Tuesday, July 27, 2021

आप 'स्वर' साधने में यकीन करते हैं या 'सुर' ....

साधना कितनी जरूरी है... 

और आप 'स्वर' साधने में यकीन करते हैं या 'सुर' .... 

स्वर और व्यंजन.... जीवन में संतुलन के लिए कुछ लोग स्वर साधते हैं. स्वर की साधना करते हैं। इससे उन्हें 'व्यंजन' मिलता है। कुछ लोग सुर की साधना करते हैं। यह साधना कुछ ज्यादा कठिन होती है। 

जीवन में संतुलन, बैलेंस बनाना, कितना जरूरी होता है। इस बात का अंदाजा आप इससे भी लगा सकते है कि कुछ लोग जीवनभर साधते ही रहते हैं। इन्हें उसका फल भी मिलता है। रिजल्ट भी मिलता है। लेकिन जरूरी नहीं कि सभी को मिले। 

अगर आप एक मामूली-सा 100-500 शब्द का आर्टिकल भी पढ़े तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि लेखक ने अपने आर्टिकल में जोरदार प्रहार किया है। तीखा प्रहार किया है। या बैलेंस बनाया है। तो जो लोग जीवन में बैलेंस बनाकर चलते हैं। क्या वे लोग ज्यादा कामयाब होते हैं। या वे लोग ज्यादा सफल होते हैं जो हमेशा तीखा प्रहार करते हैं। कड़ी आलोचना करते हैं।

आपका अनुभव क्या कहता है। 

जहां तक मेरी बात की जाए तो मैं लगभग बैलेंस बनाकर चलता हूं। लेकिन यह भी है कि मुझे इसका बहुत ज्यादा फायदा जीवन में नहीं मिला है। मेरे बारे में कई लोगों की राय है कि मैं किसी से भी भिड़ जाता है। या मुझे ठीक ढंग से लोगों को साधना नहीं आता। तो जनाब मैं जैसा हूं वैसा ही रहूंगा। न बेवजह किसी को तवज्जो नहीं देता। न बेवजह किसी से उलझता हूं। 

कुछ लोग बैलेंस बनाने में इतने काबिल होते हैं कि उनके लिए एक नया शब्द गढ़ा गया है। छोड़िए...। 

लेकिन स्वर की साधना जरूरी है या सुर की साधना...। बड़ा सवाल तो है। 'व्यंजन' आपको ज्यादा मात्रा में स्वर की साधना से ही मिलता है। सुर की साधना से कम। 

ऐसा मेरा आकलन है। आप क्या सोचते हैं...

©® ब्लॉगर और पत्रकार *रामकृष्ण डोंगरे*

Tuesday, July 13, 2021

फेसबुक पोस्ट : दूसरों की मदद कीजिए

जब आप दूसरों के लिए कुछ करते हैं,
उसी पल खुशी की शुरुआत हो जाती हैं।

किसी की मदद करने के लिए धन ही जरूरी नहीं होता।
सिर्फ मन, वचन और कर्म से भी आप दूसरों की मदद कर सकते हो।

मैंने अपने जीवन में किसी की भी बहुत बड़ी आर्थिक सहायता की हो। ऐसा मुझे याद नहीं आता। लेकिन किसी भी जरूरतमंद को नौकरी दिलाने में भरपुर मदद करता हूं। मैं पत्रकारिता के पेशे में हूँ और देशभर में जहां भी संभव होता है। वहां लोगों की मदद करने की पूरी कोशिश करता हूं।

कुछ नहीं तो अब तक आधा दर्जन से ज्यादा लोगों को नौकरी दिला चुका हूं। और दर्जनों लोगों के लिए अपने स्तर पर लगातार प्रयास करते रहता हूं।

मेरा मानना है कि हम सिर्फ एक माध्यम है, जिन्हें ईश्वर ने चुना है किसी की मदद करने के लिए। बाकी योग्य व्यक्ति अपनी जगह और अपना भविष्य खुद बनाता है। उसे किसी के सहारे की जरूरत नहीं होती। सहारा तो कमजोर लोगों को दिया जाता है।

