Tuesday, June 9, 2015

कुलपति कुठियाला के खिलाफ... #लड़ाईजारीहै #savemcu #savejournalism

#savemcu #savejournalism #लड़ाईजारीहै
पुष्प की अभिलाषा चाह नहीं, मैं सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊं राष्ट्रकवि माखनलाल चतुर्वेदी और माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विवि भोपाल दोस्तों, आपको याद तो होगा ही चलिए फिर से याद करते हैं। इस बार मौका है- सेव एमसीयू, सेव जर्नलिज्म, लड़ाई जारी है के साथ कुठियाला हटाओ, माखनलाल बचाओ। 
यहां के कुछ मौजूदा और पुराने छात्रों ने कई मुद्दों को लेकर सोशल मीडिया पर विवि के कुलपति बीके कुठियाला के खिलाफ मुहिम शुरू की है। छात्रों से जुड़े मद्दे है जैसे- इंटर्नशिप, प्लेसमेंट, लाइब्रेरी, कंप्यूटर लैब की टाइमिंग, सीनियर प्राध्यापकों की अवहेलना और कम योग्य प्राध्यापकों को प्रश्रय देना। इसके साथ ही कुलपति की गलत नीतियां। लड़ाई किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं उस व्यक्ति के तालिबानी फरमानों के खिलाफ चल रही हैं।

छात्रों का आंदोलन जोर पकड़ रहा है। छात्रों की द्वारा बनाए फेसबुक पेज पर अब तक 1200 से ज्यादा लोग जुड़ चुके हैं। यह आंदोलन इसी विवि में साल 2001 में महीनेभर तक चले एक और आंदोलन की याद दिला रहा है। उस वक्त भी छात्रों ने इंटर्नशिप, छात्रों की फीस के मुद्दे पर लगातार आंदोलन चलाया था। आखिरकार विवि प्रशासन को छात्रों की सभी मांगों को मानना पड़ा था। मतलब साफ है कि छात्रों की जायज मांगों के सामने विवि प्रशासन को झुकना पड़ा था और इस बार भी झुकना पड़ेगा।

रेडियो एफएम आकाशवाणी छिंदवाड़ा ने मेरे अंदर जुनून पैदा किया। मीडिया में आने के लिए प्रेरित किया। उन दिनों मैं हिंदी लिटरेचर से एमए प्रिवियस की पढ़ाई कर रहा था। साल था 2003 अचानक एक मित्र माखनलाल (एमसीयू) जा पहुंचा। इधर मैं पत्रकारिता के पेशे से जुड़ता चला गया। कॉलेज फंक्शन की खबरें बनाना और अखबारों में देना। फिर अनियमित रूप से लोकमत समाचार से जुड़ गया। कई खबरें पब्लिश हुई और पत्रकार बनने की दिशा में आगे बढ़ गया

एमए कम्पलीट होते ही 5 जुलाई, 2004 को भोपाल जा पहुंचा। पढ़ाईपढ़ाई और लगातार पढ़ाई के बाद फिर तुरंत एडमिशन लेने का कोई इरादा नहीं था। सो स्वदेश न्यूजपेपर में नौकरी शुरू की। जॉब के दौरान कई लोगों से मिलना जुलना हुआ। आखिर कुछ शुभचिंतकों की सलाह पर साल 2005 में माखनलाल चतुर्वेदी विवि में एडमिशन ले लिया। उससे पहले भी कई पुराने पत्रकारों ने कहा- भैया पत्रकार क्यों बनना चाहते हो, कुछ और कर लो। पढ़े-लिखे हो। लेकिन हम नहीं माने, क्योंकि हमें तो पत्रकार ही बनना था।

