Saturday, June 7, 2025

अखबार Newspaper सिर्फ कागज नहीं, गाँव Village की आवाज़ है, लेकिन क्या यह आवाज अब खामोश हो रही है


( किरदार काल्पनिक, लेकिन समस्या वास्तविक है) 

छत्तीसगढ़ में अखबार वितरण और समाचार संचालन: चुनौतियाँ, समाधान और डिजिटल क्रांति का प्रभाव

छत्तीसगढ़, अपनी प्राकृतिक और सांस्कृतिक समृद्धि के लिए जाना जाता है, लेकिन समाचार पत्र वितरण और समाचार संचालन के क्षेत्र में यहाँ कई चुनौतियाँ हैं। हाल ही में बलौदा बाजार, सारंगढ़, और बिलाईगढ़ जिलों के दौरे के दौरान इन समस्याओं को करीब से समझने का अवसर मिला। इस आलेख में, हम इन चुनौतियों, उनके समाधान, और डिजिटल क्रांति के प्रभाव पर विस्तार से चर्चा करेंगे, जिसमें कुछ काल्पनिक किरदारों के माध्यम से स्थानीय परिप्रेक्ष्य को शामिल किया जाएगा।

1. छत्तीसगढ़ में अखबार वितरण और समाचार संचालन की प्रमुख समस्याएँ

👉 प्रमुख समस्याएँ :

(i) योग्य एजेंसी संचालक का अभाव

समस्या: स्थानीय स्तर पर समाचार पत्र वितरण के लिए विश्वसनीय और जिम्मेदार एजेंसी संचालकों की कमी है। कई बार, संचालक व्यवसाय को गंभीरता से नहीं लेते या उनके पास पर्याप्त संसाधन और प्रबंधन कौशल नहीं होते।

✔️ उदाहरण: बलौदा बाजार के एक गाँव में, रामलाल, एक स्थानीय दुकानदार, ने अखबार वितरण की जिम्मेदारी ली थी। लेकिन उसकी दुकान के अन्य कामों के कारण वह समय पर अखबार नहीं पहुँचा पाता, जिससे ग्राहक नाराज़ हो गए।

(ii) वितरण के लिए कार्यबल की कमी

✔️ समस्या: घर-घर अखबार पहुँचाने के लिए युवाओं की कमी है। ग्रामीण क्षेत्रों में युवा या तो नौकरी के लिए शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं या इस काम को कम आय वाला और कम सम्मानजनक मानते हैं।

✔️ उदाहरण: सारंगढ़ के एक गाँव में, स्कूल के बाद अखबार बाँटने वाले लड़के, जैसे श्याम, अब मोबाइल रिपेयर की दुकानों में काम करना पसंद करते हैं, क्योंकि वहाँ आय अधिक है।

(iii) डिजिटल क्रांति का प्रभाव

✔️ समस्या: डिजिटल क्रांति ने समाचार उपभोग के तरीके को बदल दिया है। लोग अब मोबाइल फोन पर समाचार पढ़ना पसंद करते हैं, जिससे प्रिंट मीडिया की माँग कम हो रही है। इसके अलावा, एक पाठक के पास असीमित कंटेंट उपलब्ध है, जिससे यह तय करना मुश्किल हो गया है कि वह कौन सी खबर पढ़ेगा।

✔️ उदाहरण: बिलाईगढ़ के एक कॉलेज छात्रा रिया, ने बताया कि वह दिन में केवल 10-15 मिनट सोशल मीडिया पर समाचार पढ़ती है। अखबार पढ़ने का समय उसके पास नहीं है, क्योंकि वह ऑनलाइन कंटेंट को अधिक सुविधाजनक और त्वरित मानती है।

(iv) स्थानीय खबरों का अभाव

✔️ समस्या: ग्रामीण क्षेत्रों की छोटी-छोटी खबरें, जैसे गाँव में नल की समस्या या स्कूल की स्थिति, अखबारों तक नहीं पहुँच पातीं। बड़े समाचार पत्र अक्सर राष्ट्रीय और शहरी खबरों पर ध्यान देते हैं।

✔️ उदाहरण: गाँव के शिक्षक, गुरुजी (श्री हरिशंकर), ने शिकायत की कि उनके गाँव में बिजली की समस्या को कोई अखबार कवर नहीं करता, जबकि यह गाँव की सबसे बड़ी समस्या है।

2. समस्याओं के समाधान

इन समस्याओं का समाधान करने के लिए निम्नलिखित रणनीतियाँ अपनाई जा सकती हैं:

