा की शुरुआत हुई। तमिलनाडु का यह औद्योगिक शहर अपनी सादगी और सुव्यवस्थित जीवनशैली के लिए जाना जाता है। कोयंबटूर से निकलते ही जैसे-जैसे सड़क नीलगिरि की ओर बढ़ती है, मौसम और मिजाज दोनों बदलने लगते हैं। रास्ते में 40 किमी की दूरी पर स्थित ईशा फाउंडेशन एक ऐसी आध्यात्मिक यात्रा पर ले जाता है, जहां 112 फीट ऊंची आदियोगी शिव की भव्य प्रतिमा स्थापित है। यह स्थान न केवल ध्यान और साधना का केंद्र है, बल्कि शांति, आत्मबोध और आध्यात्मिक ऊर्जा का अनूठा अनुभव भी कराता है।
कुछ ही घंटों में ऊटी का ठंडा अहसास यात्रियों को घेर लेता है। घुमावदार पहाड़ी सड़कें, चाय बागानों की हरी चादर और बादलों की ओट में छिपे पहाड़—ऊटी को यूं ही ‘पहाड़ों की रानी’ नहीं कहा जाता। बोटैनिकल गार्डन की सैर हो या ऊटी झील में नौकायन, हर दृश्य कैमरे में कैद करने लायक लगता है। डोड्डाबेट्टा पीक से नीचे फैली वादियों को देखना मानो प्रकृति का विराट कैनवास हो। यहां की शांति मन को ठहराव देती है, जो आगे की यात्रा के लिए ऊर्जा बन जाती है।

ऊटी से मैसूर की राह प्रकृति से इतिहास की ओर ले जाती है। रास्ते में मुदुमलाई राष्ट्रीय उद्यान, बांदीपुर वन्यजीव अभयारण्य में बस में बैठे–बैठे ही हाथी, हिरण, मोर आदि वन्य जीवों के दर्शन हो जाते हैं। मुदुमलाई उद्यान की दूरी ऊटी से लगभग 40 किमी है। कर्नाटक का मैसूर शहर अपनी भव्यता और अनुशासन के लिए प्रसिद्ध है। मैसूर पैलेस की रोशनी में डूबती शाम हो या चामुंडी पहाड़ी से शहर का नजारा—हर पल शाही विरासत की याद दिलाता है। मैसूर सिर्फ देखने का शहर नहीं, बल्कि महसूस करने का अनुभव है। मैसूर पैलेस वास्तुकला की विभिन्न शैलियों का मिश्रण है। इसे देखने के लिए रोजाना हजारों लोगों की भीड़ उमड़ती है। इसे ताजमहल के बाद भारत में सबसे अधिक देखा जाने वाला स्मारक भी माना जाता है। मैसूर से 13 किमी दूर स्थित चामुंडेश्वरी मंदिर हमें दक्षिण भारत के द्रविड़ शैली के मंदिरों से रूबरू कराता है। 

यात्रा का सबसे भावनात्मक पड़ाव है आंध्र प्रदेश जिले में स्थित तिरुपति बालाजी (तिरुमला)। बेंगलुरु शहर से इसकी दूरी लगभग 250 किमी है। तिरुपति शहर से 25 किलोमीटर दूर पहाड़ियों पर बसे इस पवित्र धाम की ओर बढ़ते हुए श्रद्धा अपने आप गहराने लगती है। घुमावदार रास्तों पर चलते वाहन, “गोविंदा… गोविंदा…” के जयकारे और भक्तों की आस्था—सब मिलकर माहौल को आध्यात्मिक बना देते हैं। भगवान वेंकटेश्वर के दर्शन मात्र से यात्रा की सारी थकान जैसे समाप्त हो जाती है। यहां की व्यवस्था, अनुशासन और श्रद्धालुओं की आस्था भारत की सांस्कृतिक शक्ति का परिचय देती है।

