Sunday, May 5, 2019

क्या मोदीजी खुद को प्रधानमंत्री नहीं मानते

भाजपा की मुश्किल ये है कि उसके पास भी कोई बड़ा नेता नहीं है। जो भीड़ जुटा सके। वोट दिला सकें।

आप कहेंगे मोदी जी है ना।

मैं कहूँगा... ये तो सही है कि मोदी जी है।

... लेकिन दुर्भाग्य ये है कि मोदी जी खुद को भाजपा का बड़ा नेता और स्टार प्रचारक से ज्यादा कुछ और मानने को तैयार ही नहीं है।

जबकि पूरा देश जानता है कि भारत के मौजूदा प्रधानमंत्री का नाम नरेंद्र मोदी है। और ये भी विश्वास करता है प्रधानमंत्री को क्या बोलना चाहिए। क्या नहीं बोलना चाहिए।

मोदीजी भूल जाते हैं। बार बार कि वे अभी प्रधानमंत्री है। खैर कोई बात नहीं।

मोदीजी आप तो लगे रहिये...

क्योंकि आखिर आप तो पहले भाजपा नेता। स्टार प्रचारक है। प्रधानमंत्री आप कुछ समय के लिए बने हो। हमेशा के लिए थोड़ी ना।

आपको क्या करना है ये याद रखकर कि प्रधानमंत्री को क्या बोलना होता है। और क्या नहीं।

सितंबर 2013। यह वही समय था जब भाजपा ने आपको प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित किया था।
फिर चुनाव के ऐलान के साथ आपकी रैलियां शुरू हो गई। खूब चर्चे थे आपके। भीड़ जुटाने में माहिर। स्टार प्रचारक। पार्टी में नंबर।

यूपीए के 10 साल के शासन के बाद जनता बदलाव चाह रही थी। और मोदीजी आपको इसका खूब फायदा हुआ। जैसे पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मिला है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में। जहां भाजपा की सरकारों से मुंह मोड़कर जनता ने कांग्रेस को सत्ता की चाबी सौंपी है। वैसे ही आपकी पार्टी भाजपा को 2014 में जबरदस्त सीटें मिली। खैर...। ये सब देश जानता है।

... लेकिन मोदीजी अब देश, देश के जागरूक और जिम्मेदार नागरिक ये भी जानने लगा है कि आप क्या बोलते हैं। आपकी भाषा क्या है।

आप तथ्य गलत रख दो। ये भी नहीं होना चाहिए। क्योंकि आप प्रधानमंत्री हो।

फिर भी ये चल जाएगा।

लेकिन आप मर्यादा का ख्याल न रखो। घटिया बयानबाजी करो। घटिया टिप्पणी करो। ये पूरा देश देख रहा है।

हम ये भी मानते हैं कि राजनीति। हमारे देश की राजनीति वाकई खराब है। हर नेता लगभग ऐसी ही भाषा बोल रहा है। कोई कम, कोई ज्यादा। हर नेता चुनावी मंच से विरोधी पार्टी के नेताओं के लिए जहर उगलता है।

लेकिन जब ये नेता लोग आपस में मिलते हैं तो कहते हैं कि हम तो सिर्फ राजनीतिक विरोधी है। और जनता। मासूम जनता आपके बयान पर लड़ पड़ती है।

आप जैसे नेता लोग तो सिर्फ राजनीति करते हैं। अपनी पार्टी की। पार्टी की सीटें बढ़ाने के लिए घटिया बयानबाजी करते हैं। और देश की भोली-भाली जनता आपस में लड़ पड़ती है। वो मेरा प्रिय नेता है। फिर चुनावी जुमले दोहराने लगती है।... आएगा तो...।

जनता भूल जाती है कि ये चुनावी नारे है। किसी पार्टी के है। फिर वो औरों से भी अपने प्रिय नेता को वोट देने की अपील करने लगती है। जबकि वोट किसे देना है ये हर नागरिक का व्यक्तिगत मामला है।

ये भी सब पार्टी के आईटी का कमाल होता है। जो देखते देखते हर मोबाइल में फैल जाता है। हर फारवर्ड करने वाले को लगता है कि ये मेरे अपने की अपील है।

