Saturday, February 7, 2026

मेरी पहली दक्षिण भारत की यात्रा : तीन राज्य और पांच शहर

29 जनवरी से 4 फरवरी 2026 तक आयोजित सात दिवसीय एक्सपोजर विजिट की यादें 
छत्तीसगढ़ जनसंपर्क विभाग की ओर से 29 जनवरी से 4 फरवरी 2026 तक आयोजित सात दिवसीय एक्सपोजर विजिट के दौरान हमें तमिलनाडु में कोयंबटूर के ईशा फाउंडेशन, ऊटी के प्रमुख टूरिस्ट प्लेस जैसे– चाय फैक्ट्री संग्रहालय, बोटैनिकल गार्डन, पाइन फॉरेस्ट, शूटिंग स्थल, पायकारा जलप्रपात, कर्नाटक में मैसूर पैलेस, श्री चामुंडेश्वरी मंदिर, बेंगलुरु में कर्नाटक विधानसभा और आंध्रप्रदेश में तिरुपति बालाजी मंदिर आदि स्थानों पर जाने का अवसर मिला। 
दक्षिण भारत की यह यात्रा सिर्फ शहरों के बीच की दूरी नहीं थी, बल्कि संस्कृति, प्रकृति और आस्था के संगम की एक जीवंत कहानी बन गई। कोयंबटूर से तिरुपति बालाजी तक का यह सफर हर मोड़ पर नया अनुभव देता है—कहीं हरियाली, कहीं इतिहास, तो कहीं श्रद्धा की गहराई।
कोयंबटूर से यात्रा की शुरुआत हुई। तमिलनाडु का यह औद्योगिक शहर अपनी सादगी और सुव्यवस्थित जीवनशैली के लिए जाना जाता है। कोयंबटूर से निकलते ही जैसे-जैसे सड़क नीलगिरि की ओर बढ़ती है, मौसम और मिजाज दोनों बदलने लगते हैं। रास्ते में 40 किमी की दूरी पर स्थित ईशा फाउंडेशन एक ऐसी आध्यात्मिक यात्रा पर ले जाता है, जहां 112 फीट ऊंची आदियोगी शिव की भव्य प्रतिमा स्थापित है। यह स्थान न केवल ध्यान और साधना का केंद्र है, बल्कि शांति, आत्मबोध और आध्यात्मिक ऊर्जा का अनूठा अनुभव भी कराता है।
कुछ ही घंटों में ऊटी का ठंडा अहसास यात्रियों को घेर लेता है। घुमावदार पहाड़ी सड़कें, चाय बागानों की हरी चादर और बादलों की ओट में छिपे पहाड़—ऊटी को यूं ही ‘पहाड़ों की रानी’ नहीं कहा जाता। बोटैनिकल गार्डन की सैर हो या ऊटी झील में नौकायन, हर दृश्य कैमरे में कैद करने लायक लगता है। डोड्डाबेट्टा पीक से नीचे फैली वादियों को देखना मानो प्रकृति का विराट कैनवास हो। यहां की शांति मन को ठहराव देती है, जो आगे की यात्रा के लिए ऊर्जा बन जाती है।

ऊटी से मैसूर की राह प्रकृति से इतिहास की ओर ले जाती है। रास्ते में मुदुमलाई राष्ट्रीय उद्यान, बांदीपुर वन्यजीव अभयारण्य में बस में बैठे–बैठे ही हाथी, हिरण, मोर आदि वन्य जीवों के दर्शन हो जाते हैं। मुदुमलाई उद्यान की दूरी ऊटी से लगभग 40 किमी है। कर्नाटक का मैसूर शहर अपनी भव्यता और अनुशासन के लिए प्रसिद्ध है। मैसूर पैलेस की रोशनी में डूबती शाम हो या चामुंडी पहाड़ी से शहर का नजारा—हर पल शाही विरासत की याद दिलाता है। मैसूर सिर्फ देखने का शहर नहीं, बल्कि महसूस करने का अनुभव है। मैसूर पैलेस वास्तुकला की विभिन्न शैलियों का मिश्रण है। इसे देखने के लिए रोजाना हजारों लोगों की भीड़ उमड़ती है। इसे ताजमहल के बाद भारत में सबसे अधिक देखा जाने वाला स्मारक भी माना जाता है। मैसूर से 13 किमी दूर स्थित चामुंडेश्वरी मंदिर हमें दक्षिण भारत के द्रविड़ शैली के मंदिरों से रूबरू कराता है। 

