Monday, October 27, 2008

हैप्पी दिवाली : अपनों की कमी सिर्फ मुझे ही या आपको भी


हैप्पी दिवाली : अपनों की कमी सिर्फ मुझे ही या आपको भी

अपनों से दूर रहकर शायद ही कभी अपनों की कमी पूरी होती हो...। मुझे तो यही लगता... और आपको ...। अगर कोई उपाय किसी केपास हो मुझे जरूर बताए। मैं आपका शुक्रगुजार रहूंगा।

दीपावली... प्रकाशपर्व यानी दिवाली। आप सब को दीपोत्सव पर हार्दिक शुभकामनाएं। आप में से जो लोग अपने गांव में, अपने परिवार के बीच दिवाली मना रहे हैं वे उन लोगों की बनिस्बत ज्यादा खुश होंगे, जो लोग अपने घर, अपने गांव नहीं जा सकें। मेरे जैसे कुछ लोग उन्हीं लोगों की सूची में आते हैं।
खैर...। हम अपने से दूर रहे या अपनों के करीब ...। हमें दिवाली को इन्जॉय तो करना ही है। मुझे अपने बचपन की दिवाली भी याद है और पिछले साल या उससे पिछले साल की दिवाली भी...।

बात पिछले साल की दिवाली की करते हैं। पिछले साल मैं दिल्ली से घर गया था। सभी के लिए कपड़े मैंने खरीदें थे। मेरे घर में एक पीढ़ी अपने बचपन के दौर से गुजर रही है। जिसमें मेरे दो भतीजे और एक भतीजी शामिल है। मैं छोटे- छोटे पटाखें, अनार दाने और फूलझड़ी खरीद कर लाता हू और हां ... साथ में टिकली भी। बड़ा भतीजा सोनू हमेशा इन चीजों से दूर भागता है। अभी वह 6 साल का हो गया है ... कई साल से उसका रवैया ऐसा ही रहा है... ।

अब बात मेरे बचपन की। हम तीन भाई और बड़ी दीदी भी कुछ इसी तरह केस्वभाव केरहे हैं। मैं और मेरा छोटा रामधन छोटे-छोटेपटाखे और लक्ष्मी पटाखे फोड़ा करते थे...। जवार केखेत में पक्षियों को भगाने केलिए कई दिनों तक हम पटाखे फोड़ा करते थे।

खास बात जो मुझे याद आती है वो ये कि मैं रंगोली सजाने, घर की साफ-सफाई करने और सामान को व्यवस्थित करने में सबसे आगे रहता था। कौन- सा सामान कहां होना चाहिए, यह मुझे हमेशा अच्छी तरह याद होता था। इसलिए घर की साफ-सफाई केबाद सामान जमाने की जिम्मेदारी मेरी ही होती थी।
इस बार दिवाली पर मैं घर नहीं गया। ऐसे मौके पर मुझे सभी की याद आ रही है। मोबाइल के चलते सभी से रोज बात हो जाती है। फिर भी मन नहीं भरता। कई दोस्तों, परिचितों को एसएमएस किया, कुछेक को फोन किया फिर भी चैन नहीं मिला। अपनों से दूर रहकर शायद ही कभी अपनों की कमी पूरी होती हो...। मुझे तो यही लगता... और आपको ...। अगर कोई उपाय किसी केपास हो मुझे जरूर बताए। मैं आपका शुक्रगुजार रहूंगा।

एक बार फिर आप सबको दिवाली की हार्दिक शुभकामनाएं। हैप्पी दिवाली।

Friday, October 3, 2008

सरकार की उपेक्षा से गिरमिटिया बनते बिहारी

सरकार की उपेक्षा से
गिरमिटिया बनते बिहारी

विश्वनाथ सुमन

पुराने आंकड़ों पर गौर करें बिहार से बाहर पलायन करने वालों में कोसी क्षेत्र के लोग अधिक हैं। 1954 में कोसी बैराज बनने के बाद अभी तक चार बार तटबंध टूट चुका है और पिछले 50 वर्षों में इस क्षेत्र के लोग पलायन करने वालों में शामिल हैं।
आशंका जताई जा रही है कि इस साल भी इस क्षेत्र से ही पांच लाख लोग उद्योगों वाले शहर में पहुंचेंगे, काम की तलाश में। कहीं काम नहीं करेंगे तो करेंगे क्या? सरकार के पास ऐसी योजना नहीं है, जो इनके कदम रोक ले।


1834 में अंग्रेजों की ज्यादती के कारण पहली बार बिहार के कुछ लोग गिरमिटिया बने, अब कुदरत के कहर और सरकार की उपेक्षा के कारण गिरमिटिया बन रहे हैं, वह भी अपनी मर्जी से। आखिर जीना तो सभी चाहते हैं।

अथ बिहार कथा ...