अंत में सिर्फ इतना कि भारत में लोकतंत्र है। कई दल है। कई नेता है। जो पार्टी या नेता अच्छा काम करेगा। जनता उसे पसंद करेगी। बार बार मौका भी देगी।

कई बार विकल्प नहीं होने का फायदा भी मिल जाता है।

मोदीजी आप पांच साल प्रधानमंत्री रहे। आगे क्या होगा। कह नहीं सकते। आपका काम है विरोधी पार्टी पर हमला बोलना। सबसे बड़ी विरोधी पार्टी कांग्रेस है। आप उसके मौजूदा नेताओं पर खूब बोलिए।

लेकिन देश के प्रधानमंत्री रहे नेताओं के बारे में बोलते वक्त आपको ध्यान रखना होगा कि आप क्या बोल रहे हैं। क्योंकि फिलहाल आप खुद प्रधानमंत्री के पद पर बैठे है।

©® गैर राजनीतिक पत्रकार रामकृष्ण डोंगरे की कलम से


Tuesday, April 16, 2019

फेसबुक पोस्ट : गलत कहीं भी हो विरोध कीजिए

देश में दो विचारधारा एक साथ आगे बढ़ रही है। मुझे बताने की जरूरत नहीं है। वे कौन सी है। उनके मानने वाले कौन और कैसे है।

मेरा मानना है कि देश में कई विचारधारा हो सकती है। कोई बुराई नहीं है। एक परिवार में पति - पत्नी, पिता-पुत्र सभी अलग विचारधारा को मानने वाले हो सकते हैं। रहते हैं। इसका ये अर्थ कदापि नहीं होता है कि वे हमेशा लड़ते-झगड़ते रहे।

हम सब देशवासियों को कम से कम कुछ मुद्दों पर तो एक होना चाहिए। जैसे - जो चीज गलत है उसे सभी एक साथ खड़े होकर गलत बोले।

अब सोचिए किसी महिला या बच्ची के साथ जघन्य अपराध होता है। रेप होता है। उस पर भी हम अगर धर्म देखकर फैसला करने लगे तो फिर क्या होगा। ऐसी स्थिति में पीड़ित या आरोपी का धर्म नहीं देखा जाना चाहिए।

पीड़ित के साथ और आरोपी के खिलाफ हमें पूरी ताकत के साथ खड़ा होना चाहिए। अगर ऐसा नहीं हो रहा है तो सोचना पड़ेगा कि आखिर हममें इंसानियत नाम की चीज शेष है या नहीं।

*विचार कीजिए। बात आपको बुरी लग सकती है। मगर ये सोचना मौजूदा वक्त की जरूरत बन चुका है।*

#एक_बार_सोचिए

#फेसबुक वॉल से, 16 अप्रैल 2019


Sunday, April 14, 2019

क्या आपने चलाई है कैंची साइकिल

यह दौर था हमारे साइकिल सीखने का और हमारे जमाने में साइकिल दो चरणों में सीखी जाती थी पहला चरण कैंची और दूसरा चरण गद्दी.......

तब साइकिल चलाना इतना आसान नहीं था क्योंकि तब घर में साइकिल बस बाबा या ताऊ चलाया करते थे तब साइकिल की ऊंचाई अड़तालीस  इंच हुआ करती थी जो खड़े होने पर हमारे कंधे के बराबर आती थी ऐसी साइकिल से गद्दी चलाना मुनासिब नहीं होता था।

"कैंची" वो कला होती थी जहां हम साइकिल के फ़्रेम में बने त्रिकोण के बीच घुस कर दोनो पैरों को दोनो पैडल पर रख कर चलाते थे ।

और जब हम ऐसे चलाते थे तो अपना सीना तान कर टेढ़ा होकर हैंडिल के पीछे से चेहरा बाहर निकाल लेते थे, और "क्लींङ क्लींङ" करके घंटी इसलिए बजाते थे ताकी लोग बाग़ देख सकें की छोरा साईकिल दौड़ा रहा है ।

आज की पीढ़ी इस "एडवेंचर" से मरहूम है उन्हे नही पता की आठ दस साल की उमर में अड़तालीस इंच की साइकिल चलाना "जहाज" उड़ाने जैसा होता था।

