Wednesday, November 4, 2026

abhijeet bhattacharya live show : 'चलती है क्या 9 से 12...' 10:25 बजे शुरू हुआ अभिजीत के सुरों का सफर


तीन नवंबर 2026 । राज्योत्सव की आखिरी रात... आसमान से बरसती बूंदें, मैदान में पसरा कीचड़ और हजारों आंखों में एक ही इंतजार... बॉलीवुड के मशहूर प्लेबैक सिंगर अभिजीत भट्टाचार्य का। शाम पांच बजे के आसपास शुरू हुई बूंदाबांदी देखते ही देखते झमाझम बारिश में बदल गई। मैदान में जगह-जगह पानी भर गया। चारों तरफ कीचड़ था। दर्शक भीग चुके थे, लेकिन उनके उत्साह में कमी नहीं आई। रात 10:25 बजे जैसे ही अभिजीत मंच पर पहुंचे, तालियों और शोर से पूरा मैदान गूंज उठा।


छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना दिवस के अवसर पर आयोजित राज्योत्सव के अंतिम दिन अभिजीत का विशेष लाइव शो रखा गया था। 90 के दशक और उसके बाद बॉलीवुड को कई यादगार गीत देने वाले इस गायक को सुनने के लिए बड़ी संख्या में दर्शक पहुंचे थे। बारिश और कार्यक्रम में देरी के बावजूद लोग मैदान में डटे रहे। दर्शकों की उम्मीद थी कि अभिजीत अपने लोकप्रिय गीतों से इस शाम को यादगार बनाएंगे।

ब्लैक कुर्ता-पायजामा और सफेद जैकेट पहने अभिजीत ने 'आशिक हूं मैं कातिल भी हूं' से अपनी प्रस्तुति शुरू की।
इसके बाद 'बहुत खूबसूरत हो', 'वादा रहा सनम' और 'बड़ी मुश्किल है, खोया मेरा दिल है' जैसे गीत सुनाए।

 'बहुत खूबसूरत हो' के बाद उन्होंने 
दर्शकों से मजाकिया अंदाज में कहा कि 

मुझे रायपुर पहले क्यों नहीं बुलाया गया। एक-एक को देख लूंगा। उनके इस अंदाज पर दर्शकों ने खूब तालियां बजाईं।

हालांकि, कार्यक्रम में तकनीकी अव्यवस्था ने कई बार संगीत का मजा किरकिरा किया। साउंड सिस्टम अपेक्षा के अनुरूप नहीं था। 

माइक बंद होने पर अभिजीत ने मंच से ही नाराजगी जताते हुए कहा, 'मेरा माइक किसने बंद किया। आप लोग अच्छे सिंगर हैं। मतलब मुझे गाने नहीं देंगे।' खराब साउंड के बावजूद उन्होंने अपनी प्रस्तुति जारी रखी।

उन्होंने बातचीत के दौरान कहा कि कई फ्लाप फिल्मों में भी उन्होंने अच्छे गाने गाए हैं। इसके बाद 'चांद तारे तोड़ लाऊं', 'कदम कदम पर हैं यहां लाखों हसीनाएं', 'मुसाफिर हूं यारों', 'तुमने ना जाना, मैं दीवाना', 'सुनो ना सुनो ना, सुन लो ना', 'तौबा तुम्हारे ये इशारे' और 'मैं हूं ना' के गीतों से माहौल में फिर रंग भर दिया।
'तुम्हें जो मैंने चाहा, तुम्हें जो मैंने देखा', 'फूलों के रस में नहा के', 'मेरे ख्यालों में मलिका रे', 'झांझरिया', 'तुम आए तो हवाओं में एक नशा' और 'दिल का जो हाल है' जैसे गीतों पर दर्शक उनके साथ गुनगुनाते रहे। ड्रम की थाप के बीच 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' का लोकप्रिय गीत 'जरा सा झूम लूं मैं' सुनकर दर्शकों को पुराने दिनों की याद आ गई। 

इसके बाद 'मैं कोई ऐसा गीत गाऊं', 'टन टना टन टन टन तारा, चलती है क्या 9 से 12', 'तुम दिल की धड़कन में रहती हो' और 'जब भी कोई लड़की देखूं ओले ओले' जैसे गीतों ने समां बांध दिया।

करीब 20 गीतों की प्रस्तुति के दौरान अभिजीत ने पूरे समर्पण और तन्मयता के साथ दर्शकों का मनोरंजन करने की कोशिश की। रात 12:10 बजे कार्यक्रम समाप्त हुआ। राज्योत्सव की इस आखिरी शाम में बारिश, कीचड़ और तकनीकी अव्यवस्थाओं ने आयोजन की चमक जरूर प्रभावित की, लेकिन अभिजीत के सदाबहार गीतों के लिए दर्शकों का इंतजार और उनका उत्साह इस रात को यादगार बना गया।

अभिजीत भट्टाचार्य के कार्यक्रम में प्रस्तुत 20 गीत और उनसे जुड़ी फिल्में

1. आशिक हूं मैं कातिल भी हूं
फिल्म : बादशाह (1999)
कलाकार : शाहरुख खान, ट्विंकल खन्ना, अमरीश पुरी, राखी
गीतकार : समीर
संगीतकार : अनु मलिक

