Thursday, December 31, 2009
Thursday, October 22, 2009
वर्तमान एवं भावी बिजनेस पत्रकारों को एक मंच पर लाने का प्रयास
नमस्कार
आप सभी को सूचित करते हुए हमें हर्ष हो रहा है
हमने गूगल के संयोजन से बिजनेस जर्नलिस्ट्स और विद्यार्थियों के लिए एक बिजनेस ग्रुप बनाया है. आप एक क्लिक पर इसे ज्वाइन कर सकते है. हमारा प्रयोजन ब्यापार पत्रकारिता के शुभेच्छुओं को उनकी आवश्यकता अनुरूप आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराना है. आप इस ग्रुप के माध्यम से जानकारियों का आदान-प्रदान भी कर सकते हैं. साथ ही किसी भी प्रकार की दुविधा होने पर हमसे संपर्क करके उसका समाधान पा सकते हैं. उम्मीद है कि हमारे इस प्रयास को सार्थक बनाने में आप हमारा साथ देंगे. अगर आपके पास हमारा आमन्त्रण नहीं पहुंचा है तो हमें नीचे दिए गए नंबरों या ईमेल पर सूचित करें. आपको हमारे ग्रुप का हिस्सा बनाने में हमें खुशी होगी।
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-स्कन्द विवेक
9584353012
-गौतम
9981596647
Monday, October 12, 2009
फ्रेंड्स विद वेनिफिट्स
पोस्ट से पहले में .... एक बार फ़िर ... बहस वाला ब्लॉग ... उल्टा तीर
उल्टा तीर पर महीने भर के लिए जारी है बहस .... फ्रेंड्स विद वेनिफिट्स पर ...
क्या है फ्रेंड्स विद वेनिफिट्स । क्या आपके है इसका कोई अनुभव तो बांटे ....
फ्रेंड्स विद वेनिफिट्स को युवा वर्ग, वह वर्ग जिसकी ये जरूरत है स्वीकार चुका है क्योंकि समाज में एक बहुत बड़ा वर्ग आज प्रत्येक कार्य के ऊपर सेक्स को महत्व दे रहा है।
इस तरह के रिश्तों के बारे में जो अधिकतर अभी तक महानगरों में है पर देर सवेर इनका असर छोटे शहरों पर भी दिखने लगेगा इसमें कोई अतिशयोक्ति नही है। क्योंकि लोग अपनी सहूलियत के लिए मिसाल ढूंढ लेते है कि वो भी तो ऎसा कर रहा फिर हम क्यों नही करे क्योंकि संस्कृति कैसी भी हो कही न कही उसका स्थान्तरण दूसरे स्थानों पर भी हो ही जाता है।
इस रिश्ते में महिलाओं की अपेक्षा पुरुष वर्ग की संलग्नता थोडी सी ज्यादा है। इसमें पुरुष वर्ग लाभीय केंदित महिला वर्ग की अपेक्षा अधिक होता है वहीं महिला अधिकांशतः मित्रवत केन्द्रित होती हैं। इसमें कोई आर्श्चय नहीं है कि इस सम्बन्ध के दोनों वर्ग महिला व पुरुष मानते हैं कि बिना प्रेम के शारीरिक सम्बन्ध होना असहज नहीं है.
इस तरह के रिश्ते में अगर आपके पास हैं अपने अनुभव या है कोई आपका मित्र, जानकार जुड़ा हुआ है इस रिश्ते में तो हमें लिख भेजिए! [उल्टा तीर]
उल्टा तीर पर महीने भर के लिए जारी है बहस .... फ्रेंड्स विद वेनिफिट्स पर ...
क्या है फ्रेंड्स विद वेनिफिट्स । क्या आपके है इसका कोई अनुभव तो बांटे ....