पत्रकारिता हो या कोई भी फील्ड हो। मुझे लगता है कि जो भी लोग अगर उस मुकाम पर हो कि आप किसी की मदद कर सकते हो। तो जरूर करना चाहिए। आपको करना भी क्या है। मार्गदर्शन। ईमेल आईडी। राइट पर्सन का नाम बताना। या वहां तक सीधे जरूरतमंद को पहुंचाना है। बस। इतना ही तो करना होता है।

क्या आप इतना भी नहीं कर सकते।

याद रखें, अगर आप दूसरों की मदद करते है
तो ईश्वर भी कभी आपकी मदद जरूर करेगा।

©® रामकृष्ण डोंगरे 
#डोंगरे_की_डायरी #छिंदवाड़ा_डायरी #मदद

Wednesday, June 30, 2021

मेरी मोबाइल गाथा -2: मुझे छह साल लग गए थे 3जी मोबाइल फोन लेने में

मैंने पहला 3G मोबाइल 8 अगस्त 2014 को खरीदा था सैमसंग गैलेक्सी कोर-2

Samsung C170

साल 2007 में माखनलाल यूनिवर्सिटी से MJ पास करने के बाद हम जॉब करने के लिए अमर उजाला नोएडा पहुंचे। तब फिर नए मोबाइल की कशमकश शुरू हुई। उस समय मोबाइल नंबर पोर्ट करने की फैसिलिटी नहीं थी। इसलिए मैंने अपना सिम छिंदवाड़ा में दीदी के दे दिया था। 

नया मोबाइल को परचेस करने के लिए फिर से रिसर्च चालू हुई। कुछ दोस्तों ने कहा कि 3G मोबाइल ही लेना चाहिए, क्योंकि 2008 में 3G लॉन्च होने वाला था. बजट नहीं होने की वजह से आखिर मैंने 3 जून 2007 को सैमसंग C170 हैंडसेट ₹3000 में खरीदा। जो ब्लैक कलर का और काफी स्लिम था.

दुनिया में 3जी मोबाइल सर्विस सबसे पहले जापान में 2001 में शुरू हुई थी। भारत महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड (MTNL) के द्वारा साल 2008 में 3G मोबाइल सेवा शुरू की थी। 

उस समय हम मोबाइल का इस्तेमाल सिर्फ कॉल, मैसेज और एफएम सुनने के लिए करते थे. मोबाइल से कुछ और काम संभव ही नहीं था. 28 दिसंबर 2007 को मैंने अपना पहला ब्लॉग पोस्ट किया। "डोंगरे की डायरी" नाम से बनाया था. इसी के साथ हम इंटरनेट की दुनिया से जुड़ गए. हालांकि इससे पहले माखनलाल यूनिवर्सिटी की पढ़ाई के दौरान ही ऑरकुट orkut पर अपना प्रोफाइल बन चुका था. इसके अलावा याहू पर ईमेल आईडी भी बना था. यह सब 2005 में एमसीयू में एडमिशन के बाद ही हुआ था. 

ऑरकुट प्रोफाइल के जरिए बाहरी दुनिया के कई लोगों से संपर्क होने लगा था. इसी ऑरकुट की बदौलत एक मित्र काशिफ अहमद फराज से दोस्ती हुई, जो झांसी के रहने वाले थे और भी कई लोग होंगे. आर्कुट से याद आया कि फेसबुक से पहले आर्कुट का बहुत क्रेज था। और हम लोग ₹10 प्रति घंटे नेट कैफे का चार्ज देकर खूब सर्फिंग करते थे। लड़कियों से दोस्ती करने के लिए उन्हें रिक्वेस्ट भेजते थे। कई लोगों से चैट भी होती थी। लेकिन उससे ज्यादा कुछ नहीं। हां डोंगरे की डायरी, छिंदवाड़ा छवि ब्लॉग बनने के बाद हर वीकली ऑफ पर कई घंटे कैफे जाते थे। कई बार 2-3 घंटे नेट कैफे में बिता देता था. एक पोस्ट को लिखना और उसे सजाना संवारना, इसी में वक्त बीत जाता था. 

