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Tuesday, December 21, 2021

सेकंड हैंड का जमाना गया, अब सबकुछ न्यू... न्यू...चाहिए

आज (21 दिसंबर 2021) मैंने साढ़े 4 साल के बेटे दक्ष के लिए 
नई साइकिल खरीदी, ₹3500 में...

अचानक अपने बचपन के दिन याद आ गए...। 

मिडिल क्लास फैमिली के लोग हमेशा सेकंड हैंड चीजें ही इस्तेमाल करते थे। मेरे पिताजी ने साल 1993-94 के आसपास सेकंड हैंड मोपेड लूना खरीदी थी ₹4000 में। इससे पहले जब मैं छठवीं क्लास में पहुंचा तो ₹250 में सेकंड हैंड साइकिल खरीदी थी. 

.... सिलसिला यूं ही चलता रहा.

जब मैं कॉलेज पढ़ने के लिए छिंदवाड़ा पहुंचा तो 1998 में ₹800 में हर्कुलस साइकिल खरीदी थी. जो मेरे साथ 2004 में भोपाल तक भी पहुंची। भोपाल में जॉब के दौरान मैं साइकिल से ही रिपोर्टिंग करता था। जब दिल्ली के लिए निकला तो मैंने उस साइकिल को वापस छिंदवाड़ा लाकर अपने भांजे को दे दिया। फिर गांव में भतीजे के पास आ गई।

एक वक्त वो था और आज का दौर है साल 2021...। 

बच्चे के लिए जब साइकिल खरीदने की बारी आई तो मैंने सेकंड हैंड साइकिल भी सर्च की। मुझे 1000 से लेकर 2000 रुपये तक में सेकंड हैंड साइकिल का ऑप्शन मिल रहा था। लेकिन मैंने न्यू साइकिल खरीदने का ही फैसला किया। क्योंकि आज का दौर ही यही है। बच्चे भी बोलने लगते हैं कि - पापा यह साइकिल पुरानी है, मुझे नई वाली चाहिए। 

... और जब हम छोटे थे तब हमारी ऐसी कोई डिमांड नहीं होती थी। बस हमें वो चीज मिल जाए, हम उसी में खुश हो जाते थे। चाहे कपड़े हो या साइकिल हो या कुछ और हो। खैर...। यह बदलाव भी आना था। 

... लेकिन इसी के साथ मिडिल क्लास फैमिली का बजट बिगड़ गया है. हर चीज नई खरीदना है। और ज्यादा से ज्यादा खरीदना है। मोबाइल भी नया खरीदना है। गाड़ियां नई खरीदना है। और कपड़े उनका तो पूछिए मत... 

पहले संयुक्त परिवार होते थे, सब भाई बहन पुराने कपड़े पहनते थे। आज की सिंगल फैमिली में ऐसा कोई ऑप्शन भी नहीं बचा है। इसलिए आजकल सभी को सब कुछ न्यू... न्यू... ही चाहिए।

#डोंगरे_की_डायरी #दक्ष_डायरी #सेकंडहैंड_वाला_जमाना #साइकिल #90skids #90कादशक

Tuesday, January 26, 2021

डायरी : हम आपस में मिलना-जुलना क्यों नहीं चाहते?

*हम लोग एक- दूसरे से बात क्यों नहीं करते?*

*हम आपस में मिलना-जुलना क्यों नहीं चाहते?* 

~~~*पत्रकार व ब्लॉगर रामकृष्ण डोंगरे* ~~~ 
---मेरी डायरी के पन्नों से---

जीवन में अगर हम लोगों से मिलेंगे नहीं, बात नहीं करेंगे तो हमारे इंसान होने का क्या मतलब. हम इंसान होने की वजह से एक दूसरे के साथ अपनी फीलिंग को शेयर कर सकते हैं। लेकिन आज के दौर में हम शेयर नहीं कर रहे हैं। 

एक वह दौर था, जब हम चिट्ठी लिखा करते थे. चिट्ठी के जरिए अपने विचारों को दूसरों तक पहुंचाया करते थे. फिर उनके उत्तर का इंतजार करते थे. ऐसे में अगर हमारी दोस्ती हो जाती थी तो हम उनसे मिलने के लिए कई किलोमीटर का फासला तय करते थे. मैं अपनी बात करूं तो मैंने अपने मोहल्ले, गांव या स्कूल के बाहर लोगों से दोस्ती के लिए पहला माध्यम आकाशवाणी यानी रेडियो को चुना. जब हम फरमाइशी प्रोग्राम में चिट्ठी लिखा करते थे तो वहां से हम नए मित्र तलाशते थे. जिनके नाम याद रह जाते थे। उन्हें बार बार याद करते थे। इसके अलावा कार्यक्रमों की प्रतिक्रिया के पत्र पहुंचते थे, और जब लोगों के विचार हमें अच्छे लगते थे, तो हम उनकी तरफ चिट्ठी लिखकर दोस्ती का हाथ बढ़ाते थे. कई चिट्ठियों तक सिलसिला चलने के बाद मिलने का समय आता था.

एक वाकया मुझे याद आता है। ऐसे ही एक रेडियो मित्र, पेन फ्रेंड से मिलने के लिए हमने जिला मुख्यालय छिंदवाड़ा से तामिया के पातालकोट का 60 किमी का सफर यूं ही तय कर लिया था। बिना किसी खास वजह के। पातालकोट पहुंचने के बाद हमें पता चला कि उस मित्र का घर जंगल वाले पैदल रास्ते में कई किलोमीटर दूर है। तो बड़ी मुश्किल से हमने उसका घर खोजा। मिलते ही हमारी सारी थकान दूर हो गई। मित्र ने तुरंत हमें गरमा गरम पकौड़े खिलाएं. 

… तो एक दौर वह था। और आज जब एक मोबाइल हमारे हाथ में है और हमें "कर लो दुनिया मुट्ठी में" कहकर यह मोबाइल थमाया गया है, वाकई पूरी दुनिया हमारी मुट्ठी में है. हम मात्र एक क्लिक से हमारे देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री से लेकर किसी भी अपने परिचित या किसी भी क्षेत्र में सक्रिय या हमारे आदर्श व्यक्ति से हम मैसेज पर बातचीत कर सकते हैं। कॉल भी कर सकते हैं। लेकिन आज के दौर में देखा जा रहा है कि हम किसी से भी दिल से बातें नहीं करना चाहते। मिलना नहीं चाहते। अगर किसी को यूं ही फोन लगा लो तो उधर से तुरंत पूछा जाता है कि कोई काम था क्या। 

ऐसे में मिलने की और रिश्ता बनाने की बात क्या करें। 
ज्यादा दूर की बात ना कि जाए तो शहरी जिंदगी में अपार्टमेंट कल्चर में हम अपने पड़ोसियों से भी करीबी रिश्ता नहीं रख पाते। इसमें कहां कमी है। इस पर हमें विचार करना चाहिए। इसके अलावा अपने दोस्तों से और रिश्तेदारों से भी हमें गाहे-बगाहे बातचीत करते रहना चाहिए। साथ ही किसी ना किसी बहाने मिलना भी चाहिए। 


~~~*आपका दोस्त रामकृष्ण डोंगरे* ~~~
---मेरी डायरी के पन्नों से/26 जनवरी, 2021---

Wednesday, November 15, 2017

हमारी बैलगाड़ी : बचपन की सवारी...

