Thursday, May 22, 2008

भोपाल गैस कांड




बाबा धरणीधर



भोपाल गैस कांड

(बाबा धरणीधर की मशहूर कविता से चुनिदा लाइनें .... )

हर जिस्म जहर हो गया एक दिन
मुर्दों का शहर हो गया भोपाल एक दिन
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सर्दी की रात थी वो क़यामत की रात थी
दोजख की आग थी वो भयानक सी रात थी
जो भी हो मगर ये भी एक बात थी
कि तहजीबो तरक्की के गिलाजत की रात थी
...................

मासूम कोई चीखता अम्मी मुझे बचा
मरती बहन भी टेरती भैय्या मुझे उठा
कहता था कोई आँख से आंसू बहा बहा
मरते दफा तो बाप को बेटा खुदा दिखा
...............................................

फर्क था न लाश को जात पांत का
नस्ल रंग आज सब साथ साथ था
हिंदू का हाथ थामते मुस्लिम का हाथ था
जां जहाँ था मौत के हाथ था
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देखा गया न जो कभी सोचा गया
नहीं दर्द को भी पी गई भोपाल की जमीं
खुदा करे ये हादसा गुजरे न अब कहीं
शायद ही अगली peediyan इसपे करे यकीं

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हर जर्रा शरर हो गया भोपाल एक दिन
मुर्दों का शहर हो गया भोपाल एक दिन
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Tuesday, May 20, 2008

पत्रकार एवं साहित्यकार बाबा स्व. श्री संपतराव धरणीधर


पलंग पर लेटे हुए बाबा धरणीधर के साथ हनुमंत मनगटे और दामोदर सदन .

पत्रकार एवं साहित्यकार बाबा स्व. श्री संपतराव धरणीधर


जन्म १० मार्च , १९२४ और निधन १५ मई , २००२

रचनाए
- गजल संग्रह " किस्त किस्त जिंदगी "
कविता और लोकगीतों का संग्रह " महुआ केशर "
कविता संग्रह - नहीं है मरण पर्व
नहीं है मरण पर्व के बारे में कुछ खास बातें ...

संस्करण - प्रथम - 2003

प्रमुख कविताये ...

टाइटल कविता मरण पर्व के अलावा
भोपाल गैस कांड ,
दिल्ली ,
मेरा मध्यप्रदेश ,
२१ वीं सदी के लिए ,
भूख - भरे पेट की ,
किस आंधी का शोर हुआ है ,
आदमी ,
क्यों मौसम बेइमान हुआ है ,
बस्ती
साहित्यकार से एक परिचय ...

Monday, May 19, 2008

छिंद के वाडे के नाम पर पड़ा छिंदवा़ड़ा...





छिंदवाड़ा : ऐतिहासिक तथ्य

एक समय छिंदवा़ड़ा जिला छिंद के पे़ड़ों से भरपूर था इसलिए इसका नाम छिंद के वाडे के नाम पर छिंदवाड़ा पड़ा। वहीं दूसरी ओर कहा जाता है कि छिदंवाड़ा में शेरों की संख्या काफी अधिक थी। यहां काफी संख्या में शेर आते थे। इसलिए इसे सिंहद्वार भी कहा जाता था।

छिंदवाड़ा में कभी भक्त बुलुंद का राज हुआ करता था। इसने तीसरी शताब्दी में यहां शासन किया। इसके बाद राष्ट्रकुट ने नीलकंठ गांव बसाया। उसने 7वीं सदी तक राज किया। इसके पश्चात गौंडवाना राजाओं ने राज किया। उन्होंने देवगढ़ को अपनी राजधानी बनाया तथा देवगढ़ में किले का निर्माण भी किया। यहां भक्त बुलुंद सबसे शक्तिशाली राजा था। उसने औरंगजेब की हुकूमत के समय मुस्लिम धर्म अपना लिया था। इसके बाद यहां पर राजपाट बदलता रहा। अंत में 1803 में अंतिम मराठा शासन समाप्त हुआ और 17 सितम्बर 1803 को ईस्ट इंडिया कंपनी ने रघुजी-द्वितीय को परास्त कर अपना आधिपत्य स्थापित किया।

स्वतंत्रता के बाद नागपुर की राजधानी छिंदवाड़ा को बनाना चाहते थे।
1 नवंबर, 1956 को इस जिले का पुनर्गठन किया गया।

आकर्षक स्थलः



पातालकोट जिले का प्रख्यात दर्शनीय स्थल हैं
तामिया जनजातीय संग्रहालय
छोटा महादेव की गुफा
देवगढ़ का किला
नदादवाड़ी
गर्म पानी का फुहारा, अनहोनी
राधादेवी की गुफाएं
जामसावली हनुमान मंदिर, सौंसर

छिंदवाड़ा :