आज का मशहूर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक हालांकि 26 सितंबर 2006 से इंडिया में आ चुका था. लेकिन लोगों के बीच पॉपुलर होने में इसे 1-2 साल लगे. मेरा पहला फेसबुक प्रोफाइल तो साल 2010 में जाकर बना था, जो कि मेरे मित्र श्री अमिताभ अरुण दुबे जी के सौजन्य से तैयार हुआ था। 

2009 में मैंने टाटा डोकोमो का एक मोबाइल लिया था। कीमत थी 1350 रुपये। जिससे सस्ती दरों पर बातचीत होती थी। हालांकि इस मोबाइल से जुड़ी कुछ खास यादें नहीं है। 

Samsung Metro Duos C3322

9 सितंबर 2012 को मैंने सैमसंग DUOS-C3322 मोबाइल में खरीदा था। जो कि डबल सिम वाला और 2 मेगापिक्सल कैमरा वाला मोबाइल था। माखनलाल में पढ़ाई के दौरान ही मैंने देखा कि मेरे कुछ जूनियर के पास Nokia 6600 मोबाइल था। और इससे अच्छी पिक्चर भी आती थी। इसकी फोटो हमने वीकली मैगजीन विकल्प में भी पब्लिश की थी। 

… तो सैमसंग C3322 मोबाइल आने के बाद मैंने छुट्टी में छिंदवाड़ा आने पर कई सारे फोटोग्राफ खीचें और उन्हें मोबाइल से ही फेसबुक पर भी अपलोड किए। 2जी सर्विस का इस्तेमाल करते हुए, इसी मोबाइल से मैं फेसबुक भी ऑपरेट करता था. सितंबर 2013 में रायपुर आने के बाद तक यह मोबाइल मेरे साथ था। 2014 तक यह मोबाइल मेरे पास था। 

अब आते हैं 3G और 4G स्मार्टफोन पर…. 

samsung galaxy core 2
8 अगस्त 2014 को मैंने पहला 3G मोबाइल खरीदा सैमसंग गैलेक्सी कोर 2। इसे मैंने 11500 रुपये में रायपुर में मोबाइल शॉप से खरीदा था। इसी मोबाइल के बाद मैंने व्हाट्सएप यूज करना शुरू किया। वाट्सएप ग्रुप बनाए फैमिली, फ्रेंड और आफिस के लिए। 

फिर 2 साल बाद मैंने ऑनलाइन वेबसाइट से पहला 4जी मोबाइल शाओमी रेडमी नोट 3, 3/32gb खरीदा। 26 सितंबर 2016 को खरीदें इस मोबाइल की कीमत थी 12,999 रुपये। इस मोबाइल को अभी भी यूज कर रहा हूं। रेडमी के मोबाइल से मुझे कभी कोई खास परेशानी नहीं हुई। हां 4G सेवा आने के बाद मोबाइल की बैटरी जरूर जल्दी खत्म हो जाती है।

इस मोबाइल से मैं सब कुछ ऑपरेट कर लेता हूं। किसी तरह की कोई परेशानी नहीं है। बात सिर्फ स्टोरेज की आती है। एक सफर- एक छुट्टी में कुछ फोटोग्राफ और वीडियो बना लिए तो मोबाइल का स्टोरेज फुल हो जाता है। तुरंत ही मोबाइल को खाली करना पड़ता है। एक वजह तो यह थी. लेकिन बड़ी वजह तो बच्चे की ऑनलाइन क्लास है, जिसके लिए मुझे नया मोबाइल लेना ही पड़ेगा। 