बैलगाड़ी और हम

तस्वीर में नजर आ रही इस बैलगाड़ी से जुड़े वैसे तो कई किस्से है। लेकिन मैं आपको एक दो वाकये सुनाता हूं।

बचपन की बात है। जब मैं बमुश्किल पहली - दूसरी में पढ़ता रहा होगा. जैसा कि अक्सर होता है. अगर कोई भी बैलगाड़ी या कोई वाहन हमारे घर के सामने से गुजरता है। तो बच्चे अक्सर उसके पीछे लग जाते हैं। मतलब उस पर सवार हो जाते हैं। बैठ जाते हैं। तो यही कुछ हमारे साथ भी हुआ। शाम का वक्त था 4-5 बजे का. और हम कुछ बच्चे एक बैलगाड़ी के पीछे लटक गए।

बैलगाड़ी हमारे घर से बमुश्किल डेढ़ किलोमीटर दूर तारा गांव के लिए जा रही थी। तो बैल अपनी रफ्तार से बैलगाड़ी को लेकर दौड़ रहे थे।

बाकी बच्चे तो गाड़ी से उतर गए लेकिन मैं उतर नहीं पाया। डर के मारे कि उतरने पर चोट लग जाएगी। उसके बाद वह बैलगाड़ी जिस काम के लिए जा रही थी। यानी चारा भूसा या कड़बी लाने। उसको भरने के बाद शाम के 7 या 8:00 बजे तक को बैलगाड़ी वापस मेरे घर के सामने आई। तब तक मेरा रो रो कर बुरा हाल और पूरे घर वाले भी मुझे ढूंढ ढूंढ के परेशान हो गए थे।

तो यह बचपन का एक किस्सा। इसके अलावा गांव में बैलगाड़ी महिलाएं भी चलाती है। ये कोई नई बात नहीं है। कई जगह परंपरा के नाम पर उन्हें मना किया जाता है। हमारी दादी खुद बैलगाड़ी चलाकर खेत के पत्थर उठाकर फेंका करती थी बाहर।

एक बार बैलगाड़ी में हमारा एक भांजा चक्के के बीच में फंसते फंसते बचा था। तो गांव देहात की ये बैलगाड़ी सबसे भरोसेमंद सवारी गाड़ी होती है। जिस पर हर काम होता है। हालांकि इन दिनों सभी तरह के वाहन गांव में भी पहुंच गए हैं। इसलिए बाजारों में सब्जी लेकर जाना है। मार्केट- बाजार का काम अब बैलगाड़ी से कम ही होता.

अगर आपके पास भी कुछ किस्से हो। बैलगाड़ी से जुड़े। तो जरूर शेयर कीजिए।


Friday, May 20, 2016

अचानक किसी को फोन कीजिए और बात करके देखिए...

अचानक किसी को फोन कीजिए और बात करके देखिए...

# Conversation_with_anyone

आज हर हाथ में मोबाइल। हमारे-आपके मोबाइल में सौ- 200 और 1000 - 2000 मोबाइल नंबर हैं। जिसका जितना बड़ा फ्रेंड सर्किल या जाॅब। जरा याद करके देखिए...कितने ऐसे फ्रेंड है, रिलेटिव है, जिनसे आपने महीनों-सालों से बात नहीं की है।

आप कहेंगे रोज तो चैट होती है। एफबी पर मिलते हैं। फिर क्या जरूरत।आप वाट्सएप-एफबी पर चैट करते हैं। यानी रोज अपना आधा घंटा चैटिंग में निकाल देते हैं। कभी किसी फ्रेंड को, रिलेटिव, एक्स कलीग को अचानक फोन कीजिए। दिल की बात कीजिए। देखना आपको वो खुशी मिलेगी। जिसकी आपने कल्पना भी नहीं की होगी।

बस फोन करने से पहले सामने वाले के डेली रूटीन का ख्याल रखिए। यानी जिसे आप फोन लगाए वह शख्स फ्री होना चाहिए।

आज हर कोई बिजी होने का बहाना करता है। मगर होता नहीं। हम मोबाइल पर, वाट्सएप, फेसबुक पर अपना बहुत समय बर्बाद करते हैं। इसी समय से कुछ टाइम निकाल अपनों को अचानक फोन कीजिए। रिश्ते मजबूत होंगे। नए दोस्त बनेंगे। आपके जाॅब सर्किल में नेटवर्किंग बढ़ेगी। हर तरह से फायदा ही होगा।

मेरा अनुभव तो यही कहता है। 10 साल पहले जब मेरे पास मोबाइल नहीं हुआ करता था। तब भी मैं दोस्तों को एसटीडी बूथ पर जाकर फोन करता था। मोबाइल आने के बाद ये सब इजी हो गया। इधर वाट्सएप जैसे एप के आने से हम 24 घंटे लाइव तो रहते है मगर असली खुशी हमें दिल की बात करने से ही मिलती है।

हम सिर्फ काम पड़ने पर भी किसी को फोन करते हैं। यह गलत है। इसलिए आजकल तुरंत ही पूछ बैठते है- बोलिए क्या काम था। सोचिए। हम किस दिशा में जा रहे। अपनों का हाल-चाल जानना, घर-परिवार की बातें करना, दोस्तों से उनकी नौकरी के बारे में हमने बिल्कुल ही छोड़ दिया है।

चलिए फिर से हम अपनों के करीब जाएं और अपनों को दिल के करीब लाएं। सेल्फी विथ डाॅटर की तरह .... चैट विथ एनीवन या चैट विथ फ्रेंड जैसा कोई अभियान चलाए।

# डोंगरे_की_बात , # डोंगरेकीडायरी ,
# ChatWithFriend #Conversation_w
ith_anyone

July 13, 2015 at 4:14pm


Thursday, May 7, 2015

भड़कीली शादियां और शादी को सामाजिक मान्यता पर सवाल

10 रुपए से लेकर 10 हजार तक के महंगे शादी के कार्ड

खर्चीली,  भड़कीली यानी ताम-झाम से लबरेज शादियां थमने का नाम नहीं ले रही है। शुरुआत- महंगे-महंगे शादी के कार्ड से होती है। इनकी कीमत अब 5, 10 रुपए से लेकर 8 या 10 हजार तक पहुंच गई है। इसके बाद शुरु होता है लंबा सिलसिला। लाखों के गहने, कपड़े,  दहेज का साजो-सामान, फोर व्हीलर गाड़ी, मैरिज हॉल, कैटरिंग,बारात की गाड़ियां की लंबी कतारें, डीजी... आदि-आदि।

और ये सब किसलिए। शादी को सामाजिक मान्यता के लिए...। कम खर्चों में कोई परिवार अगर साधारण तरीके से शादी करना चाहे तो सब कहते है- समाज क्या कहेगा। समाज के लोग, नाते-रिश्तेदार, दोस्त-भाई ताने देंगे। क्या इनके घर में पैसे नहीं है।

साधारण शादी की पहल पर कोई साथ नहीं देता

अगर कोई परिवार में कोई लड़का या लड़की सिम्पल शादी की बात अपने माता-पिता से कहता है तो कोई तैयार नहीं होता। मैं स्वयं और मुझ जैसे कई लोग हो सकते हैं जो साधारण शादी की पहल करने को तैयार थे। मगर माता-पिता या रिश्तेदारों ने उनका साथ नहीं दिया।

एसएमएस, ई-मेल, वाट्सएप फिर भी निमंत्रण कार्ड

कम्युनिकेशन के तमाम साधनों के बावजूद हम हजारों-लाखों के कार्ड छपवाकर, उस पर भी लाखों का पेट्रोल फूंककर, कीमत समय बर्बाद करके अपना बड़प्पन दिखाने के लिए घर-घर कार्ड पहुंचाना जरूरी समझ रहे हैं। इसे आप क्या कहोगे। जबकि आज हाथ में मोबाइल है। कुछ पैसों में बात हो जाती है। एसएमएस भेज सकते हैं। ई-मेल, वाट्सएप, फेसबुक तमाम सुविधाएं मौजूद है। फिर भी पचासों साल पुरानी घर-घर निमंत्रण कार्ड बांटने की परम्परा को निभा रहे हैं।

ऐसे तमाम सवाल हमारे सामने खड़े हैं। इन्हें हम कब तक नजरअंदाज करते रहेंगे।

हम भारतीय शादियों में इतना ज्यादा खर्च करते है  जिसका कोई हिसाब नहीं। शादी को लेकर किस तरह का उत्साह रहता है, सब जानते हैं। रहना भी चाहिए, मगर क्या हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि यह अंधी दौड़ कहां जाकर थमेगी। हालांकि कुछ अच्छी शुरुआत की खबरें भी अब तक आ रही है। जैसे- कई परिवार के लोग भी अपने बच्चों की शादियां सामूहिक विवाह समारोह में कराने लगे हैं। इसके अलावा कई परिवारों में दहेज में कई गाड़ियां भरकर लाखों का साजो-सामान देने की बजाय लड़की का एकाउंट खुलवाकर माता-पिता और रिश्तेदार पैसे जमा करने लगे है। इन सब सकारात्मक पहल से सभी को प्रेरणा लेना चाहिए।
- रामकृष्ण डोंगरे तृष्णा

Tuesday, April 9, 2013

एक स्‍त्री ही नहीं चाहती लड़की !!! जिम्मेदार कौन ???