हमने ना जाने कितने दफे अपने घुटने और मुंह तोड़वाए है और गज़ब की बात ये है कि तब दरद भी नही होता था, गिरने के बाद चारो तरफ देख कर चुपचाप खड़े हो जाते थे अपना हाफ कच्छा पोंछते हुए।

अब तकनीकी ने बहुत तरक्क़ी कर ली है पांच साल के होते ही बच्चे साइकिल चलाने लगते हैं वो भी बिना गिरे। दो दो फिट की साइकिल इजाद कर ली गयी है, और अमीरों के बच्चे तो अब सीधे गाड़ी चलाते हैं छोटी छोटी बाइक उपलब्ध हैं बाज़ार में ।

मगर आज के बच्चे कभी नहीं समझ पाएंगे कि उस छोटी सी उम्र में बड़ी साइकिल पर संतुलन बनाना जीवन की पहली सीख होती थी!  "जिम्मेदारियों" की पहली कड़ी होती थी जहां आपको यह जिम्मेदारी दे दी जाती थी कि अब आप गेहूं पिसाने लायक हो गये हैं ।

इधर से चक्की तक साइकिल ढुगराते हुए जाइए और उधर से कैंची चलाते हुए घर वापस आइए !

और यकीन मानिए इस जिम्मेदारी को निभाने में खुशियां भी बड़ी गजब की होती थी।

और ये भी सच है की हमारे बाद "कैंची" प्रथा विलुप्त हो गयी ।

हम आदम की दुनिया की आखिरी पीढ़ी हैं जिसने साइकिल चलाना दो चरणों में सीखा !

पहला चरण कैंची
दूसरा चरण गद्दी।


©® अभिनय बंटी पंचोली, भोपाल के फेसबुक वॉल से

😊😊


मेरे प्रिय नेता

स्कूल में आपने गाय पर निबंध लिखा होगा. स्कूल में आपने 'मेरे प्रिय नेता, इस सब्जेक्ट पर भी निबंध लिखा होगा. आपने लिखा हु- 'मेरे प्रिय नेता महात्मा गांधी' चाचा नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, अटल बिहारी वाजपेयी.

हो सकता है आपने उस समय परीक्षा में अच्छे नंबर मिल जाए। इसलिए अपने प्रिय नेता के बारे में खूब लिखा होगा। तारीफों के पुल बांधे होंगे। लेकिन वास्तविक जिंदगी में भी राजनीति का कोई एक ऐसा किरदार, जो आपको बेहद प्रिय होता है। वह आपका सबसे पसंदीदा नेता बन जाता है। चाहे वह नेता कोई भी हो।

अभी नरेंद्र मोदी कई लोगों के प्रिय नेता है। वहीं कुछ लोगों को राहुल गांधी, किसी को केजरीवाल तो किसी को कोई और भी नेता प्रिय होगा। इस स्थिति में ऐसे लोग अपने प्रिय नेता के बारे में कुछ भी आलोचना बर्दाश्त नहीं कर पाते। तो इस बारे में इतना ही कहना चाहूंगा कि हो उन्हें ज्यादा छेड़ा ना करें।

किसी को पसंद और नापसंद करना, यह सभी की व्यक्तिगत रुचि का विषय होता है। लेकिन जब देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था है तो यहां हमें सरकार की नीतियों और जनप्रतिनिधियों के कार्यों को लेकर सवाल करने का भी पूरा हक होता है। इसमें किसी तरह की कोताही नहीं बरती जानी चाहिए।

क्योंकि ये नेता, हमारे चुने हुए प्रतिनिधि और जनता के सेवक है. देश में कोई राजशाही या राजतंत्र नहीं है। ना ही नेता हमारे राजा है। जो कि राजा के खिलाफ अगर आप कुछ कहेंगे तो आप को दंड दिया जाएगा।

अच्छे और जागरूक नागरिक बनने की कोशिश कीजिए। चुनाव में अपने लिए अच्छा जनप्रतिनिधि चुनिए। अपने मताधिकार का उपयोग करते समय पूरी गोपनीयता बरतें।

आपको जिसे वोट देना है, दीजिए। मगर उसका ढिंढोरा मत पीटिए। आप अपने परिवार में भी किसी को वोट देने के लिए दबाव नहीं बना सकता।