छिंदवाड़ा जिले का गठन 1 नवंबर, 1956 को हुआ। यह सतपुड़ा पर्वत माला के दक्षिण-पश्चिमी में स्थित है। यह 21।28 से 22.49 डि. उत्तरी देशांतर और 78.40 से 79.24 डिग्री पूर्वी अक्षांश में 11,815 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में फैला हुआ है। जिले की सीमा दक्षिण में महाराष्ट्र के नागपुर जिले, उत्तर में मप्र के होशंगाबाद और नरसिंहपुर, पश्चिम में बैतूल एवं पूर्व में सिवनी जिले से लगी हुई है। छिदंवाड़ा जिला क्षेत्रफल की दृष्टि से प्रदेश में पहले नंबर पर है। जो प्रदेश के कुल क्षेत्रफल का 3.85 प्रतिशत है। यह जिला 9 तहसीलों (छिंदवाड़ा, परासिया, जुन्नारदेव, तामिया, अमरवाड़ा चौरई, बिछुआ, सौसर और पांढुर्णा) में बंटा हुआ है। जिले में 11 विकासखंड (छिंदवाड़ा, परासिया, जुन्नारदेव, तामिया, अमरवाड़ा, चौरई, बिछुआ, हर्रई, मोहखेड़, सौसर और पांढुर्णा) हैं। जिले में 4 नगर पालिकाएं (छिंदवाड़ा, परासिया, जुन्नारदेव, और पांढुर्णा) हैं। वहीं 8 नगर पंचायतें (सौसर, अमरवाड़ा, चांदामेटा भूतरिया, न्यूटन चिकली, हर्रई, मोहगांव, चौरई और लोधीखेड़ा है। वहीं 10 छोटे कस्बे (दीघावनी, जाटाछापर, इकलहरा, पगारा, काली छापर, दमुआ, पाला चौरई, बम्हौरी, अम्बाड़ा और बड़कुही हैं। जिले में 1984 गांव हैं। इनमें से 1903 गांवों को 19 राजस्व मंडल और 319 पटवारी हल्कों में बांटा गया है। जिले में 808 पंचायतें हैं। प्रमुख औद्योगिक इकाईयां : हिन्दुस्तान लीवर लिमिटेड, लहगड़ुआ रेमण्ड वूलन मिल्स लिमिटेड, बोरगांव पी.बी.एम. पोलीटेक्स लिमिटेड, बोरगांव सुपर पैक (बजाज) ग्राम सावली भंसाली इंजीनियरिंग पोलीमर्स, सातनूर सूर्यवंशी स्पिनिंग मिल्स, ग्राम राजना शशिकांत एंड कम्पनी, जुन्नारदेव रूबी इंजीनियंरिग वर्क्स छिंदवा़ड़ा ईश्वर इंडस्ट्रीज खजरी,

Saturday, May 17, 2008

छिंदवाड़ा का बादल भोई tribal म्यूज़ियम




वर्ल्ड म्यूज़ियम डे १८ मई स्पेशल जनजातीय म्यूज़ियम

chhindwara में जनजातीय म्यूज़ियम की शुरूआत 20 april 1954 में हुई थी .
वर्ष 1975 को इसे स्टेट म्यूज़ियम का दर्जा दिया गया .

8 सितम्बर १९९७ को इसका नाम बदलकर श्री बादल भोई tribal म्यूज़ियम कर दिया गया . असल में श्री बादल भोई जिले के क्रन्तिकारी जनजातीय नेता थे . उनका जन्म 1845 में परासिया तहसील के dungria titra गाँव में हुआ था । उनके नेतृत्व में हजारों आदिवासियों ने १९२३ में कलेक्टर के बंगले पर एकत्र होकर प्रदर्शन किया था। इस दौरान उन पर लाठियाँ बरसाई गईं और गिरफ्तार कर लिया गया.
२१ अगस्त १९३० को अंग्रेजों के शासनकाल में उन्हें रामाकोना में वन नियमों का उल्लंघन करने के जुर्म में चन्दा जेल में बंद कर दिया गया था। उन्होने इसी जेल में अंग्रेजों द्वारा जहर दिए जाने के कारण वर्ष १९४० में अपने प्राण गंवा दिए. राष्ट्र कि आजादी में उनके इस बलिदान के कारण traibala म्यूजियम का नाम बदलकर श्री बदल बोई स्टेट traibala म्यूजियम कर दिया गया.

पर्यटकों के लिए १५ अगस्त २००३ से यह म्यूजियम रविवार तक खोला जाता है। जनजातीय सोध संगठन प्रमुख के निर्देश और चपरासियों के सुपुर्द है. इसमें ११ कमरे और ४ गैलारियाँ हैं. इसमें करीब ४५ जनजातीय संस्कृतियों और सभ्यताओं का वर्णन मिलता है.
यह मध्य प्रदेश का सबसे पुराना और बड़ा म्यूजियम है । सितम्बर २००३ से इस म्यूजियम में प्रवेश के लिए २ रुपये का शुल्क निर्धारित किया गया है. इससे पहले इस म्यूजियम में प्रवेश के लिए कोई शुल्क नहीं देना पड़ता था. यहाँ प्रतिदिन १००-१५० लोग आते हैं.