बाढ़ ने ही बीमारू राज्य बना दिया बिहार को
प्रत्येक वर्ष करीब 55 लाख बिहारी दूसरे राज्यों में रोजी रोटी तलाशने निकलते है
प्लानिंग कमीशन की मानें तो बिहार की 42.6 फीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे जिंदगी गुजार रही
एक रिपोर्ट के अनुसार बिहार की 82 प्रतिशत श्रमिक कृषि, मछली पालन सहित प्राइमरी सेक्टर से जुड़े हैं


बिहार फिर मुसीबत में हैं। इस राज्य के 16 जिले कोसी के कहर की चपेट में हैं। करीब 755 गांवों के 25 लाख लोग प्रत्यक्ष रूप से इस विभिषिका से प्रभावित हैं। टूटी रेल पटरियां, सिर पर गठरी लेकर सुरक्षित ठिकाने की तलाश करते वृद्ध और महिलाएं, जलमग्न खेत, दशहत और बेबसी की कहानी कहतीं इस तरह कितनी तस्वीरें अखबारों के पन्नों पर दिख रहे हैं।

खबरिया टीवी चैनलों में इस भयावह आपदा के दृश्यों को देखकर लोग सिहर जाते हैं। हालात दिन ब दिन बदतर होते जा रहे हैं। बाढ़ में फंसे लोग दो जून की रोटी और पानी के लिए तरस रहे हैं। अब तो बाढ़ से घिरे लोग ही नहीं, दूर परदेस में बैठे लोग भी यह सोचने को मजबूर हो गए कि यह बुरे दिन कब खत्म होंगे। रोज बढ़ रहे कोसी के कहर और सरकारी इंतजामात से यह नहीं लगता है कि यह विपदा जल्द ही खत्म हो जाएगी। इसलिए लोगों ने पलायन करना भी शुरू कर दिया है।

हालांकि यह इस प्रदेश के लिए बाढ़ और पलायन कोई नई समस्या नहीं है। शायद ही कोई ऐसा वर्ष बीता हो, जब बाढ़ ने विकराल रूप नहीं दिखलाया हो।

पिछले वर्षों में कमला, बलान, गंडक, बागमती और अधवारा समूह की नदियां उत्तर बिहार को जलमग्न करती रहीं हैं। बाढ़ ने ही इस राज्य को बीमारू बना दिया और इसका नतीजा यह रहा है कि प्रत्येक वर्ष करीब 55 लाख बिहारी दूसरे राज्यों में रोजी रोटी तलाशने निकल जाते हैं।

प्रदेश के 35 जिलों में से 24 जिले कमोवेश बाढ़ प्रभावित रहे हैं। इनमें से 11 जिलों में तो हर साल बाढ़ पैर पसार ही लेती है। कुल मिलाकर बिहार का 73.6 प्रतिशत हिस्सा बाढ़ से ग्रस्त है। यहां के सिर्फ पांच जिले ही ऐसे हैं, जहां बाढ़ और सूखा का प्रकोप नहीं होता है।

जाहिर तौर पर बाढ़ और सूखे की वजह से फसलें भी चौपट होती रहीं हैं और लोग रोजी-रोटी की तलाश में भागते रहे हैं शहरों की ओर। इस बार भी स्थिति और भी विकराल है और इसका असर काफी लंबे समय तक रहेगा। इस कारण इस बार घर छोड़कर परदेस जाने वालों की तादाद काफी बढ़ेगी। फिर जाएंगे दिल्ली, हरियाणा, मुंबई, सूरत, लुधियाना और इंदौर। खेतिहर श्रमिकों की कमी से जूझ रहे पंजाब और हरियाणा को मजदूर आसानी से मिल जाएंगे। दिल्ली और लुधियाना में बिहार के मजदूरों की खेप आनी शुरू हो गई है। कई परिवार के साथ आए तो कई परिवार को उनके भाग्य के भरोसे छोड़ आए । इस उम्मीद के साथ कि जब वापस जाएंगे तो उनकी जरूरतों को पूरा कर लेंगे। इस दौरान ये श्रमिक कहीं भी, कैसे भी के आधार पर गुजारा कर लेंगे।