फ्रेंड्स विद वेनिफिट्स को युवा वर्ग, वह वर्ग जिसकी ये जरूरत है स्वीकार चुका है क्योंकि समाज में एक बहुत बड़ा वर्ग आज प्रत्येक कार्य के ऊपर सेक्स को महत्व दे रहा है।
इस तरह के रिश्तों के बारे में जो अधिकतर अभी तक महानगरों में है पर देर सवेर इनका असर छोटे शहरों पर भी दिखने लगेगा इसमें कोई अतिशयोक्ति नही है। क्योंकि लोग अपनी सहूलियत के लिए मिसाल ढूंढ लेते है कि वो भी तो ऎसा कर रहा फिर हम क्यों नही करे क्योंकि संस्कृति कैसी भी हो कही न कही उसका स्थान्तरण दूसरे स्थानों पर भी हो ही जाता है।
इस रिश्ते में महिलाओं की अपेक्षा पुरुष वर्ग की संलग्नता थोडी सी ज्यादा है। इसमें पुरुष वर्ग लाभीय केंदित महिला वर्ग की अपेक्षा अधिक होता है वहीं महिला अधिकांशतः मित्रवत केन्द्रित होती हैं। इसमें कोई आर्श्चय नहीं है कि इस सम्बन्ध के दोनों वर्ग महिला व पुरुष मानते हैं कि बिना प्रेम के शारीरिक सम्बन्ध होना असहज नहीं है.
इस तरह के रिश्ते में अगर आपके पास हैं अपने अनुभव या है कोई आपका मित्र, जानकार जुड़ा हुआ है इस रिश्ते में तो हमें लिख भेजिए! [उल्टा तीर]
Monday, September 21, 2009
दुष्यंत कुमार पर डाक टिकट कुमार जारी होगा

हो गई पीर परबत- सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकालनी चाहिए
आज ये दीवार परदों की तरह हिलने लगी
शर्त लेकिन थी की बुनियाद हिलनी चाहिए
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए
सिर्फ हंगामा खडा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश ये है की ये सूरत बदलनी चाहिए
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकालनी चाहिए
आज ये दीवार परदों की तरह हिलने लगी
शर्त लेकिन थी की बुनियाद हिलनी चाहिए
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए
सिर्फ हंगामा खडा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश ये है की ये सूरत बदलनी चाहिए
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए
दुष्यंत कुमार स्मारक डाक टिकट जारी करेंगे राज्यपाल
हिन्दी गजल को नया तेवर और ताजगी प्रदान करने वाले मध्यप्रदेश के साहित्यकार दिवंगत दुष्यंत कुमार के सम्मान में भारतीय डाक विभाग स्मारक डाक टिकट जारी करने जा रहा है। मध्यप्रदेश के राज्यपाल रामेश्वर ठाकुर २७ सितम्बर को माधवराव सप्रे स्मृति समाचार पत्र संग्रहालय एवं शोध संस्थान में एक समारोह में दुष्यंत कुमार स्मारक डाक टिकट जारी करेंगे। इस मौके पर दुष्यंत रचनावली के संपादक डा. विजय बहादुर सिंह तथा पूर्व कुलपति प्रो. धनंजय वर्मा दुष्यंत के व्यक्तित्व और कृतित्व पर व्याख्यान देंगे।
http://sangrahalay.blogspot.com/
‘मैं बेकरार हूं आवाज में असर के लिए’
जयप्रकाश चौकसे
Friday, August 31, 2007
परदे के पीछे मशहूर कवि और शायर दुष्यंत कुमार का 75वां जन्मोत्सव एक सितंबर 2007 से 31 अगस्त 2008 तक मनाया जाएगा। भोपाल में आयोजक ने बताया कि इस दौरान वर्ष भर व्याख्यान, कवि सम्मेलन और मुशायरों का आयोजन होगा। आज बाजार की ताकतों के कारण आए सामाजिक परिवर्तनों पर दुष्यंत कुमार किस तरह लिखते, इस बात की कल्पना मात्र से रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उनके जैसी विलक्षण प्रतिभा के लिए इस कालखंड में लिखना अत्यंत महत्वपूर्ण होता, क्योंकि विसंगतियों और विरोधाभास के इस दौर को वे बेहतर ढंग से प्रस्तुत करते, साथ ही उनके नजरिए से मौजूदा दौर को देखना एक विरल अनुभव होता। इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि उनकी रचनाएं आउटडेटेड हो गईं हैं। उनकी रचनाएं आज भी सार्थक हैं और कल भी महत्वपूर्ण साबित होंगी।.......