2. बहुत खूबसूरत हो
फिल्म : खूबसूरत (1999)
कलाकार : संजय दत्त, उर्मिला मातोंडकर, ओम पुरी
गीतकार : मजरूह सुल्तानपुरी
संगीतकार : जतिन-ललित

3. वादा रहा सनम
फिल्म : खिलाड़ी (1992)
कलाकार : अक्षय कुमार, आयशा जुल्का, दीपक तिजोरी
गीतकार : मजरूह सुल्तानपुरी
संगीतकार : जतिन-ललित

4. बड़ी मुश्किल है, खोया मेरा दिल है
फिल्म : अंजाम (1994)
कलाकार : शाहरुख खान, माधुरी दीक्षित, दीपक तिजोरी
गीतकार : समीर
संगीतकार : आनंद-मिलिंद

5. चांद तारे तोड़ लाऊं
फिल्म : यस बॉस (1997)
कलाकार : शाहरुख खान, जूही चावला, आदित्य पंचोली
गीतकार : जावेद अख्तर
संगीतकार : जतिन-ललित

6. कदम-कदम पर हैं यहां लाखों हसीनाएं
फिल्म : बादशाह (1999)
कलाकार : शाहरुख खान, ट्विंकल खन्ना, अमरीश पुरी
गीतकार : समीर
संगीतकार : अनु मलिक

8. तुमने ना जाना, मैं दीवाना
फिल्म : चलते-चलते (2003)
कलाकार : शाहरुख खान, रानी मुखर्जी
गीतकार : जावेद अख्तर
संगीतकार : आदेश श्रीवास्तव

9. सुनो ना सुनो ना, सुन लो ना
फिल्म : चलते-चलते (2003)
कलाकार : शाहरुख खान, रानी मुखर्जी
गीतकार : जावेद अख्तर
संगीतकार : आदेश श्रीवास्तव

10. तौबा तुम्हारे ये इशारे
फिल्म : चलते-चलते (2003)
कलाकार : शाहरुख खान, रानी मुखर्जी
गीतकार : जावेद अख्तर
संगीतकार : जतिन-ललित

11. तुम्हें जो मैंने देखा, तुम्हें जो मैंने जाना, 
फिल्म : मैं हूं ना 
गीतकार : —जावेद अख्तर 
संगीतकार : —अनु मलिक 

12. फूलों के रस में नहा के
फिल्म : जोश (2000)
कलाकार : शाहरुख खान, ऐश्वर्या राय, चंद्रचूड़ सिंह
गीतकार : समीर
संगीतकार : अनु मलिक

13. मेरे ख्यालों की मलिका रे
फिल्म : जोश (2000)
कलाकार : शाहरुख खान, ऐश्वर्या राय, चंद्रचूड़ सिंह
गीतकार : समीर
संगीतकार : अनु मलिक

14. झांझरिया
फिल्म : कृष्णा (1996)
कलाकार : सुनील शेट्टी, करिश्मा कपूर
गीतकार : इंदीवर
संगीतकार : अनु मलिक

15. तुम आए तो हवाओं में एक नशा
फिल्म : फिर भी दिल है हिंदुस्तानी (2000)
कलाकार : शाहरुख खान, जूही चावला, परेश रावल
गीतकार : जावेद अख्तर
संगीतकार : जतिन-ललित

16. दिल का जो हाल है
फिल्म : बेशरम (2013)
कलाकार : रणबीर कपूर, पल्लवी शारदा, ऋषि कपूर
गीतकार : निलेश मिश्रा
संगीतकार : ललित पंडित

17. जरा सा झूम लूं मैं
फिल्म : दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे (1995)
कलाकार : शाहरुख खान, काजोल, अमरीश पुरी
गीतकार : आनंद बख्शी
संगीतकार : जतिन-ललित

18. मैं कोई ऐसा गीत गाऊं
फिल्म : यस बॉस (1997)
कलाकार : शाहरुख खान, जूही चावला, आदित्य पंचोली
गीतकार : जावेद अख्तर
संगीतकार : जतिन-ललित

19. टन टना टन टन टन तारा, चलती है क्या 9 से 12
फिल्म : जुड़वा (1997)
कलाकार : सलमान खान, करिश्मा कपूर, रंभा
गीतकार : देव कोहली
संगीतकार : अनु मलिक

20. तुम दिल की धड़कन में रहती हो
फिल्म : धड़कन (2000)
कलाकार : अक्षय कुमार, शिल्पा शेट्टी, सुनील शेट्टी
गीतकार : समीर
संगीतकार : नदीम-श्रवण

21. जब भी कोई लड़की देखूं, ओले ओले
फिल्म : ये दिल्लगी (1994)
कलाकार : अक्षय कुमार, सैफ अली खान, काजोल
गीतकार : समीर
संगीतकार : दिलीप सेन-समीर सेन

~~ पत्रकार रामकृष्ण डोंगरे ~~
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Sunday, October 18, 2026

Bastar Tour : बस्तर को एक बार देखकर मन भर जाए, ऐसा बस्तर है ही नहीं!