माखनलाल में एडमिशन लेने के बाद यहां के माहौल का पता चला। भोपाल शहर में यहां-वहां कई बिल्डिंगों में बिखरें कमरों में लगने वाले डिपार्टमेंट और इनमें पढ़ने वाले स्टूडेंट्स ही पूरी माखनलाल यूनिवर्सिटी थी। एक बार का वाकया है मुझे किसी काम से -8 त्रिलंगा, अरेरा कॉलोनी में यूनिवर्सिटी में जाना था। मिनी बस से उतरते ही मैंने लोगों से माखनलाल विवि का एडरेस पूछा। काफी मशक्कत करने के बाद ही मुझे विवि की बिल्डिंग का रास्ता मिला। मतलब साफ है कि आम लोग विवि की बिल्डिंग को नहीं उन कुछ कमरों में चलने वाले डिपार्टमेंट और उन काबिल स्टूडेंट्स के सहारे विवि को जानते थे आज भी कुछ नहीं बदला है। किसी कॉलेज और यूनिवर्सिटी की पढ़ाई, वहां का माहौल और वहां से पढ़े बच्चों की काबिलियत ही सबसे ज्यादा मायने रखता है।

यूनिवर्सिटी से पासआउट होने के बाद लगातार आठ साल से पत्रकारिता के फील्ड में हूं। यूनिवर्सिटी में आने से पहले रिपोर्टिंग की. फिर डेस्क पर वर्किंग यूनिवर्सिटी के उन दिनों को बहुत मिस करते हैं। वहां के लेक्चर अटेंड करना लैब जर्नल विकल्प को निकालने का अनुभव अलग-अलग फील्ड के नामी लोगों से मिलने-सीखने को अवसर मिला। देशभर के बड़े मीडिया में कार्यरत हमारे सीनियर्स से मिलने बात करने का मौका मिला। माखनलाल विवि के ताजा विवाद के बाद हम सबकी चिंता का विषय यही है कि क्या यूनिवर्सिटी की आने वाली पीढ़ी इन खूबसूरत लम्हों को जी पाएगी।

पिछले चार-पांच साल से पूरी तरह से भोपाल से दूर हूं। साल 2010 का विवाद दिल्ली में अमर उजाला में कार्यरत रहने के दौरान घटा। मगर इस सबसे कुछ-कुछ अंजान ही थे हम। क्योंकि उन दिनों सोशल मीडिया, आज की तरह सबके पास नहीं था। कुलपति कुठियाला द्वारा एक एचओडी को एक संगीन आरोप लगाकर हटाना। घोर निंदनीय कृत्य था। और अब ताजा विवाद रोटेशन के नाम पर सीनियर लोगों के साथ ऐसा बर्ताव

यूनिवर्सिटी की ताजा व्यवस्था या अव्यवस्था, जो कि जुनियर साथियों के जरिए हम तक पहुंची हैं। लाइब्रेरी की टाइमिंग बदलना, कंप्यूटर लैब की टाइमिंग बदलना कई बंदिशें। पत्रकारिता जगत के सीनियर पत्रकारों से रूबरू कराने, उनके अनुभवों से लाभ मिलने के अवसरों का कम हो जाना।

पत्रकारिता के गुर सीखने के लिए निकलने वाले विकल्प और अन्य लैब जर्नल का काम ठप हो जाना। सेमेस्टर एग्जाम के बाद होने वाली इंटर्नशिप पर पाबंदी कहते हैं कि कुलपति कुठियाला के काले कारनामे की फेहरिस्त काफी लंबी है। क्या ऐसे कुलपति को अपने पद पर विवि में बने रहने का कोई हक होना चाहिए कदापि नहीं तो हमारी लड़ाई जारी रहेगी