Saturday, May 30, 2009
आज दिल कहता है हर बात कह दूं ,
आज दिल कहता है हर बात कह दूं,
वो दिन कह दूं, वो रात कह दूं,
आज दिल कहता है हर बात कह दूं
तुम्हें देखें हुए अर्सा हो गया है ,
दिल कहता है हाँ यही बात कह दूं,
आज दिल कहता है हर बात कह दूं
तुम होती तो कुछ ना कहता
बस इसलिए आज ये बात कह दूं
आज दिल कहता है हर बात कह दूं
वो दिन कह दूं, वो रात कह दूं,
आज दिल कहता है हर बात कह दूं
तुम्हें देखें हुए अर्सा हो गया है ,
दिल कहता है हाँ यही बात कह दूं,
आज दिल कहता है हर बात कह दूं
तुम होती तो कुछ ना कहता
बस इसलिए आज ये बात कह दूं
आज दिल कहता है हर बात कह दूं
Friday, February 13, 2009
Happy Valentine's Day
वैलेंटाइन डे पर सभी दोस्तों को मेरी ओर से बधाई। प्यार के रंग हजार होते है. आप जिस रंग में रंगे हो, बस प्यार कीजिये. एक बात और ... अगर कोई आपका प्यार स्वीकार ना करें तो उसे दोस्त बना लीजिये।
दोस्ती ता- उम्र बरक़रार रहे,
या खुदा जब तक ये संसार रहे।
हैप्पी वैलेंटाइन डे... मेरा वैलेंटाइन कौन है ... कहाँ है ... ये सवाल आपके मन में जरूर होगा . इसका जवाब तो फिलहाल मेरे पास भी नहीं है ...
हैप्पी वैलेंटाइन डे
आपका दोस्त ...
इन्हें भी पढें....
प्यार का पहला ख़त
Valenlines day प्यार : इक शै के रंग हजार
जब मैं तुमसे प्यार करता हूँ
Thursday, February 5, 2009
पांव छूने पर प्रतिबंध
पांव छूने पर प्रतिबंध
दिल में रखें आदरभाव, चरण छुआई बंद करें
- बीएचयू के समाजशास्त्र विभाग ने लगाया प्रतिबंध
- चरण छूने की प्रथा छदम व्यवहार का परिचायक
- कुछ परंपरागत परिवारों के लोग स्वाभाविक रूप से पांव छूते हैं लेकिन कुछ इस बारे में गंभीर नहीं रहते।
- पांव छूना सामाजिक आउटलुक के लिहाज से बेहतर नहीं माना जाता
पांव छूना आदर का सूचक हो सकता है लेकिन यह दूसरों के अहं को ठेस भी पहुंचाता है। इसी सोच के तहत काशी हिंदू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग ने पांव छूने पर रोक लगा दी है। इसके लिए बकायदा विभाग में नोटिस तक जारी की गई है। विभाग के प्राध्यापकों का तर्क है कि दिल की भाषा को दिल समझ लेता है। आदरणीय को अपने मन के भाव को समझाने के लिए पांव छूना जरूरी नहीं है।
जब अज्ञेय ने टैगोर के पांव नहीं छूये
इलाहाबाद में कविवर रविंद्र नाथ टैगोर आए थे। सब उनका पांव छू रहे थे। एक दृढ़ व्यक्तित्व का धनी सुदर्शन युवक आया। उसने नमस्ते किया और भीतर चला गया। इस घटना ने विश्वकवि को झकझोर कर रख दिया था। वह बहुत देर तक संयत नहीं हो पाए। युवक भी कोई नहीं बल्कि हिंदी साहित्य के मूर्धन्य रचनाकार सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय थे।
युवा शक्ति को नमस्कार करने की जरूरत : अज्ञेय
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के अध्यक्ष प्रो. एमके चतुर्वेदी जेपी आंदोलन के दौरान अज्ञेय से मिलने दिल्ली गए थे। जैसे ही वह आए उनके साथ गए लोग अज्ञेय के पांव की ओर लपके। पर उन्होंने कहा कि नहीं, पांव छूने की जरूरत नहीं। युवा शक्ति को नमस्कार करने की जरूरत है। इसलिए मैं आपको नमस्कार करता हूं।