यूं तो पत्रकारों को काम के सिलसिले में नई-नई जगहों पर घूमने का मौका मिल ही जाता है, लेकिन जब बात परिवार की आती है तो अक्सर पत्रकारों को इस मामले में थोड़ी कंजूसी करनी पड़ती है। कभी आफिस में काम का दबाव, कभी चुनाव की कवरेज, कभी कोई बड़ा आयोजन तो कभी अचानक कोई ऐसी खबर आ जाती है कि परिवार के साथ घूमने का प्लान फिर अगले महीने, अगले साल पर टल जाता है।
मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।

छत्तीसगढ़ आए हुए मुझे 13 साल हो चुके हैं। बस्तर की खूबसूरती के बारे में सुनता रहा, लेकिन परिवार को लेकर घूमने जाने का संयोग ही नहीं बन पा रहा था। नईदुनिया परिवार से जुड़ने के बाद विधानसभा और लोकसभा चुनाव की कवरेज के सिलसिले में मुझे बस्तर जाने का मौका जरूर मिला, लेकिन हर बार अकेला ही गया। अब पत्नी और परिवार के ताने सुनने की बारी मेरी थी। उनका सवाल भी जायज था कि भई, बस्तर इतना घूम आए, लेकिन हमें कब लेकर जाओगे?

बस, इसी सवाल का जवाब देने में कई साल लग गए।

आखिरकार वह तारीख आ ही गई, जब हमने परिवार के साथ बस्तर घूमने का प्लान जमीन पर उतार दिया। तारीख थी 7 अक्टूबर 2026। रात 11:45 बजे हमारी बस रायपुर से रवाना होनी थी। हम दो परिवार थे और कुल आठ लोग। सबके मन में उत्साह था। बच्चों को घूमने की खुशी थी और हम बड़ों को इस बात का सुकून कि चलो, इस बार खबरों के पीछे नहीं, परिवार के साथ बस्तर देखने जा रहे हैं।

लेकिन भैया, यात्रा की शुरुआत में ही केशकाल घाटी ने हमारा स्वागत अपने अंदाज में किया। रात का सफर था, ऊपर से घाटी में जाम लग गया। सुबह 5:50 बजे जगदलपुर पहुंचने की उम्मीद थी, लेकिन जाम ने करीब साढ़े तीन घंटे का अतिरिक्त समय ले लिया। अब आप समझ सकते हैं कि जिस यात्रा की शुरुआत ही जाम से हो, वहां कार्यक्रम में थोड़ा-बहुत बदलाव तो होना ही था।

खैर, सुबह जगदलपुर पहुंचे और बिना समय गंवाए निकल पड़े बस्तर की खूबसूरती देखने।

बस्तर प्रवास : पहला दिन 
सबसे पहले पहुंचे तीरथगढ़ जलप्रपात। अब बस्तर आएं और तीरथगढ़ न देखें, तो समझिए यात्रा की शुरुआत में ही कुछ छूट गया। कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान के क्षेत्र में स्थित यह जलप्रपात अपनी सीढ़ीनुमा चट्टानों से नीचे गिरते पानी के कारण अलग पहचान रखता है। बारिश के बाद यहां पानी का प्रवाह और आसपास की हरियाली मन मोह लेती है। परिवार के साथ ऐसी जगह पहुंचने का अपना ही आनंद है। बच्चे आसपास के नजारे देखकर खुश और हम लोग तस्वीरें खींचने में व्यस्त। पत्रकारिता में तस्वीरें खबर के लिए लेते हैं, लेकिन इस बार तस्वीरें अपनी यादों के लिए ले रहे थे।

यहां से निकले और गीदम होते हुए बारसूर पहुंचे।
बारसूर को यूं ही मंदिरों का नगर नहीं कहा जाता। कभी यह क्षेत्र प्राचीन नागवंशी शासन और मंदिर स्थापत्य के लिए प्रसिद्ध रहा है। यहां के पुराने मंदिर बस्तर के समृद्ध इतिहास की कहानी कहते हैं। हम पहुंचे मामा-भांजा मंदिर और जुड़वां गणेश मंदिर के दर्शन किए। बारसूर का गणेश मंदिर अपने विशाल गणेश प्रतिमा के लिए प्रसिद्ध है। यहां आकर लगता है कि बस्तर की पहचान सिर्फ जंगल, झरने और आदिवासी संस्कृति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी ऐतिहासिक विरासत भी उतनी ही समृद्ध है।

बारसूर से लौटते हुए हमारा अगला पड़ाव था दंतेवाड़ा।

और भला दंतेवाड़ा जाएं तो मां दंतेश्वरी के दरबार में हाजिरी लगाए बिना कैसे लौट सकते हैं?
मां दंतेश्वरी बस्तर की आराध्य देवी हैं। उनका मंदिर धार्मिक आस्था के साथ-साथ बस्तर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपरा का भी महत्वपूर्ण केंद्र है। मंदिर से जुड़ी मान्यता है कि माता सती का दांत यहां गिरा था, इसलिए इस स्थान का नाम दंतेवाड़ा पड़ा। मां के दरबार में पहुंचकर हमने दर्शन किए और अपनी एक मनोकामना पूरी करने की विनती की।

