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Sunday, July 12, 2015

विज्ञप्ति, प्रेसनोट और सरकारी खबर... इसके अलावा भी होती है खबरें..


मीडिया से जुड़े हम लोगों को इन शब्दों से रोज ही दो-चार होना पड़ता है. अखबारों में विज्ञापन का दबाव बढ़ने से प्रेस रिलीज के लिए स्पेस कम होते जा रहा है। यह तो मानना पड़ेगा कि इनका अपना महत्व होता है- अखबार के लिए भी और आमजन के लिए भी।
मगर हम खबरों के दबाव में विज्ञप्ति या सरकारी खबरों से अक्सर चिढ़ते है। हम सालों से अखबार और तमाम खबरों को पढ़ते आ रहे हैं। खबरों में नयापन कैसे लाया जाता है...खासकर सिटी की खबरें यानी सड़क, बारिश जैसे तमाम मुद्दों में नया एंगल क्या हो सकता है, यह सब मैंने पिछले दो साल में सीखा-देखा।
इससे पहले मैं सेंट्रल डेस्क पर रहा। जहां मेरा वास्ता देश और तमाम राज्यों की बड़ी खबरों से पड़ता था। छिंदवाड़ा या भोपाल में चाहे मेरी शुरुवात सिटी से ही हुई थी मगर मुझे ऐसी कुछ खबरें याद नहीं आती।
इस मसले पर मैं फिर से बात करूंगा।

शुक्रिया दोस्तों।

‪#‎अखबारकीदुनिया‬ ‪#‎मेरीपत्रकारिता‬ ‪#‎तारीखेंयादआतीहै‬ ‪#‎myjournalisticjourney‬ ‪#‎कुछ_बातें_कुछ_लोग‬

Friday, March 8, 2013

कुछ बातें, कुछ लोग (पार्ट-सेवन)

एफआईआर भ्रष्टाचार का हथियार


पहले शॉट में-
नई दुनिया, भोपाल, 6 मार्च, 2007
नई दुनिया अखबार में प्रकाशित इस लेख को मैंने भोपाल में क्राइम बीट पर काम करने के दौरान हुए अनुभव के बाद ‌लिखा था। मैंने साल 2006 में राज्य की नई दुनिया में काम किया गया। इसमें मेरा ज्यादातर डेस्क वर्क ही होता था, लेकिन इसके अलावा मुझे क्राइम की खबरों में पंकज शुक्ला जी के साथ काम करना होता था। इस दौर की दिलचस्प बात यह है कि मेरे दोस्त और सीनियर मुझे कहते थे- कला से क्राइम तक डोंगरे जी। यानी पहले कला संवाददाता हुआ करता था फिर क्राइम रिपोर्टर। अब बात मुद्दे पर। जैसा कि अ‌र्टिकल की हेडिंग है- एफआईआर भ्रष्टाचार का हथियार, तो इसमें मैंने पुलिस महकमे में भ्रष्टाचार, घूसखोरी को बढ़ावा देने में एफआईआर की भूमिका को सामने लाया था। 

अब विस्तार से- 
आर्ट एंड कल्चर की रिपोर्टिंग करते-2 अचानक मुझे क्राइम की खबरों से जूझना पड़ गया था। शुरूआत में क्राइम से जुड़ीं कई शब्दावली और बातें मुझे समझ नहीं आती थी। इसमें हमारे सीनियर अजय बोकिल जी, आनंद दुबे, पंकज शुक्ला आदि मेरी हेल्प करते थे। रिपोर्टिंग के दौरान मैंने दूसरे अखबारों के क्राइम रिपोर्टर बंधुओं से भी संपर्क बना लिया था। जिनमें खास थे- गुनेंद्र अग्निहोत्री (जागरण), सुनीत सक्सेना (भास्कर), आनंद पांडे (राज एक्सप्रेस), जुबैर कुरैशी (अग्निबाण), जुगलकिशोर (सीटीवी)। लगभग सभी से मेरी एक-दो साल पुरानी जान-पहचान थी। सुनीत सक्सेना जी के साथ मैंने स्वदेश में काम किया था, तो जुबैर भाई के साथ अग्निबाण में।

Thursday, February 28, 2013

कुछ बातें, कुछ लोग (पार्ट-सिक्स)