मेरी प्यारी भतीजी निधि।
(निधि के बहाने ...)
ये है निधि। मेरी प्यारी भतीजी। शुरू-2 में फोन पर बात करने में हिचकिचाती थी। बाद में खूब बात करने लगीं। फोन पर अगर मैंने पूछा- 'क्या कर रही हो?' तो तुरंत जवाब देगी- 'खेल रही हूं।' उससे बात करना मुझे बहुत अच्छा लगता है। बहुत छोटी थी तब मेरी गोद में नहीं आती थी। इसकी वजह यह रहती थी कि महीनों बाद मेरा घर जाना होता था। इसके चलते मुझे पहचान नहीं पाती थी। फिर धीरे-2 मेरे पास आने लगी। उसके जन्म के साल मैं भोपाल में था। इस साल जून की 23 तारीख को छह साल की हो जाएंगी।

बड़े भैया के तीन बच्चों में निधि सबसे छोटी है। दो भाइयों की एक बहन। वहीं, मेरी दीदी के भी तीन बच्चे है। तीनों ही लड़के है। इस नाते हुईं पांच भाइयों की इकलौती बहन। यहां दिलचस्प बात यह है कि बड़े भैया के दो बच्चों होने के बाद मेरी जिद थी कि अब बस किया जाए। मगर एक लड़की की चाहत, एक बहन की चाहत ने निधि को हमारी दुनिया में ला दिया। इसके लिए हम सब ईश्वर के शुक्रगुजार है। कई परिवारों में लड़के की चाहत देखी जाती है और लड़कों की इस चाहत में लड़कियों की लाइन लग जाती है।  एक-दो-तीन-चार...। लेकिन इसके उलट हमारे घर में शुरू से ही लड़कियों की चाहत रही है। हमारे पापा इकलौते थे, यानी उनकी कोई बहन (हमारी बुआ) होने का सवाल ही नहीं था। हम तीन भाइयों की एक ही बहन है। इस तरह हमें लड़की की चाहत शुरू से ही रही। 

समाज या परिवार के दबाव में आकर महिलाएं भी अपना बच्चा लड़की नहीं सिर्फ लड़का चाहती हैं। मैंने जब इसके तह में जाने की कोशिश की तो क्या पता चला? एक लड़की को, एक औरत को दुनिया में काफी कुछ सहना पड़ता है इसलिए वह लड़की को पैदा नहीं करना चाहती। अगर ऐसा ज्यादातर महिलाएं सोचती है तो इसका कारण क्या है। हम। हमारा समाज। हमारा परिवेश। हमारी मान्यताएं। यानी इस समस्या के लिए हम सब जिम्मेदार है।

Wednesday, March 9, 2011

एक-सा था बाबा और पिताजी का नाम

बाबा धरणीधर के जन्मदिन पर खास
  • सतपुड़ा केपुरखा साहित्यकार बाबा संपतराव धरणीधर का जन्मदिन
  • मेरे खास दोस्त 'रेडियो' के जरिए हुई थी बाबा से मुलाकात
  • जब मिला तब बाबा धरणीधर पार कर चुके थे ७५ बसंत
ऐसी ही किसी मुलाकात में बाबा ने मेरे सामने अपना पत्र लेखक बनने का प्रस्ताव रखा। मैंने सहर्ष इसे स्वीकार कर लिया। इसके बाद मैं लगभग रोजाना बाबा के पास जाने लगा। पहले सात नंबर और बाद में ग्यारह नंबर कमरे में।
बाबा का कविता पाठ, इंटरव्यू मैंने आकाशवाणी छिंदवाड़ा से सुना था। जिसमें उनकी बातचीत और कविताओं ने मुझे आकृषित किया था। इसके साथ ही यह बात भी मुझे उनकी तरफ खींच रही थी कि वे मेरे गांव तन्सरामाल के नजदीकी कस्बे मोहखेड़ के रहने वाले थे। इसके अलावा बाबा का नाम और मेरे पिताजी का नाम भी एक-सा था। यानी बाबा संपतराव धरणीधर और श्री सम्पतराव डोंगरे। आज हमारे बीच न तो बाबा है और न मेरे पिताजी। मेरे मित्र अमिताभ दुबे कई बार मुझे बाबा का मानस पुत्र कहते हैं।


आज है १० मार्च। बाबा का जन्मदिन। यानी सतपुड़ा के पुरखा लेखक, साहित्यकार, पत्रकार और कवि बाबा संपतराव धरणीधर का। 'मुझे फांसी पर लटका दो ... कि मैं भी एक बागी हूं' वाले बाबाजी। 'किस्त-किस्त जिंदगी' के रचियता। जब मैं बाबा से मिला वे ७५ बसंत पार कर चुके थे। बाबा से मेरी मुलाकात मेरे खास दोस्त 'रेडियो' के जरिए ही हुई। बाबा का कविता पाठ, इंटरव्यू मैंने आकाशवाणी छिंदवाड़ा से सुना था। जिसमें उनकी बातचीत और कविताओं ने मुझे आकृषित किया था। इसके साथ ही यह बात भी मुझे उनकी तरफ खींच रही थी कि वे मेरे गांव तन्सरामाल (उमरानाला) के नजदीकी कस्बे मोहखेड़ के रहने वाले थे। इसके अलावा बाबा का नाम और मेरे पिताजी का नाम भी एक-सा था। यानी बाबा संपतराव धरणीधर और श्री सम्पतराव डोंगरे। आज हमारे बीच न तो बाबा है और न मेरे पिताजी। मेरे मित्र अमिताभ दुबे कई बार मुझे बाबा का मानस पुत्र कहते हैं।

उस समय मैं छिंदवाड़ा शहर में ही रहकर कॉलेज की पढ़ाई कर रहा था। आकाशवाणी जाने का सिलसिला मेरा लगातार जारी था। यही मेरी मुलाकात कार्यक्रम अधिकारी श्री अमर रामटेके जी से हुई। वे उन दिनों बस स्टेशन केपास यादव लॉज में रहते थे। उनसे वहां कई मुलाकातें हुई। एक मुलाकात केदौरान मैंने उनसे बाबा के बारे में पूछताछ की। उन्होंने जिला अस्पताल के कमरा नं. पांच में जाने को कहा। अस्पताल पहुंचने में मुझे पता चला कि वे अब दूसरे कमरे में है। काफी मशक्कत केबाद बाबा से मुलाकात हो गई। फिर मेरी उनसे लगातार मुलाकात होने लगी। ऐसी ही किसी मुलाकात में बाबा ने मेरे सामने अपना पत्र लेखक बनने का प्रस्ताव रखा। मैंने सहर्ष इसे स्वीकार कर लिया। इसके बाद मैं लगभग रोजाना बाबा के पास जाने लगा। पहले सात नंबर और बाद में ग्यारह नंबर कमरे में।

बाबा के पास जाने से मुझे छिन्दवाड़ा के साहित्यिक परिदृश्य को समझने में आसानी हुई। बाबा के कमरे में पाठक मंच (किताबों की समीक्षा के लिए प्रदेशभर के जिलों में गठित इकाई) की बैठक होती थी। उन दिनों से ही पाठक मंच केसंयोजक श्री ओमप्रकाश 'नयन जी थे। इसकेअलावा कई कवि गोष्ठियां बाबा के कमरे में होती थी। बाहर से आने वाले उनकी पीढ़ी के कई वरिष्ठ कवि, साहित्यकार भी गोष्ठियों में शामिल होते थे। जिनमें इंदौर के स्वर्गीय नईम जी का नाम मुझे याद आ रहा है।