अब मनोकामना क्या मांगी, यह तो मां और मेरे बीच की बात है। हां, इतना जरूर है कि जब आप परिवार के साथ किसी धार्मिक स्थल पर पहुंचते हैं तो मन में कई भाव एक साथ उमड़ते हैं। अपने लिए, परिवार के लिए और अपनों की खुशहाली के लिए बहुत कुछ मांगने का मन करता है।

दर्शन के बाद वापस जगदलपुर लौटे। दिन भर घूमने के बाद शरीर थक चुका था, इसलिए रात को आराम किया। अगले दिन फिर एक नया पड़ाव हमारा इंतजार कर रहा था।


बस्तर प्रवास : दूसरा दिन 

सुबह-सुबह निकल पड़े चित्रकूट जलप्रपात देखने।
चित्रकूट को छत्तीसगढ़ का नियाग्रा भी कहा जाता है। इंद्रावती नदी पर स्थित यह जलप्रपात अपनी चौड़ाई और घोड़े की नाल जैसी बनावट के लिए प्रसिद्ध है। बारिश के मौसम में जब नदी पूरे वेग से बहती है तो इसका दृश्य देखने लायक होता है। दूर से गिरते पानी की आवाज, हवा में उड़ती पानी की फुहारें और सामने फैला विशाल जलप्रपात... कुछ देर तक आप बस उसे देखते रह जाते हैं।
सच कहूं तो तस्वीरों में चित्रकूट जितना सुंदर दिखाई देता है, सामने पहुंचकर उसका अनुभव उससे कहीं ज्यादा बड़ा होता है। यही तो यात्रा की खूबी है। मोबाइल में तस्वीर देखकर किसी जगह को जानना अलग बात है और वहां खड़े होकर उसकी खूबसूरती महसूस करना बिल्कुल अलग।

चित्रकूट से लौटते समय रास्ते में विष्णु मंदिर के दर्शन किए। बस्तर की ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल यह मंदिर प्राचीन स्थापत्य का उदाहरण है। स्थानीय लोगों के बीच इसकी पहचान है और इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए यह एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। बस्तर जिले में चित्रकोट जलप्रपात के पास स्थित नारायणपाल का प्राचीन विष्णु मंदिर क्षेत्र की ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लगभग 11वीं शताब्दी में निर्मित इस मंदिर का संबंध छिंदक नागवंशी राजवंश से माना जाता है। 

इसके बाद हम जगदलपुर शहर लौट आए।

जगदलपुर को सिर्फ बस्तर घूमने का प्रवेश द्वार समझना ठीक नहीं होगा। यह अपने आप में इतिहास, संस्कृति और स्थानीय जीवन का जीवंत केंद्र है। शहर में घूमते हुए हमने एयरपोर्ट का क्षेत्र देखा, रेलवे के अमृत भारत स्टेशन के विकास कार्यों पर नजर डाली और दूसरे प्रमुख स्थानों को भी देखा।

लौटते समय दलपत सागर देखने पहुंचे।

दलपत सागर जगदलपुर की पहचान से जुड़ा ऐतिहासिक तालाब है। स्थानीय लोगों के लिए यह केवल जलाशय नहीं, बल्कि शहर की सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा भी है। हालांकि, वहां जलकुंभी का फैलाव देखकर मन में एक बात आई। इतनी बड़ी जलराशि, आसपास का प्राकृतिक वातावरण और शहर के बीच इसकी मौजूदगी... यदि नियमित सफाई, संरक्षण और योजनाबद्ध विकास पर ध्यान दिया जाए तो यहां पर्यटन की गतिविधियों को और बढ़ाया जा सकता है।

जरा सोचिए, साफ-सुथरा तालाब, सुंदर किनारे और व्यवस्थित पर्यटन सुविधाएं हों तो स्थानीय लोगों के साथ बाहर से आने वाले पर्यटकों के लिए भी यह शानदार जगह बन सकती है।

दोपहर में कुछ घंटे आराम करने के बाद हम फिर निकल पड़े बस्तर की ऐतिहासिक विरासत देखने।

इस बार हमारा पड़ाव था बस्तर का राजमहल और दशहरा से जुड़ी परंपराओं के महत्वपूर्ण स्थल।

75 दिन चलने वाला बस्तर दशहरा देश के दूसरे दशहरा आयोजनों से काफी अलग है। यहां इसका मुख्य संबंध भगवान राम की रावण पर विजय की परंपरा से नहीं, बल्कि मां दंतेश्वरी की आराधना और स्थानीय जनजातीय परंपराओं से है। यह पर्व लंबे समय तक चलने वाली रस्मों, विभिन्न समुदायों की भागीदारी और राजपरंपरा से जुड़े आयोजनों के लिए प्रसिद्ध है।
हमने काछन गादी भी देखी, जो बस्तर दशहरा की महत्वपूर्ण परंपराओं से जुड़ा स्थल है। यहां काछन देवी की आराधना और उनसे अनुमति लेने की परंपरा का विशेष महत्व है। बस्तर दशहरा को समझना हो तो इन रस्मों को जानना जरूरी है, क्योंकि इनके भीतर यहां की आस्था, इतिहास और सामुदायिक जीवन की झलक मिलती है। काछन गादी की रस्म जगदलपुर शहर में भंगाराम चौक के पास कांचनगुड़ी (पथरागुड़ा) में निभाई जाती है। इस परंपरा के तहत पनका समाज की एक छोटी कुंवारी कन्या (बालिका) पर मां काछनदेवी की सवारी आती है। देवी का रूप धारण करने वाली कन्या को बेल के नुकीले कांटों से तैयार किए गए एक झूले पर लिटाया या बैठाया जाता है।