हमारी यात्रा का अंतिम पड़ाव बेंगलुरु रहा—आधुनिक भारत की तकनीकी राजधानी। समय की सीमाओं के कारण हम कर्नाटक विधानसभा भवन तक ही सीमित रह सके, किंतु शहर की सड़कों से गुजरते हुए बेंगलुरु की तेज़ रफ्तार और आपाधापी भरी जीवनशैली को नज़दीक से महसूस करने का अवसर मिला। लालबाग बोटैनिकल गार्डन, रॉक गार्डन और क्यूबन पार्क जैसे हरित स्थलों को देखने की इच्छा अधूरी ही रह गई। फिर भी यह स्पष्ट होता है कि ऐतिहासिक विधान सौधा और आधुनिक आईटी हब का संतुलित संगम ही बेंगलुरु की विशिष्ट पहचान है। यहां की जीवंत सड़कें, उभरता कैफे कल्चर और युवाओं से भरी ऊर्जा दक्षिण भारत के बदलते और गतिशील चेहरे की सशक्त कहानी कहती है।


इस पूरे सफर में कोयंबटूर की सादगी, ऊटी की ठंडक, मैसूर की शान, बेंगलुरु की आधुनिकता और तिरुपति की भक्ति—पांचों रंग एक साथ उभरकर सामने आते हैं। यह यात्रा सिर्फ पर्यटन स्थलों की नहीं, बल्कि भारत की विविधता को करीब से जानने की एक यादगार दास्तान बन जाती है। कहा जा सकता है कि दक्षिण भारत की सड़कें सिर्फ मंजिल तक नहीं ले जातीं, बल्कि अनुभवों से भर देती हैं।
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जनसंपर्क अधिकारियों और वरिष्ठ पत्रकारों का मिला सान्निध्य

सात दिवसीय शैक्षणिक टूर में जनसंपर्क विभाग, रायपुर से श्री बालमुकुंद तंबोली, श्री अनिल कुमार वर्मा, श्री भवानी सिंह ठाकुर एवं श्री धनेन्द्र कुमार बंजारे शामिल रहे, वहीं जनसंपर्क विभाग बस्तर से श्री कमल बघेल ने सहभागिता की। मीडिया जगत से दैनिक नवप्रदेश रायपुर के श्री चंद्रशेखर घोटे, दैनिक हरिभूमि रायपुर के श्री गुलाल प्रसाद वर्मा, राष्ट्रीय न्यूज सर्विस दुर्ग के श्री हर्ष शुक्ला, दैनिक नवभारत बस्तर के श्री कमलेश बघेल, दैनिक अग्रदूत रायपुर के श्री कृष्ण कुमार शर्मा तथा दैनिक साथी संदेश दुर्ग के श्री मलय बैनर्जी इस शैक्षणिक यात्रा का हिस्सा रहे।

इसके अतिरिक्त दैनिक जनता से रिश्ता रायपुर से मोहम्मद जाकिर घुरसेना, दैनिक भास्कर रायपुर से श्री नीरज कुमार मिश्रा, नईदुनिया रायपुर से श्री रामकृष्ण डोंगरे, दैनिक विश्व परिवार रायपुर से श्री रत्नेश गुप्ता, दैनिक दावा राजनांदगांव एवं दैनिक बस्तर इम्पैक्ट दंतेवाड़ा से श्री सुरेश महापात्र, दैनिक राजनांदगांव टाइम्स से श्री सूरज बुद्धदेव, राजनांदगांव से श्री उत्तम कुमार पाण्डेय तथा दैनिक छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस से श्री विक्रम तिवारी भी इस भ्रमण में सहभागी रहे।

-रामकृष्ण डोंगरे, वरिष्ठ पत्रकार 
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Sunday, November 30, 2025

रायपुर डायरी : मुक्तिबोध जी की स्मृतियों में एक शाम

पत्रकारिता एक ऐसा पेशा है जहां आपको हर वर्ग के लोगों से मेलजोल करना होता है, हर विषय का थोड़ा-बहुत ज्ञान अनिवार्य है। लेकिन दिल हमेशा अपनी पसंद की तरफ झुकता है। मेरे लिए वह विषय हमेशा से कला, साहित्य और संस्कृति रहा है।
जब मैं वर्ष 2004-07 के बीच भोपाल में रहा करता था, तब वहाँ के साहित्यकारों से मिलना-जुलना मेरी दिनचर्या का हिस्सा था। अक्सर अपनी एटलस साइकिल से मैं उनसे मिलने उनके घर तक पहुंच जाता था। वह दौर था ज्ञान की भूख शांत करने का।