सन् ९५ मैंने कविता लिखना शुरू कर दिया था। कविता क्या थी तुकबंदी ज्यादा हुआ करती थी। इसकेअलावा दो और चार लाइनें। जिन्हें हम शायरी कहकर मुगालते में रहते थे। पहली मुक्तछंद की कविता मैंने २००१-२००२ में लिखी होगी। बाबा से मिलने केबाद मैंने एक कविता बाबा पर ही लिख डाली। जो डीडीसी कॉलेज की मैग्जीन में छपी थी। बाबा से मैंने अपनी आतंकवाद वाली कविता के लिए बातचीत की थी।

बाबा को जब कभी भी बाहर किसी कार्यक्रम में जाना होता था हम यानी राम (बाबा का सहायक) और मैं लेकर जाते थे। हम अक्सर बाबा को लेकर हिन्दी प्रचारिणी और टाउन हॉल जाया करते थे। बाबा से अक्सर मिलने वालों में बाबा हनुमंत मनगटे जी, सलीम जुन्नारदेवी जी, लक्ष्मीप्रसाद दुबे जी, राजेद्र राही जी, ओमप्रकाश नयन जी, नेमीचंद व्योम जी और कई नाम शामिल थे।

बाबा का व्यक्तित्व ऐसा था, जो छोटे-बड़े सभी को अपनी ओर आकृर्षित करता था। बाबा सभी से बहुत दोस्ताना अंदाज में मिलते और बतियाते थे। बाबा की यादों को मैं कभी भी बिसरा नहीं सकता। मुझे इस बात का हमेशा अफसोस रहेगा कि मैं उनके अंतिम समय में उनकेपास नहीं था।

रामकृष्ण डोंगरे 'तृष्णा'

Thursday, March 4, 2010

बीस रुपये, एक थाली, एक रूमाल तो नहीं मिला ... मिली सिर्फ मौत

बाबा के पुण्य के चक्कर गई दर्जनों की जान
दर्जनों, सैकड़ों और हजारों की तादाद में होने वाली मौतों पर हम मातम करें या मंथन। हासिल कुछ भी नहीं होने वाला। अब तक कई धार्मिक आयोजनों में हजारों की संख्या में लोग मारे गए है। मगर ये सिलसिला बदस्तूर जारी है। शायद धार्मिक आयोजनों में जाने से न तो लोगों को रोका जा सकता है, और न वहां होने वाले ऐसे हादसों को।
बीस रुपये, एक थाली, एक रूमाल, एक लड्डू को लेने की खातिर गए इन लोगों को मौत मिली। कोई यह भी कह सकता है कि इन्हें कृपालु महाराज का आशीर्वाद पाने का लोभ था।
अब लोगों को भगवान याद आ गया। वही भगवान जिससे उम्मीद की जाती है वह सबकी रक्षा करेगा। क्या सचमुच ऐसी जगहों पर होता है कोई भगवान ? मनगढ़ के भक्ति धाम में बाबा कृपालु जी महाराज ने अपनी पत्नी की पहली बरसी पर पुण्य कमाने के लिए यह भंडारा आयोजित किया था। तो बाबा के पुण्य के चक्कर ६३ लोगों ने अपनी जान गंवा दी।
------------------------- सवाल- ६३ लोगों की मौत का जिम्मेदार कौन? जवाब- बाबा, प्रशासन और स्वयं वे लोग। हम सब के मन में पहला सवाल यही उठा होगा। आखिर प्रतापगढ़ के मनगढ़ में कृपालु महाराज के आश्रम में गईं इतनी जिंदगियों का जिम्मेदार कौन है? मैंने भी यही सहज सवाल एक शख्स से पूछा था। धर्म के नाम पर दुनिया में क्या कुछ नहीं चल रहा है। आखिर चले भी क्यों न। दूसरे क्षेत्रों शिक्षा, मनोरंजन, खेल की तरफ धर्म भी अब कारोबार का रूप ले चुका है। मगर सवाल यह है कि मंदिरों, मेलों, आश्रमों में होने वाली मौत का जिम्मेदार कौन है? एक सुर में सभी का कहना होता है कि जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की बनती है। क्योंकि सुरक्षा और व्यवस्था देखना इनका काम है। नाकामी प्रशासन की ही है। बीस रुपये, एक थाली, एक रूमाल, एक लड्डू को लेने की खातिर गए इन लोगों को मौत मिली। कोई यह भी कह सकता है कि इन्हें कृपालु महाराज का आशीर्वाद पाने का लोभ था। बताया जा रहा है कि भंडारे में बंटने वाला भोग हर हाल में पाने के लिए लोग समय से दो तीन घंटा पहले ही मनगढ़ आश्रम के सामने जुटने लगे थे। महाराज से 'सुखी रहो, जीते रहो का आशीष लेने पहुंचे थे लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था। प्रसाद की जगह मौत मुंह बाए उनका इंतजार कर रही थी। अपने बेटे, बेटियों और मां बहनों को गंवा चुके लोगों के सामने एक ही सवाल था कि हे ईश्वर यह कैसा न्याय है। अब लोगों को भगवान याद आ गया। वही भगवान जिससे उम्मीद की जाती है वह सबकी रक्षा करेगा। क्या सचमुच ऐसी जगहों पर होता है कोई भगवान? मनगढ़ के भक्ति धाम में बाबा कृपालु जी महाराज ने अपनी पत्नी की पहली बरसी पर पुण्य कमाने के लिए यह भंडारा आयोजित किया था। तो बाबा के पुण्य के चक्कर ६३ लोगों ने अपनी जान गंवा दी। भंडारे में करीब पंद्रह से पच्चीस हजार लोग पहुंचे थे। आखिर इन बाबाओं के आयोजनों में लोग जाते ही क्यों है? ऐसा क्या है जो लोग सम्मोहित से खिचें चले जाते हैं। 'भक्ति' या तथाकथित भक्ति ऐसी होती है...। जान गंवाने के लिए जाते है लोग...। मंदिरों और मेलों में अफवाहों से भगदड़ मचना समझ में आता है, लेकिन इन बाबाओं के आश्रमों में ये सब...। एक सवाल यह भी है आखिर ऐसे कार्यक्रमों में इतनी भीड़ उमड़ती क्यों है। क्या आस्था, भक्ति या श्रद्धा के नाम पर...। भूख और चीजों को दान में पाने का लालच में इन बेतहाशा लोगों को यहां खींच लाता है। साफ जाहिर होता है कि हजारों की तादाद में उमड़ती भीड़ के लिए भक्ति की भावना से ज्यादा भूख-गरीबी जिम्मेदार है। -------------------------- बाबा कृपालु जी महाराज का सच
  • आलीशान रहन-सहन का आदी हैं कृपालु महाराज
  • इटैलियन मार्बल से चकाचौंध है भक्ति धाम
  • त्रिनिदाद में कथित रेप से हो चुकी है किरकिरी
  • महज ३४ साल की आयु में पांचवें जगद्गुरु की उपाधि
महज ३४ साल की आयु में कृपालु जी महराज को पांचवें जगद्गुरु की उपाधि दी गई थी। वह देश-विदेश में घूमकर प्रवचन और लोगों को राधा-कृष्ण भक्ति का संदेश देने लगे। प्रसिद्धि फैली तो मनगढ़ भक्ति धाम में देश-विदेश से भक्तों की भीड़ जमा होने लगी। कृपालु जी महाराज ने पंचम जगद्गुरु की उपाधि मिलने के बाद अपनी जन्मस्थली भक्तिधाम मनगढ़ को सजाना-संवारना शुरू कर दिया था। कृपालु जी महाराज का जन्म वर्ष १९२२ में मनगढ़ में हुआ। उन्होंने इंदौर, चित्रकूट, वाराणसी में साहित्य, आयुर्वेद का अध्ययन किया। १६ वर्ष की उम्र में राधा कृष्ण भक्ति का प्रचार शुरू किया।