बस्तर प्रवास : तीसरा दिन 

तीन दिन की यात्रा का आखिरी दिन भी कम दिलचस्प नहीं था।

अब लौटना था रायपुर, लेकिन रास्ते में केशकाल को देखने का मन था। सोचा, जब आए ही हैं तो इस इलाके को भी थोड़ा समय दिया जाए।
सुबह लगभग 8:00 बजे बस से हम रवाना हुए और दोपहर 11:00 बजे तक पहुंच गए केशकाल शहर। और सबसे पहले पहुंचे गढ़ धनोरा गांव के पास स्थित गढ़ गोबरहीन। 
प्राकृतिक वातावरण के बीच स्थित यह स्थान अपनी स्थानीय धार्मिक और ऐतिहासिक पहचान के लिए जाना जाता है। यहां शिव मंदिर, शिवलिंग और आसपास की प्राचीन धरोहरों के दर्शन किए। चारों ओर हरियाली और शांत वातावरण था। शहर की भागदौड़ से दूर ऐसी जगह पर कुछ देर बैठना भी अपने आप में सुकून देता है।


यहां से आगे बढ़े तो हमारा अगला पड़ाव था टाटामारी।
अब टाटामारी को लेकर जितना सुना था, उसे देखने की उत्सुकता भी उतनी ही थी। केशकाल के पास स्थित यह पहाड़ी पर्यटन स्थल अपनी हरियाली, प्राकृतिक वातावरण और घाटियों के दृश्यों के लिए जाना जाता है। यहां पहुंचकर लगा कि छत्तीसगढ़ में पर्यटन की संभावनाएं कितनी व्यापक हैं। लोग अक्सर घूमने के लिए दूसरे राज्यों के हिल स्टेशन तलाशते हैं, जबकि हमारे अपने प्रदेश में भी ऐसे कई स्थान हैं, जिन्हें सही तरीके से विकसित किया जाए तो वे पर्यटकों को आकर्षित कर सकते हैं।
टाटामारी में अभी पर्यटन सुविधाओं को विकसित करने का काम चल रहा है। यहां महिला स्व सहायता समूह के द्वारा संचालित भोजनालय में छत्तीसगढ़ी व्यंजनों का स्वाद लेने का मौका मिलता है। इसके अलावा ग्लास हाउस कैफे, बच्चों के लिए बाल उद्यान और ठहरने के लिए बने कॉटेज जैसी सुविधाएं भी हैं। यानी यह जगह धीरे-धीरे परिवार के साथ घूमने और कुछ समय बिताने के लिए तैयार हो रही है।

हम पहुंचे तो वहां छत्तीसगढ़ी फिल्म की शूटिंग भी चल रही थी। इसे देखकर लगा कि आने वाले समय में टाटामारी फिल्मों की शूटिंग और पर्यटन, दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण स्थान बन सकता है। 

हां, अभी यहां और सुविधाएं विकसित करने की गुंजाइश है। बेहतर सड़क संकेतक, पर्यटकों के लिए व्यवस्थित सुविधाएं, साफ-सफाई और स्थानीय व्यंजनों को बढ़ावा दिया जाए तो यह जगह और निखर सकती है। प्रकृति ने तो यहां अपना खजाना पहले से खोल रखा है, अब जरूरत है उसे सहेजने और बेहतर ढंग से पर्यटकों के सामने लाने की।

कुल मिलाकर तीन दिन की यह बस्तर यात्रा हमारे लिए बेहद खास रही।

एक तरफ तीरथगढ़ और चित्रकूट जैसे जलप्रपातों की खूबसूरती, दूसरी तरफ बारसूर के प्राचीन मंदिर, मां दंतेश्वरी का दरबार, जगदलपुर की सांस्कृतिक विरासत, दलपत सागर और बस्तर दशहरा की परंपराएं। फिर केशकाल और टाटामारी का प्राकृतिक सौंदर्य।

तीन दिन में हमने बस्तर के कई प्रमुख पर्यटन स्थलों को देखने की कोशिश की। यह पूरी तरह संभव नहीं कि इतने बड़े और विविधतापूर्ण क्षेत्र को तीन दिन में जान लिया जाए, लेकिन शुरुआत जरूर हो गई।