वर्ष 2013 में जब मैं रायपुर आया, तो यह सिलसिला थमा नहीं। यहाँ सबसे पहली मुलाकात साहित्यकार गिरीश पंकज जी से हुई थी; संयोग से वे मेरे किराए के घर के नज़दीक ही रहते थे।
छत्तीसगढ़ के बड़े साहित्यकारों की बात हो, तो गजानन माधव मुक्तिबोध एक ऐसा नाम है, जो था, है और हमेशा रहेगा। मुझे जब पता चला कि उनके सुपुत्र, दिवाकर मुक्तिबोध Diwakar Muktibodh सर, पत्रकारिता जगत में हैं, तो उनसे मिलने का अवसर अक्सर मिलता रहा। पर, इस बार पहली बार उनके निवास स्थान पर जाना हुआ।

[अंधेरे में, चांद का मुंह टेढ़ा, ब्रह्मराक्षस जैसी कविताओं के रचयिता मुक्तिबोध जी की स्मृतियों से मुलाकात] 

रायपुर में विधानसभा रोड पर स्थित सड्डू इलाके की मेट्रो ग्रीन सोसाइटी में उनका घर है। घर के प्रवेश द्वार पर ही आपको मुक्तिबोध की स्मृतियों का एहसास होने लगता है। अंदर पूरा घर उनकी विरासत को सहेजे हुए है — उनकी तस्वीरें, उनकी रचनाओं के अंश... हर जगह उनकी उपस्थिति महसूस होती है।

पिछले 12 वर्षों से मैं रायपुर में हूँ। पहले वे देवेंद्र नगर में रहा करते थे, तब भी कई बार दिवाकर सर से घर पर मुलाकात को लेकर बातचीत हुई, पर व्यस्तता के कारण घर पहुंचना नहीं हुआ। पर इस बार, माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय की हमारी वरिष्ठ साथी, सुमिता जायसवाल मैडम की वजह से यह सार्थक संयोग बन गया।

मुलाकात का विषय व्यक्तिगत कुशलक्षेम के अलावा मुख्य रूप से पत्रकारिता और उसके बदलते स्वरूप पर केंद्रित रहा।

दिवंगत गजानन माधव मुक्तिबोध जी की विरासत को सहेजते हुए, उनके पुत्र दिवाकर मुक्तिबोध सर से यह मिलन मेरे साहित्यिक अनुराग को एक नई दिशा देने वाला साबित हुआ। 

छत्तीसगढ़ की पावन माटी में जन्मे मूर्धन्य लेखक-साहित्यकारों में कुछ नाम मुझे हमेशा स्मृत रहते हैं—पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, गजानन माधव मुक्तिबोध, माधवराव सप्रे, मुकुटधर पांडे आदि। उनके परिवारजनों से भेंट आज भी मुझे हृदयस्पर्शी लगती है। इसी कड़ी में मुक्तिबोध जी के पुत्र दिवाकर मुक्तिबोध सर से यह संक्षिप्त मुलाकात अत्यंत सौहार्दपूर्ण रही। भविष्य में उनसे और गहन, लंबी चर्चाओं की आशा करता हूँ।
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*गजानन माधव मुक्तिबोध का संक्षिप्त परिचय*
गजानन माधव मुक्तिबोध (1917-1964) हिंदी साहित्य के प्रगतिशील कवि, आलोचक और कहानीकार थे। उनकी रचनाएँ मध्यमवर्गीय बुद्धिजीवी के आंतरिक द्वंद्व, सामाजिक विषमता और मानवीय संघर्ष को प्रतीकात्मक गहराई से उकेरती हैं। अंधेरे में उनकी शिखर कविता है, जो 55 पृष्ठों में आत्मसंघर्ष का चित्रण करती है। अन्य चर्चित कविताएँ हैं—भूरी-भूरी खाक धूल, देवी मुझे न जला दे, प्रलाप और जीने की आस। मुख्य पुस्तक चाँद का मुँह टेढ़ा है (1964) हिंदी काव्य की मील का पत्थर है।