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काशी हिंदू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग में पांव छूने पर प्रतिबंध लगा दिया है। विभाग अध्यक्ष प्रो. एमके चतुर्वेदी का मानना है कि किसी के प्रति आदर प्रकट करने के और भी तरीके हो सकते हैं लेकिन आज पांव छूना कई मायनों में अच्छा नहीं है।
कहां से मिली प्रेरणा
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के अध्यक्ष प्रो. एमके चतुर्वेदी जेपी आंदोलन के दौरान अज्ञेय से मिलने दिल्ली गए थे। जैसे ही वह आए उनके साथ गए लोग अज्ञेय के पांव की ओर लपके। पर उन्होंने कहा कि नहीं, पांव छूने की जरूरत नहीं। युवा शक्ति को नमस्कार करने की जरूरत है। इसलिए मैं आपको नमस्कार करता हूं। यह बात उनके मन को छू गई। अब उन्होंने अपने विभाग में सबसे बातचीत करके पांव छूने पर प्रतिबंध लगा दिया है। उनका कहना है कि किसी के प्रति आदर प्रकट करने के और भी तरीके हो सकते हैं लेकिन आज पांव छूना कई मायनों में अच्छा नहीं है।
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क्या कहते हैं समाजशास्त्र विभाग के अध्यक्ष प्रो. चतुर्वेदी
उनका कहना है कि कभी दान देते समय दाता दान स्वीकार करने वाले का पांव छूता था। इसके पीछे मकसद था कि लेने वाले के मन में याचक का भाव न जगे। चरण छूने की प्रथा छद्म व्यवहार का परिचायक हो रही है। इसके पीछे कुछ लोग दूसरों को भी भ्रम में रखने की कोशिश करते हैं।
इसी विभाग के डा. एके जोशी का कहना है कि कुछ परंपरागत परिवारों के लोग स्वाभाविक रूप से पांव छूते हैं लेकिन कुछ इस बारे में गंभीर नहीं रहते। इससे बात बिगड़ रही थी। वैसे भी पांव छूना सामाजिक आउटलुक के लिहाज से बेहतर नहीं माना जाता है। इसलिए छात्रों से बात कर इस चलन को कम किया गया है।
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विश्वविद्यालय में पांव छूने की परंपरा
काशी हिंदू विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, संपूणानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में पांव छूने की परंपरा है। यहां इसी के माध्यम से गुरु शिष्य के बीच संबंध बनते हैं। पूर्वांचल में नया अनाज पैदा होने पर जब उसका नेवान किया जाता है तो लोग मुहल्ले भर में घूम कर बड़ों का पांव छूते हैं। किसी के घर पुत्र पैदा होने पर भी ऐसा ही किया जाता है। पांव छूना आदर का सूचक हो सकता है लेकिन यह दूसरों के अहं को ठेस भी पहुंचाता है। इसी सोच के तहत काशी हिंदू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग ने पांव छूने पर रोक लगा दी है। इसके लिए बकायदा विभाग में नोटिस तक जारी की गई है। विभाग के प्राध्यापकों का तर्क है कि दिल की भाषा को दिल समझ लेता है। आदरणीय को अपने मन के भाव को समझाने के लिए पांव छूना जरूरी नहीं है।
गहरी जड़े हैं पांव छूने के संस्कार की