जो स्वतः ही इस म्यूजियम के प्रति लोगों के रुझान की स्पष्ट गवाही देता है।
वर्ष ---- पर्यटक
2000 ---- 9, 518
2001 ---- 82, 582
2002 ---- 96, 477
2003 ---- 75, 857
2004 ---- 36, 553
2005 ---- 35, 612

इस म्यूजियम में जिले की जनजातियों से सम्भंधित इक़ से इक़ अद्भुत चीजें हैं। इसमें घर, कपडे, जेवरात, हथियार, कृषि के साधन, कला, संगीत, नृत्य, त्यौहार, देवी-देवता, धार्मिक गतिविधियाँ, आयुर्वेदिक संग्रह जैसी वस्तुएं के बारे में विस्तृत जानकारी मिलती है. यह म्यूजियम जनजातीय संप्रदाय की उन्नत परम्पराओं और प्राचीन संस्कृति पर प्रकाश डालता है. जिले में गौंड और बैगदो प्रमुख जनजातियाँ थीं. इसमें उन लोगों के परिवार के रहने सहने के ढंग का भी वर्णन मिलता है. इसमें यह भी जानकारी मिलती है कि अगरियाजन्जाती के लोग किस तरह लोहे को मोदते थे. इन बातों को अगर इक़ लाइन में कहा जाए तो यह म्यूजियम जिले की जनजातीय के बारे में जानकारी जुटाने का सर्वथा उपयुक्त साधन है.

म्यूजियम की समय सारिणी और अवकाश
पर्यटकों के लिए घुमाने का समय

१ अप्रेल से ३० जून- सुबह ११:३० से शाम ६:३० बजे तक।
१ जुलाई से ३१ मार्च- सुबह १०:३० से शाम ५ बजे तक

****नोट: रविवार को छोड़कर सभी सरकारी छुट्टियों और सोमवार को म्यूजियम बंद रहता है।
(स्त्रोत: ट्राईबलम्यूजियम, छिंदवाड़ा के शोध अधिकारी)

Friday, May 16, 2008

Akhilesh Pawar's Blog: आज (16 मई 2008) को भैया के ऑफिस में रात 2 बजे तक

आज मैं भइया (Ramkrishna Dongre) के ऑफिस (Amar Ujala Newspaper Office Noida Sec 59) में 2 बजे रात तक बैठा हूँ . यहां पेपर कैसे छपता ये देखने के लिए में आया था .पर बाकी ऑफिस देखने में भी काफी मजा आया .ऑफिस एकदम शानदार बहुमंजिला इमारत है .जिसमें कई सारे कमरे है साथ ही यह पर एक बड़ा सा रिसेप्शन रूम और एक बड़ा सा रेस्टोरेंट की तरह भोजन कक्ष है. यही पर नीचे में सारी मशीनें है जो कि काफी बड़ी है। इनमें पेपर छपते देखना मेरे लिए काफी रोमांचकारी अनुभव था।
( तस्वीर राष्ट्रपति भवन के पास की।

कहते है ये सभी लगभग 4 से 5 लाख कीमत की है। इनमें टेलीफोन के वायर रोल की तरह ही पेपर रोल लगते है जोकि 150 किलो के होते है और लगभग 15 किलोमीटर लंबे है. मशीन में ये पूरा रोल फंसाया जाता है। पेपर पहले मेटल प्लेट में छपता है फिर उसकी कॉपी पेपर में आती है। इनका ऑफिस किसी फिल्मी ऑफिस की तरह ही दिखता है जो आकर्षक है इसमें हर किसी की अलग डेस्क है और हर डेस्क पर एक कंप्यूटर रखा होता है। साथ ही जैसा कि मेरा अंदाज था कि यह एयर कंडिशनर की ठंडी ताजी हवा आती है, जिसके कारण हमारे भइयाजी दिन बा दिन गोरे होते और निखरते जा रहे है ।
(तस्वीर इंडिया गेट के पास।) 

और क्या कहूँ... यहाँ के स्टाफ वैसे तो मुझे ठीक ही लगा. और हाँ, छत से नजारें और आसमान काफी साफ नजर आता हैं। मुझे तो ये जगह काफी अच्छी लगी। ये बिल्डिंग काफी आधुनिक और कई अत्याधुनिक सुविधाओं से युक्त है। यह पर टीवी भी है। कुल मिलाकर अनुभव काफी मजेदार और रोमांचकारी रहा। 

📝 अखिलेश पवार की कलम से 

chhindwara छबि





Thursday, May 1, 2008

घर की याद


शायद ही कोई ऐसा हो जिसको ना आती हो ... घर की याद
चंद दिनों बाद में घर जा रहा हूँ.

मेरे लिए ... अब दुनिया कितनी बड़ी हो गई है ...
... कहाँ तो बचपन में 25 किलो मीटर दूर का पता नहीं था
अब मैं हजार किलो मीटर से ज्यादा दूरी पर रह रहा हूँ ...
मुझको अब ... हजारों- हजार मील की दुनिया भी पता है ...

दिल्ली से भोपाल ... भोपाल से नागपुर ...
नागपुर से तन्सरामल ( उमरानाला ) ...
नागपुर में दोस्तों से मुलाकात ...उसके बाद घर ...