और सबसे अच्छी बात यह रही कि इस बार बस्तर की खबरें करने नहीं, परिवार के साथ बस्तर को जीने पहुंचे थे। बस्तर के हमारे इस प्रवास को यादगार, सुखद और सहज बनाने में जगदलपुर के वरिष्ठ पत्रकार श्री विनोद सिंह जी, पत्रकार श्री अनूप श्रीवास्तव जी, केशकाल के पत्रकार श्री चिराग उपाध्याय जी और हमारे सारथी श्री गुप्ता जी का विशेष सहयोग रहा। आप सभी ने जिस आत्मीयता, स्नेह और अपनत्व के साथ हमारा साथ दिया, उसके लिए हृदय से आभारी हूं। आपके सहयोग से बस्तर को करीब से जानने, यहां की प्राकृतिक सुंदरता, संस्कृति और लोगों की आत्मीयता को महसूस करने का अवसर मिला। सच है, यात्राएं स्थानों से पहचानी जाती हैं, लेकिन उन्हें यादगार बनाते हैं वहां मिलने वाले लोग और उनसे जुड़े रिश्ते।
पत्रकारिता में घूमते हुए कई जगहों की खबरें बनती हैं, लेकिन परिवार के साथ उन्हीं जगहों पर बिताए पल जीवन की अपनी खबर बन जाते हैं। ऐसी खबर, जिसे किसी पेज पर लगाने की जरूरत नहीं होती, बस दिल में संभालकर रखना होता है।

अब पत्नी और परिवार के ताने भी कुछ समय के लिए बंद होने चाहिए। आखिर बस्तर दिखा तो दिया!

हां, एक बात जरूर है। तीन दिन में इतना कुछ देखने के बाद भी लगता है कि बस्तर में अभी बहुत कुछ बाकी है। अबकी बार कुछ और जगहों के लिए समय निकालना पड़ेगा।

क्योंकि बस्तर को एक बार देखकर मन भर जाए, ऐसा बस्तर है ही नहीं!

~~वरिष्ठ पत्रकार रामकृष्ण डोंगरे ~~

Friday, October 16, 2026

Bastar Diaries : 'नार' में छिपी आदिवासी गांवों की कहानी,

आदिवासी क्षेत्रों में गांवों के नाम बताते हैं जंगल, नदी और जनजातीय जीवन की कहानी
किसी गांव का नाम नगरनार क्यों पड़ा? बास्तानार और कोड़ेनार के नामों में बार-बार आने वाला 'नार' आखिर क्या कहता है? क्या इन नामों के पीछे कोई कहानी है, किसी पुरानी बसाहट की स्मृति है या फिर सदियों से चली आ रही भाषा और संस्कृति की कोई निशानी?

ऐसे सवालों के जवाब तलाशने की जिज्ञासा मुझे बस्तर के गांवों के नामों तक ले गई।

मेरा जन्म मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के तंसरामाल गांव में हुआ। पिछले 13 वर्षों से छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में रह रहा हूं। यहां टिकरापारा, बढ़ईपारा, तात्यापारा, बूढ़ापारा, आमापारा, नयापारा, बैजनाथपारा और मौदहापारा जैसे नामों से गुजरते हुए अक्सर मन में सवाल उठता था कि आखिर इन गांवों और मोहल्लों के नाम कैसे पड़े होंगे? इनके पीछे कोई व्यक्ति, भौगोलिक विशेषता या इतिहास जरूर रहा होगा।
यह जिज्ञासा मन में बनी रही।

फिर बस्तर में आठ से 10 अक्टूबर 2026 तक, तीन दिवसीय प्रवास का अवसर मिला। जगदलपुर से दंतेवाड़ा और चित्रकोट जाते समय बास्तानार, कोड़ेनार जैसे गांवों से गुजरना हुआ। हर बार नामों में उभरता 'नार' शब्द ध्यान खींचता रहा। लगा कि इन नामों के पीछे कोई दिलचस्प कहानी जरूर छिपी होगी। बस, यहीं से शुरू हुई बस्तर के गांवों के नामों की कहानी जानने की कोशिश।

बस्तर के गांवों के नामों पर नजर डालें तो 'नार' से जुड़े कई नाम मिलते हैं। नगरनार, नेतानार, मड़ानार, चोलनार, पालनार, पीरनार, कोड़ेनार, कावनार, कपानार, तोयनार और उलनार ऐसे ही कुछ नाम हैं। बड़े अलनार, छोटे अलनार, बड़े बोदेनार और छोटे बोदेनार जैसे नाम भी इस क्षेत्र की बसाहटों की विविधता सामने लाते हैं।

स्थानीय गोंडी और हल्बी भाषाओं में 'नार' शब्द का अर्थ गांव या बस्ती होता है। हालांकि, इस शब्द की भाषाई उत्पत्ति और प्रत्येक गांव के नाम का वास्तविक अर्थ समझने के लिए गोंडी और हल्बी भाषा के जानकारों, स्थानीय बुजुर्गों और ऐतिहासिक दस्तावेजों की मदद लेना जरूरी है। केवल नाम के आधार पर किसी गांव के इतिहास का अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

बस्तर की खासियत यही है कि यहां के गांवों के नाम केवल भौगोलिक पहचान नहीं हैं। वे स्थानीय भाषाओं, जनजातीय परंपराओं, प्राकृतिक परिवेश और पीढ़ियों से चली आ रही स्मृतियों को भी अपने भीतर समेटे हो सकते हैं। किसी नाम के पीछे जंगल, नदी, पहाड़ी, पेड़-पौधे, खेती या किसी पुरानी बसाहट का संदर्भ हो सकता है। ऐसे नामों को समझना दरअसल उस क्षेत्र के समाज और संस्कृति को समझने की एक कोशिश है।