कुठियाला हटाओ, माखनलाल बचाओ

का नारा हम सब बुलंद करना ही होगा।

Thursday, May 7, 2015

भड़कीली शादियां और शादी को सामाजिक मान्यता पर सवाल

10 रुपए से लेकर 10 हजार तक के महंगे शादी के कार्ड

खर्चीली,  भड़कीली यानी ताम-झाम से लबरेज शादियां थमने का नाम नहीं ले रही है। शुरुआत- महंगे-महंगे शादी के कार्ड से होती है। इनकी कीमत अब 5, 10 रुपए से लेकर 8 या 10 हजार तक पहुंच गई है। इसके बाद शुरु होता है लंबा सिलसिला। लाखों के गहने, कपड़े,  दहेज का साजो-सामान, फोर व्हीलर गाड़ी, मैरिज हॉल, कैटरिंग,बारात की गाड़ियां की लंबी कतारें, डीजी... आदि-आदि।

और ये सब किसलिए। शादी को सामाजिक मान्यता के लिए...। कम खर्चों में कोई परिवार अगर साधारण तरीके से शादी करना चाहे तो सब कहते है- समाज क्या कहेगा। समाज के लोग, नाते-रिश्तेदार, दोस्त-भाई ताने देंगे। क्या इनके घर में पैसे नहीं है।

साधारण शादी की पहल पर कोई साथ नहीं देता

अगर कोई परिवार में कोई लड़का या लड़की सिम्पल शादी की बात अपने माता-पिता से कहता है तो कोई तैयार नहीं होता। मैं स्वयं और मुझ जैसे कई लोग हो सकते हैं जो साधारण शादी की पहल करने को तैयार थे। मगर माता-पिता या रिश्तेदारों ने उनका साथ नहीं दिया।

एसएमएस, ई-मेल, वाट्सएप फिर भी निमंत्रण कार्ड

कम्युनिकेशन के तमाम साधनों के बावजूद हम हजारों-लाखों के कार्ड छपवाकर, उस पर भी लाखों का पेट्रोल फूंककर, कीमत समय बर्बाद करके अपना बड़प्पन दिखाने के लिए घर-घर कार्ड पहुंचाना जरूरी समझ रहे हैं। इसे आप क्या कहोगे। जबकि आज हाथ में मोबाइल है। कुछ पैसों में बात हो जाती है। एसएमएस भेज सकते हैं। ई-मेल, वाट्सएप, फेसबुक तमाम सुविधाएं मौजूद है। फिर भी पचासों साल पुरानी घर-घर निमंत्रण कार्ड बांटने की परम्परा को निभा रहे हैं।

ऐसे तमाम सवाल हमारे सामने खड़े हैं। इन्हें हम कब तक नजरअंदाज करते रहेंगे।

हम भारतीय शादियों में इतना ज्यादा खर्च करते है  जिसका कोई हिसाब नहीं। शादी को लेकर किस तरह का उत्साह रहता है, सब जानते हैं। रहना भी चाहिए, मगर क्या हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि यह अंधी दौड़ कहां जाकर थमेगी। हालांकि कुछ अच्छी शुरुआत की खबरें भी अब तक आ रही है। जैसे- कई परिवार के लोग भी अपने बच्चों की शादियां सामूहिक विवाह समारोह में कराने लगे हैं। इसके अलावा कई परिवारों में दहेज में कई गाड़ियां भरकर लाखों का साजो-सामान देने की बजाय लड़की का एकाउंट खुलवाकर माता-पिता और रिश्तेदार पैसे जमा करने लगे है। इन सब सकारात्मक पहल से सभी को प्रेरणा लेना चाहिए।
- रामकृष्ण डोंगरे तृष्णा

Sunday, April 5, 2015

चलो सांवगा विठोबा : मनोकामना पूरी करने के लिए जलाते हैं लाखों का कर्पूर

महाराष्ट्र के अमरावती जिले में चांदूर रेलवे इलाके में स्थित है गांव सांवगा। यहां पर बने विठोबा संस्थान उर्फ श्रीकृष्ण अवधुत बुवा संस्थान के द्वारा हर साल गुड़ी पाड़वा के मौके पर 10 दिन का गुड़ी पाड़वा यात्रा महोत्सव का आयोजन किया जाता है। संयोगवश इस बार वहां जाने का मौका मिला।