इस बीच क्षेत्र विशेष में वहां के उपराष्ट्रवाद और उनके सियासी गुस्से को झेल लेंगे। इसके सिवा उनके पास चारा ही क्या है। इन दिनों उनका साथ उनके पुराने परिचित दे रहे हैं जो उनसे पहले घर छोड़ चुके हैं। पुराने आंकड़ों पर गौर करें बिहार से बाहर पलायन करने वालों में कोसी क्षेत्र के लोग अधिक हैं। 1954 में कोसी बैराज बनने के बाद अभी तक चार बार तटबंध टूट चुका है और पिछले 50 वर्षों में इस क्षेत्र के लोग पलायन करने वालों में शामिल हैं।

आशंका जताई जा रही है कि इस साल भी इस क्षेत्र से ही पांच लाख लोग उद्योगों वाले शहर में पहुंचेंगे, काम की तलाश में। कहीं काम नहीं करेंगे तो करेंगे क्या? सरकार के पास ऐसी योजना नहीं है, जो इनके कदम रोक ले। प्लानिंग कमीशन की मानें तो बिहार की 42.6 फीसदी आबादी गरीबी रेखा से नीचे जिंदगी गुजार रही है। राज्य के अन्य जिलों की अपेक्षा कोसी परिक्षेत्र में ही बीपीएल परिवारों की तादाद अधिक है। उदाहरण के तौर पर अररिया की 78.6 फीसदी आबादी बीपीएल पैमाने के नीचे गुजर बसर कर रही है। इंडियन इन्स्तित्युत ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की रिपोर्ट के अनुसार बिहार की 82 प्रतिशत श्रमिक कृषि, मछली पालन सहित प्राइमरी सेक्टर से जुड़े हैं। कल कारखाने हैं नहीं। 2006-07 में इंडटि्रयल डिवेलपमेंट रेट 5.5 फीसद रही (जबकि नैशनल रेट 20.1 है )।
ऐसे हालात में प्राकृतिक आपदा से घिरा यह तबका क्या करें? हाथ पर हाथ धरकर कब तक सरकार की राहत का इंतजार करे? हालांकि इस श्रम पलायन का खामियाजा खुद बिहार को ही उठाना पड़ रहा है। विधानसभा में पेश इननॉमिक सवे 2006-07 मे जब खुलासा हुआ कि पिछले एक साल में खाद्यान्न का उत्पादन स्तर 26.4 फीसदी तक गिर गया है। इसके बावजूद सरकार को कम होती श्रम शक्ति का एहसास नहीं हुआ।

फिलहाल दु:ख की इस घड़ी में पूरा देश बिहार के साथ खड़ा दिख रहा है। हर तरफ से मदद के हाथ बढ़ रहे हैं। मगर इस राज्य के पलायन की समस्या को भी बाढ़ और सूखे की मार से अलग करके देखना सही नहीं होगा। कोई भी अपना घर, अपना गांव नहीं छोड़ना चाहता है और न ही परदेस में दर-दर की ठोकरें खाना।

1834 में अंग्रेजों की ज्यादती के कारण पहली बार बिहार के कुछ लोग गिरमिटिया बने, अब कुदरत के कहर और सरकार की उपेक्षा के कारण गिरमिटिया बन रहे हैं, वह भी अपनी मर्जी से। आखिर जीना तो सभी चाहते हैं।

अब इस पलायन को रोकने की जिम्मेदारी भी समाज और सरकार को मिलकर उठानी होगी।
दो महत्वपूर्ण क्षेत्र में सहयोग और सुविधा से प्राकृतिक आपदाओं से त्रस्त बिहार की इस समस्या का निदान हो सकता है। पहला वहां की कृषि संबंधी सुधार किए जाएं । दूसरा वहां शिक्षा की बेसिक और उच्च शिक्षा की गुणवत्ता सुधारा जाए। शायद बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर के डिवेलप होने के बाद घर छोड़ने वालों के कदम देहरी छोड़ने से पहले ठिठकेंगे तो सही।


विश्वनाथ सुमन



(लेखक दिल्ली के एक राष्ट्रीय अखबार में कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत है . इन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय भोपाल से वर्ष 2005 में मास्टर ऑफ़ जर्नलिज्म का कोर्स भी किया है . खास बात ये है की लेखक ख़ुद उस राज्य के मूल निवासी है जिसकी कहानी वे बयां कर रहे है .)