सेहत के लिए सामाजिक स्थिति जिम्मेदार

नई दुनिया, भोपाल, 12 अप्रैल, 2006
पहले शॉट में-
भोपाल के नई दुनिया अखबार में प्रकाशित इस लेख को मैंने एक सेमिनार के दौरान लिखा था। मध्यप्रदेश के हिल स्टेशन पचमढ़ी में महिला स्वास्‍थ्य और मीडिया पर तीन दिवसीय सेमिनार का आयोजन किया गया था। इस लेख में महिला स्वास्‍थ्य की अनदेखी को रेखांकित किया गया है।

अब विस्तार से-
हमारे देश और समाज में महिला सुरक्षा की तरह महिला स्वास्‍थ्य को भी हमेशा नजरअंदाज किया जाता है। मैंने इस आर्टिकल में अपने ही परिवार का उदाहरण सामने रखा था। इस लेख को प्रकाशित कराने के पीछे माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विवि के प्रोफेसर पुष्पेंद्र पाल सिंह की प्रेरणा रही। इसमें मेरे दोस्त हरीश बाबू और रामसुरेश सिंह का भी सहयोग रहा। जैसा कि लेख का शीर्षक है- सेहत के लिए सामाजिक स्थिति जिम्मेदार...। यानी महिलाओं की सेहत, स्वास्‍थ्य के साथ खिलवाड़ के लिए हमारी सामाजिक स्थिति और सोच सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। हम स्वास्‍थ्य के प्रति जागरूक नहीं होते हैं। महिला खुद अपनी सेहत के प्रति लापरवाह हो जाती है और उसे ऐसा बनाती है, समाज की सोच। गांवों में यह स्थिति ज्यादा देखने को मिलती है।

कुछ बातें, कुछ लोग (पार्ट-5)

राज्य की नई दुनिया, भोपाल, 28 मार्च, 2006
जीवन संघर्ष की गाथा


पहले शॉट में-
राज्य की नई दुनिया में भगवान चंद्र घोष के उपन्यास-कर्मक्षेत्रे-कुरूक्षेत्रे की समीक्षा प्रकाशित होने का पूरा श्रेय आदरणीय विनय उपाध्याय जी को जाता है। यह समीक्षा राज्य की नई दुनिया में काम करने के दौरान ही छपी थी। विनय जी मुझे अग्निबाण के समय से ही जानते थे। मैं कई बार उनसे खबरों को लेकर बात करता था। राज्य की नईदुनिया ज्वाइन करने के बाद मेरा ज्यादातर काम डेस्‍क पर ही होता था, मगर वे मुझे इस तरह के कई असाइनमेंट भी दिया करते थे।

अब विस्तार से-
किताबों की समीक्षा लिखने का मुझे पहले से तर्जुबा था। छिंदवाड़ा में पाठक मंच की कई किताबों की मैंने समीक्षा की थी, जिनमें कविता, कहानी, उपन्यास और लेख सभी तरह की किताबें हुआ करती थी। समीक्षा लिखते वक्त काफी सावधानी बरतनी पड़ती है। यानी सकारात्मक और नकारात्मक पहलु के बीच संतुलन बनाकर रखना होता है।
अफसोस इस बात का रहेगा कि मैं इस सिलसिले को बरकरार नहीं रख पाया। उपाध्याय जी ने मुझे कई लेखकों, साहित्यकारों और रंगकर्मियों के इंटरव्यू और स्टोरी आइडिया दिए थे मगर...। बीच-बीच में मैं पत्रकारिता की पढ़ाई में बिजी हो जाता था। भोपाल हमेशा मेरे दिल के करीब रहेगा। जैसे छिंदवाड़ा। भोपाल के सभी लोगों को मैं कभी नहीं भूल पाऊंगा।

Sunday, February 24, 2013

कुछ बातें, कुछ लोग (पार्ट-फोर)

अल्पायु में ही दम तोड़ा रंगमंडल ने
पहले शॉट में-
अग्निबाण में जनरल रिपोर्टिंग और कवरेज के अलावा मुझे स्पेशल पेज के लिए कवर स्टोरी भी तैयार करनी पड़ती थी। साल 2005 के मई, जून, जुलाई और अगस्त, इन चार महीनों के दौरान मेरी कई कवर स्टोरी प्रकाशित हुई। इनमें प्रमुख थी- मोबाइल बंद होते नहीं, बच्चे भी सोते नहीं... , वीआईपी का आगमन, मुसीबत में आमजन..., उर्दू अकादमी में उर्दू क्लास और अल्पायु में ही दम तोड़ा रंगमंडल ने।