महाराष्ट्र के विदर्भ इलाके के तमाम जिलों और देश के अन्य इलाकों से लाखों की संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। यह धार्मिंक कार्यक्रम रामनवमी तक चलता है। विठोबा संस्थान में गुड़ी पाड़वा के दिन 72 से 77 फुट ऊंचे दो झंडों पर कपड़ा चढ़ाने की रस्म अदा की जाती है।  इसी दौरान लाखों श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी करने के लिए शाम को 4 बजे से रात बारह बजे तक लगातार कर्पूर जलाते हैं। कुछ लोग अपने वजन के बराबर भी कर्पूर जलाते हैं।

बच्चे-बूढ़े और युवा सभी ईट या पत्थर के ऊपर कर्पूर रखकर जलाते हैं। इस दौरान विठोबा संस्थान के आसपास, गांव की गलियों में और घर की छतों पर कर्पूर जलाते हुए श्रद्धालु ही नजर आते हैं। गांव के आसमान में काला धुंआ मंडराते रहता है। तीन सौ या पांच सौ घरों वाले गांव में पैर रखने के लिए भी जगह नजर नहीं आती। गांव के बाहर मेला लगता है। मगर कई दुकान गांव के अंदर भी होती है। कुछ लोग घूम-घूमकर कर्पूर बेचते हैं। रातभर यहां पर दूर-दूर से आने वाली मंडलियां भजन गाती है।

सांवगा के विठोबा संस्थान में एक प्रसिद्ध संत की समाधि भी है। इस गांव में भगवान श्रीकृष्ण के आगमन की भी चर्चाएं है। ऐसी मान्यता है कि रुक्मणी के अपहरण के दौरान भगवान कृष्ण इस गांव में आए थे।
इस यात्रा की एक विशेषता यह भी बताई जाती है कि सवा महीने का कठिन उपवास करने पर बीमारियां दूर होती है और लोगों की मनोकामना पूरी होती है।

इस यात्रा के लिए परिवहन विभाग की ओर से विशेष रूप से बसों की व्यवस्था की जाती है। साथ ही यहां पर पार्किंग के बेहतर इंतजाम और पुलिस जवानों की तैनाती भी की जाती है।
  


Friday, September 12, 2014

छत्तीसगढ़ के साहित्यकार- तीसरी किश्त

छत्तीसगढ़ के साहित्यकार... लगातार 
प्रदेश के गज़़लकारों ये प्रमुख नाम शुमार है। लाला जगदलपुरी, अमीर अली अमीर, नीलू मेघ, डॉ. महेन्द्र ठाकुर। अब छत्तीसगढ़ प्रदेश व्यंग्य प्रदेश के रूप में चर्चित होने लगा है। शब्दों के बम से वार करने वाले ऐसे सेनापतियों को हम प्रदेश के प्रथम व्यंग्यकार शरद कोठारी (दास्तान दो जमूरों की, चित्र और चरित्र), तीस से अधिक व्यंग्य संग्रहों के रचनाकार लतीफ घोंघी, विनोद शंकर शुक्ल (मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएं, कबिरा खड़ा चुनाव में), प्रभाकर चौबे (विज्ञापन के बहाने), त्रिभुवन पांडेय (पम्पापुर की कथा), गिरीश पंकज (भ्रष्टाचार विकास प्राधिकरण एवं मिठलबरा की आत्मकथा), स्नेहलता पाठक (द्रोपदी का सफरनामा) आदि के नाम से जानते हैं। स्व. रवीन्द्र कंचन के व्यंग्य लेखन ने जो जोखिम उठाया वह कम लोगों को ज्ञात है। उनके एक व्यंग्य पर (सूचक, इंदौर में प्रकाशित) घरघोड़ा में इतनी हाय तौबा मची कि उन्हें प्राण बचाने के लिए महीनों घर छोड़कर अंडरग्राउंड रहना पड़ा।

