यूं तो पत्रकारों को काम के सिलसिले में नई-नई जगहों पर घूमने का मौका मिल ही जाता है, लेकिन जब बात परिवार की आती है तो अक्सर पत्रकारों को इस मामले में थोड़ी कंजूसी करनी पड़ती है। कभी आफिस में काम का दबाव, कभी चुनाव की कवरेज, कभी कोई बड़ा आयोजन तो कभी अचानक कोई ऐसी खबर आ जाती है कि परिवार के साथ घूमने का प्लान फिर अगले महीने, अगले साल पर टल जाता है।
मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।
छत्तीसगढ़ आए हुए मुझे 13 साल हो चुके हैं। बस्तर की खूबसूरती के बारे में सुनता रहा, लेकिन परिवार को लेकर घूमने जाने का संयोग ही नहीं बन पा रहा था। नईदुनिया परिवार से जुड़ने के बाद विधानसभा और लोकसभा चुनाव की कवरेज के सिलसिले में मुझे बस्तर जाने का मौका जरूर मिला, लेकिन हर बार अकेला ही गया। अब पत्नी और परिवार के ताने सुनने की बारी मेरी थी। उनका सवाल भी जायज था कि भई, बस्तर इतना घूम आए, लेकिन हमें कब लेकर जाओगे?
बस, इसी सवाल का जवाब देने में कई साल लग गए।
आखिरकार वह तारीख आ ही गई, जब हमने परिवार के साथ बस्तर घूमने का प्लान जमीन पर उतार दिया। तारीख थी 7 अक्टूबर 2026। रात 11:45 बजे हमारी बस रायपुर से रवाना होनी थी। हम दो परिवार थे और कुल आठ लोग। सबके मन में उत्साह था। बच्चों को घूमने की खुशी थी और हम बड़ों को इस बात का सुकून कि चलो, इस बार खबरों के पीछे नहीं, परिवार के साथ बस्तर देखने जा रहे हैं।
लेकिन भैया, यात्रा की शुरुआत में ही केशकाल घाटी ने हमारा स्वागत अपने अंदाज में किया। रात का सफर था, ऊपर से घाटी में जाम लग गया। सुबह 5:50 बजे जगदलपुर पहुंचने की उम्मीद थी, लेकिन जाम ने करीब साढ़े तीन घंटे का अतिरिक्त समय ले लिया। अब आप समझ सकते हैं कि जिस यात्रा की शुरुआत ही जाम से हो, वहां कार्यक्रम में थोड़ा-बहुत बदलाव तो होना ही था।
खैर, सुबह जगदलपुर पहुंचे और बिना समय गंवाए निकल पड़े बस्तर की खूबसूरती देखने।
बस्तर प्रवास : पहला दिन
सबसे पहले पहुंचे तीरथगढ़ जलप्रपात। अब बस्तर आएं और तीरथगढ़ न देखें, तो समझिए यात्रा की शुरुआत में ही कुछ छूट गया। कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान के क्षेत्र में स्थित यह जलप्रपात अपनी सीढ़ीनुमा चट्टानों से नीचे गिरते पानी के कारण अलग पहचान रखता है। बारिश के बाद यहां पानी का प्रवाह और आसपास की हरियाली मन मोह लेती है। परिवार के साथ ऐसी जगह पहुंचने का अपना ही आनंद है। बच्चे आसपास के नजारे देखकर खुश और हम लोग तस्वीरें खींचने में व्यस्त। पत्रकारिता में तस्वीरें खबर के लिए लेते हैं, लेकिन इस बार तस्वीरें अपनी यादों के लिए ले रहे थे।
यहां से निकले और गीदम होते हुए बारसूर पहुंचे।
बारसूर को यूं ही मंदिरों का नगर नहीं कहा जाता। कभी यह क्षेत्र प्राचीन नागवंशी शासन और मंदिर स्थापत्य के लिए प्रसिद्ध रहा है। यहां के पुराने मंदिर बस्तर के समृद्ध इतिहास की कहानी कहते हैं। हम पहुंचे मामा-भांजा मंदिर और जुड़वां गणेश मंदिर के दर्शन किए। बारसूर का गणेश मंदिर अपने विशाल गणेश प्रतिमा के लिए प्रसिद्ध है। यहां आकर लगता है कि बस्तर की पहचान सिर्फ जंगल, झरने और आदिवासी संस्कृति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी ऐतिहासिक विरासत भी उतनी ही समृद्ध है।
बारसूर से लौटते हुए हमारा अगला पड़ाव था दंतेवाड़ा।
और भला दंतेवाड़ा जाएं तो मां दंतेश्वरी के दरबार में हाजिरी लगाए बिना कैसे लौट सकते हैं?