कहा जाता है धार्मिक आस्था बेहद निजी मामला होता है। यहां तक कि एक ही परिवार में पति-पत्नी और बच्चे अलग अलग धार्मिक प्रवृत्ति के हो सकते हैं। ठीक वैसे ही राजनीतिक आस्था भी व्यक्तिगत मसला है। इस मामले में अगर हम पारिवारिक और शुभचिंतकों के दायरे में ज्यादा चर्चा न ही करें तो बेहतर रहेगा।

©® रामकृष्ण डोंगरे


Friday, April 5, 2019

आप फेक न्यूज क्यों शेयर करते हैं

राजनीतिक पार्टियों के आईटी देशभर के लोगों को भ्रमित करने का काम करते हैं। और आपको पता है यही उनका काम है। ...लेकिन इस पर उन्हें या उनके आकाओं को भी विचार करना चाहिए। आखिर वे गलत जानकारियां फैलाकर क्यों युवा पीढ़ी को बर्बाद करने में तुले है। आईटी सेल की पोस्ट, फोटो और वीडियो को सच मानकर शेयर करने वालों में कई बार ' अच्छे अच्छे पत्रकार' भी शामिल हो जाते हैं। फिर किसी अफसर, बिजनेसमैन, आईटी प्रोफेशनल की कौन बात करेगा।

फेक न्यूज पर गहरी नजर रखने के बाद मैं एक बात तो दावे से कह सकता हूं कि ऐसी गलती हम भावनाओं में बहकर करते हैं। जैसे अगर मैं मोदी जी का बहुत बड़ा फैन हूं या भाजपा को सपोर्ट करता हूं तो राहुल गांधी  के वायनाड में नामांकन दाखिल करने को लेकर आईटी सेल की तरफ से फैलाई जा रही तस्वीरों और पोस्ट को सच मानकर वाट्सएप, फेसबुक और टि्वटर पर तत्काल शेयर कर दूंगा। क्या आपको पता है कि ये तस्वीर कुछ सच है लेकिन इनके साथ लिखा संदेश गलत है। पूरी खबर आप कमेंट बॉक्स में पढ़े।

मुझ जैसे सजग नागरिक की चिंता ये है कि अगर हम 24 घंटे लगाकर भी एक एक फेक न्यूज और पोस्ट का सच लोगों को बताएंगे तो भी हमारा काम खत्म नहीं होगा। क्योंकि फेक न्यूज, झूठी खबर शायद कभी खत्म नहीं हो सकती। जैसे पुराने जमाने में झूठी अफवाह फैलती थी। आज उसी तरह से फेक न्यूज फैलाई जाती है अपने अपने स्वार्थ के लिए।

इंटरनेट इतना बड़ा संसार है कि आम आदमी के वश की बात नहीं है कि वह गूगल में सर्च करके किसी भी पोस्ट या फेक न्यूज की असलियत तुरंत जान सकें। हालांकि थोड़ी मेहनत करने से यह भी संभव हो जाता है। मगर आपने भी देखा होगा कि हर कोई इतनी जल्दी में है कि उसके पास सोचने-विचारने और गूगल करने का समय ही नहीं है। वो क्या फेक न्यूज की पड़ताल करेगा।

फिर भी मेरी फ्रेंड लिस्ट या सर्किल से जुड़े लोगों से मेरा हाथ जोड़कर निवेदन है कि वे फेक न्यूज को शेयर न करें। अगर उन्हें किसी पोस्ट के बारे में जानना है कि ये सच या झूठ तो वे मुझे भेज सकते हैं। दूसरा अगर उन्होंने ठान लिया है कि वे फेक न्यूज ही शेयर और पोस्ट करेंगे तो वे कृपया मुझसे ग्लोबल संसार में नाता तोड़ लीजिए।

कैसे बचें फेक न्यूज से 
- अपने किसी जानकार मित्र को भेजकर वायरल पोस्ट या फोटो की
सचाई पता कीजिए।
- गूगल में जाकर की वर्ड सर्च कीजिए। अापको सच और झूठ का पता चल जाएगा।