यात्रा का सबसे भावनात्मक पड़ाव है आंध्र प्रदेश जिले में स्थित तिरुपति बालाजी (तिरुमला)। बेंगलुरु शहर से इसकी दूरी लगभग 250 किमी है। तिरुपति शहर से 25 किलोमीटर दूर पहाड़ियों पर बसे इस पवित्र धाम की ओर बढ़ते हुए श्रद्धा अपने आप गहराने लगती है। घुमावदार रास्तों पर चलते वाहन, “गोविंदा… गोविंदा…” के जयकारे और भक्तों की आस्था—सब मिलकर माहौल को आध्यात्मिक बना देते हैं। भगवान वेंकटेश्वर के दर्शन मात्र से यात्रा की सारी थकान जैसे समाप्त हो जाती है। यहां की व्यवस्था, अनुशासन और श्रद्धालुओं की आस्था भारत की सांस्कृतिक शक्ति का परिचय देती है।

हमारी यात्रा का अंतिम पड़ाव बेंगलुरु रहा—आधुनिक भारत की तकनीकी राजधानी। समय की सीमाओं के कारण हम कर्नाटक विधानसभा भवन तक ही सीमित रह सके, किंतु शहर की सड़कों से गुजरते हुए बेंगलुरु की तेज़ रफ्तार और आपाधापी भरी जीवनशैली को नज़दीक से महसूस करने का अवसर मिला। लालबाग बोटैनिकल गार्डन, रॉक गार्डन और क्यूबन पार्क जैसे हरित स्थलों को देखने की इच्छा अधूरी ही रह गई। फिर भी यह स्पष्ट होता है कि ऐतिहासिक विधान सौधा और आधुनिक आईटी हब का संतुलित संगम ही बेंगलुरु की विशिष्ट पहचान है। यहां की जीवंत सड़कें, उभरता कैफे कल्चर और युवाओं से भरी ऊर्जा दक्षिण भारत के बदलते और गतिशील चेहरे की सशक्त कहानी कहती है।


इस पूरे सफर में कोयंबटूर की सादगी, ऊटी की ठंडक, मैसूर की शान, बेंगलुरु की आधुनिकता और तिरुपति की भक्ति—पांचों रंग एक साथ उभरकर सामने आते हैं। यह यात्रा सिर्फ पर्यटन स्थलों की नहीं, बल्कि भारत की विविधता को करीब से जानने की एक यादगार दास्तान बन जाती है। कहा जा सकता है कि दक्षिण भारत की सड़कें सिर्फ मंजिल तक नहीं ले जातीं, बल्कि अनुभवों से भर देती हैं।
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जनसंपर्क अधिकारियों और वरिष्ठ पत्रकारों का मिला सान्निध्य

सात दिवसीय शैक्षणिक टूर में जनसंपर्क विभाग, रायपुर से श्री बालमुकुंद तंबोली, श्री अनिल कुमार वर्मा, श्री भवानी सिंह ठाकुर एवं श्री धनेन्द्र कुमार बंजारे शामिल रहे, वहीं जनसंपर्क विभाग बस्तर से श्री कमल बघेल ने सहभागिता की। मीडिया जगत से दैनिक नवप्रदेश रायपुर के श्री चंद्रशेखर घोटे, दैनिक हरिभूमि रायपुर के श्री गुलाल प्रसाद वर्मा, राष्ट्रीय न्यूज सर्विस दुर्ग के श्री हर्ष शुक्ला, दैनिक नवभारत बस्तर के श्री कमलेश बघेल, दैनिक अग्रदूत रायपुर के श्री कृष्ण कुमार शर्मा तथा दैनिक साथी संदेश दुर्ग के श्री मलय बैनर्जी इस शैक्षणिक यात्रा का हिस्सा रहे।

इसके अतिरिक्त दैनिक जनता से रिश्ता रायपुर से मोहम्मद जाकिर घुरसेना, दैनिक भास्कर रायपुर से श्री नीरज कुमार मिश्रा, नईदुनिया रायपुर से श्री रामकृष्ण डोंगरे, दैनिक विश्व परिवार रायपुर से श्री रत्नेश गुप्ता, दैनिक दावा राजनांदगांव एवं दैनिक बस्तर इम्पैक्ट दंतेवाड़ा से श्री सुरेश महापात्र, दैनिक राजनांदगांव टाइम्स से श्री सूरज बुद्धदेव, राजनांदगांव से श्री उत्तम कुमार पाण्डेय तथा दैनिक छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस से श्री विक्रम तिवारी भी इस भ्रमण में सहभागी रहे।

-रामकृष्ण डोंगरे, वरिष्ठ पत्रकार 
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