'चांद का मुंह टेढ़ा है' से:

"चांद का है टेढ़ा मुँह!!"
"ज़िन्दगी में झोल है!!"
"गड़ गये, गाड़े गये !! झड़ गये, झाड़े गये !! चीरी गयीं, फाड़ी गयीं !!"
'ब्रह्मराक्षस' और अन्य कविताओं से:
"विचार आते हैं लिखते समय नहीं, बोझ ढोते वक्त पीठ पर"
"(वह नहीं दीखता... नहीं ही दीखता, किन्तु वह रहा घूम तिलस्मी खोह में ग़िरफ्तार कोई एक...)"
अन्य चर्चित पंक्तियां:
"बैचेनी के साँपों को मैंने छाती से रगड़ा है।"
"हमारी भूख की मुस्तैद आँखें ही थका-सा दिल बहादुर रहनुमाई पास पा के भी बुझा-सा ही रहा इस ज़िन्दगी के कारख़ाने में उभरता भी रहा पर बैठता भी तो रहा बेरुह इस काले ज़माने में।"

~~ रामकृष्ण डोंगरे~~

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Friday, October 17, 2025

सत्ता को दो-टूक जवाब: 'मैं संपादक हूँ, खबर मैं तय करूँगा, आप नहीं!’

किस्सा संपादक का : पहली किस्त

आज मैं तेज-तर्रार पत्रकार और संपादक आनंद पांडे जी से जुड़ा एक रोचक किस्सा साझा करना चाहता हूं। पांडे जी, जो वर्तमान में 'द सूत्र' से जुड़े हैं और चर्चा में हैं, उस समय रायपुर के एक प्रतिष्ठित अखबार के संपादक थे।
यह बात उस वक्त की है जब मैंने अमर उजाला, नोएडा छोड़कर उस अखबार में नौकरी शुरू की थी। वहां के संपादक आनंद पांडे जी के तेवर देखते ही बनते थे। एक बार हमारे होनहार रिपोर्टर गोविंद पटेल ने एक सनसनीखेज खबर फाइल की। 

खबर थी कि तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष और भाजपा के बड़े नेता गौरीशंकर अग्रवाल के बंगले में 48 एयर कंडीशनर (एसी) लगे थे। यह खबर सरकारी बंगलों में रखरखाव और मरम्मत के नाम पर होने वाली फिजूलखर्ची को उजागर करती थी।

खबर छपते ही रायपुर के राजनीतिक गलियारों में हड़कंप मच गया, चर्चाएं गर्म हो गईं और स्वाभाविक रूप से गौरीशंकर जी नाराज हो गए। अगले दिन सुबह की मीटिंग के दौरान पांडे जी के पास गौरीशंकर अग्रवाल का फोन आया।

उन्होंने सवाल किया, 

“आनंद जी, क्या आपको लगता है कि मेरे बंगले की यह खबर पहले पेज पर टॉप बॉक्स में छपने लायक थी? क्या यह इतनी बड़ी खबर थी?” 

पांडे जी ने तुरंत सख्त लहजे में जवाब दिया, 

“गौरीशंकर जी, आप राजनेता हैं, अपना काम करें। मैं संपादक हूँ, मेरा काम करूँगा। कौन सी खबर कहाँ छपेगी, यह मैं तय करूँगा, आप नहीं।” 

यह सुनते ही गौरीशंकर जी की बोलती बंद हो गई और बातचीत आगे बढ़ना मुश्किल था। 

इस घटना ने मुझे पांडे जी के बेबाक तेवर दिखाए। एक सच्चा संपादक वही होता है जो सच का साथ दे और झूठ को बर्दाश्त न करे, चाहे सामने कितना बड़ा व्यक्ति क्यों न हो। 