फेक न्यूज जान लेती है 
इतना अगर आप जान लेंगे तो 
कभी आप फेक न्यूज शेयर नहीं करेंगे। 

Friday, March 29, 2019

रीतेश के साथ...आठ साल के बाद

दिल्ली में साथ रहते थे। दिल्ली छूटी तो करीब 8 साल के बाद अब रायपुर में हम दोनों की मुलाकात हुई।

माखनलाल विवि भोपाल में एमजे के साथी रहे और छोटे भाई रीतेश पुरोहित इन दिनों भोपाल मेमोरियल हॉस्पिटल में पीआरओ के तौर पर कार्यरत है।

दुनिया में आप कहीं भी रहो। मिलजुल रहने के मौके हर जगह मिलते हैं। स्कूल कॉलेज और आफिस में भी। जहां आपको हर स्टेट के, जाति धर्म के लोग मिलते हैं। सब मिल-जुलकर रहते हैं। बिछड़ने के बाद भी आप उन्हें याद करते हैं।

रीतेश रायपुर आए थे 2 फरवरी 2019 को शुक्रवार रात 9 बजे। हमारी मुलाकात हुई शनिवार दोपहर करीब 2 बजे। और शाम 6-7 बजे हम विदा हो गए।

इन चंद घंटों में रीतेश की भोपाल की यादें ताजा कर दी। अरेरा कॉलोनी के उस छोटे से रूम की। जो बामुश्किल 3 बाय 6 रहा होगा। जिसमें मैंने दो साल गुजारे थे।

अपनों से मिलने की चाहत
रीतेश में साफ दिख रही थी।
बार बार एक ही सवाल - क्या एमजे से कोई और है रायपुर में

चर्चा 'ओ धर्मनाथ' की निकली।
रबिंद्र सर की निकलीं और

अंत में हमेशा के लिए बिछुड़कर दुनिया छोड़ चुके साथी सुदीप कुमार पर आकर खत्म हो गई।

कितना कम समय है आपके पास।
फिर भी लोग विचारधारा, प्रांत, जाति-धर्म के चक्कर में हमेशा लड़ते और झगड़ते रहते हैं।

मिल जुलकर रहिए
दोस्त बनाते रहिए...

|| दोस्त बनाओ, दुनिया बनाओ ||
 — with Ritesh Purohit atSmart-City-Raipur.