मां दंतेश्वरी बस्तर की आराध्य देवी हैं। उनका मंदिर धार्मिक आस्था के साथ-साथ बस्तर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपरा का भी महत्वपूर्ण केंद्र है। मंदिर से जुड़ी मान्यता है कि माता सती का दांत यहां गिरा था, इसलिए इस स्थान का नाम दंतेवाड़ा पड़ा। मां के दरबार में पहुंचकर हमने दर्शन किए और अपनी एक मनोकामना पूरी करने की विनती की।
अब मनोकामना क्या मांगी, यह तो मां और मेरे बीच की बात है। हां, इतना जरूर है कि जब आप परिवार के साथ किसी धार्मिक स्थल पर पहुंचते हैं तो मन में कई भाव एक साथ उमड़ते हैं। अपने लिए, परिवार के लिए और अपनों की खुशहाली के लिए बहुत कुछ मांगने का मन करता है।
दर्शन के बाद वापस जगदलपुर लौटे। दिन भर घूमने के बाद शरीर थक चुका था, इसलिए रात को आराम किया। अगले दिन फिर एक नया पड़ाव हमारा इंतजार कर रहा था।
बस्तर प्रवास : दूसरा दिन
सुबह-सुबह निकल पड़े चित्रकूट जलप्रपात देखने।
चित्रकूट को छत्तीसगढ़ का नियाग्रा भी कहा जाता है। इंद्रावती नदी पर स्थित यह जलप्रपात अपनी चौड़ाई और घोड़े की नाल जैसी बनावट के लिए प्रसिद्ध है। बारिश के मौसम में जब नदी पूरे वेग से बहती है तो इसका दृश्य देखने लायक होता है। दूर से गिरते पानी की आवाज, हवा में उड़ती पानी की फुहारें और सामने फैला विशाल जलप्रपात... कुछ देर तक आप बस उसे देखते रह जाते हैं।
सच कहूं तो तस्वीरों में चित्रकूट जितना सुंदर दिखाई देता है, सामने पहुंचकर उसका अनुभव उससे कहीं ज्यादा बड़ा होता है। यही तो यात्रा की खूबी है। मोबाइल में तस्वीर देखकर किसी जगह को जानना अलग बात है और वहां खड़े होकर उसकी खूबसूरती महसूस करना बिल्कुल अलग।
चित्रकूट से लौटते समय रास्ते में विष्णु मंदिर के दर्शन किए। बस्तर की ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल यह मंदिर प्राचीन स्थापत्य का उदाहरण है। स्थानीय लोगों के बीच इसकी पहचान है और इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए यह एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। बस्तर जिले में चित्रकोट जलप्रपात के पास स्थित नारायणपाल का प्राचीन विष्णु मंदिर क्षेत्र की ऐतिहासिक और धार्मिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लगभग 11वीं शताब्दी में निर्मित इस मंदिर का संबंध छिंदक नागवंशी राजवंश से माना जाता है।
इसके बाद हम जगदलपुर शहर लौट आए।
जगदलपुर को सिर्फ बस्तर घूमने का प्रवेश द्वार समझना ठीक नहीं होगा। यह अपने आप में इतिहास, संस्कृति और स्थानीय जीवन का जीवंत केंद्र है। शहर में घूमते हुए हमने एयरपोर्ट का क्षेत्र देखा, रेलवे के अमृत भारत स्टेशन के विकास कार्यों पर नजर डाली और दूसरे प्रमुख स्थानों को भी देखा।
लौटते समय दलपत सागर देखने पहुंचे।
दलपत सागर जगदलपुर की पहचान से जुड़ा ऐतिहासिक तालाब है। स्थानीय लोगों के लिए यह केवल जलाशय नहीं, बल्कि शहर की सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा भी है। हालांकि, वहां जलकुंभी का फैलाव देखकर मन में एक बात आई। इतनी बड़ी जलराशि, आसपास का प्राकृतिक वातावरण और शहर के बीच इसकी मौजूदगी... यदि नियमित सफाई, संरक्षण और योजनाबद्ध विकास पर ध्यान दिया जाए तो यहां पर्यटन की गतिविधियों को और बढ़ाया जा सकता है।