अब जब चर्चा 5जी की चल रही है। और 5जी पूरी तरह से इंडिया में आने में 1 से 2 साल का वक्त लग सकता है। लेकिन मोबाइल हैंडसेट तो अभी आ चुके हैं। तो क्या मुझे 5जी मोबाइल ही लेना चाहिए। या फिर 4जी मोबाइल से ही काम चलाना चाहिए। मोबाइल चॉइस करने में ब्रांड के अलावा मोबाइल का प्रोसेसर बहुत मायने रखता है, जिससे आपका मोबाइल स्मूथली चलता है। बाकी बैटरी बैकअप, कैमरा और स्टोरेज तो है ही। लेकिन जब इन सबको एक साथ रखकर हम कोई मोबाइल पसंद करते हैं तो "बड़ा बजट" हमारी जेब को अलाउड नहीं करता।

ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर कौन-सा मोबाइल खरीदें...? 

आप पढ़ रहे थे डोंगरे की डायरी…

अगली किस्त में फिर किसी विषय पर होगी चर्चा… 

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Monday, June 28, 2021

मेरी मोबाइल गाथा-1 : पहला मोबाइल 2004 में लिया था पेनासोनिक का एंटीना वाला, सेकंड हैंड एक हजार में

panasonic antenna phone

एक मिडिल क्लास फैमिली में जन्म लेने वाले लोगों का जीवन बड़ी मुश्किल से गुजरता है। ज्यादातर लोग अपनी हर जरूरत के लिए कड़ी मेहनत करते हैं। तब उन्हें वो चीजें मिलती है। मेरी जिंदगी में भी अब तक बहुत ज्यादा स्ट्रगल रहा है। सेकंड हैंड चीजों से हम मिडिल क्लास वालों को समझौता करना होता है। पापा ने घर के लिए सबसे पहले टू व्हीलर मोपेड लूना खरीदी थी। वह भी सेकंड हैंड थी। ₹4000 की। उसके बाद हमारे लिए साइकिल खरीदी। वो भी सेकंड हैंड थी। जब मैं कॉलेज पहुंचा तो मैंने छिंदवाड़ा में अपने लिए हरक्यूलिस की 800 रुपये की साइकिल खरीदी। वह भी सेकंड हैंड थी। जब मैं भोपाल पहुंचा तो मोबाइल की जरूरत महसूस हुई। तब 1000 रुपये में सेकंड हैंड मोबाइल खरीदा पैनासोनिक का। 

अभी हमारे पास दो स्मार्टफोन हैं। एक रेडमी नोट-3 3/32जीबी वाला, जो कि मैं इस्तेमाल करता हूं। और दूसरा श्रीमतीजी के पास सैमसंग गैलेक्सी कोर- 2 (512एमबी के स्पेस वाला)। इन मोबाइल के बारे में आपको बाद में बताऊंगा। पहले मूल विषय पर आते हैं। बच्चे की आनलाइन क्लास की वजह से हमें नया मोबाइल खरीदना पड़ रहा है। चूंकि सैमसंग गैलेक्सी मोबाइल में आनलाइन क्लास के लिए Google meet एप सपोर्ट नहीं कर रहा है। इस साल हमने 4 साल के बेटे का एडमिशन पीपीवन में करवाया है। इसलिए उसकी आनलाइन क्लास के चक्कर में जल्दी ही नया फोन लेना हमारी मजबूरी है। 

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ऑनलाइन क्लास के चक्कर में हर पैरेंट्स स्मार्टफोन अपने बच्चों के लिए खरीद रहे है। लेकिन जहां प्राइमरी तक के बच्चों को स्मार्टफोन से कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं होने लगी है। वही कम उम्र से ही स्मार्टफोन रूपी खिलौना मिलने के बाद बच्चों का ध्यान पढ़ाई पर कम रहता है, इसमें कोई शक नहीं है। इसलिए मैं 10वीं तक के बच्चों को स्मार्टफोन देने के पक्ष में नहीं रहता। बच्चों को पहले से ही टीवी देखने की लत लगी हुई है। अब फोन की लत लगेगी। फिर मोबाइल गेम्स की।