इसी तरह का एक और किस्सा भोपाल के प्रतिष्ठित संपादक गिरीश मिश्र जी का है। जब वे एक अखबार के संपादक थे, तब मालिक ने उनसे कहा कि वे मुख्यमंत्री निवास जाकर मुख्यमंत्री से मुलाकात करें। 

मिश्र जी ने दो टूक जवाब दिया, “मैं संपादक हूँ, मेरा काम अखबार को बेहतर बनाना है। अगर किसी को मुझसे मिलना है, तो वे मेरे दफ्तर आएँ। मैं किसी के पास नहीं जाऊँगा।” 

ऐसे तेवर वाले संपादक कम ही देखने को मिलते हैं, लेकिन अक्सर ऐसे लोग मालिकों को पसंद नहीं आते। बाद में मिश्र जी को उस अखबार से हटना पड़ा, हालांकि वे दूसरे अखबार के संपादक बने। 

आनंद पांडे जी और 'द सूत्र' की खबरों को देखकर लगता है कि वे केवल वही दिखाते हैं जो जनता को जानना चाहिए। राजस्थान के घटनाक्रम “दीया तले अंधेरा” सीरीज को आप देखेंगे तो समझ पाएंगे कि जो दिखाया गया है, वह जनता को जरूर देखना चाहिए। 

 'द सूत्र' के वीडियो देखकर आप भी अपनी राय बना सकते हैं कि क्या वे कुछ गलत कर रहे हैं। 

कृपया अपनी राय जरूर बताएं कमेंट में आपका स्वागत है….। 

~~ रामकृष्ण डोंगरे, पत्रकार व यूट्यूबर, डोंगरेजी ऑनलाइन ~~

Saturday, October 4, 2025

डेढ़ दशक बाद डॉ. लक्ष्मीचंद सर से मुलाकात: पीजी कॉलेज, छिंदवाड़ा की स्मृतियां

भाग-दौड़ भरे दिन के पश्चात कल (चार अक्टूबर, 2025) रात लगभग 8:30 बजे एमए हिंदी के मेरे प्रिय शिक्षक आदरणीय डॉ. लक्ष्मीचंद सर से मुलाकात हुई। यह मिलन लगभग डेढ़ दशक के अंतराल के बाद हुआ। छिंदवाड़ा के पीजी कॉलेज से वर्ष 2004 में एम.ए. हिंदी की पढ़ाई पूरी करने के बाद मैं (रामकृष्ण डोंगरे) भोपाल चला गया था।
सर ने बताया कि नरसिंहपुर रोड पर स्थित बिंद्रा कॉलोनी का यह नया मकान उन्होंने वर्ष 2005 में बनवाया था। मुझे याद है कि मैं कॉलेज के दिनों में उनके पुराने निवास पर भी जा चुका हूँ, जहां सर ने अपनी लाइब्रेरी से मुझे कुछ पुरानी और मूल्यवान किताबें भेंट की थीं, जो आज भी मेरे संग्रह का हिस्सा हैं। 

मुझे याद है कि मैं एक बार पहले भी इस नए मकान में आ चुका हूं। 2011 के बाद मैंने अपना फेसबुक अकाउंट खोला था। इसका मतलब है कि उसके बाद मेरी मुलाकात नहीं हुई है, क्योंकि मैं हर मुलाकात की यादें फेसबुक पर जरूर लिखता हूं। 
यद्यपि इस डेढ़ दशक के दौरान फोन पर हमारा लगातार संपर्क बना रहा, परंतु व्यक्तिगत रूप से मिलना एक सुखद अनुभव था। इस अवधि में सर ने छिंदवाड़ा जिले के विभिन्न कॉलेजों में अपनी उत्कृष्ट सेवाएं दी हैं।