Sunday, September 28, 2008

'उल्टा तीर पत्रिका' का दूसरा अंक "दिनकर"

पोस्ट से पहले

'उल्टा तीर पत्रिका' का दूसरा अंक "दिनकर"

दिनकर पढने के लिए क्लिक करें: उल्टा तीर पत्रिका दिनकर

'उल्टा तीर पत्रिका' का दूसरा अंक "दिनकर" प्रकाशित हो चुका है । उल्टा तीर अपने सभी सुधि पाठकों और "दिनकर" में रचनात्मक व प्रेरणात्मक योगदान देने वाले रचनाकारों, टिप्पणीकारों का दिल से आभार व्यक्त करता है। "जश्न-ए-आज़ादी" पत्रिका के बाद अब "दिनकर" पत्रिका पढिये पूरे महीने भर। और भाग लीजिये उल्टा तीर पर जारी बहस में। उल्टा तीर की पत्रिका पढने के लिए "दिनकर" पर क्लिक कीजिए।



आभार;
अमित के. सागर

Friday, August 8, 2008

9 अगस्त : मेरे जीवन की क्रांति का दिन


तारीखें याद आती है...


9 अगस्त : मेरे जीवन की क्रांति का दिन


आज है 9 अगस्त...। 9 अगस्त यानी अगस्त क्रांति का दिन। और यही नौ अगस्त मेरे जीवन में भी क्रांति का दिन है। मुझे अच्छी तरह याद है साल 2000 का 9 अगस्त। जिस दिन मेरी आवाज रेडियो के जरिये छिन्दवाड़ा जिले में गूंजी थी ... जी हां, आकाशवाणी के छिन्दवाड़ा स्टेशन से।

आकाशवाणी यानी रेडियो मेरी लाइफ में खास जगह रखता है। कह सकते हैं कि इसी से प्रेरणा लेकर मैं जीवन पथ पर आगे बढ़ता गया। जिसकी बदौलत मैं आज कुछ बेहतर स्थिति में हूँ । रेडियो से मेरा इंटरव्यू बॉडकास्ट होने के साथ ही मेरा रेडियो से नाता जुड़ता ही चला गया। इंटरव्यू के बाद इंटरव्यू ... रेडियो की गतिविधियां बढ़ती गई ... और फिर मेरा रेडियो रूपक भी आकाशवाणी छिन्दवाड़ा से रिले हुआ। जिसके लिए मैं कार्यक्रम अधिकारी आदरणीय डॉ। हरीश पराशर रिशु सर का हमेशा आभारी रहूंगा। और देखा जाए तो रिशु सर जैसे लोगों के मार्गदर्शन केचलते ही मैं एक छोटे से क़स्बे से निकलकर दिल्ली जैसे बड़े शहर तक आ पाया।

रेडियो से जुड़े संस्मरण, किस्से, यादें और बातें तो मेरे पास कई है, मगर यहां मैं खासतौर पर 9 अगस्त से जुड़े बातें आपके साथ शेयर करना चाहूंगा।

कैसे मिला रेडियो पर इंटरव्यू देने का मौका
आकाशवाणी से यूथ केलिए एक खास प्रोग्राम होता है युववाणी। जिसमें अलग-अलग दिन कई दिलचस्प और जानकारी से लबरेज कार्यक्रम होते हैं। ऐसा ही एक कार्यक्रम सात सवाल मेरा पसंदीदा प्रोग्राम हुआ करता था। इसे मैं 1995 से लगातार सुनता आ रहा था। सात सवाल बेसिकली सामान्य ज्ञान के सवालों पर आधारित प्रोग्राम है।

उस ह$ ते के प्रोग्राम केसभी सातों सवालों का जवाब देना वाला मैं एकमात्र श्रोता था। इस प्रोग्राम के विजेता को पुरस्कार के बदले युववाणी के लिए एक इंटरव्यू देना का मौका मिलता था। मुझे भी इसीलिए मौका मिला। इससे पहले भी विजेता रहा था, मगर झिझक के चलते मैं आकाशवाणी नहीं आ पाया।