प्रमुख कहानीकारों में लाला जगदलपुरी, महरुन्निसा परवेज, गुलशेर अहमद शानी, स्व. दामोदर सदन, जया जादवानी आदि प्रमुख हैं। मशहूर कहानीकार दामोदर सदन ने अपने जीवन का काफी समय मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में बिताया।

ललित निबंधकार जयप्रकाश मानस की प्रमुख कृतियों काम के भाग, ग्राम के प्रथम शुभचिंतक, घर आंगन के रचयिता, देवरास, जामुन का पेड़ आदि ने लोगों का ध्यान खींचा। उनका पहला ललित निबंध संग्रह-दोपहर गांव- आया है। यह समूचे छत्तीसगढ से अब तक प्रकाशित पहली किताब है जो संपूर्णतः इंटरनेट पर उपलब्ध है। इसके अलावा डॉ. महेश परिमल का नाम भी ललित निबंध के क्षेत्र में पहचाना जाने लगा है। उनका एक संग्रह भी प्रकाशित हुआ है, जिसका नाम है- लिखो पाती प्‍यार भरी। डॉ परिमल मूल रूप से महासमुंद के हैं, फिलहाल भोपाल में रहते हैं। इन्‍होंने हिंदी समाचारपत्रों के शीर्षकों पर पीएचडी की है।

स्त्रोत- विकीपीडिया

छत्तीसगढ़ के साहित्यकार - दूसरी किश्त

छत्तीसगढ़ के साहित्यकार... लगातार
इधर विनोद कुमार शुक्ल का नाम काफी चर्चा में रहता है। शुक्ल हिंदी के प्रसिद्ध कवि और उपन्यासकार हैं। 1937 राजनंदगांव, छत्तीसगढ़ में जन्मे शुक्ल ने प्राध्यापन को रोजग़ार के रूप में चुनकर पूरा ध्यान साहित्य सृजन में लगाया। आपकी प्रमुख कृतियां है- नौकर की कमीज, दीवार में एक खिड़की रहती थी, खिलेगा तो देखेंगे। नौकर की कमीज पर फिल्मकार मणिकौल ने इसी से नाम से फिल्म भी बनाई। कई सम्मानों से सम्मानित विनोद कुमार शुक्ल को उपन्यास- दीवार में एक खिड़की रहती थी, के लिए वर्ष 1999 का साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हो चुका है।

समकालीन हिंदी कविता में अपनी लगातार मौजूदगी से छत्तीसगढ़ को पहचान देने वाले कवियों में प्रभात त्रिपाठी, एकांत श्रीवास्तव, शरद कोकास, माझी अनंत, बसंत त्रिपाठी, ललित सुरजन आदि प्रमुख हैं। एकांत श्रीवास्तव का जन्म 8 फ़रवरी 1964 को हुआ। आपके प्रमुख काव्य संकलन- अन्न हैं मेरे शब्द, मट्टी से कहूँगा धन्यवाद और बीज से फूल तक। श्रीवास्तव जी को अब तक साहित्य के सम्मानों से नवाजा जा चुका है।  इधर जयप्रकाश मानस, पुष्पा तिवारी, गिरीश मिश्र आदि संभावना से पूर्ण कवि के रूप में सामने आ रहे हैं।
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हिंदी गीत रचकर अपनी खास पहचान बनाने वालों में आनंदी सहाय शुक्ल, नारायणलाल परमार, नरेन्द्र श्रीवास्तव, राम कुमार वर्मा, रामअधीर प्रमुख हस्तियां हैं। रायगढ़ के जनकवि आनंदी सहाय 85 साल की उम्र पार कर चुके हैं। परमार छत्तीसगढ़ के प्रमुख साहित्यकारों में गिने जाते हैं। आधी सदी से भी अधिक समय तक वे देश भर की पत्र पत्रिकाओं में छपे, उनके गीत रेडियो से बजते रहे, कवि सम्मेलनों में उनकी उपस्थिति निरंतर बनी रही और पाठ्यपुस्तकों के जरिए लाखों बच्चों ने उनकी रचनाओं को पढ़ा।
स्त्रोत- विकीपीडिया