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हिंदी विभाग की यादें
डॉ. लक्ष्मीचंद सर का व्यक्तित्व सरल और सहज है। उन्होंने हिंदी विभाग के कई सफल बैचों को पढ़ाया है। 
एक विशेष बात यह है कि आदरणीय सर रोज अपने गार्डन के फूलों की तस्वीर के साथ सुप्रभात का मैसेज भेजते हैं। हमें याद है कि वर्ष 2002-2004 के सत्र में सर के साथ-साथ गुप्ता मैडम, अवस्थी मैडम, पटवारी मैडम भी हमें पढ़ाया करती थीं। यह मेरे लिए गर्व का विषय था कि मैंने 73% के साथ अपनी कक्षा में टॉप किया था।

मुझे याद है कि हमसे पहले वाले बैच से इमरान खान जी पास आउट हुए थे, जो वर्तमान में हिंदुस्तान डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। यह भी गौरतलब है कि पीजी कॉलेज छिंदवाड़ा की गिनती उन प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में होती है, जहां छत्तीसगढ़ की पूर्व राज्यपाल अनुसूइया उइके जी भी शिक्षा ग्रहण कर चुकी हैं।

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सांस्कृतिक और साहित्यिक उपलब्धियां 
कॉलेज से जुड़ी मेरी यादों में साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियां सर्वोपरि हैं। कॉलेज की पत्रिका 'निर्झरी' में मेरे आलेख और कविताएं प्रकाशित हुई थीं। इससे पहले डीसी कॉलेज की पत्रिका में भी मेरी कविता को स्थान मिला था। सांस्कृतिक प्रतियोगिताओं में भाग लेना एक महत्वपूर्ण अनुभव रहा। मैंने अपने मित्र दिग्विजय सिंह के साथ सामान्य ज्ञान प्रश्न मंच प्रतियोगिता में छिंदवाड़ा जिले का प्रतिनिधित्व किया था और सागर विश्वविद्यालय में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी। जिले से प्रतिनिधि चयन के लिए गर्ल्स कॉलेज में एक कड़ी प्रतिस्पर्धा आयोजित की गई थी।

हमारा पीजी कॉलेज धर्म टेकरी पर स्थित है, जिसके नज़दीक ही आकाशवाणी छिंदवाड़ा और ऐतिहासिक राज्य बादल भोई संग्रहालय भी मौजूद हैं, जो इस क्षेत्र के सांस्कृतिक महत्व को बढ़ाते हैं।

- वरिष्ठ पत्रकार रामकृष्ण डोंगरे, पूर्व विद्यार्थी, पीजी कालेज छिंदवाड़ा

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Thursday, October 2, 2025

School Life : गांव तंसरामाल के प्राइमरी स्कूल के दोस्तों से मुलाकात

मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में स्थित तंसरामाल गांव में गुरुवार 2 अक्टूबर 2025 को बचपन के यारों कैलाश डोंगरे, पंचम महोबिया और प्रीतम डोंगरे से एक साथ मुलाकात हुई तो मानो समय की मशीन में सवार होकर सीधे 1985 में पहुंच गया! जिस समय शासकीय प्राथमिक शाला तंसरामाल में हमारी स्कूल लाइफ शुरू हुई थी। 


कैलाश से तो मुलाकातें होती रहती हैं, लेकिन पंचम से मिलना? अरे, वो तो दो दशक बाद हुआ! पंचम, जो कभी कोर्ट की नौकरी में, कभी टीचर की भूमिका में मध्यप्रदेश के अलग-अलग शहरों में रहे। इन दिनों विदिशा जिले में शिक्षक के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। 
हमारा प्राइमरी स्कूल का जमाना, वो तो बस एक अलग ही दुनिया थी! हमारा दोस्तों का गैंग—कैलाश, पंचम, शंकर, आरिफ, प्रीतम, सुभाष—जैसे सात समंदर के रत्न! हर दिन नई शरारत, नई मस्ती।
कैलाश के साथ तो एक खास किस्सा है, जो आज भी हंसी ला देता है। स्कूल के सांस्कृतिक कार्यक्रम में कैलाश के साथ मुझे स्टेज पर चढ़ने का मौका मिला। असल में, कोई और आने वाला था, लेकिन उसकी 'गैरहाजिरी' ने मुझे स्टार बना दिया! वो मेरी जिंदगी का पहला और आखिरी स्कूल स्टेज परफॉर्मेंस था। इनाम में मिला एक चमचमाता गिलास, जिसे मैंने बरसों तक ट्रॉफी की तरह संभाला।