होली के बहाने जेएनयू की सैर

जेएनयू की होली : मदहोशी में भी होश में थे स्टूडेंटर्स
लड़के-लड़कियां गु्रप में नाच-गा रहे थे। उछल-कूद मचा रहे थे। लोगों ने अपनी अजीब-अजीब सी शक्लें बना रखी थी। जेएनयू में कई बातें गौर करने लायक थी। लड़के और लड़कियां सभी रंग और गुलाल में सराबोर थे। नशा भी किया था। मगर सभी होश में थे, सभी शालीनता से पेश आ रहे थे। लड़कियों ने अच्छी ड्रेस पहनी थी। फिर चाहे वे लड़कियां देसी रही हो, विदेशी रही हो, साउथ इंडियन या नार्थ-ईस्ट की।
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लौटते समय मेरे दिमाग में सवाल आया कि क्या छिन्दवाड़ा जिले से किसी ने जेएनयू में पढ़ाई की है। शायद नहीं... अगर की होगी तो ... डॉ. ब्राउन, भूतपूर्व प्रिंसिपल डीडीसी कॉलेज, बता सकते हैं। इस बारे में पता करना होगा। जेएनयू यानी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय अच्छे अफसर, नेता, पत्रकार, विचारक और रणनीतिकारों की जन्मस्थली रही है। मैं इस बात से खुश था कि होली के बहाने मुकेश भाई ने मुझे जेएनयू की सैर करवा दी।
----------------------- संडे की शाम को अपने दोस्त मुकेश के रूम पर पहुंचा। उसका रूम साउथ डेहली में वसंत विहार के पास मुनरिका में है। रात को नौ बजे के आसपास उसने कहा, रामकृष्ण चलो, जेएनयू चलते हैं। और हम निकल पड़े। उसके साथ और दो-तीन दोस्त थे। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) उसके रूम से पास में ही है। मेन गेट से दाखिल होते ही गंगा ढाबा के सामने लड़कियों के हॉस्टल केपास ही मंच पर होली का प्रोग्राम चल रहा था। जेएनयू में कुल मिलाकर १६ हॉस्टल्स हैं। सभी हॉस्टल से एक-एक प्रतिभागी अपनी प्रस्तुति दे रहा था। दिमाग खाने वाले या चाटने वालों पर प्रोग्राम केंद्रित था। काफी देर तक हमने प्रोग्राम देखा। रात का खाना हम लोगों ने जेएनयू में किया। खाना काफी लजीज और स्वादिष्ट था। खाने के समय हमारे साथ दो शख्स और थे। एक महिला और एक पुरुष। जेएनयू में पहुंचने पर ही मुझे कई नई बातें मालूम हुई। जेएनयू परिसर के ऊपर से हर एक-दो मिनट में प्लेन गुजरते हैं। जिससे काफी शोर होता है। छिन्दवाड़ा के रहने वाले मेरे दोस्त मुकेश भाई ने बताया कि जेएनयू में एयरपोर्ट (इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अडडा) वाले इसके लिए काफी पैसा देते हैं। प्लेन रात को ज्यादा गुजरते हैं। दिन में प्लेनों की आवाजाही कुछ कम होती है। इसलिए क्लास के दौरान कोई डिस्टर्ब नहीं होता। राजधानी दिल्ली की बड़ी यूनिवर्सिटीज की बात करें तो, जहां डीयू और जामिया यूनिवर्सिटी कैंपस दिन में अपने जलवे के लिए मशहूर हैं, वहीं जेएनयू कैंपस रात के जलवों के लिए जाना जाता है। इसका सबसे बड़ा कारण है कि जेएनयू एक कॉम्पेक्ट रेजिडेंशियल कैंपस है। इसके चलते इसके छात्र-छात्राएं जहां दिन में सिर्फ अपनी पढ़ाई में रमे रहते हैं। मौज-मस्ती के लिए वे रात का समय चुनते हैं। इसके चलते जेएनयू कैंपस के सभी हॉस्टल्स, ढाबों और कैफे का माहौल रात दो से तीन बजे तक पूरी तरह छात्रों और उनकी मौज-मस्ती से गुलजार रहता है। दूसरे दिन सोमवार (एक मार्च, २०१०) को हम लोग होली खेलने के लिए फिर जेएनयू पहुंचे। वहां का माहौल बहुत ही अच्छा था। जेएनयू में दाखिल होने से पहले हम पांच लोगों में से किसी ने भी रंग-गुलाल नहीं लगाया था। वहां जाकर देखा तो कई लड़कों के कपड़े (शर्ट, टी-शर्ट) फटे हुए थे, कईयों ने भांग का नशा किया हुआ था। मगर किसी ने भी हमें रंग या गुलाल नहीं लगाया। एक-दो हमारे पहचान वाले बंदे अंदर थे, उन्होंने ही हमें गुलाल लगाया। चेहरे पर। फिर हम लोगों ने आपस में एक दूसरे को गुलाल लगाया। इसके बाद हम लोग काफी देर तक वहां रहे। लड़के-लड़कियां गु्रप में नाच-गा रहे थे। उछल-कूद मचा रहे थे। लोगों ने अपनी अजीब-अजीब सी शक्लें बना रखी थी। जेएनयू में कई बातें नोट करने लायक थी। लड़के और लड़कियां सभी रंग और गुलाल में सराबोर थे। नशा भी किया था। मगर सभी होश में थे, सभी शालीनता से पेश आ रहे थे। लड़कियों ने अच्छी ड्रेस पहनी थी। फिर चाहे वे लड़कियां देसी रही हो, विदेशी रही हो, साउथ इंडियन या नार्थ-ईस्ट की। बाद में हम लोगों ने पूरा कैम्पस घूमा। गंगा ढाबा पर कॉफी पी। लौटते समय मेरे दिमाग में सवाल आया कि क्या छिन्दवाड़ा जिले से किसी ने जेएनयू में पढ़ाई की है। शायद नहीं... अगर की होगी तो ... डॉ। ब्राउन, भूतपूर्व प्रिंसिपल डीडीसी कॉलेज, बता सकते हैं। इस बारे में पता करना होगा। जेएनयू यानी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय अच्छे अफसर, नेता, पत्रकार, विचारक और रणनीतिकारों की जन्मस्थली रही है। मैं इस बात से खुश था कि होली के बहाने मुकेश भाई ने मुझे जेएनयू की सैर करवा दी।

Tuesday, March 2, 2010

सामाजिक ताने-बाने ने बुझा दिया एक 'दीपक'

