आकाशवाणी के प्रोग्राम एग्जीक्यूटिव और नाटककार अमर रामटेके जी के साथ...
आकाशवाणी छिंदवाड़ा और आकाशवाणी नागपुर में लंबे अरसे तक काम कर चुके मेरे प्रेरणा स्रोत, लेखक, दलित नाटककार और कार्यक्रम अधिकारी सम्मानीय सर श्री अमर रामटेके जी से हाल ही में मुलाकात हुई। उनकी गिनती प्रमुख दलित लेखकों में होती है।
छिंदवाड़ा आकाशवाणी से उनके ट्रांसफर के करीब 15 साल बाद हुई इस मुलाकात ने कई यादें ताजा कर दी। जब उनसे पहले आकाशवाणी छिंदवाड़ा में मुलाकात हुई। फिर बस स्टैंड के यादव लॉज की कई मुलाकातें। साहित्यिक आयोजनों में। वे हमारे गांव तंसरामाल भी आए थे... तारीख थी 16 मई 2001। जब मैंने इंटरनेट रेडियो श्रोता संघ का उद्घाटन किया था। छिंदवाड़ा से उनकी वापसी के समय का भावुक क्षण कभी भूल नहीं सकता।
वे इन दिनों बेड रेस्ट पर है। 6 साल पहले हुए एक गंभीर हादसे के बाद स्वस्थ होने में उन्हें काफी वक्त लग गया। रामटेके जी लेखक के अलावा एक अच्छे एक्टर भी है। कई नाटकों में उन्होंने यादगार रोल प्ले किए है। उनकी कई किताबें भी प्रकाशित हो चुकी है। मराठी के अलावा हिंदी में भी अपना लेखन करते हैं।
उन्होंने कई शहरों के आकाशवाणी केंद्रों में काम करते हुए कई युवाओं को प्रेरणा दी और आगे बढ़ाया। मध्यप्रदेश में आकाशवाणी छिंदवाड़ा के अलावा आकाशवाणी बैतूल में भी उन्होंने काम किया। जिन शहरों में वे रहे वहां उन्होंने साहित्यिक संस्था बनाकर युवाओं को सार्थक लेखन की ओर अग्रसर किया। फेसबुक पर जो साथी उन्हें जानते हैं वे चीज के गवाह होंगे।
आपका व्यक्तित्व ही आपकी पहचान होता है और इस संसार में कुछ व्यक्तित्व - पर्सनालिटी ऐसी होती है जो अपने आप ही कई लोगों को कुछ कर गुजरने की प्रेरणा दी जाती है। इसमें सृजन भी शामिल है और जीवन का ध्येय निर्धारित करना भी।
इस दुनिया में हर जगह, हर संस्था में कुछ ऐसे लोग होते हैं जो आपको डिस्टर्ब कर सकते हैं। परेशान कर सकते हैं। आपको धैर्य के साथ अपना काम करते जाना चाहिए। यही ऐसी पर्सनालिटी हमें सिखाती है।
आकाशवाणी में प्रोग्राम एग्जीक्यूटिव रहते हुए उन्होंने किसानों के लिए कई अच्छे प्रोग्राम बनाए। कई गांवों का दौरा किया, उन गांव तक पहुंचे जहां पहले कभी आकाशवाणी पहुंचा ही नहीं था। आकाशवाणी छिंदवाड़ा से प्रसारित होने वाला किसान भाइयों का 'चौपाल' प्रोग्राम उन दिनों काफी पसंद किया जाता था। रेडियो पर रामटेके जी का अंदाज निराला होता था। उनकी आवाज दमदार और खनक वाली है।
अमर रामटेके जी की प्रमुख कृतियां :
‘गोडघाटेचाळ’, 'ग्रेस नावाचं गारूड ', जखमांचे शहर
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Tuesday, August 13, 2019
एक मुलाकात, एक व्यक्तित्व, एक सृजन...
Sunday, April 8, 2018
ये सोचना ग़लत है के' तुम पर नज़र नहीं...
ये सोचना ग़लत है के' तुम पर नज़र नहीं,
मसरूफ़ हम बहुत हैं मगर बेख़बर नहीं....