स्कूल की वो गलियां, वो क्लासरूम, वो सैयद सर की डांट और देशमुख सर का वो दमदार अंदाज—कैसे भूलें? गुप्ता सर और मर्सकोले मैडम की पढ़ाई ने तो हमें जिंदगी की पहली सीढ़ियां चढ़ाईं। और हां, हमारे गैंग का शंकर सिरसाम तो बाद में गांव का सरपंच बना, वो भी दो-दो बार! गर्व की बात, है न?

ये मुलाकात बस एक मुलाकात नहीं थी, बल्कि उन पुराने दिनों की एक झलक थी—जब जिंदगी बस हंसी-मजाक, दोस्तों की यारी और मासूम सपनों का पीछा करना थी। तंसरामाल के स्कूल की वो यादें, वो दोस्ती, आज भी दिल में उतनी ही ताजा है, जितनी उस गिलास की चमक!

~ रामकृष्ण डोंगरे, तंसरामाल ~

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Wednesday, October 1, 2025

सब फोन देखने में बिजी हैं, रामलीला देखने कौन जाएगा?

मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में स्थित मेरा ग्राम तंसरामाल, जहां कभी दुर्गोत्सव और मंडई मेलों की रौनक पूरे क्षेत्र में प्रसिद्ध थी, आज एक अजीब सी खामोशी में डूबा हुआ है।

पहले इन मेलों में रंग-बिरंगे मंच सजते थे, गांव के लोग रामलीला और नाटकों के लिए उत्साह से इकट्ठा होते थे। बच्चे, बूढ़े, जवान—सब एक साथ बैठकर रामायण के चरित्रों को जीवंत होते देखते थे। ढोल-मंजीरे की आवाज, राम-सीता के संवाद और रावण के दहाड़ते किरदार गांव की फिजा में गूंजते थे। लेकिन आज, यह सब एक धुंधली याद बनकर रह गया है। मंच खाली हैं, दर्शक गायब हैं, और गांव की सांस्कृतिक धरोहर धीरे-धीरे विलुप्त हो रही है। 

कारण? हर हाथ में स्मार्टफोन और हर आंख स्क्रीन पर टिकी हुई है। 

शायद आपके पिताजी, चाचा जी या आपके बड़े भाई कभी रामलीला के किरदारों को जीवंत करते रहे होंगे। हमारे गांव के भी कई नाम मुझे याद आते हैं। जैसे- मयाराम काका, अर्जुन काका, छोटू काका, शिवपाल काका आदि। 

तंसरामाल में दुर्गोत्सव और मंडई मेलों का समय गांव वालों के लिए उत्सव का पर्याय था। रामलीला के मंच पर स्थानीय कलाकार अपने अभिनय से रामायण को जीवंत करते थे। बच्चे राम के बाण चलाने का दृश्य देखकर तालियां बजाते, तो बुजुर्ग राम-सीता के आदर्शों पर चर्चा करते। ये आयोजन केवल मनोरंजन नहीं थे, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक मूल्यों को जीवित रखने का माध्यम थे। गांव के लोग महीनों पहले से तैयारी में जुट जाते—मंच सजाना, वेशभूषा तैयार करना और किरदारों के लिए अभ्यास करना। यह सब गांव की सामूहिकता का प्रतीक था। 

आज समय बदल गया है। स्मार्टफोन ने न केवल हमारा समय, बल्कि हमारी संस्कृति को भी अपने आगोश में ले लिया है। युवा अब रामलीला के मंच के बजाय यूट्यूब और सोशल मीडिया पर वीडियो देखने में मशगूल हैं। बच्चे गेमिंग ऐप्स में खोए रहते हैं, और बड़े-बूढ़े भी व्हाट्सएप और फेसबुक की स्क्रॉलिंग में समय बिता रहे हैं। 