… मैं थोड़ा पीछे फ्लैशबैक में जाता हूं। जब मैं 1992 में सातवीं कक्षा में था. तब हमारे घर में पिताजी ने टीवी खरीदा था. उसके पीछे भी एक किस्सा है. दरअसल उस वक्त पूरे मोहल्ले में एक या दो ही टेलीविजन सेट थे. जहां हम रात को सीरियल या पिक्चर देखने के लिए जाया करते थे. एक दिन रात को 9-10 बजे लौटते वक्त किसी ने हमें डरा दिया. उसका शॉक मेरे बड़े भाई को बैठ गया। रातभर हम सभी लोग परेशान रहे। 

… और इस घटना के बाद मेरे पिताजी ने टीवी खरीदने का फैसला किया. टीवी आने के बाद हम लोग घंटों तक हर सीरियल, हर मूवी देखते रहते थे. कभी टीवी से दूर नहीं होते थे. इसका असर हमारे रिजल्ट पर साफ नजर आया. छठवीं क्लास की तुलना में सातवीं में मेरे पर्सेंटेज कम आए थे। इसीलिए बच्चों को मोबाइल से दूर ही रखना चाहिए. …

लेकिन अब ऐसा दौर आया है कि छोटा सा बच्चा भी मोबाइल यूज करने लगा है. आजकल के बच्चे तो आंख खोलते ही सामने मोबाइल देखते है। 

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1998 में जब कॉलेज पहुंचा तब मुझे मोबाइल के बारे में कुछ पता नहीं था. शायद एमए (2003-04) के दौरान एक या दो छात्रों के पास मोबाइल रहा होगा। जब 2004 में भोपाल पहुंचा तब मेरे रूममेट के कहने पर ही मैंने 9 अगस्त को एक हजार रुपए में पैनासोनिक का एंटीना वाला सेकंड हैंड मोबाइल लिया था। उससे भी ठीक ठाक बात नहीं होती थी। उस मोबाइल के कंकाल गांव के घर में कहीं बिखरे पड़े होंगे। जब मेरी सैलरी अठारह सौ रुपये महीना थी। उस वक्त 1000 रुपए का मोबाइल खरीदना, मेरे लिए बहुत बड़ी बात है। घर से संपर्क में रहने के लिए जरूरी था इसलिए मुझे मोबाइल खरीदना पड़ा। 

उस मोबाइल को करीब डेढ़ साल तक यूज किया होगा। 14 जुलाई 2004 को भोपाल में लगी मेरी पहली नौकरी स्वदेश अखबार से लेकर दुष्यंत संग्रहालय में जॉब और फिर सांध्य दैनिक अग्निबाण तक वो मोबाइल मेरे पास था। अग्निबाण मैंने 2005 में ज्वाइन किया था। इसी साल मैंने माखनलाल राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल में एडमिशन लिया। तब तक पैनासोनिक का मोबाइल मेरे पास था। जब मैं गांव जाता था, तब घर की छत पर चढ़कर सिग्नल पकड़ता था। क्योंकि तब तक गांव में टॉवर नहीं लगा था। 

nokia 1600
माखनलाल यूनिवर्सिटी में सुबह से क्लास और अखबार में सुबह की नौकरी… ये सब मैनेज नहीं हो पाया। और मेरी नौकरी छूट गई। उसके बाद साल जनवरी 2006 में मैंने राज्य की नई दुनिया में पार्ट टाइम जॉब शुरू किया। उस वक्त तक मेरा मोबाइल बिगड़ चुका था। 

आफिस में मोबाइल खरीदने के लिए दबाव बनाया जा रहा था। 4500 की सैलरी में कॉलेज का खर्च और घर खर्च किसी तरह संभाल रहा था। फिर मैंने अपने एक रिश्तेदार से पैसे उधार लिए। लेकिन पिताजी ने छिंदवाड़ा से भोपाल तक ट्रेन का सफर करके मुझ तक रकम पहुंचा दी। और तब जाकर मैंने 19 मार्च 2006 को 3350 रुपये में नोकिया-1600 मोबाइल खरीदा। 

इतना लेट कंप्यूटर और मोबाइल यूज करने के बावजूद मेरी रुचि होने की वजह से मैं कंप्यूटर और मोबाइल फ्रेंडली बन गया। एमए फाइनल के दौरान जब हमें कॉलेज में "ओ लेवल" का कंप्यूटर कोर्स कराया जा रहा था तब पहली बार मैंने नजदीक से कंप्यूटर को देखा था. 