अब विस्तार से- 
सांध्य दैनिक अग्निबाण, भोपाल, 28 अगस्त, 2005
सांध्य दैनिक अग्निबाण, भोपाल, 28 अगस्त, 2005
अग्निबाण के 'भोपाल विशेष' पेज के लिए फुल पेज की कवर स्टोरी तैयार करने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती थी। उन दिनों आज की तरह सबकुछ इंटरनेट पर नहीं मिलता था। थियेटर से संबंधित कवर स्टोरी में मेरे दोस्त चिन्मय सांकृत और सभी रंगकर्मियों ने मेरी काफी सहायता की। मोबाइल बंद होते नहीं... के दौरान मुझे वरिष्ठ रंगकर्मी केजी त्रिवेदी, अभिनेत्री व निर्देशक बिशना चौहान ने मदद की।

अल्पायु में दम तोड़ा रंगमंडल ने... इस स्टोरी के लिए मैंने काफी मेहनत की। भोपाल के मशहूर रंगमंडल का पूरा इतिहास खंगालना पड़ा। रंगमंडल के सफर से रूबरू होना पड़ा। 1982 में मंचित घासीराम कोतकाल, मोहन राकेश के आधे-अधूरे, धर्मवीर भारती के अंधा युग, तुम सआदत हसन मंटो हो, बीवियों का मदरसा के मंचन की जानकारी जुटानी पड़ी। उर्दू अकादमी की स्टोरी के समय मुझे अकादमी के चेयरमैन और मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र साहब का भरपूर सहयोग मिला।

कुछ बातें, कुछ लोग (पार्ट-थ्री)

कथाकार अलका सरावगी से विशेष बातचीत


पहले शॉट में-
सांध्य दैनिक अग्निबाण, भोपाल, 9 जुलाई, 2005
इवनिंग न्यूजपेपर अग्निबाण में रिपोर्टिंग के दौरान मुझे वरिष्ठ कथाकार अलका सरावगी जी का इंटरव्यू लेने का मौका मिला। भोपाल ‌स्थित भारत भवन में अलका जी ने मुझसे अलग से बातचीत की थी। इस खबर का दिलचस्प पहलू यह है कि इंटरव्यू के दौरान उन्होंने मुझसे कहा था- 'आपने ज्यादा कुछ पढ़ा नहीं है।' इसकी वजह यह थी कि मैं बहुत ज्यादा सवाल नहीं कर पाया था। सच कहा था अलका जी ने। हां, मैंने उनके कलिकथा ः वाया बाईपास, शेष कादम्बरी उपन्यास नहीं पढ़े थे। मैंने दूसरी महिला कथाकारों जैसे कृष्‍णा सोबती का 'मित्रो मरजानी', सूरजमुखी अंधेरे में, मृदुला गर्ग का कठगुलाब आदि जरूर पढ़े थे।

अब विस्तार से-
आर्ट एंड कल्चर की रिपोर्टिंग के दौरान मैंने झीलों की नगरी भोपाल के लगभग सारे 'भवनों' के चक्कर लगाए थे। इनमें भारत भवन, हिंदी भवन, रविंद्र भवन और मानस भवन आदि प्रमुख है। मैं अपनी हरक्यूलस साइकिल से ही रिपोर्टिंग किया करता था। यानी करीब दो साल तक मैंने साइकिल से ही रिपोर्टिंग की थी। इन सालों में मुझे अपने वरिष्ठ पत्रकार साथियों से काफी कुछ सीखने को मिला। इनमें विनय उपाध्याय (राज्य की नई दुनिया), वसंत सकरगाए (राज्य एक्सप्रेस), राकेश सेठी, सौरभ कुमार (जागरण), शकील जी (दैनिक भास्कर), बद्र वास्ती, अरुण कुमार (नवभारत) आदि शामिल है।