▪️(i) योग्य एजेंसी संचालकों की भर्ती और प्रशिक्षण

✔️ समाधान: स्थानीय युवाओं, खासकर शिक्षित बेरोजगारों, को अखबार वितरण एजेंसी संचालन के लिए प्रोत्साहित करना। इसके लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किए जा सकते हैं, जिसमें समय प्रबंधन, ग्राहक सेवा, और वित्तीय प्रबंधन सिखाया जाए।

✔️ उदाहरण: बलौदा बाजार में, जिला प्रशासन और स्थानीय समाचार पत्रों ने मिलकर एक कार्यशाला आयोजित की, जिसमें 20 युवाओं को प्रशिक्षित किया गया। इनमें से 5 ने अपनी एजेंसी शुरू की, जिससे वितरण में सुधार हुआ।

▪️(ii) वितरण कार्यबल को प्रोत्साहन

✔️ समाधान: अखबार वितरण के काम को आकर्षक बनाने के लिए वेतन में वृद्धि, बोनस, और अन्य प्रोत्साहन (जैसे साइकिल या इलेक्ट्रिक स्कूटर) दिए जा सकते हैं। साथ ही, इस काम को सामाजिक रूप से सम्मानजनक बनाने के लिए जागरूकता अभियान चलाए जा सकते हैं।

उदाहरण: सारंगढ़ में, एक समाचार पत्र ने अपने वितरकों को मासिक "बेस्ट डिलीवरी बॉय" पुरस्कार देना शुरू कर दिया, जिसके बाद कई युवा इस काम में रुचि लेने लगे।

(iii) डिजिटल और प्रिंट का समन्वय

✔️ समाधान: समाचार पत्रों को डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के साथ तालमेल बिठाना होगा। अखबारों की वेबसाइट्स और सोशल मीडिया पर स्थानीय खबरें उपलब्ध कराकर पाठकों को आकर्षित किया जा सकता है। साथ ही, प्रिंट संस्करण में डिजिटल कंटेंट का प्रचार (जैसे QR कोड) किया जा सकता है।

✔️ उदाहरण: बिलाईगढ़ में, एक स्थानीय समाचार पत्र ने अपने अखबार में QR कोड छापे, जिन्हें स्कैन करने पर गाँव की खबरें ऑनलाइन पढ़ी जा सकती थीं। इससे युवा पाठकों की रुचि बढ़ी।

(iv) स्थानीय खबरों का संग्रह

✔️ समाधान: गाँवों में "सिटीजन जर्नलिस्ट" नेटवर्क बनाया जा सकता है, जिसमें शिक्षक, डॉक्टर, जनप्रतिनिधि, और छात्र स्थानीय खबरें भेजें। इसके लिए मोबाइल ऐप्स और व्हाट्सएप ग्रुप्स का उपयोग किया जा सकता है।
✔️ उदाहरण: गाँव की सरपंच, सावित्री बाई, ने एक व्हाट्सएप ग्रुप बनाया, जिसमें गाँव की समस्याओं की तस्वीरें और विवरण भेजे जाते हैं। ये खबरें स्थानीय अखबार में छपने लगीं, जिससे प्रशासन का ध्यान गया।

▪️(v) पाठकों की रुचि बढ़ाना

✔️ समाधान: अखबारों को पाठकों की रुचि के अनुसार कंटेंट डिज़ाइन करना होगा, जैसे स्थानीय कहानियाँ, युवाओं के लिए करियर गाइड, और बच्चों के लिए कॉमिक्स। साथ ही, स्कूलों और कॉलेजों में अखबार पढ़ने की आदत को प्रोत्साहित करने के लिए प्रतियोगिताएँ आयोजित की जा सकती हैं।

✔️ उदाहरण: गुरुजी ने अपने स्कूल में "अखबार पढ़ो, सवाल बनाओ" प्रतियोगिता शुरू की, जिसमें बच्चे अखबार से सवाल बनाते हैं और पुरस्कार जीतते हैं। इससे बच्चों में अखबार पढ़ने की रुचि बढ़ी।

▪️3. डिजिटल क्रांति का प्रभाव और भविष्य की दिशा

डिजिटल क्रांति ने समाचार उद्योग को पूरी तरह बदल दिया है। छत्तीसगढ़ जैसे ग्रामीण-प्रधान राज्य में, जहाँ इंटरनेट की पहुँच बढ़ रही है, लेकिन अभी भी सीमित है, प्रिंट और डिजिटल मीडिया को साथ मिलकर काम करना होगा।

कुछ प्रमुख बिंदु:

▪️कंटेंट की अधिकता: एक पाठक के पास दिन में सीमित समय होता है, और वह चुनिंदा खबरें ही पढ़ता है। इसलिए, अखबारों को ऐसी खबरें देनी होंगी जो स्थानीय, प्रासंगिक, और आकर्षक हों।