जरा सोचिए, साफ-सुथरा तालाब, सुंदर किनारे और व्यवस्थित पर्यटन सुविधाएं हों तो स्थानीय लोगों के साथ बाहर से आने वाले पर्यटकों के लिए भी यह शानदार जगह बन सकती है।
दोपहर में कुछ घंटे आराम करने के बाद हम फिर निकल पड़े बस्तर की ऐतिहासिक विरासत देखने।
इस बार हमारा पड़ाव था बस्तर का राजमहल और दशहरा से जुड़ी परंपराओं के महत्वपूर्ण स्थल।
75 दिन चलने वाला बस्तर दशहरा देश के दूसरे दशहरा आयोजनों से काफी अलग है। यहां इसका मुख्य संबंध भगवान राम की रावण पर विजय की परंपरा से नहीं, बल्कि मां दंतेश्वरी की आराधना और स्थानीय जनजातीय परंपराओं से है। यह पर्व लंबे समय तक चलने वाली रस्मों, विभिन्न समुदायों की भागीदारी और राजपरंपरा से जुड़े आयोजनों के लिए प्रसिद्ध है।
हमने काछन गादी भी देखी, जो बस्तर दशहरा की महत्वपूर्ण परंपराओं से जुड़ा स्थल है। यहां काछन देवी की आराधना और उनसे अनुमति लेने की परंपरा का विशेष महत्व है। बस्तर दशहरा को समझना हो तो इन रस्मों को जानना जरूरी है, क्योंकि इनके भीतर यहां की आस्था, इतिहास और सामुदायिक जीवन की झलक मिलती है। काछन गादी की रस्म जगदलपुर शहर में भंगाराम चौक के पास कांचनगुड़ी (पथरागुड़ा) में निभाई जाती है। इस परंपरा के तहत पनका समाज की एक छोटी कुंवारी कन्या (बालिका) पर मां काछनदेवी की सवारी आती है। देवी का रूप धारण करने वाली कन्या को बेल के नुकीले कांटों से तैयार किए गए एक झूले पर लिटाया या बैठाया जाता है।
बस्तर प्रवास : तीसरा दिन
तीन दिन की यात्रा का आखिरी दिन भी कम दिलचस्प नहीं था।
अब लौटना था रायपुर, लेकिन रास्ते में केशकाल को देखने का मन था। सोचा, जब आए ही हैं तो इस इलाके को भी थोड़ा समय दिया जाए।
सुबह लगभग 8:00 बजे बस से हम रवाना हुए और दोपहर 11:00 बजे तक पहुंच गए केशकाल शहर। और सबसे पहले पहुंचे गढ़ धनोरा गांव के पास स्थित गढ़ गोबरहीन।
प्राकृतिक वातावरण के बीच स्थित यह स्थान अपनी स्थानीय धार्मिक और ऐतिहासिक पहचान के लिए जाना जाता है। यहां शिव मंदिर, शिवलिंग और आसपास की प्राचीन धरोहरों के दर्शन किए। चारों ओर हरियाली और शांत वातावरण था। शहर की भागदौड़ से दूर ऐसी जगह पर कुछ देर बैठना भी अपने आप में सुकून देता है।
यहां से आगे बढ़े तो हमारा अगला पड़ाव था टाटामारी।
अब टाटामारी को लेकर जितना सुना था, उसे देखने की उत्सुकता भी उतनी ही थी। केशकाल के पास स्थित यह पहाड़ी पर्यटन स्थल अपनी हरियाली, प्राकृतिक वातावरण और घाटियों के दृश्यों के लिए जाना जाता है। यहां पहुंचकर लगा कि छत्तीसगढ़ में पर्यटन की संभावनाएं कितनी व्यापक हैं। लोग अक्सर घूमने के लिए दूसरे राज्यों के हिल स्टेशन तलाशते हैं, जबकि हमारे अपने प्रदेश में भी ऐसे कई स्थान हैं, जिन्हें सही तरीके से विकसित किया जाए तो वे पर्यटकों को आकर्षित कर सकते हैं।