कुछ बातें, कुछ लोग पार्ट टू


चर्चा ऑफ दी रिकार्ड, चाय-पकौड़े ऑन द रिकार्ड

पहले शॉट में- 
सांध्य दैनिक अग्निबाण, भोपाल, 30 जून, 2005
अग्निबाण में ही प्रकाशित इस खबर को रोचक बनाती है इसकी हेडिंग। उन दिनों भोपाल के अप्सरा रेस्टारेंट में रोजाना दो-चार प्रेस कांफ्रेंस-प्रेसवार्ता हुआ करती थी। यह बात सभी जानते हैं कि प्रेस कांफ्रेंस में चाय-समोसा, खाना-पीना क्या स्‍थान रखता है। इस बात को जब मैंने एक किताब पर चर्चा के लिए आयोजित कार्यक्रम के दौरान वरिष्ठ पत्रकार रामशरण जोशी के मुख से सुना, तो तुरंत दूसरे दिन के अखबार की हेडलाइन बना दी- चर्चा ऑफ दी रिकार्ड, चाय-पकौड़े द रिकार्ड।

अब विस्तार से- 
मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के न्यू मार्केट का अप्सरा रेस्टारेंट प्रेस कांफ्रेंस-प्रेसवार्ता के लिए सबसे ज्यादा जाना जाता है, जो कि रविन्द्र भवन परिसर में स्थित है। झीलों की नगरी भोपाल को जानने वाले पत्रकार बंधु इस तथ्य से अंजान नहीं होंगे। मुझे अपने इवनिंग न्यूज पेपर के लिए रोजाना कुछ अलग हटकर न्यूज देनी होती थी। मेरे बॉस अवधेश बजाज जी का साफ निर्देश था कि सुबह के अखबार में जो खबर छप जाए, उसे हम नहीं छापेंगे। इसलिए मुझे आर्ट एंड कल्चर की खबरों को नया रंग देना होता था। यह खबर इसी का नतीजा था। वरिष्ठ पत्रकार विजय मनोहर तिवारी की किताब -हरसूद 30 जून- पर चर्चा के लिए आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में टेलीविजन पत्रकार राहुल देव और आदरणीय रामशरण जोशी मौजूद थे।

कुछ बातें, कुछ लोग पार्ट- वन


'पोंगा पंडित' ने पाए लाखों और कराए उपद्रव

पहले शॉट में- 

सांध्य दैनिक अग्निबाण, भोपाल, 5 अगस्त, 2005
किसी भी अखबार के फ्रंट पेज पर यह मेरी पहली बाइलाइन न्यूज थी। अखबार था इंदौर से प्रकाशित सांध्य दैनिक अग्निबाण का भोपाल एडीशन। हमारे बॉस थे मध्यप्रदेश के बेहद निडर और तेजतर्रार पत्रकार और संपादक अवधेश बजाज साहब। इस खबर का ‌दिलचस्प पहलू यह है कि संस्कृति विभाग के कई चक्कर काटने के बाद तैयार मेरी स्टोरी काफी लंबी हो गई थी, जिसे बजाज साहब ने खुद पेज पर एडिट करवाई थी। मुझे याद है कि इसकी यह हेडिंग भी उन्होंने ही ‌दी थी।

अब विस्तार से- 
अग्निबाण में मुझे आर्ट एंड कल्चर की रिपोर्टिंग का जिम्मा मिला था। यानी कला संवाददाता का। पत्रकारिता का यह मेरा चौथा संस्‍थान था। इससे पहले लोकमत समाचार छिंदवाड़ा, भोपाल से प्रकाशित स्वदेश न्यूज पेपर और एक साहित्यिक मैगजीन में काम करने का तर्जुबा था। भोपाल में अग्निबाण के शुरुआत से ही मैं इससे जुड़ा हुआ था। मशहूर रंगकर्मी हबीब तनवीर के इस नाटक 'पोंगा पंडित' पर स्टोरी का आइडिया मेरे वरिष्ठ साथी गौरव चतुर्वेदी ने दिया था। इस स्टोरी के दौरान मुझे पता नहीं था कि इसका प्लेसमेंट कहां और कैसे होगा। स्टोरी काफी लंबी लिख डाली थी, सो पहले पेज पर लगाने के दौरान हमारे बॉस ने ही इसे छोटी करवाई। मैं उस दौरान पीछे ही खड़ा था। उस समय वहां की रिपोर्टिंग टीम में गीत दीक्षित, गौरव चतुर्वेदी, विनोद उपाध्याय, आरती शर्मा, जुबेर कुरैशी, जितेंद्र सूर्यवंशी, हरीश बाबू आदि थे।