सामाजिक ताने-बाने ने बुझा दिया एक 'दीपक'
हम चाहे कितना भी सोचें कि ये सब किस्मत में लिखा होगा। मगर मैं इन बातों को मानने केलिए तैयार नहीं हूं कि सुखदेव को उसकी किस्मत ले डूबी। सुखदेव की जगह को हमारे बीच में भरना अब मुमकिन नहीं है। वो एक ऐसा 'दीपक' था जो अपने परिवार के लिए रोशनी बन गया था। उसे हमारे सामाजिक ताने-बाने ने बुझा दिया।
सुखदेव डोंगरे 'दीपक'... एक नाम जो परिचय का मोहताज नहीं... अभावों में जन्मा-पला-बढ़ा और कई ऊंचाईंयों को छूवा। स्कूल से पढऩे में होशियार ... १२ वीं क्लास में अव्वल रहा... स्कूल का बेस्ट स्टूडेंट ऑफ द ईयर भी। प्रायवेट पढ़ाई से कॉलेज... बीए फिर एमए अंग्रेजी से। उमरानाला में नाका मोहल्ला और फिर जाम रोड पर 'अभिनव कोचिंग' का संचालन। जीके की अच्छी जानकारी। जिसकी बदौलत रेडियो से इंटरव्यू प्रसारित हुए। राइटिंग में कोई उसका हाथ नहीं पकड़ सकता था। कई लेख, कविताएं और रचनाएं लिखीं। मेरे एक मित्र युवा हास्य-व्यंग्यकार मूर्ख मध्यप्रदेशी उनकी कलम का लोहा मानते हैं। उसने भी हम पत्रकार दोस्तों (मेरे अलावा भाई अमिताभ दुबे और उनके भ्राता पत्रका अनिमेष दुबे) से प्रेरणा लेकर शौकिया रूप से पत्रकारिता शुरू कर दी थी। उसकी खबरों में गांव और आसपास की गूंज साफ सुनाई देती थी। उसने भास्कर के अलावा कई छोटे-बड़े अखबारों के लिए काम किया। जिला मुख्यालय छिन्दवाड़ा जाकर भी अखबार के दफ्तर में काम किया। कई बार मेरी उससे चर्चा हुई, कि तुम प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करो, छोटी-मोटी सरकारी नौकरी का जुगाड़ देखो। वह भी मुझसे कहता रहा कि ... मैं तैयारी कर रहा हूं। पत्रकारिता मुझे हमेशा नहीं करनी है। मुझे इस काम से खुशी मिलती है, इसलिए मैं अखबारों के लिए रिपोर्ट तैयार करता हूं। सुखदेव बहुत ही ज्यादा एक्टिव और जिंदादिल इंसान था। वह जेब खर्च और अपनी पढ़ाई के खर्च के लिए कई छोटे-मोटे काम करता था। मेरे एक दोस्त हेमंत मालवीय 'हेमंत पेंटर' के साथ उसने कई काम किए। हेमंत ही उसे मुझसे मिलवाने मेरे घर लाया था। हेमंत ने कहा था- तुमसे एक तुम्हारे दोस्त को मिलवा रहा हूं। मुझे वो तारीख अच्छे से याद है। ... उसके बाद हमारी मुलाकात और घर आने-जाने का सिलसिला शुरू हो गया। हमने खतों-कितावत का सिलसिला भी जारी कर दिया। मेरे अपने गांव तंसरा और उमरानाला में वो इकलौता शख्स था जिससे मेरा पत्र व्यवहार चला। हमने इन पत्रों में कई बातों का जिक्र किया था। वे पत्र आज भी मेरे पास रखे हुए है। तंसरा से निकलकर... छिन्दवाड़ा, भोपाल आने के बाद भी उसके पत्र मुझे मिलते रहे। अब बात करते हैं मूल कारणों पर। उसकी मौत की वजहों पर। सुखदेव के बारे में जैसा कि हम जानते हैं। उसके परिवार में बुजुर्ग उम्रदराज, दादाजी के उम्र के पिता और माताजी के अलावा छोटे भाई-बहन समेत छह लोग थे। छोटा-सा कच्चा घर। जिसमें कई सालों तक बिजली नहीं थी। थोड़ा-सा खेत। माताजी छोटे-मोटे काम करती है। उसने अपनी कई क्लासों की पढ़ाई बिना बिजली के यानी दीपक की रोशनी में की थी। बारहवीं तक की पढ़ाई करने के बाद वह कुछ इधर-उधर के काम करने लगा। ताकि घर खर्च में हाथ बंटा सकें। साथ-साथ पढ़ाई भी जारी रखीं। उसने कितने काम्पीटिशन एक्जाम दिए मुझे पता नहीं, शायद किस्मत ने उसका साथ नहीं दिया। वह घर से बाहर नहीं निकल सका...। फिर क्या हुआ... । यही सबसे बड़ा सवाल है। ऐसा क्या हुआ कि वह डिप्रेशन का शिकार हो गया। अपनी याददाश्त खो बैठा। घर से भाग गया। उसका नागपुर में इलाज चला। फिर ठीक होने केबाद अचानक ... एक दिन कुंए में गिर गया। रातभर उसी में रहा। जख्म गहरा हो गया। जिसके चलते वह बिस्तर पर पड़ गया। क्या पढऩे में होशियार हर शख्स डिप्रेशन का शिकार हो जाता है? अगर ऐसा होता तो दुनिया में कोई भी शख्स ज्यादा पढ़ाई न करता। दुनिया में बड़े-बड़े वैज्ञानिक और विद्वान, विचारक नहीं होते। जो हजारों किताबें चाट डालते हैं। फिर इन नासमझ गांव वालों को कौन समझाए.... जो कहते फिरते है कि पढ़-पढ़ के पागल हो गया। अच्छे खासे स्वस्थ इंसान को इनकी बातें ही पागल बना देती है। काश कि हमारा दोस्त सुखदेव घर से बाहर निकल जाता... उसके घर की परिस्थितियों को देखते हुए हमने कभी उस पर दबाव नहीं बनाया कि तुम घर से निकलो। उसने भी कभी खुद से नहीं कहा। काश कि वह कभी कह देता... काश सुखदेव ... मेरे भाई की तरह ...। हम चाहे कितना भी सोचें कि ये सब किस्मत में लिखा होगा। मगर मैं इन बातों को मानने केलिए तैयार नहीं हूं कि सुखदेव को उसकी किस्मत ले डूबी। सुखदेव की जगह को हमारे बीच में भरना अब मुमकिन नहीं है। वो एक ऐसा 'दीपक' था जो अपने परिवार के लिए रोशनी बन गया था। उसे हमारे सामाजिक ताने-बाने ने बुझा दिया। (फोटो ८ अगस्त, 2003 को chhindwara में ली गई थी ) ... दूर तलक जाएगी 'दीपक' की बात

Sunday, December 14, 2008

वेल कम टू शाहपुर जाट....



वेल कम टू शाहपुर जाट....

बिग बी ... यानी अमित जी, मीतू जी, अमिताभ दुबे का आज जन्म दिन है ... हम यानी राधेश्याम डोंगरे और मैं अभी शाहपुर जाट में है ... मीतू ने हमें कहा - वेल कम टू शाहपुर जाट... और हम आ गए


... दोस्त, भाई और मार्गदर्शक अमिताभ दुबे का नाम मेरे लिए बचपन से ... किसी सेलेब्रिटी से कम नहीं था . पापा से पहली बार मैंने सुना की ...दुबे सर के बेटे अमिताभ ने फिफ्थ क्लास में ब्लाक में पहला स्थान हासिल किया है ... फ़िर उमरानाला स्कूल में आने के बाद मैंने इनके जलवे देखे ... इतने इनाम बटोरते थे की ... बस पूछिये ही मत ... उमरानाला स्कूल में जलवा बिखेरने के बाद जनाब ... डीडीसी कॉलेज chhindwara में पहुंचे ... हम भी वहीं जा पहुंचे ... अमिताभ भाई को वहां भाई बेस्ट स्टूडेंट का आवार्ड मिला ... आप सोच सकते ... जनाब में क्या क्वालिटी होगी ... आज बिग बी दिल्ली में ... पिछले ८-९ साल से ... हम भी दिल्ली आ पहुंचे ... मगर इसका मतलब यह हरगिज़ नहीं ... हम उनका पीछा कर रहे है ... जस्ट जोकिंग ...

तो मीतू भाई १४ दिसम्बर , जन्म दिन की अनेक शुभकमानये ... विश यू अ हैप्पी डे ...
जन्म दिन मुबारक हो ...

आपका दोस्त , भाई
तृष्णा , आरके डोंगरे
http://dongretrishna.blogspot.com

Friday, August 8, 2008

9 अगस्त : मेरे जीवन की क्रांति का दिन


तारीखें याद आती है...