छिंदवाड़ा के अपने गांव तंसरामाल से रायपुर के मोहल्लों और फिर बस्तर के गांवों तक फैली यह जिज्ञासा अब एक बड़े सवाल में बदल गई है।

क्या हम अपने आसपास के स्थानों के नामों के पीछे छिपी कहानियों को जानते हैं? शायद इन नामों को समझने की शुरुआत स्थानीय बुजुर्गों से बातचीत और लोकस्मृतियों को दर्ज करने से हो सकती है।

आखिर गांव का नाम केवल नक्शे पर दर्ज एक पहचान नहीं, बल्कि उस जगह के अतीत तक पहुंचने का एक रास्ता भी हो सकता है।

~~वरिष्ठ पत्रकार रामकृष्ण डोंगरे ~~

#bastartour #बस्तरडायरी #डोंगरे_की_डायरी #dongrejionline #villagelife

Saturday, February 7, 2026

मेरी पहली दक्षिण भारत की यात्रा : तीन राज्य और पांच शहर

29 जनवरी से 4 फरवरी 2026 तक आयोजित सात दिवसीय एक्सपोजर विजिट की यादें 
छत्तीसगढ़ जनसंपर्क विभाग की ओर से 29 जनवरी से 4 फरवरी 2026 तक आयोजित सात दिवसीय एक्सपोजर विजिट के दौरान हमें तमिलनाडु में कोयंबटूर के ईशा फाउंडेशन, ऊटी के प्रमुख टूरिस्ट प्लेस जैसे– चाय फैक्ट्री संग्रहालय, बोटैनिकल गार्डन, पाइन फॉरेस्ट, शूटिंग स्थल, पायकारा जलप्रपात, कर्नाटक में मैसूर पैलेस, श्री चामुंडेश्वरी मंदिर, बेंगलुरु में कर्नाटक विधानसभा और आंध्रप्रदेश में तिरुपति बालाजी मंदिर आदि स्थानों पर जाने का अवसर मिला। 
दक्षिण भारत की यह यात्रा सिर्फ शहरों के बीच की दूरी नहीं थी, बल्कि संस्कृति, प्रकृति और आस्था के संगम की एक जीवंत कहानी बन गई। कोयंबटूर से तिरुपति बालाजी तक का यह सफर हर मोड़ पर नया अनुभव देता है—कहीं हरियाली, कहीं इतिहास, तो कहीं श्रद्धा की गहराई।
कोयंबटूर से यात्रा की शुरुआत हुई। तमिलनाडु का यह औद्योगिक शहर अपनी सादगी और सुव्यवस्थित जीवनशैली के लिए जाना जाता है। कोयंबटूर से निकलते ही जैसे-जैसे सड़क नीलगिरि की ओर बढ़ती है, मौसम और मिजाज दोनों बदलने लगते हैं। रास्ते में 40 किमी की दूरी पर स्थित ईशा फाउंडेशन एक ऐसी आध्यात्मिक यात्रा पर ले जाता है, जहां 112 फीट ऊंची आदियोगी शिव की भव्य प्रतिमा स्थापित है। यह स्थान न केवल ध्यान और साधना का केंद्र है, बल्कि शांति, आत्मबोध और आध्यात्मिक ऊर्जा का अनूठा अनुभव भी कराता है।
कुछ ही घंटों में ऊटी का ठंडा अहसास यात्रियों को घेर लेता है। घुमावदार पहाड़ी सड़कें, चाय बागानों की हरी चादर और बादलों की ओट में छिपे पहाड़—ऊटी को यूं ही ‘पहाड़ों की रानी’ नहीं कहा जाता। बोटैनिकल गार्डन की सैर हो या ऊटी झील में नौकायन, हर दृश्य कैमरे में कैद करने लायक लगता है। डोड्डाबेट्टा पीक से नीचे फैली वादियों को देखना मानो प्रकृति का विराट कैनवास हो। यहां की शांति मन को ठहराव देती है, जो आगे की यात्रा के लिए ऊर्जा बन जाती है।

ऊटी से मैसूर की राह प्रकृति से इतिहास की ओर ले जाती है। रास्ते में मुदुमलाई राष्ट्रीय उद्यान, बांदीपुर वन्यजीव अभयारण्य में बस में बैठे–बैठे ही हाथी, हिरण, मोर आदि वन्य जीवों के दर्शन हो जाते हैं। मुदुमलाई उद्यान की दूरी ऊटी से लगभग 40 किमी है। कर्नाटक का मैसूर शहर अपनी भव्यता और अनुशासन के लिए प्रसिद्ध है। मैसूर पैलेस की रोशनी में डूबती शाम हो या चामुंडी पहाड़ी से शहर का नजारा—हर पल शाही विरासत की याद दिलाता है। मैसूर सिर्फ देखने का शहर नहीं, बल्कि महसूस करने का अनुभव है। मैसूर पैलेस वास्तुकला की विभिन्न शैलियों का मिश्रण है। इसे देखने के लिए रोजाना हजारों लोगों की भीड़ उमड़ती है। इसे ताजमहल के बाद भारत में सबसे अधिक देखा जाने वाला स्मारक भी माना जाता है। मैसूर से 13 किमी दूर स्थित चामुंडेश्वरी मंदिर हमें दक्षिण भारत के द्रविड़ शैली के मंदिरों से रूबरू कराता है। 

