Sunday, July 12, 2015

विज्ञप्ति, प्रेसनोट और सरकारी खबर... इसके अलावा भी होती है खबरें..


मीडिया से जुड़े हम लोगों को इन शब्दों से रोज ही दो-चार होना पड़ता है. अखबारों में विज्ञापन का दबाव बढ़ने से प्रेस रिलीज के लिए स्पेस कम होते जा रहा है। यह तो मानना पड़ेगा कि इनका अपना महत्व होता है- अखबार के लिए भी और आमजन के लिए भी।
मगर हम खबरों के दबाव में विज्ञप्ति या सरकारी खबरों से अक्सर चिढ़ते है। हम सालों से अखबार और तमाम खबरों को पढ़ते आ रहे हैं। खबरों में नयापन कैसे लाया जाता है...खासकर सिटी की खबरें यानी सड़क, बारिश जैसे तमाम मुद्दों में नया एंगल क्या हो सकता है, यह सब मैंने पिछले दो साल में सीखा-देखा।
इससे पहले मैं सेंट्रल डेस्क पर रहा। जहां मेरा वास्ता देश और तमाम राज्यों की बड़ी खबरों से पड़ता था। छिंदवाड़ा या भोपाल में चाहे मेरी शुरुवात सिटी से ही हुई थी मगर मुझे ऐसी कुछ खबरें याद नहीं आती।
इस मसले पर मैं फिर से बात करूंगा।

शुक्रिया दोस्तों।

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Tuesday, June 9, 2015

कुठियाला हटाओ, माखनलाल बचाओ : चौथी किस्त

#savemcu #savejournalism #लड़ाईजारीहै


यूनिवर्सिटी की ताजा व्यवस्था या अव्यवस्थाजो कि जूनियर साथियों के जरिए हम तक पहुंची हैं। लाइब्रेरी की टाइमिंग बदलनाकंप्यूटर लैब की टाइमिंग बदलना कई बंदिशें। पत्रकारिता जगत के सीनियर पत्रकारों से   रूबरू करानेउनके अनुभवों से लाभ मिलने के अवसरों का कम हो जाना।

पत्रकारिता के गुर सीखने के लिए निकलने वाले विकल्प और अन्य लैब जर्नल का काम ठप हो जाना। सेमेस्टर एग्जाम के बाद होने वाली इंटर्नशिप पर पाबंदी कहते हैं कि कुलपति कुठियाला के काले कारनामे की  फेहरिस्त काफी लंबी है। क्या ऐसे कुलपति को अपने पद पर विवि में बने रहने का कोई हक होना चाहिए   कदापि नहीं तो हमारी लड़ाई जारी रहेगी

कुठियाला हटाओमाखनलाल बचाओ

 का नारा हम सब बुलंद करना ही होगा।


... और #लड़ाईजारीहै 

कुठियाला हटाओ, माखनलाल बचाओ : तीसरी किस्त

#savemcu #savejournalism #लड़ाईजारीहै


यूनिवर्सिटी से पासआउट होने के बाद लगातार आठ साल से पत्रकारिता के फील्ड में हूं। यूनिवर्सिटी में आने से पहले रिपोर्टिंग कीफिर डेस्क पर वर्किंग यूनिवर्सिटी के उन दिनों को बहुत मिस करते हैं। वहां के लेक्चर अटेंड करना लैब जर्नल विकल्प को निकालने का अनुभव अलग-अलग फील्ड के नामी लोगों से मिलने-सीखने को अवसर मिला। देशभर के बड़े मीडिया में कार्यरत हमारे सीनियर्स से मिलने बात करने का मौका मिला। माखनलाल विवि के ताजा विवाद के बाद हम सबकी चिंता का विषय यही है कि क्या यूनिवर्सिटी की आने वाली पीढ़ी इन खूबसूरत लम्हों को जी पाएगी।

पिछले चारपांच साल से पूरी तरह से भोपाल से दूर हूं। साल 2010 का विवाद दिल्ली में अमर उजाला में कार्यरत रहने के दौरान घटा। मगर इस सबसे कुछकुछ अंजान ही थे हम। क्योंकि उन दिनों सोशल मीडियाआज की तरह सबके पास नहीं था। कुलपति कुठियाला द्वारा एक एचओडी को एक संगीन आरोप लगाकर हटाना। घोर निंदनीय कृत्य था। और अब ताजा विवाद रोटेशन के नाम पर सीनियर लोगों के साथ ऐसा बर्ताव

... जारी (अगली किस्त में)