लेकिन माखनलाल में एडमिशन लेने के बाद ही कंप्यूटर को ठीक से देखा और यूज किया। हालांकि इससे पहले छिंदवाड़ा में लोकमत समाचार के दफ्तर में, फिर भोपाल में स्वदेश, अग्निबाण और राज्य की नई दुनिया के दफ्तर में दूर से ही कंप्यूटर को निहारते थे।

किताबी कीड़े के बाद हम कंप्यूटर के कीड़े बन गए। आजकल मोबाइल हमारे हाथ से चिपक गया है। 

देखा जाए तो कच्ची उम्र में मोबाइल और कंप्यूटर मिलना नुकसानदायक ही होता है। मोबाइल ऐसा खिलौना है, जिससे खेलना सबको अच्छा लगता है। लेकिन जरा सी चूक होने पर ये खिलौना आपकी लाइफ को बर्बाद कर सकता है। आपका बैंक अकाउंट खाली कर सकता है। आपके बच्चों की खुशहाल जिंदगी को वीरान बना सकता है। इसलिए आपके घर में किसी को भी स्मार्टफ़ोन देने से पहले उसे साइबर शिक्षा यानी तकनीकी ज्ञान देना जरूरी है। 

आप पढ़ रहे थे डोंगरे की डायरी... 

*अगली किस्त में पढ़िए… 3जी से 4जी मोबाइल का सफर*

©® ब्लॉगर और पत्रकार रामकृष्ण डोंगरे

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Sunday, June 20, 2021

फेसबुक पोस्ट : मेरे पत्रकारिता जीवन की शुरुआत...

*मेरे पत्रकारिता जीवन की शुरुआत*... 
*साल 2001 से 2004 तक की कुछ यादें*... 

आज छिंदवाड़ा शहर में हूं. कल अचानक गांव में मुझे वो फाइल मिल गई जोकि मेरे पत्रकारिता जीवन के शुरुआती दौर की साक्षी और सबूत है। इसी फाइल की बदौलत सितंबर 2004 में बिना किसी जान पहचान और एप्रोच के भोपाल स्थित स्वदेश न्यूज़पेपर में नौकरी हासिल की थी। सैलरी थी अठारह सौ रुपए। 

इस फाइल में पूर्व में लोकमत समाचार छिंदवाड़ा के लिए हाथ से लिखी गई खबरों की हार्ड कॉपी, प्रिंट खबरों की कटिंग भी लगी हुई है। स्वदेश भोपाल की बातें बाद में… अभी मेरे पत्रकारिता जीवन के शुरुआती दिनों को याद करता हूं. 

तो मेरी यह फाइल जुलाई 2001 से अखबारों में खबरें लिखने के सिलसिले का दस्तावेज है। इसमें शुरुआत की खबरें, साहित्यिक संस्था "अबंध" के कार्यक्रमों की विज्ञप्ति, उसके बाद कुछ खबरें "इंटरनेट रेडियो श्रोता संघ" के प्रेस नोट थे। इसके अलावा डीडीसी कॉलेज और पीजी कॉलेज के कल्चरल प्रोग्राम का कवरेज जोकि छिंदवाड़ा के तमाम अखबारों में पब्लिश होता था। इनमें में दैनिक भास्कर भोपाल, दैनिक भास्कर जबलपुर, राज्य की नई दुनिया, लोकमत समाचार, स्वदेश, देशबंधु आदि तमाम नाम है। 