यात्रा का सबसे भावनात्मक पड़ाव है आंध्र प्रदेश जिले में स्थित तिरुपति बालाजी (तिरुमला)। बेंगलुरु शहर से इसकी दूरी लगभग 250 किमी है। तिरुपति शहर से 25 किलोमीटर दूर पहाड़ियों पर बसे इस पवित्र धाम की ओर बढ़ते हुए श्रद्धा अपने आप गहराने लगती है। घुमावदार रास्तों पर चलते वाहन, “गोविंदा… गोविंदा…” के जयकारे और भक्तों की आस्था—सब मिलकर माहौल को आध्यात्मिक बना देते हैं। भगवान वेंकटेश्वर के दर्शन मात्र से यात्रा की सारी थकान जैसे समाप्त हो जाती है। यहां की व्यवस्था, अनुशासन और श्रद्धालुओं की आस्था भारत की सांस्कृतिक शक्ति का परिचय देती है।

हमारी यात्रा का अंतिम पड़ाव बेंगलुरु रहा—आधुनिक भारत की तकनीकी राजधानी। समय की सीमाओं के कारण हम कर्नाटक विधानसभा भवन तक ही सीमित रह सके, किंतु शहर की सड़कों से गुजरते हुए बेंगलुरु की तेज़ रफ्तार और आपाधापी भरी जीवनशैली को नज़दीक से महसूस करने का अवसर मिला। लालबाग बोटैनिकल गार्डन, रॉक गार्डन और क्यूबन पार्क जैसे हरित स्थलों को देखने की इच्छा अधूरी ही रह गई। फिर भी यह स्पष्ट होता है कि ऐतिहासिक विधान सौधा और आधुनिक आईटी हब का संतुलित संगम ही बेंगलुरु की विशिष्ट पहचान है। यहां की जीवंत सड़कें, उभरता कैफे कल्चर और युवाओं से भरी ऊर्जा दक्षिण भारत के बदलते और गतिशील चेहरे की सशक्त कहानी कहती है।


इस पूरे सफर में कोयंबटूर की सादगी, ऊटी की ठंडक, मैसूर की शान, बेंगलुरु की आधुनिकता और तिरुपति की भक्ति—पांचों रंग एक साथ उभरकर सामने आते हैं। यह यात्रा सिर्फ पर्यटन स्थलों की नहीं, बल्कि भारत की विविधता को करीब से जानने की एक यादगार दास्तान बन जाती है। कहा जा सकता है कि दक्षिण भारत की सड़कें सिर्फ मंजिल तक नहीं ले जातीं, बल्कि अनुभवों से भर देती हैं।
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जनसंपर्क अधिकारियों और वरिष्ठ पत्रकारों का मिला सान्निध्य

सात दिवसीय शैक्षणिक टूर में जनसंपर्क विभाग, रायपुर से श्री बालमुकुंद तंबोली, श्री अनिल कुमार वर्मा, श्री भवानी सिंह ठाकुर एवं श्री धनेन्द्र कुमार बंजारे शामिल रहे, वहीं जनसंपर्क विभाग बस्तर से श्री कमल बघेल ने सहभागिता की। मीडिया जगत से दैनिक नवप्रदेश रायपुर के श्री चंद्रशेखर घोटे, दैनिक हरिभूमि रायपुर के श्री गुलाल प्रसाद वर्मा, राष्ट्रीय न्यूज सर्विस दुर्ग के श्री हर्ष शुक्ला, दैनिक नवभारत बस्तर के श्री कमलेश बघेल, दैनिक अग्रदूत रायपुर के श्री कृष्ण कुमार शर्मा तथा दैनिक साथी संदेश दुर्ग के श्री मलय बैनर्जी इस शैक्षणिक यात्रा का हिस्सा रहे।

इसके अतिरिक्त दैनिक जनता से रिश्ता रायपुर से मोहम्मद जाकिर घुरसेना, दैनिक भास्कर रायपुर से श्री नीरज कुमार मिश्रा, नईदुनिया रायपुर से श्री रामकृष्ण डोंगरे, दैनिक विश्व परिवार रायपुर से श्री रत्नेश गुप्ता, दैनिक दावा राजनांदगांव एवं दैनिक बस्तर इम्पैक्ट दंतेवाड़ा से श्री सुरेश महापात्र, दैनिक राजनांदगांव टाइम्स से श्री सूरज बुद्धदेव, राजनांदगांव से श्री उत्तम कुमार पाण्डेय तथा दैनिक छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस से श्री विक्रम तिवारी भी इस भ्रमण में सहभागी रहे।

-रामकृष्ण डोंगरे, वरिष्ठ पत्रकार 
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