~ वरिष्ठ पत्रकार रामकृष्ण डोंगरे ~

Photo Credit : Google

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Sunday, September 21, 2025

Dongre ki Diary डोंगरे की डायरी के अंश



रामकृष्ण डोंगरे का ब्लॉग "DONGRE की डायरी" (dongretrishna.blogspot.com) उनकी व्यक्तिगत स्मृतियों, पत्रकारिता के अनुभवों और साहित्यिक संस्मरणों का संग्रह है। यह एक डिजिटल डायरी की तरह है, जहाँ वे अपने जीवन के विभिन्न चरणों—जैसे भोपाल के साहित्यिक कार्यालय में काम, आकाशवाणी के दिन और पुरानी यादों को ताजा करने—के बारे में लिखते हैं। ब्लॉग की थीम मुख्य रूप से आत्मकथात्मक है, जिसमें किताबों की खुशबू, साहित्यकारों की चर्चाएँ और जीवन के छोटे-छोटे क्षण प्रमुख हैं। नीचे कुछ प्रमुख अंश दिए गए हैं, जो उनके ब्लॉग से लिए गए हैं। ये अंश हिंदी में हैं और उनके मूल भाव को बनाए रखते हुए संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किए गए हैं:

1. **साहित्यिक कार्यालय की यादें (भोपाल के दिनों से)
 
 - **तिथि/संदर्भ**: हालिया पोस्ट (2020-2025 के बीच की यादें)।
   - **अंश**:  
     "कार्यालय में प्रवेश करते ही किताबों और कागज़ों की सौंधी खुशबू, साहित्यकारों की गहन चर्चाएं-ये सब मेरे रोज़मर्रा का हिस्सा थे। मैं, रामकृष्ण डोंगरे, वहां कार्यालय प्रबंधक के रूप में था, मगर मेरी भूमिका सिर्फ प्रशासनिक कार्यों तक सीमित नहीं थी। मैं उन शब्द शिल्पियों का साक्षी था, जो अपने विचारों से समाज को नई दिशा दे रहे थे।"  
     *(यह अंश उनके प्रारंभिक करियर की सादगी और साहित्यिक वातावरण की जीवंतता को दर्शाता है।)*

2. **विष्णु प्रभाकर जी के दर्शन

   - **तिथि/संदर्भ**: भोपाल कार्यालय की पुरानी घटना (लगभग 2004-2005)।
   - **अंश**:  
     "इसी जगह मैंने पहली बार लेखक साहित्यकार श्री विष्णु प्रभाकर जी के दर्शन किए थे। उस वक्त उनकी उम्र करीब 93 साल थी। मुझे उन्हें इतने करीब से देखकर भरोसा नहीं हो रहा था कि मैंने उनकी कहानियों को बचपन में स्कूल की किताबों में पढ़ा था।"  
     *(यह संस्मरण साहित्यिक हस्तियों से उनके व्यक्तिगत जुड़ाव को उजागर करता है, जो बचपन की यादों से जुड़ता है।)*

3. **पुरानी मैगज़ीन की यादें और मित्रता**
   - **तिथि/संदर्भ**: हालिया (2025 के आसपास, व्हाट्सएप के माध्यम से ताजा हुई याद)।
   - **अंश**:  
     "दैनिक भास्कर रतलाम के स्थानीय संपादक, मेरे मित्र और बड़े भाई श्री संजय पांडेय Sanjay Pandey जी ने आज मुझे व्हाट्सएप पर इस मैगजीन का स्क्रीनशॉट भेजा तो मैं अचानक पुरानी यादों में खो गया।"  
     *(यह छोटा अंश पत्रकारिता के पुराने साथियों से जुड़ी भावुकता को व्यक्त करता है।)*

ये अंश डोंगरे जी की डायरी के सार को दर्शाते हैं—एक साधारण जीवन की गहराई, जहाँ साहित्य और पत्रकारिता के अनुभव भावनाओं का स्रोत बनते हैं। ब्लॉग पर और भी कई पोस्ट हैं, जैसे आकाशवाणी के दिनों की डायरी और साहित्यिक चर्चाओं के वर्णन।