संभवत अखबार के लिए मैंने पहली खबर 27 जुलाई 2001 को लिखी थी। जो कि अबंध साहित्यिक संस्था की ओर बतौर संयोजक स्वयं के द्वारा कारगिल विजय दिवस पर आयोजित कवि गोष्ठी की रिपोर्ट थी। इसमें मैंने कविता पाठ भी किया था। 

लोकमत समाचार में मैंने बिना वेतन के काम किया था। यहां लिखी मेरी खबरों की लिस्ट के मुताबिक पहली खबर 25 जुलाई 2003 को लिखी गई थी और अंतिम खबर 29 अक्टूबर 2003 को फाइल की गई थी। सभी खबरों की हेडिंग, खबरों की कटिंग और हार्ड कॉपी जो कि मैं कार्बन पेपर लगाकर तैयार करता था, सबकुछ फाइल में संलग्न है। यानी टोटल 25 खबरों की हेडिंग तारीख के साथ लिखी है। 

क्योंकि मैं ट्रेनी के तौर पर काम करता था. इसलिए सभी खबरें मैं खुद तय करता था. मुझे कोई असाइनमेंट नहीं देता था. शुरुआत की कुछ खबरें रेडियो यानी आकाशवाणी छिंदवाड़ा को लेकर रही. कुछ खबरें कॉलेज फंक्शन के कवरेज. इसके अलावा सांस्कृतिक, साहित्यिक कार्यक्रम और जन समस्याएं, जो मुझे नजर आती थी. उनको लेकर मैं खबर लिखता था. 

मेरे साथ वरिष्ठ छायाकार बाबा कुरैशी जी फोटो के लिए जाते थे. उन्हें मैं बहुत मिस करता हूं. वे अब हमारे बीच नहीं है। इसके अलावा मेरे बॉस और बड़े भैया श्री धर्मेंद्र जायसवाल जी और ऑफिस के सीनियर पंकज जी और गुणेंद्र दुबे जी, जोकि उसी ऑफिस में बैठकर राष्ट्रीय एजेंसी के लिए खबर लिखते थे। उन सभी को याद करता हूं.

लोकमत समाचार में काम करते हुए मुझे दैनिक भास्कर में काम करने का ऑफर मिला था, जो कि श्री गिरीश लालवानी जी के जरिए आया था और मुझे परासिया तहसील में ब्यूरो चीफ बनाया जा रहा है। लेकिन मैंने पढ़ाई की वजह से अस्वीकार कर दिया। उस साल में एमए प्रीवियस हिंदी कर रहा था पीजी कॉलेज से.

स्वदेश भोपाल में पहली खबर 14 सितंबर 2004 को पब्लिश हुई थी - बाइलाइन स्टोरी - "आखिर क्यों उपेक्षित है हिंदी अध्ययन"। बाकी बातें फिर भी…

*इस पोस्ट या लेख के जरिए मेरे कई सीनियर, मित्र भी यादों में खोते लगा सकते है।* 

Dharmendra Jaiswal , Ashish Jain, Sudesh Kumar Mehroliya Jagdish Pawar Digvijay Singh Apo Mgnrega Bhushan Kurothe Prashant Nema Prabhashankar Giri 

©® *पत्रकार व ब्लॉगर रामकृष्ण डोंगरे*

Friday, June 18, 2021

फेसबुक पोस्ट : 90 के दशक की स्कूल लाइफ, कॉपियां और पेन

आपने स्कूल में किस कॉपी में लिखा था?...

सरकारी राशन दुकान में
मिट्टी तेल और शक्कर ही नहीं
कॉपियां भी मिलती थी...

90 के दशक के स्कूल की कॉपियां...
आकाशवाणी अभ्यास पुस्तिका, अनुपम सुपर डीलक्स...

बचपन में नई कॉपी और नई किताबें मिलने पर जो खुशी मिलती थी। उसे बयां नहीं किया जा सकता।

बार-बार देखते थे। उलटते-पलटते थे। नई पुस्तक और कॉपी जिस दिन आती थी, उस दिन तो मजे ही मजे रहते थे। तस्वीर में नजर आ रही नर्मदा नाम की कॉपी तो 90 के दशक में सरकारी राशन की दुकान से मिला करती थी। रियायती दरों पर।

आज के बच्चे इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकते कि उन्हें सरकारी राशन दुकान से कॉपी मिल सकती है.