छत्तीसगढ़ के प्रमुख साहित्यकार- पहली किश्त

इन दिनों छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर का बाशिंदा हूं। यहां मैं राज्य के कुछ चर्चित लेखक और कवियों का उल्लेख कर रहा हूं। भारतेंदु मंडल के अग्रगण्य सदस्य ठाकुर जगमोहन सिंह की कर्मभूमि छत्तीसगढ़ ही थी। पद्यश्री पं. मुकुटधर पांडेय को प्रदेश का प्रथम मनीषी कहा जाता है। उन्हें छायावाद का प्रवर्तक भी माना जाता है। पदुमलाल पन्नालाल बख्शी को छत्तीसगढ़ का श्लाका पुरुष कहा जाता है। उनकी रचना झलमला हिंदी की पहली लघुकथा मानी जाती है। उन्होंने सरस्वती जैसी महत्वपूर्ण पत्रिका का संपादन किया था। हिंदी की पहली कहानी टोकरी भर मिट्टी के लेखक माधवराव सप्रे भी इसी धरती पर पैदा हुए थे। 
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गजानन माधव मुक्तिबोध को न केवल छत्तीसगढ़ अपितु सारा देश कभी भी नहीं भूल सकता। वे बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी साहित्यकार थे। वे हिन्दी साहित्य में सर्वाधिक चर्चा के केंद्र में रहने वाले कवि रहे। वे कहानीकार भी थे और समीक्षक भी। उनकी विश्व प्रसिद्ध कृतियां हैं- चांद का मुंह टेढा़ है, अंधेरे में, एक साहित्यिक की डायरी। उनके बेटे दिवाकर मुक्तिबोध छत्तीसगढ़ के वरिष्ठ पत्रकारों में शुमार है। वे लंबे समय से कई अखबारों के साथ जुड़े रहे हैं। वे वर्तमान में दैनिक अमन-पथ में संपादक है। उनकी दो किताबें प्रकाशित हुई- ‘इस राह को गुजरते हुए’ और ‘36 का चौसर’।

हिंदी के आधुनिक काल में श्रीकांत वर्मा राष्ट्रीय क्षितिज पर प्रतिष्ठित कवि की छवि रखते हैं, जिनकी प्रमुख कृतियां- माया दर्पण, दिनारम्भ, छायालोक, संवाद, झाठी, जिरह, प्रसंग, अपोलो का रथ आदि हैं।
श्रीकांत वर्मा का जन्म 18 नवंबर 1931 को बिलासपुर में हुआ। वे गीतकार, कथाकार तथा समीक्षक के रूप में जाने जाते हैं। आपने दिल्ली में कई पत्र पत्रिकाओं में लगभग एक दशक तक पत्रकार के रूप में कार्य किया। 1966 से 1977 तक वे दिनमान के विशेष संवाददाता रहे। वर्मा जी राजनीति से भी जुड़े थे तथा लोकसभा के सदस्य भी रहे।
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स्त्रोत-  विकीपीडिया

Saturday, May 31, 2014

काश ये रात न आए

काश ये रात न आए,
दिन निकले, सुबह हो जाए....

फिर सुबह हो जाए
बस रात न आए....

काश ये रात ना आए...

हम जागते हैं,
ख्वाबों के पीछे भागते हैं...

क्या मिलता है हमें,
क्यूं हम सो जाए...

काश ये रात न आए,
हम सुबह तक सो न पाए...

- (अपने गांव तंसरा में तृष्णा की कलम से, अप्रैल 2014)