बड़े भाई जैसे श्री आलोक श्रीवास्तव जी की ये लाइनें और वे स्वयं किसी परिचय के मोहताज नहीं है।
प्रोफाइल आप गूगल कर सकते हैं। या आप जानते ही होंगे। आलोक जी से मेरी पहली मुलाकात साल 2004 में भोपाल में हुई थी।
तब वे दैनिक भास्कर की रविवारीय मैग्जीन रसरंग में हुआ करते थे। तब मैं भोपाल के अपने शुरुआती पत्रकारीय जीवन में साहित्यकारों की मैग्जीन "शब्द शिल्पियों के आसपास", पड़ाव प्रकाशन में काम कर सकता था।
भास्कर आफिस में ही उनसे मुलाकात हुई थी। इससे पहले सिर्फ उनको पढ़ा था। बाद में आलोक जी उसी साल 2004 में दिल्ली चले गए। 2006 में फिर मेरी उनसे इंडिया टीवी में मुलाकात हुई। 2007 से लगातार 2013 तक मैं दिल्ली में रहा। अमर उजाला में नौकरी के दौरान। मगर उनसे मुलाकात नहीं हो पाई।
इधर रायपुर आने के बाद उनसे एक दो बार और मुलाकात हुई। वे पिछली बार ओमपुरी जी के साथ आए थे।
आलोक पुतुल जी से भी पहली बार रूबरू मुलाकात हुई है। जान पहचान काफी पुरानी है। आलोक पुतुल जी की धारदार रिपोर्ट्स मैंने बीबीसी पर पढ़ी थी। खास तौर पर बस्तर को लेकर। इन दिनों आप नवभारत से भी जुड़े हुए हैं।
आलोक श्रीवास्तव जी और आलोक पुतुल जी के बीच मैं किसी जुगनू की मानिंद हूं। मैं ऐसे लोगों से ज्यादा मिलना पसंद करता हूं। जिनसे दिल से जुड़ाव महसूस करता हूं। मुझे आज आप जैसे महानुभावों से मिलकर बेहद खुशी हुई।
उम्मीद है ये मुलाकात फिर होगी...
मसरूफ़ हम बहुत हैं मगर बेख़बर नहीं....
बड़े भाई जैसे श्री आलोक श्रीवास्तव जी की ये लाइनें और वे स्वयं किसी परिचय के मोहताज नहीं है।
प्रोफाइल आप गूगल कर सकते हैं। या आप जानते ही होंगे। आलोक जी से मेरी पहली मुलाकात साल 2004 में भोपाल में हुई थी।
तब वे दैनिक भास्कर की रविवारीय मैग्जीन रसरंग में हुआ करते थे। तब मैं भोपाल के अपने शुरुआती पत्रकारीय जीवन में साहित्यकारों की मैग्जीन "शब्द शिल्पियों के आसपास", पड़ाव प्रकाशन में काम कर सकता था।
भास्कर आफिस में ही उनसे मुलाकात हुई थी। इससे पहले सिर्फ उनको पढ़ा था। बाद में आलोक जी उसी साल 2004 में दिल्ली चले गए। 2006 में फिर मेरी उनसे इंडिया टीवी में मुलाकात हुई। 2007 से लगातार 2013 तक मैं दिल्ली में रहा। अमर उजाला में नौकरी के दौरान। मगर उनसे मुलाकात नहीं हो पाई।
इधर रायपुर आने के बाद उनसे एक दो बार और मुलाकात हुई। वे पिछली बार ओमपुरी जी के साथ आए थे।
आलोक पुतुल जी से भी पहली बार रूबरू मुलाकात हुई है। जान पहचान काफी पुरानी है। आलोक पुतुल जी की धारदार रिपोर्ट्स मैंने बीबीसी पर पढ़ी थी। खास तौर पर बस्तर को लेकर। इन दिनों आप नवभारत से भी जुड़े हुए हैं।
आलोक श्रीवास्तव जी और आलोक पुतुल जी के बीच मैं किसी जुगनू की मानिंद हूं। मैं ऐसे लोगों से ज्यादा मिलना पसंद करता हूं। जिनसे दिल से जुड़ाव महसूस करता हूं। मुझे आज आप जैसे महानुभावों से मिलकर बेहद खुशी हुई।
उम्मीद है ये मुलाकात फिर होगी...
Wednesday, November 15, 2017
15 साल बाद डॉ. दीपक आचार्य से एक यादगार मुलाकात
छिंदवाड़ा में डॉ. दीपक आचार्य Deepak Acharya सर से 15 साल के बाद दुबारा यादगार और प्रेरक मुलाकात...
दीपक सर से डीडीसी कॉलेज में कल्चरल एक्टिविटी के बहाने मुलाकात या निकटता हुई। मैं बीए कर रहा था और सर वहां पर साइंस की क्लास को पढ़ाते थे।
आप इन दिनों गुजरात में रहते हैं। आपने छिंदवाड़ा की रहस्यमय दुनिया पातालकोट पर काफी रिसर्च और काम किया है। आपने कई कंपनियों में साइंटिस्ट के तौर पर काम किया। फिर अभुमका हर्बल के नाम से खुद की कंपनी बना ली है।
छिंदवाड़ा और छिंदवाड़ा के लोगों के बारे में हमेशा सोचने वालों में से एक दीपक सर ने यहां के प्रतिभाशाली युवाओं का एक अॉनलाइन डाटाबेस तैयार किया है। जो
http://www.patalkot.com/chhindwara/ यहां पर मौजूद हैं।
आप प्रिंट और अॉडियो वीडियो मीडियम पर हर्बल ज्ञान को लेकर लिखते रहते हैं।
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