9 अगस्त : मेरे जीवन की क्रांति का दिन


आज है 9 अगस्त...। 9 अगस्त यानी अगस्त क्रांति का दिन। और यही नौ अगस्त मेरे जीवन में भी क्रांति का दिन है। मुझे अच्छी तरह याद है साल 2000 का 9 अगस्त। जिस दिन मेरी आवाज रेडियो के जरिये छिन्दवाड़ा जिले में गूंजी थी ... जी हां, आकाशवाणी के छिन्दवाड़ा स्टेशन से।

आकाशवाणी यानी रेडियो मेरी लाइफ में खास जगह रखता है। कह सकते हैं कि इसी से प्रेरणा लेकर मैं जीवन पथ पर आगे बढ़ता गया। जिसकी बदौलत मैं आज कुछ बेहतर स्थिति में हूँ । रेडियो से मेरा इंटरव्यू बॉडकास्ट होने के साथ ही मेरा रेडियो से नाता जुड़ता ही चला गया। इंटरव्यू के बाद इंटरव्यू ... रेडियो की गतिविधियां बढ़ती गई ... और फिर मेरा रेडियो रूपक भी आकाशवाणी छिन्दवाड़ा से रिले हुआ। जिसके लिए मैं कार्यक्रम अधिकारी आदरणीय डॉ। हरीश पराशर रिशु सर का हमेशा आभारी रहूंगा। और देखा जाए तो रिशु सर जैसे लोगों के मार्गदर्शन केचलते ही मैं एक छोटे से क़स्बे से निकलकर दिल्ली जैसे बड़े शहर तक आ पाया।

रेडियो से जुड़े संस्मरण, किस्से, यादें और बातें तो मेरे पास कई है, मगर यहां मैं खासतौर पर 9 अगस्त से जुड़े बातें आपके साथ शेयर करना चाहूंगा।

कैसे मिला रेडियो पर इंटरव्यू देने का मौका
आकाशवाणी से यूथ केलिए एक खास प्रोग्राम होता है युववाणी। जिसमें अलग-अलग दिन कई दिलचस्प और जानकारी से लबरेज कार्यक्रम होते हैं। ऐसा ही एक कार्यक्रम सात सवाल मेरा पसंदीदा प्रोग्राम हुआ करता था। इसे मैं 1995 से लगातार सुनता आ रहा था। सात सवाल बेसिकली सामान्य ज्ञान के सवालों पर आधारित प्रोग्राम है।

उस ह$ ते के प्रोग्राम केसभी सातों सवालों का जवाब देना वाला मैं एकमात्र श्रोता था। इस प्रोग्राम के विजेता को पुरस्कार के बदले युववाणी के लिए एक इंटरव्यू देना का मौका मिलता था। मुझे भी इसीलिए मौका मिला। इससे पहले भी विजेता रहा था, मगर झिझक के चलते मैं आकाशवाणी नहीं आ पाया।

पहले इंटरव्यू का अनुभव
मेरा पहला इंटरव्यू मशहूर एनाउंसर आदरणीय अवधेश तिवारी जी ने लिया था। मुझे अच्छी तरह याद है, इसकेलिए उन्होंने कई बार रीटेक किया था। पहली दफा आकाशवाणी आना, स्टूडियो देखना और इंटरव्यू देना मेरे लिए रोमांचक अनुभव था।
अवधेश तिवारी जी मेरा इंट्रोडेक्शन कुछ इस अंदाज में दिया था- छिन्दवाड़ा में एक छोटा-सा गांव है तन्सरामाल ... और यहां रहते हैं एक उत्साही नौजवान रामकृष्ण डोंगरे...। इस पहले इंटरव्यू के बाद मैंने और भी इंटरव्यू इस प्रोग्राम के लिए दिए ...। पहला इंटरव्यू तो मेरे लिए हमेशा यादगार रहेगा ही मगर एक और इंटरव्यू मेरे लिए खास है।

उस इंटरव्यू में मुझसे दो लोगों ने बातचीत की थी। एक थे एनाउंसर धीरेन्द्र दुबे और दूसरे थे एक सीनियर कार्यक्रम अधिकारी ... जिनका नाम मैं भूल रहा हूं। शायद शशिकांत व्यास सर थे. इस लंबे इंटरव्यू में कई सवाल थे, और मेरी कुछ कविता भी शामिल थी।

मेरी यही दीवानगी बाद में मेरे काम आई...
अंत में फिर से 9 अगस्त के इंटरव्यू का जिक्र करना चाहूंगा ... उस दिन हमारे नये घर का काम चल रहा था। मैं जल्दी काम पूरा करके उमरानाला पंहुचा और उस इंटरव्यू को रिकार्ड करवाया। जब मैं इंटरव्यू को रिकार्ड को रिकार्ड करवा रहा था, उस वक्त दूकान पर लोगों की भीड़ मेरा ... तन्सरामाल... उमरानाला ... का नाम सुन रही थी ... मुझे कांटों तो खून नहीं।

.... रेडियो के प्रति मेरी दीवानगी का ये आलम था कि इसे मैं अपना पहला प्यार कहता था... सात सवाल के उत्तर खोजना मेरे लिए जीवन-मरण और प्रतिष्ठा का प्रश्न होता था... एक- एक सवाल के उत्तर के लिए मैं अपनी सारी किताबें, नोटबुक और डायरियां उलट-पुलट डालता था। इसके अलावा सारे मित्रों-पड़ोसियों के यहां भी खाक छानता फिरता था।

मेरी यही दीवानगी बाद में मेरे काम आई...।

Wednesday, July 2, 2008

एक आदर्श विभूति डॉ. प्रभुदयालु जी

एक आदर्श विभूति डॉ. प्रभुदयालु जी

सुविख्यात साहित्यकार एवं अनेक भाषाओं के प्रकाण्ड विद्वान आचार्य डॉ. प्रभुदयालु अग्निहोत्री का 5 जून 2008 की देर रात देहावसान हो गया। पेश है उन पर लिखा मेरे मित्र परवेज़ मसूद का आत्मीय लेख .

वयोवृद्ध स्वतंत्रता सेनानी साहित्य रत्न आचार्य श्री प्रभुदयालु अग्निहोत्री जी राष्ट्र की अनमोल धरोधर हैं। उम्र के इस कठिन और दुष्कर पड़ाव में भी वह अपने सहज एवं विनम्र व्यवहार से मिलने-जुलने वालों को विस्मित कर देते हैं। साधारणतः वृद्धावस्था में व्यक्ति के सोचने-समझने की शक्ति जवाब दे जाती है और स्वभाव में चिड़चिड़ापन आ जाता है लेकिन इसके विपरीत बाबूजी आश्चर्यजनक रूप से नौ दशक का फासला पार करके भी मृदुभाषी, विनोदप्रिय और सरल तबीयत के बने हुए हैं। दृढ़ इच्छाशक्ति, वैचारिक प्रतिबद्धता, अनवरत कर्म का संकल्प तथा जीवन-मूल्यों को आगे ले जाने की चाह, उनकी आँखों में स्पष्ट नजर आती है।

आजादी की लड़ाई में सपत्नीक योगदान देने वाले बाबूजी को आज के अव्यवस्थित हालात भीतर तक पीड़ित करते हैं। अव्यवस्था से संक्रमित वर्तमान परिदृश्य और मानवता पर कोड़े बरसाती निर्दयी राजनीति पर जब चर्चा चलती है तो अंग्रेजों से जूझने वाले इस नायक का मन रोष से भर उठता है। साम्प्रदायिकता, अशिक्षा, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और आतंकवाद ये ऐसे दुखद पहलू हैं जो बाबूजी को व्यथित कर देते हैं। टीवी देखना, रेडियो सुनना और अखबार पढ़ना उनकी दिनचर्या में शामिल हैं, परन्तु मनोरंजन या समय व्यतीत करने के लिए नहीं, बल्कि देश दुनिया की मौजूदा परिस्थितियों पर नजर रखने के लिए वह इन संचार माध्यमों से रूबरू होते हैं।

अपने बीते समय की यादों और अनुभवों को जब वे बाँटते हैं तो ऐसा लगता है कि बाबूजी उसी कालखण्ड में पहुँचकर वहां से आवाज लगा रहे हों। अतीत जैसे उनकी आँखों में जीवन्त हो उठता है। बचपन, लड़कपन एवं विद्यार्थी जीवन की रोचक बातें, स्वाधीनता संग्राम की रोमांचक घटनाएँ, साहित्य सम्बन्धी उपलब्धियाँ और विभिन्न शिक्षण संस्थाओं, महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों से जुड़े गरिमापूर्ण अनुभव, सब कुछ उनकी स्मृति में क्रमवार अंकित है। अपने पैतृक गाँव से लेकर सुदूर विदेश-भ्रमण तक की बातें वह बहुत उत्साह और तन्मयता से सुनाते हैं। कभी ऐसा भी होता है कि अपने गुजरे समय की बहुत-सी बातें बाबूजी कुछ-कुछ दिनों के अन्तराल पर फिर से सुना देते हैं। तब मैं उन्हें टोकना उचित नहीं समझता। इस प्रकार कई बार अभिव्यक्त हो चुके अनुभव मैं पुनः सुन लेता हूँ। वास्तव में उनकी स्मृति में संग्रहित प्रसंग बार-बार और हर बार सुनना अच्छा लगता है। सुगंधित फूलों की सुगंध जितनी मर्तबा ली जाए, मन प्रसन्न होता है।