इसके अलावा आकाशवाणी अभ्यास पुस्तिका, अनुपम सुपर डीलक्स, जनता सुपर, हवा महल इन कॉपियों में भी हमने (1985-1998 तक) प्राइमरी स्कूल, मिडिल स्कूल से लेकर हाईस्कूल तक लिखा है।

ऐसी यादें वाकई हमें बचपन की सैर करा जाती है।

शुरुआत में स्याही वाले (फाउंटेन) पेन से लिखना और निब का खराब हो जाना। निब को बाल डालकर साफ करना। निब का टूट जाना। एक दूसरे के ऊपर स्याही छिड़क देना। फिर झगड़ना। इसी स्याही वाले पेन से लिखने में अंगुली दुखने लगती थी। निशान बन जाता था। 

फिर आता है बॉल पेन का जमाना। रोटोमैक, रेनॉल्ड्स, ग्रिफ वाला सेलो का पेन, जेटर पेन, पाइलेट पेन, चार-पांच रिफिल वाले मल्टी कलर चेंजिंग पेन। हरा, पीला, नीला, लाल कलर वाले। जिनसे टिकटॉक जैसी आवाज आती थी। एक पेन में ही अलग, अलग कलर की रिफिल से लिखने का मजा ही कुछ और होता था। 

©® *रामकृष्ण डोंगरे*, ब्लॉगर और पत्रकार 

#डोंगरे_की_डायरी #स्कूल_कॉपी #SchoolCopy #90skids #90sschoollife

Thursday, June 17, 2021

फेसबुक पोस्ट : खेती किसानी की यादें ताजा हो गई...

पहली बार चौथी क्लास में यानी 32 साल पहले बख्खर मारा था।

लास्ट टाइम करीब 25 साल पहले बख्खर, नागर, तिफन, डौरा चलाया था। कॉलेज पढ़ने के लिए 1998 में छिंदवाड़ा चला गया था। तब से ये सब छूट गया था। कभी-कभी हाथ लगाया होगा। 

आज करीब आधे घंटे तक खेत में बख्खर मारा। लगा ही नहीं कि इतने सालों से हल, बख्खर से दूर हो गया था।

बख्खर मारने में क्या क्या परेशानी आती है। वो भी याद आ गई। जैसे - बैल का इधर उधर मुंह मारना, मुस्का उतार लेना, पास में चारा फंसने से ठीक से बखराई नहीं होना, कई बार बैल ज्वांडा निकाल देता है आदि कई परेशानी आती है। कई बार बैल चलते नहीं है तो उन्हें पिराना या छड़ी से मारना पड़ता है। कई बार हंकनी से कोंचना पड़ता है।

खेत बखरना, हल चलाना, डौरा मारना धैर्य का काम है। खेत बहुत दिखता है। एक - दो एकड़ मगर धैर्य के साथ काम करते जाओ तो काम थोड़ा कम होने लगता है। जब पूरा खेत बखरा जाता है तो उसकी खुशी अलग ही होती है।

और जब खेत में अनाज, दाना बोने के बाद फसल उगती है तो खुशी चार गुना बढ़ जाती है। रोज सुबह जल्दी उठकर खेत में जाना। मूंगफली, गेहूं, सोयाबीन, मक्का को उगते देखना अलग ही आनंद देता है।

खेती करना हर किसान के बेटे को अच्छा लगता है। लेकिन जब उसका रिजल्ट अच्छा नहीं मिलता। तो माता-पिता खुद ही अपने बच्चों को खेती किसानी से दूर करने लगते है और शहर में दो टके की नौकरी करने भेज देते है। क्या किया जा सकता है?

©® *ब्लॉगर और पत्रकार रामकृष्ण डोंगरे*

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