संगीत में बड़े कलाकारों का पांव छूने की परंपरा रही है। संस्कृत विद्वानों में भी यह परंपरा है। साधु-संतों के यहां तो साष्टांग दंडवत करने की परंपरा है। मान्यता है कि सिद्ध पुरुष के हाथ और पांव से हमेशा तरंगे निकलती रहती हैं। पांव छूने पर ये तरंगें शिष्य में भी प्रवेश करती हैं। सिद्ध पुरुष जब आशीर्वाद देता है तो भी इस तरह की तरंगों का प्रवाह होता है। ऊर्जा की तरंगों के संरक्षण के लिए कई सिद्ध संत किसी को अपना पांव छूने ही नहीं देते हैं। उन्हें दूर से ही नमन करना पड़ता है। कहते हैं कि रामकृष्ण परमहंस ने स्पर्श मात्र से इसी ऊर्जा और आनंद की झलक स्वामी विवेकानंद को दिखाई थी। पूर्वांचल में बचपन से ही माता, पिता और गुरु के पांव छूने की शिक्षा दी जाती है। यह परंपरा कमोबेश विश्वविद्यालयों में भी दिखाई देती है।
दिल में रखें आदरभाव, चरण छुआई बंद करें
- बीएचयू के समाजशास्त्र विभाग ने लगाया प्रतिबंध
- चरण छूने की प्रथा छदम व्यवहार का परिचायक
- कुछ परंपरागत परिवारों के लोग स्वाभाविक रूप से पांव छूते हैं लेकिन कुछ इस बारे में गंभीर नहीं रहते।
- पांव छूना सामाजिक आउटलुक के लिहाज से बेहतर नहीं माना जाता
पांव छूना आदर का सूचक हो सकता है लेकिन यह दूसरों के अहं को ठेस भी पहुंचाता है। इसी सोच के तहत काशी हिंदू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग ने पांव छूने पर रोक लगा दी है। इसके लिए बकायदा विभाग में नोटिस तक जारी की गई है। विभाग के प्राध्यापकों का तर्क है कि दिल की भाषा को दिल समझ लेता है। आदरणीय को अपने मन के भाव को समझाने के लिए पांव छूना जरूरी नहीं है।
जब अज्ञेय ने टैगोर के पांव नहीं छूये
इलाहाबाद में कविवर रविंद्र नाथ टैगोर आए थे। सब उनका पांव छू रहे थे। एक दृढ़ व्यक्तित्व का धनी सुदर्शन युवक आया। उसने नमस्ते किया और भीतर चला गया। इस घटना ने विश्वकवि को झकझोर कर रख दिया था। वह बहुत देर तक संयत नहीं हो पाए। युवक भी कोई नहीं बल्कि हिंदी साहित्य के मूर्धन्य रचनाकार सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय थे।
युवा शक्ति को नमस्कार करने की जरूरत : अज्ञेय
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के अध्यक्ष प्रो. एमके चतुर्वेदी जेपी आंदोलन के दौरान अज्ञेय से मिलने दिल्ली गए थे। जैसे ही वह आए उनके साथ गए लोग अज्ञेय के पांव की ओर लपके। पर उन्होंने कहा कि नहीं, पांव छूने की जरूरत नहीं। युवा शक्ति को नमस्कार करने की जरूरत है। इसलिए मैं आपको नमस्कार करता हूं।
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काशी हिंदू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग में पांव छूने पर प्रतिबंध लगा दिया है। विभाग अध्यक्ष प्रो. एमके चतुर्वेदी का मानना है कि किसी के प्रति आदर प्रकट करने के और भी तरीके हो सकते हैं लेकिन आज पांव छूना कई मायनों में अच्छा नहीं है।
कहां से मिली प्रेरणा