वैसे तो बाबूजी के चुने हुए अनुभव तथा यादगार अनुभूतियाँ उनकी आत्मकथात्मक, संस्मरणात्मक पुस्तकों में संकलित हैं। मगर मौखिक रूप से एक विशिष्ट शैली में इस अनुपम अनुभवों को सुनना स्वयं में एक दिलचस्प एहसास है। कभी-कभी वह मजाक में मुझे 'जनरल परवेज मुशर्रफ' कहकर संबोधित करते हैं, तो मैं मुस्कुरा देता हूँ। एक बार मैंने उनसे हँसते हुए कहा कि "मैं तो भारतीय परवेज हूँ'' तो बाबूजी बोले "परवेज मुशर्रफ भी तो भारतीय हैं, दिल्ली में पैदा हुए थे। नाम में क्या रखा है। सब परिस्थितियों के अनुसार अपनी भूमिकाएँ निभाते हैं।'' देस-परदेस की भौगोलिक सीमाओं को लाँघकर उनकी मानवीय दृष्टि ÷वसुधैव कुटुम्बकम' की भावना पर जा टिकती है। इस प्रकार विश्व के सारे लोग स्वतः उनके अपने हो जाते हैं।

बाबूजी कबीर से अत्यन्त प्रभावित हैं। महात्मा गांधी उनके हृदय में बसते हैं। गाँधी जी के प्रति अपार श्रृद्धा रखने वाले बाबू जी स्वतंत्रता आंदोलन के समय उनसे व्यक्तिगत और भावनात्मक रूप से जुड़े थे। स्वतंत्रता आंदोलन को परवान चढ़ाने के लिए वह गांधी जी से विचार-विमर्श तथा मंत्रणाएँ किया करते थे। अब गांधी जी नहीं रहे और देश स्वतंत्र है, परन्तु राष्ट्रपिता की विचारधारा बाबूजी के मन में निरन्तर प्रवाहित है।


भारतीय जनमानस में व्याप्त धार्मिक संकीर्णता, अंधविश्वास हानिकारक रीति -रिवाज, प्रथाएँ और मान्यताएँ वर्तमान सन्दर्भ में ये सारी बातें बाबूजी को गैर जरूरी लगती हैं। उनके अनुसार आज के इस प्रगतिशील युग में इन सामाजिक बुराइयों को वैज्ञानिक तर्कों और तथ्यों पर कसना चाहिए। इनकी निरर्थकता को पहचान कर परम्परागत भ्रांतियों से मुक्त होना चाहिए।

पारिवारिक संस्कार की यात्रा, स्वतंत्रता यात्रा, साहित्यिक यात्रा तथा विभिन्न पदों से सुशोभित शिक्षण यात्रा के समानांतर ही बाबूजी समाजसेवा से ओतप्रोत इंसानियत की यात्रा भी कुशलतापूर्वक कर रहे है। गहन चिंतन-मनन के दौरान अन्तर्मन में बसी इन सारी यात्राओं पर वह निकल पड़ते हैं, और मानसिक जरूरत के मुताबिक, लोकोपयोगी सामग्री लेकर वापस लौटते हैं। तब लोगों में ज्ञान का प्रकाश फैलाती कृतियों का जन्म होता है।


इस प्रकार आज भी बाबूजी का साहित्य कर्म ईश्वरीय निर्देशानुसार निर्बाध रूप से अनवरत चल रहा है। बाबूजी के जीवन के किसी भी पक्ष को लिया जाए, जीवन के किसी भी हिस्से पर नजर डाली जाए, वहीं से प्रेरणा का प्रकाश फूट पड़ता है। उनके गुजरे समय प्रत्येक पल और वर्तमान का हर एक क्षण इंसान होने का अर्थ समझाता है। अद्भुत प्रेरणास्त्रोत हैं बाबूजी।

( मेरे दोस्त परवेज ने यह लेख लिखा था . हम अक्सर बाबा के पास जाया करते थे .)
http://aaspaas.net/khabar-march07.html

Tuesday, May 27, 2008

नहीं रहे मयाराम काका

नाटकों में दमदार रोल करने वाले मयाराम काका नहीं रहे ...
भाऊ की तरह ही चल बसे दूध डेहरी वाले मयाराम काका


सोमवार को छोटे भाई (रामधन) से मोबाइल पे बात हुई ...
बता रहा था कि भाऊ की तरह ही दूध डेहरी वाले मयाराम काका भी चल बसे ...
भाऊ यानी हमारे पिताजी। मतलब मयाराम काका का रविवार 25 मई को निधन हो गया .

मुझे पिताजी का अचानक चले जाना बरबस याद हो आया ...
तारीख थी 2006 के नवम्बर महीने की 15 ।मैं दो- एक दिन पहले ही दिल्ली से भोपाल लौटा था ...
मेरे मोबाइल पर फोन आया कि जल्दी घर आ जाओ भाऊ सीरियस है ...
बाद में सब कुछ साफ हो गया ...पापा को अटैक आया था ...मैं दूसरे दिन घर पंहुचा था ...

पूरे गाँव में कई दिनों तक चर्चा होती रही कि फंला आदमी कैसे अचानक चल बसे ...
गांवों - देहातों में किसी को हाट अटैक आना कुछ समय पहले तक सुनाई नहीं देता थामगर अब अक्सर अटैक आने की खबर सुनने को मिल जाती है...

इस बार भी मयाराम काका के चल बसने की बात पर मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा है ...
मयाराम काका नाटकों में यादगार काम करते थे ...बचपन में कई नाटक रात -रात भर जागकर देखे थे ... परिवार के साथ अपने गाँव में नाटक देखने जाते थे ...मयाराम काका का हरेक नाटक में दमदार रोल होता था ... उनकी आवाज दूर -दूर तक गूंजती थी ...

मयाराम काका हमेशा राजा का रोल करते थे ... द्रोपदी चीर हरण , भरत -मिलाप जैसे कई नाटकों वे हमेशा लीड रोल करते थे ... वैसे एक इन्सान के रूप भी मुझे हमेशा याद आते रहेगें ...
पड़ोसियों के बीच विवाद होना कोई नई बात होती ॥ मगर उनका स्वभाव इतना अच्छा था कि कभी किसी से कोई विवाद या झगड़ा रहा हो ऐसा मुझे याद नहीं आता ...उनके परिवार में पत्नी और चार बच्चे है ...

गांवों में जल्दी ना पता चल पाने बीमारी - हाट अटैक ने मयाराम काका की भी जान ले ली ।

आख़िर हाट अटैक का पता क्यों नहीं चल पाताकैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के ताजा शोध में पता चला है की 50 फीसदी लोगों को मालूम ही नहीं हो पाता है कि उन्हें हाट अटैक जैसी गंभीर बीमारी है ...

इस शोध में यह भी खुलासा किया गया है कि ...दिल के अगल -बगल में दर्द या दूसरी अन्य बीमारियों का वे समझ ना पाने के कारण इलाज नहीं करा पाते ...

मयाराम काका और पिताजी के प्रति सच्ची श्रदांजलि यह होगी कि
गाँव के लोग हाट अटैक के बारे सचेत हो जाए .

Thursday, May 1, 2008

घर की याद


शायद ही कोई ऐसा हो जिसको ना आती हो ... घर की याद
चंद दिनों बाद में घर जा रहा हूँ.

मेरे लिए ... अब दुनिया कितनी बड़ी हो गई है ...
... कहाँ तो बचपन में 25 किलो मीटर दूर का पता नहीं था
अब मैं हजार किलो मीटर से ज्यादा दूरी पर रह रहा हूँ ...
मुझको अब ... हजारों- हजार मील की दुनिया भी पता है ...

दिल्ली से भोपाल ... भोपाल से नागपुर ...
नागपुर से तन्सरामल ( उमरानाला ) ...
नागपुर में दोस्तों से मुलाकात ...उसके बाद घर ...