टाटामारी में अभी पर्यटन सुविधाओं को विकसित करने का काम चल रहा है। यहां महिला स्व सहायता समूह के द्वारा संचालित भोजनालय में छत्तीसगढ़ी व्यंजनों का स्वाद लेने का मौका मिलता है। इसके अलावा ग्लास हाउस कैफे, बच्चों के लिए बाल उद्यान और ठहरने के लिए बने कॉटेज जैसी सुविधाएं भी हैं। यानी यह जगह धीरे-धीरे परिवार के साथ घूमने और कुछ समय बिताने के लिए तैयार हो रही है।
हम पहुंचे तो वहां छत्तीसगढ़ी फिल्म की शूटिंग भी चल रही थी। इसे देखकर लगा कि आने वाले समय में टाटामारी फिल्मों की शूटिंग और पर्यटन, दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण स्थान बन सकता है।
हां, अभी यहां और सुविधाएं विकसित करने की गुंजाइश है। बेहतर सड़क संकेतक, पर्यटकों के लिए व्यवस्थित सुविधाएं, साफ-सफाई और स्थानीय व्यंजनों को बढ़ावा दिया जाए तो यह जगह और निखर सकती है। प्रकृति ने तो यहां अपना खजाना पहले से खोल रखा है, अब जरूरत है उसे सहेजने और बेहतर ढंग से पर्यटकों के सामने लाने की।
कुल मिलाकर तीन दिन की यह बस्तर यात्रा हमारे लिए बेहद खास रही।
एक तरफ तीरथगढ़ और चित्रकूट जैसे जलप्रपातों की खूबसूरती, दूसरी तरफ बारसूर के प्राचीन मंदिर, मां दंतेश्वरी का दरबार, जगदलपुर की सांस्कृतिक विरासत, दलपत सागर और बस्तर दशहरा की परंपराएं। फिर केशकाल और टाटामारी का प्राकृतिक सौंदर्य।
तीन दिन में हमने बस्तर के कई प्रमुख पर्यटन स्थलों को देखने की कोशिश की। यह पूरी तरह संभव नहीं कि इतने बड़े और विविधतापूर्ण क्षेत्र को तीन दिन में जान लिया जाए, लेकिन शुरुआत जरूर हो गई।
और सबसे अच्छी बात यह रही कि इस बार बस्तर की खबरें करने नहीं, परिवार के साथ बस्तर को जीने पहुंचे थे। बस्तर के हमारे इस प्रवास को यादगार, सुखद और सहज बनाने में जगदलपुर के वरिष्ठ पत्रकार श्री विनोद सिंह जी, पत्रकार श्री अनूप श्रीवास्तव जी, केशकाल के पत्रकार श्री चिराग उपाध्याय जी और हमारे सारथी श्री गुप्ता जी का विशेष सहयोग रहा। आप सभी ने जिस आत्मीयता, स्नेह और अपनत्व के साथ हमारा साथ दिया, उसके लिए हृदय से आभारी हूं। आपके सहयोग से बस्तर को करीब से जानने, यहां की प्राकृतिक सुंदरता, संस्कृति और लोगों की आत्मीयता को महसूस करने का अवसर मिला। सच है, यात्राएं स्थानों से पहचानी जाती हैं, लेकिन उन्हें यादगार बनाते हैं वहां मिलने वाले लोग और उनसे जुड़े रिश्ते।
पत्रकारिता में घूमते हुए कई जगहों की खबरें बनती हैं, लेकिन परिवार के साथ उन्हीं जगहों पर बिताए पल जीवन की अपनी खबर बन जाते हैं। ऐसी खबर, जिसे किसी पेज पर लगाने की जरूरत नहीं होती, बस दिल में संभालकर रखना होता है।
अब पत्नी और परिवार के ताने भी कुछ समय के लिए बंद होने चाहिए। आखिर बस्तर दिखा तो दिया!
हां, एक बात जरूर है। तीन दिन में इतना कुछ देखने के बाद भी लगता है कि बस्तर में अभी बहुत कुछ बाकी है। अबकी बार कुछ और जगहों के लिए समय निकालना पड़ेगा।
क्योंकि बस्तर को एक बार देखकर मन भर जाए, ऐसा बस्तर है ही नहीं!
~~वरिष्ठ पत्रकार रामकृष्ण डोंगरे ~~
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