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के अध्यक्ष प्रो. एमके चतुर्वेदी जेपी आंदोलन के दौरान अज्ञेय से मिलने दिल्ली गए थे। जैसे ही वह आए उनके साथ गए लोग अज्ञेय के पांव की ओर लपके। पर उन्होंने कहा कि नहीं, पांव छूने की जरूरत नहीं। युवा शक्ति को नमस्कार करने की जरूरत है। इसलिए मैं आपको नमस्कार करता हूं। यह बात उनके मन को छू गई। अब उन्होंने अपने विभाग में सबसे बातचीत करके पांव छूने पर प्रतिबंध लगा दिया है। उनका कहना है कि किसी के प्रति आदर प्रकट करने के और भी तरीके हो सकते हैं लेकिन आज पांव छूना कई मायनों में अच्छा नहीं है।
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क्या कहते हैं समाजशास्त्र विभाग के अध्यक्ष प्रो. चतुर्वेदी
उनका कहना है कि कभी दान देते समय दाता दान स्वीकार करने वाले का पांव छूता था। इसके पीछे मकसद था कि लेने वाले के मन में याचक का भाव न जगे। चरण छूने की प्रथा छद्म व्यवहार का परिचायक हो रही है। इसके पीछे कुछ लोग दूसरों को भी भ्रम में रखने की कोशिश करते हैं।
इसी विभाग के डा. एके जोशी का कहना है कि कुछ परंपरागत परिवारों के लोग स्वाभाविक रूप से पांव छूते हैं लेकिन कुछ इस बारे में गंभीर नहीं रहते। इससे बात बिगड़ रही थी। वैसे भी पांव छूना सामाजिक आउटलुक के लिहाज से बेहतर नहीं माना जाता है। इसलिए छात्रों से बात कर इस चलन को कम किया गया है।
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विश्वविद्यालय में पांव छूने की परंपरा
काशी हिंदू विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, संपूणानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में पांव छूने की परंपरा है। यहां इसी के माध्यम से गुरु शिष्य के बीच संबंध बनते हैं। पूर्वांचल में नया अनाज पैदा होने पर जब उसका नेवान किया जाता है तो लोग मुहल्ले भर में घूम कर बड़ों का पांव छूते हैं। किसी के घर पुत्र पैदा होने पर भी ऐसा ही किया जाता है। पांव छूना आदर का सूचक हो सकता है लेकिन यह दूसरों के अहं को ठेस भी पहुंचाता है। इसी सोच के तहत काशी हिंदू विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग ने पांव छूने पर रोक लगा दी है। इसके लिए बकायदा विभाग में नोटिस तक जारी की गई है। विभाग के प्राध्यापकों का तर्क है कि दिल की भाषा को दिल समझ लेता है। आदरणीय को अपने मन के भाव को समझाने के लिए पांव छूना जरूरी नहीं है।
गहरी जड़े हैं पांव छूने के संस्कार की
संगीत में बड़े कलाकारों का पांव छूने की परंपरा रही है। संस्कृत विद्वानों में भी यह परंपरा है। साधु-संतों के यहां तो साष्टांग दंडवत करने की परंपरा है। मान्यता है कि सिद्ध पुरुष के हाथ और पांव से हमेशा तरंगे निकलती रहती हैं। पांव छूने पर ये तरंगें शिष्य में भी प्रवेश करती हैं। सिद्ध पुरुष जब आशीर्वाद देता है तो भी इस तरह की तरंगों का प्रवाह होता है। ऊर्जा की तरंगों के संरक्षण के लिए कई सिद्ध संत किसी को अपना पांव छूने ही नहीं देते हैं। उन्हें दूर से ही नमन करना पड़ता है। कहते हैं कि रामकृष्ण परमहंस ने स्पर्श मात्र से इसी ऊर्जा और आनंद की झलक स्वामी विवेकानंद को दिखाई थी। पूर्वांचल में बचपन से ही माता, पिता और गुरु के पांव छूने की शिक्षा दी जाती है। यह परंपरा कमोबेश विश्वविद्यालयों में भी दिखाई देती है।
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