मेरी पहली मुंबई यात्रा-2

मुंबई... इस शहर में आपको कहीं भी जाना हो तो मुंबई की टैक्सियां मुंबई की लोकल (ट्रेन) और मुंबई के ऑटो सबसे बेस्ट ऑप्शन है, अगर आप कम खर्च में सफर करना चाहते हैं तो। वरना आप चाहे तो प्राइवेट टैक्सी ओला, उबेर भी बुक कर सकते हैं।
मुझे दादर ईस्ट में भोईवाड़ा इलाके में नायगांव जाना था। दादर स्टेशन के ईस्ट गेट से रात करीब 9 बजे बाहर आने के बाद मैंने शेयरिंग टैक्सी वाले से वहां छोड़ने के लिए कहा। वह तैयार हो गया। ₹10 टिकट लगा। पहली बार मुंबई की सड़कों पर निकला था. जिस समय और जिस इलाके से होकर मैं पहुंचा। वहां मुझे कुछ खास बदलाव नहीं लगा।
एक फ्लाईओवर के नीचे से गुजरकर नायगांव पहुंचा. टाटा मेमोरियल या आसपास के किसी और हॉस्पिटल में इलाज के लिए आने वाले मरीज और उनके रिश्तेदार जिन जगहों पर कमरे लेकर, बेड लेकर रुकते हैं. उनका हाल अब आप जानेंगे.
सावली केयर सेंटर… जी हां यही वह नाम था जहां पर रात को मुझे रुकना था और अगले 1 हफ्ते तक भी। यह सेंटर चैतन्य प्रतिष्ठान संस्थान के द्वारा संचालित था। दो मंजिला लेकिन टीन शेड वाला यह मकान अंदर से आपको फुली एसी और किसी होटल की तरह एहसास कराता है। यहां पर रियायती दर पर ₹100 प्रतिदिन के हिसाब से बेड मिलता है। कोई चाहे तो ₹3000 देकर सेपरेट रूम भी ले सकता था। ग्लास का पार्टीशन किए हुए छोटे छोटे रूम बने हुए। आप पूछेंगे वहां पर फैसिलिटी क्या थी। तो साफ सुथरा कमरा। बाथरूम। छोटी सी लाइब्रेरी और छोटा सा किचन। तमाम फैसिलिटी वहां पर थी।
सुबह उठते ही मैंने तैयार होकर टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल का रुख किया। वहां जाने के लिए मुझे बमुश्किल 10-15 मिनट लगे। वह भी पैदल ही। टाटा मेमोरियल तक पहुंचने में मुझे ज्यादा कोई परेशानी नहीं हुई। रास्ते में भोईवाड़ा पुलिस थाना भी आता है। टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल की 3 या 4 बिल्डिंग है जिसमें मुख्य भवन, गोल्डन जुबली बिल्डिंग, एनएक्स बिल्डिंग और होमी भाभा शामिल है।
टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल की सिक्योरिटी काफी टाइट है. सुबह एंट्री के समय 10 से 12 के बीच और रात को 7:00 बजे के बाद आपकी एंट्री रोक दी जाएगी, अगर आपके पास विजिटर कार्ड नहीं है। बाकी समय में आप एंट्री कर ही लेते हैं। हॉस्पिटल में आपको कहीं भी जाने के लिए परेशान होने की जरूरत नहीं। हर कदम पर लोग आपकी पूरी हेल्प करते हैं। यहां तक कि दूरदराज से आए लोगों को परेशानी ना हो इसलिए मैप- नक्शा तक बना कर भेज देते कि आपको किसी वार्ड या ऑफिस में कैसे पहुंचना है।
टाटा मेमोरियल की मुख्य बिल्डिंग में सेकंड फ्लोर पर दो जनरल वार्ड हैं। ए विंग और बी विंग। एक विंग में लेडीज पैशेंट और एक में जेंट्स पैशेंट रहते हैं। यहां कैंसर पीड़ित बच्चों के लिए एक अलग वार्ड है, जिसमें दिल का बहुत मजबूत इंसान ही एंट्री कर सकता है। ऐसा क्यों यह हम आपको बाद में बताएंगे...।
जिस वार्ड में हम थे वहां पर ज्यादातर मरीज गले के कैंसर वाले या मुंह के कैंसर वाले थे। इनमें भी बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल या साउथ के मरीजों की संख्या ज्यादा थी। कुछ यूपी- एमपी से भी थे। मुझे एक खास बात यह लगी कि नर्स, वार्ड बॉय और डॉक्टर, सभी हेल्पिंग नेचर के थे। यहां रहने वाले मरीजों के अटेंडेंट भी लोगों की हर तरह से मदद करते हैं।
आज मेरा हॉस्पिटल में पहला दिन था, इसलिए मैंने पूरा दिन हॉस्पिटल के सिस्टम को समझने में लगाया। जैसा कि मुंबई का सबसे बड़ा हॉस्पिटल है, इसलिए यहां पर तमाम सुविधाएं अत्याधुनिक किस्म की है। यानी दवाइयों के लिए आपको पहले से पेमेंट जमा करनी होती है, हॉस्पिटल के अकाउंट में। उसके बाद आप मरीज का टोकन नंबर या कार्ड नंबर लेकर कभी भी मेडिकल स्टोर से दवाइयां परचेज कर सकते हैं। इसके अलावा दवाइयां लेने के लिए आपको पर्ची लेकर नहीं घूमना पड़ता, दवाइयों की लिस्ट ऑनलाइन कर दी जाती है। आप मेडिकल स्टोर में जाकर आसानी से दवाइयां ले सकते हैं।
*अगली किस्त में आप पढ़ेंगे…*
👉 आखिर कैसी है मुंबई की लाइफ.
👉 मुंबई में लोकल ट्रेन के सफ़र की कुछ बातें
👉 और कैंसर पीड़ितों के लिए संचालित ट्रस्ट, धर्मशाला और संस्थान की बातें…
_*तो पढ़ते रहिए मेरी पहली मुंबई यात्रा…*_
शुक्रिया
_*रामकृष्ण डोंगरे*_