Friday, October 16, 2026

Bastar Diaries : 'नार' में छिपी आदिवासी गांवों की कहानी,

आदिवासी क्षेत्रों में गांवों के नाम बताते हैं जंगल, नदी और जनजातीय जीवन की कहानी
किसी गांव का नाम नगरनार क्यों पड़ा? बास्तानार और कोड़ेनार के नामों में बार-बार आने वाला 'नार' आखिर क्या कहता है? क्या इन नामों के पीछे कोई कहानी है, किसी पुरानी बसाहट की स्मृति है या फिर सदियों से चली आ रही भाषा और संस्कृति की कोई निशानी?

ऐसे सवालों के जवाब तलाशने की जिज्ञासा मुझे बस्तर के गांवों के नामों तक ले गई।

मेरा जन्म मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के तंसरामाल गांव में हुआ। पिछले 13 वर्षों से छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में रह रहा हूं। यहां टिकरापारा, बढ़ईपारा, तात्यापारा, बूढ़ापारा, आमापारा, नयापारा, बैजनाथपारा और मौदहापारा जैसे नामों से गुजरते हुए अक्सर मन में सवाल उठता था कि आखिर इन गांवों और मोहल्लों के नाम कैसे पड़े होंगे? इनके पीछे कोई व्यक्ति, भौगोलिक विशेषता या इतिहास जरूर रहा होगा।
यह जिज्ञासा मन में बनी रही।

फिर बस्तर में आठ से 10 अक्टूबर 2026 तक, तीन दिवसीय प्रवास का अवसर मिला। जगदलपुर से दंतेवाड़ा और चित्रकोट जाते समय बास्तानार, कोड़ेनार जैसे गांवों से गुजरना हुआ। हर बार नामों में उभरता 'नार' शब्द ध्यान खींचता रहा। लगा कि इन नामों के पीछे कोई दिलचस्प कहानी जरूर छिपी होगी। बस, यहीं से शुरू हुई बस्तर के गांवों के नामों की कहानी जानने की कोशिश।

बस्तर के गांवों के नामों पर नजर डालें तो 'नार' से जुड़े कई नाम मिलते हैं। नगरनार, नेतानार, मड़ानार, चोलनार, पालनार, पीरनार, कोड़ेनार, कावनार, कपानार, तोयनार और उलनार ऐसे ही कुछ नाम हैं। बड़े अलनार, छोटे अलनार, बड़े बोदेनार और छोटे बोदेनार जैसे नाम भी इस क्षेत्र की बसाहटों की विविधता सामने लाते हैं।

स्थानीय गोंडी और हल्बी भाषाओं में 'नार' शब्द का अर्थ गांव या बस्ती होता है। हालांकि, इस शब्द की भाषाई उत्पत्ति और प्रत्येक गांव के नाम का वास्तविक अर्थ समझने के लिए गोंडी और हल्बी भाषा के जानकारों, स्थानीय बुजुर्गों और ऐतिहासिक दस्तावेजों की मदद लेना जरूरी है। केवल नाम के आधार पर किसी गांव के इतिहास का अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

बस्तर की खासियत यही है कि यहां के गांवों के नाम केवल भौगोलिक पहचान नहीं हैं। वे स्थानीय भाषाओं, जनजातीय परंपराओं, प्राकृतिक परिवेश और पीढ़ियों से चली आ रही स्मृतियों को भी अपने भीतर समेटे हो सकते हैं। किसी नाम के पीछे जंगल, नदी, पहाड़ी, पेड़-पौधे, खेती या किसी पुरानी बसाहट का संदर्भ हो सकता है। ऐसे नामों को समझना दरअसल उस क्षेत्र के समाज और संस्कृति को समझने की एक कोशिश है।

छिंदवाड़ा के अपने गांव तंसरामाल से रायपुर के मोहल्लों और फिर बस्तर के गांवों तक फैली यह जिज्ञासा अब एक बड़े सवाल में बदल गई है।

क्या हम अपने आसपास के स्थानों के नामों के पीछे छिपी कहानियों को जानते हैं? शायद इन नामों को समझने की शुरुआत स्थानीय बुजुर्गों से बातचीत और लोकस्मृतियों को दर्ज करने से हो सकती है।

आखिर गांव का नाम केवल नक्शे पर दर्ज एक पहचान नहीं, बल्कि उस जगह के अतीत तक पहुंचने का एक रास्ता भी हो सकता है।

~~वरिष्ठ पत्रकार रामकृष्ण डोंगरे ~~

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