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Wednesday, September 13, 2017

बच्चों के खिलाफ अपराध और समझाइश का बुरा असर

बच्चों के खिलाफ लगातार अपराध के बाद अपनी बेटी को गुड टच, बैड टच बताने वाली मां फिर भी क्यों चिंतित हैं। पढ़िए एक मां की चिट्ठी....

कई लोग आजकल कह रहे हैं कि बच्चे को ये सिखाओ, वो सिखाओ, बैड टच बताओ, गुड टच बताओ.. ऐसे गाइड करो, वैसे काउंसिलिंग करो..

लेकिन अब सुनिए इसके साइड इफेक्ट्स..... मैं अपनी बेटी को लगातार गुड टच, बैड टच के बारे में बताती हूं.. रोज खेल-खेल में उसके संपर्क में रह रहे लोगों (टीचर, आया, ऑटो ड्राइवर, घर की मेड, अंकल, आंटी, पड़ोसी, मोहल्ले वाले, क्लासमेट्स, फैमिली मेंबर्स) की गतिविधियों के बारे में जानकारी लेती हूं.. उसे भरोसा दिलाती हूं कि उसके मां-बाप उसे कुछ नहीं होने देंगे.. और मम्मा-पापा से कुछ नहीं छिपाना... वो बहुत समझदार है, सेंसेटिव भी है, सतर्क भी है.. क्योंकि ये अलर्टनेस मैं खुद भी रखती हूं इसलिए मुझे देखकर उसमें बचपन से है.. उसे मैं पूरा क्वालिटी टाइम देती हूं.. वर्किंग होने के बावजूद उसे मेरे द्वारा मिलने वाले वक्त, स्नेह, गाइडेंस में मैंने कोई कमी नहीं होने दी है

... लेकिन एक दिन उसने मुझसे कहा कि कहीं मम्मा मुझे कोई कुछ कर तो नहीं देगा...

मैंने उससे पूछा कि कोई कुछ नहीं करेगा, लेकिन तुम्हारे मन में ये सवाल आया क्यों? उसने कहा कि वो टीवी में न्यूज पर देखती है.. इसके अलावा मैं भी तो उसे हमेशा समझाती रहती हूं... यानि कि कुछ तो ऐसा है सोसायटी में , लोग बुरे हैं अपने आसपास समाज में जो उसे नुकसान पहुंचा सकते हैं..... मैंने कहा कि बेटा बुराई और अच्छाई हर जगह है.. ऐसा नहीं कि सब बुरा है.. लेकिन अपने को सतर्क रहना है. खेलना है, कूदना है, पढ़ना-लिखना है.. लेकिन सतर्क रहना है.. चाहे हम घर के अंदर हों या बाहर.. मैंने उसके उम्र के मुताबिक और भी कई तरीके से उसकी काउंसिलिंग कर दी.. और डर और सतर्कता के बीच के फर्क को समझा दिया.... हालांकि मैं खुद इस बात को सोचने पर मजबूर हो गई.. कि काश कि सोसायटी ऐसी होती कि उसे यही बात मैं तब बताती, जब उसकी उम्र 10 के पार होती .. लेकिन मुझे उसे ये सारी बातें तब बतानी पड़ रही हैं, जब उसका ध्यान अपनी सुरक्षा जैसी बातों पर होना ही नहीं चाहिए...       
              
हालांकि मेरी बेटी निडर है.. लेकिन फिर भी है तो बच्ची ही... आखिर ये सब सुनकर, माता-पिता से लेकर स्कूल और टीवी पर बच्चों को दिए जा रहे गाइडेंस के डोज को लेकर मन में उसके सवाल तो उठते ही हैं.. कि क्या सोसायटी में इतने भेड़िए हैं उसे नुकसान पहुंचाने के लिए... बच्चों के मन पर बुरा प्रभाव तो पड़ता ही है... लेकिन मां-बाप भी क्या करें.. सुरक्षा के लिए बच्चों को समझाना जरूरी है.. और बच्चे भी अफसोसजनक माहौल में पल रहे हैं. पहले जब लड़की जवान होने लगती थी, तो मां-बाप को चिंता होती थी कि कहीं ऊंच-नीच न हो जाए.. लेकिन अब तो ये चिंता पैदा होते ही शुरू हो जाती है.. वो भी न सिर्फ बेटियों के लिए.. बल्कि बेटों के लिए भी.. क्योंकि रेप के शिकार लड़के भी लगातार हो रहे हैं... क्या कहिएगा आप...

बच्चों को सतर्कता के नाम पर हर वक्त बताना पड़ता है.. कि बेटा नाना-नानी के साथ सतर्क रहो, मामा के साथ रहो, अंकल-आंटी के साथ रहो, तो बुआ-मासी के साथ रहो, बेटा मोहल्ले में अंकल के साथ रहो, तो स्कूल में टीचर्स के साथ रहो, बेटा खेलते वक्त रहो, तो बेटा ऑटो वाले से रहो, दुकान वाले से रहो.. तो दोस्तों से रहो.. रिक्शावाले से रहो.. मतलब इससे रहो, उससे रहो... सबसे रहो...

सोचिए बच्चों के मन पर क्या असर पड़ता है.... मैं भी ज्ञान देती रहती हूं बेटी को .. लेकिन कभी-कभी दया आती है उस पर... क्या करूं.....????????

(वरिष्ठ टीवी जर्नलिस्ट प्रज्ञा प्रसाद की वाट्सएप पोस्ट। आप फिलहाल स्वराज एक्सप्रेस चैनल की वेबसाइट लल्लूराम डॉट कॉम में कार्यरत हैं।)