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Friday, March 29, 2019

मेरी पहली मुंबई यात्रा-2

मुंबई... इस शहर में आपको कहीं भी जाना हो तो मुंबई की टैक्सियां मुंबई की लोकल (ट्रेन) और मुंबई के ऑटो सबसे बेस्ट ऑप्शन है, अगर आप कम खर्च में सफर करना चाहते हैं तो। वरना आप चाहे तो प्राइवेट टैक्सी ओला, उबेर भी बुक कर सकते हैं।
मुझे दादर ईस्ट में भोईवाड़ा इलाके में नायगांव जाना था। दादर स्टेशन के ईस्ट गेट से रात करीब 9 बजे बाहर आने के बाद मैंने शेयरिंग टैक्सी वाले से वहां छोड़ने के लिए कहा। वह तैयार हो गया। ₹10 टिकट लगा। पहली बार मुंबई की सड़कों पर निकला था. जिस समय और जिस इलाके से होकर मैं पहुंचा। वहां मुझे कुछ खास बदलाव नहीं लगा।
एक फ्लाईओवर के नीचे से गुजरकर नायगांव पहुंचा. टाटा मेमोरियल या आसपास के किसी और हॉस्पिटल में इलाज के लिए आने वाले मरीज और उनके रिश्तेदार जिन जगहों पर कमरे लेकर, बेड लेकर रुकते हैं. उनका हाल अब आप जानेंगे.
सावली केयर सेंटर… जी हां यही वह नाम था जहां पर रात को मुझे रुकना था और अगले 1 हफ्ते तक भी। यह सेंटर चैतन्य प्रतिष्ठान संस्थान के द्वारा संचालित था। दो मंजिला लेकिन टीन शेड वाला यह मकान अंदर से आपको फुली एसी और किसी होटल की तरह एहसास कराता है। यहां पर रियायती दर पर ₹100 प्रतिदिन के हिसाब से बेड मिलता है। कोई चाहे तो ₹3000 देकर सेपरेट रूम भी ले सकता था। ग्लास का पार्टीशन किए हुए छोटे छोटे रूम बने हुए। आप पूछेंगे वहां पर फैसिलिटी क्या थी। तो साफ सुथरा कमरा। बाथरूम। छोटी सी लाइब्रेरी और छोटा सा किचन। तमाम फैसिलिटी वहां पर थी।
सुबह उठते ही मैंने तैयार होकर टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल का रुख किया। वहां जाने के लिए मुझे बमुश्किल 10-15 मिनट लगे। वह भी पैदल ही। टाटा मेमोरियल तक पहुंचने में मुझे ज्यादा कोई परेशानी नहीं हुई। रास्ते में भोईवाड़ा पुलिस थाना भी आता है। टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल की 3 या 4 बिल्डिंग है जिसमें मुख्य भवन, गोल्डन जुबली बिल्डिंग, एनएक्स बिल्डिंग और होमी भाभा शामिल है।
टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल की सिक्योरिटी काफी टाइट है. सुबह एंट्री के समय 10 से 12 के बीच और रात को 7:00 बजे के बाद आपकी एंट्री रोक दी जाएगी, अगर आपके पास विजिटर कार्ड नहीं है। बाकी समय में आप एंट्री कर ही लेते हैं। हॉस्पिटल में आपको कहीं भी जाने के लिए परेशान होने की जरूरत नहीं। हर कदम पर लोग आपकी पूरी हेल्प करते हैं। यहां तक कि दूरदराज से आए लोगों को परेशानी ना हो इसलिए मैप- नक्शा तक बना कर भेज देते कि आपको किसी वार्ड या ऑफिस में कैसे पहुंचना है।
टाटा मेमोरियल की मुख्य बिल्डिंग में सेकंड फ्लोर पर दो जनरल वार्ड हैं। ए विंग और बी विंग। एक विंग में लेडीज पैशेंट और एक में जेंट्स पैशेंट रहते हैं। यहां कैंसर पीड़ित बच्चों के लिए एक अलग वार्ड है, जिसमें दिल का बहुत मजबूत इंसान ही एंट्री कर सकता है। ऐसा क्यों यह हम आपको बाद में बताएंगे...।
जिस वार्ड में हम थे वहां पर ज्यादातर मरीज गले के कैंसर वाले या मुंह के कैंसर वाले थे। इनमें भी बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल या साउथ के मरीजों की संख्या ज्यादा थी। कुछ यूपी- एमपी से भी थे। मुझे एक खास बात यह लगी कि नर्स, वार्ड बॉय और डॉक्टर, सभी हेल्पिंग नेचर के थे। यहां रहने वाले मरीजों के अटेंडेंट भी लोगों की हर तरह से मदद करते हैं।
आज मेरा हॉस्पिटल में पहला दिन था, इसलिए मैंने पूरा दिन हॉस्पिटल के सिस्टम को समझने में लगाया। जैसा कि मुंबई का सबसे बड़ा हॉस्पिटल है, इसलिए यहां पर तमाम सुविधाएं अत्याधुनिक किस्म की है। यानी दवाइयों के लिए आपको पहले से पेमेंट जमा करनी होती है, हॉस्पिटल के अकाउंट में। उसके बाद आप मरीज का टोकन नंबर या कार्ड नंबर लेकर कभी भी मेडिकल स्टोर से दवाइयां परचेज कर सकते हैं। इसके अलावा दवाइयां लेने के लिए आपको पर्ची लेकर नहीं घूमना पड़ता, दवाइयों की लिस्ट ऑनलाइन कर दी जाती है। आप मेडिकल स्टोर में जाकर आसानी से दवाइयां ले सकते हैं।
*अगली किस्त में आप पढ़ेंगे…*
👉 आखिर कैसी है मुंबई की लाइफ.
👉 मुंबई में लोकल ट्रेन के सफ़र की कुछ बातें
👉 और कैंसर पीड़ितों के लिए संचालित ट्रस्ट, धर्मशाला और संस्थान की बातें…
_*तो पढ़ते रहिए मेरी पहली मुंबई यात्रा…*_
शुक्रिया
_*रामकृष्ण डोंगरे*_