पहले इंटरव्यू का अनुभव
मेरा पहला इंटरव्यू मशहूर एनाउंसर आदरणीय अवधेश तिवारी जी ने लिया था। मुझे अच्छी तरह याद है, इसकेलिए उन्होंने कई बार रीटेक किया था। पहली दफा आकाशवाणी आना, स्टूडियो देखना और इंटरव्यू देना मेरे लिए रोमांचक अनुभव था।
अवधेश तिवारी जी मेरा इंट्रोडेक्शन कुछ इस अंदाज में दिया था- छिन्दवाड़ा में एक छोटा-सा गांव है तन्सरामाल ... और यहां रहते हैं एक उत्साही नौजवान रामकृष्ण डोंगरे...। इस पहले इंटरव्यू के बाद मैंने और भी इंटरव्यू इस प्रोग्राम के लिए दिए ...। पहला इंटरव्यू तो मेरे लिए हमेशा यादगार रहेगा ही मगर एक और इंटरव्यू मेरे लिए खास है।

उस इंटरव्यू में मुझसे दो लोगों ने बातचीत की थी। एक थे एनाउंसर धीरेन्द्र दुबे और दूसरे थे एक सीनियर कार्यक्रम अधिकारी ... जिनका नाम मैं भूल रहा हूं। शायद शशिकांत व्यास सर थे. इस लंबे इंटरव्यू में कई सवाल थे, और मेरी कुछ कविता भी शामिल थी।

मेरी यही दीवानगी बाद में मेरे काम आई...
अंत में फिर से 9 अगस्त के इंटरव्यू का जिक्र करना चाहूंगा ... उस दिन हमारे नये घर का काम चल रहा था। मैं जल्दी काम पूरा करके उमरानाला पंहुचा और उस इंटरव्यू को रिकार्ड करवाया। जब मैं इंटरव्यू को रिकार्ड को रिकार्ड करवा रहा था, उस वक्त दूकान पर लोगों की भीड़ मेरा ... तन्सरामाल... उमरानाला ... का नाम सुन रही थी ... मुझे कांटों तो खून नहीं।

.... रेडियो के प्रति मेरी दीवानगी का ये आलम था कि इसे मैं अपना पहला प्यार कहता था... सात सवाल के उत्तर खोजना मेरे लिए जीवन-मरण और प्रतिष्ठा का प्रश्न होता था... एक- एक सवाल के उत्तर के लिए मैं अपनी सारी किताबें, नोटबुक और डायरियां उलट-पुलट डालता था। इसके अलावा सारे मित्रों-पड़ोसियों के यहां भी खाक छानता फिरता था।

मेरी यही दीवानगी बाद में मेरे काम आई...।

Wednesday, August 6, 2008

उल्टा तीर की... "जश्न-ए-आज़ादी"

पोस्ट से पहले...
में इस बार "जश्न-ए-आज़ादी" ....
http://ut-patrika।blogspot.com/

उल्टा तीर की... "जश्न-ए-आज़ादी"

ब्लॉग जगत में पहली बार ....

उल्टा तीर की प्रथम पत्रिका "जश्न-ए-आज़ादी" प्रकाशित हो चुकी है । "जश्न-ए-आज़ादी" की किताब पढिये पूरे महीने भर। और भाग लीजिये उल्टा तीर पर नई बहस। उल्टा तीर की पत्रिका पढने के लिए "जश्ने-आज़ादी " पर क्लिक कीजिए ।

जश्ने-आज़ादी :: http://ut-patrika.blogspot.com/
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रामकृष्ण डोंगरे की कविता -आतंकवाद और सच्ची देश भक्ति
http://ut-patrika.blogspot.com/2008/08/blog-post_7776.html
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साहित्यकार बाबा स्व. श्री संपतराव धरणीधरकी ---
(कविता - भूख -भरे पेट की)
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RAMKRISHNA DONGRE, MCU, 2005-07
E-mail : dongre.trishna@gmail.com

http://chhindwara-chhavi.blogspot.com/

Saturday, August 2, 2008

हैप्पी फें्रडशिप डे




दोस्ती ता-उम्र बरकरार रहे
या खुदा जब तक ये संसार रहे।


हैप्पी फें्रडशिप डे