Friday, January 18, 2019

मेरी पहली मुंबई यात्रा- पहली किस्त

3 जनवरी : कभी ना सोने वाला शहर मुंबई। जो कभी बंबई कहलाता था। बम.. बम…बम… बंबई। बंबई हमको जम गई। आमची मुंबई। मुंबई मेरी जान। कितने ही नामों से इस शहर को लोगों ने पुकारा है। मुंबई देखना हर किसी का सपना होता है। हमारी भी चाहत थी कि एक बार मुंबई की सैर की जाए।

लेकिन जिस तरह से यह यात्रा हुई है। भगवान ना करें किसी और की हो। हम ऐसा क्यों कह रहे हैं, इसके लिए आपको थोड़ा पीछे जाना होगा। मुंबई जाने का जो अचानक प्लान बना, उसके पीछे था कैंसर। जी हां, वही कैंसर की बीमारी जो इन दिनों आम हो चली है।

क्रिकेट, फिल्म और राजनीति के बड़े नाम भी इसकी चपेट में है। हाल ही में हमारे देश के 2 बड़े राजनेताओं को भी कैंसर हो गया है। हमारे एक रिलेटिव को कैंसर डिटेक्ट हुआ था, आज से करीब डेढ़ साल पहले। उनका मुंबई के बड़े हॉस्पिटल टाटा मेमोरियल में इलाज चल रहा है। जहां वे अब ज्यादा स्वस्थ महसूस कर रहे हैं।

तो जैसा कि अंदेशा था कि अचानक कभी भी मुझे मुंबई जाना पड़ सकता है और वह तारीख आ गई 3 जनवरी 2019। ऑफिस से किसी तरह छुट्टी लेकर मैं देर रात की गीतांजलि एक्सप्रेस से मुंबई के लिए रवाना हुआ। रायपुर स्टेशन से जब ट्रेन छूटी। समय था रात के 2:30 बजे का। थर्ड एसी में रिजर्वेशन था। हालांकि वेटिंग टिकट था। रात को टीटी ने आकर सेकंड एसी का कंफर्म टिकट बनाया। इस तरह सफर शुरू हुआ मुंबई का। लगभग पूरा सफर सोने में ही बीता।

हालांकि दिन में कुछ समय मुसाफिरों से सार्थक चर्चा भी हुई। इसमें एक थे माइनिंग इंजीनियर, एक थे रेलवे के टेक्निकल इंजीनियर और एक थे आला अफसर। सभी से बातचीत में कई नई जानकारियां मिली। जैसे - खदानों में खास तरह के खनिज पदार्थ निकालने के लिए क्या-क्या मशक्कत होती है, किसी खदान में खतरनाक गैसों से कैसे बचा जाता है। माइनिंग इंजीनियर ने बताया कि सालों पहले खतरनाक गैसों का पता लगाने के लिए एक पिंजरे में एक पक्षी को लेकर जाया करते थे। और जब वह पक्षी तड़पने लगता था तो तत्काल बाद वहां से सारे कर्मचारी, मजदूर भाग जाते थे। क्योंकि पक्षी का तड़पना इस बात का संकेत होता था कि वहां से खतरनाक गैस शुरू हो गई है। और ज्यादा देर तक रुकने से मौत हो सकती है। इसी तरह चर्चा यह भी हुई कि देश के किन राज्यों में कहां-कहां पर कीमती खनिज तत्वों सोने, चांदी, यूरेनियम आदि की खदानें हैं।

रायपुर से होकर नागपुर, भुसावल और नासिक रोड होते हुए रात 9:00 बजे करीब हम मुंबई के दादर स्टेशन पर उतरे। दादर छत्रपति शिवाजी टर्मिनल के पहले आता है। और क्योंकि हमें दादर इलाके में ही जाना था, इसीलिए हमने यहीं पर उतरने का फैसला किया। दादर स्टेशन से बाहर निकलते ही मुंबई के बाजार से सामना होगा। वह बाजार, जहां मुसाफिरों के लिए जरूरत की हर चीजें मिल जाती है। वह भी बेहद सस्ते दामों में।

अगली किस्त में आप पढ़ेंगे…

आखिर कहां मिला हमें ठौर ठिकाना…

मुंबई में रात को वहां तक पहुंचते वक्त कैसा महसूस हुआ…

कैसा होता है टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल का नजारा…

तो इंतजार कीजिए अगली किस्त का…

शुक्रिया…