▪️विश्वसनीयता: डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर फर्जी खबरें एक बड़ी समस्या हैं। प्रिंट मीडिया अपनी विश्वसनीयता का लाभ उठाकर पाठकों को आकर्षित कर सकता है।

▪️हाइब्रिड मॉडल: भविष्य में, अखबारों को हाइब्रिड मॉडल अपनाना होगा, जिसमें प्रिंट संस्करण ग्रामीण क्षेत्रों के लिए और डिजिटल संस्करण शहरी और युवा पाठकों के लिए होगा।

▪️4. किरदारों के माध्यम से समाधान की झलक

(i) गुरुजी (श्री हरिशंकर, शिक्षक)

गुरुजी अपने गाँव के स्कूल में बच्चों को अखबार पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। वे हर हफ्ते "अखबार चर्चा" सत्र आयोजित करते हैं, जिसमें बच्चे स्थानीय समस्याओं पर लेख लिखते हैं। इन लेखों को स्थानीय अखबार में छापने के लिए भेजा जाता है, जिससे बच्चों का उत्साह बढ़ता है और गाँव की खबरें बाहर आती हैं।

(ii) सावित्री बाई (सरपंच)

सावित्री बाई ने गाँव में एक "खबर लहरिया" जैसा समूह बनाया, जिसमें महिलाएँ गाँव की समस्याओं को रिकॉर्ड करती हैं और अखबारों तक पहुँचाती हैं। उन्होंने गाँव के युवाओं को अखबार वितरण के लिए प्रेरित किया और इसके लिए स्थानीय कोऑपरेटिव से छोटे ऋण दिलवाए।

(iii) डॉ. रमेश (स्थानीय डॉक्टर)

डॉ. रमेश अपने क्लिनिक में मरीजों को स्वास्थ्य संबंधी खबरें पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। वे स्थानीय अखबारों में स्वास्थ्य कॉलम लिखते हैं, जिससे पाठकों की रुचि बढ़ती है।

(iv) रिया (कॉलेज छात्रा)

रिया और उसके दोस्तों ने एक सोशल मीडिया पेज शुरू किया, जहाँ वे गाँव की खबरें पोस्ट करते हैं। स्थानीय अखबार ने इस पेज के साथ साझेदारी की, जिससे डिजिटल और प्रिंट दोनों माध्यमों से खबरें फैल रही हैं।

(v) श्याम (युवा वितरक)

श्याम ने अखबार वितरण को एक छोटा व्यवसाय बनाया। उसने अपने दोस्तों के साथ मिलकर एक छोटी डिलीवरी टीम बनाई और इलेक्ट्रिक स्कूटर का उपयोग शुरू किया, जिससे समय और लागत दोनों बची।

▪️5. निष्कर्ष

छत्तीसगढ़ में अखबार वितरण और समाचार संचालन की चुनौतियाँ गंभीर हैं, लेकिन इन्हें स्थानीय समुदाय, तकनीक, और रचनात्मक रणनीतियों के सहयोग से हल किया जा सकता है। डिजिटल क्रांति ने नई चुनौतियाँ तो दी हैं, लेकिन साथ ही अवसर भी प्रदान किए हैं। अखबारों को अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए स्थानीय खबरों पर ध्यान देना होगा, पाठकों की रुचि को समझना होगा, और डिजिटल व प्रिंट माध्यमों का समन्वय करना होगा।

जैसा कि गुरुजी कहते हैं, "अखबार सिर्फ कागज नहीं, गाँव की आवाज़ है।" इस आवाज़ को बुलंद करने के लिए सामुदायिक भागीदारी, तकनीकी नवाचार, और पाठकों के साथ गहरा जुड़ाव जरूरी है। यदि ये कदम उठाए गए, तो छत्तीसगढ़ के गाँवों में न केवल अखबार पहुँचेगा, बल्कि उनकी कहानियाँ भी दुनिया तक जाएँगी।

संदर्भ:
-: अखबारों के वितरण में बाधा डालना सूचना के अधिकार का हनन
-: खबर लहरिया की कहानी, जो ग्रामीण क्षेत्रों में समाचार संचालन का उदाहरण है
क्षेत्रीय दौरे के आधार पर व्यक्तिगत अवलोकन

नोट: यह आलेख काल्पनिक किरदारों और वास्तविक समस्याओं का मिश्रण है, जो छत्तीसगढ़ के संदर्भ में समाचार पत्र उद्योग की स्थिति को दर्शाता है।

©® कंटेंट क्रिएटर : रामकृष्ण डोंगरे 

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Thursday, March 27, 2025

History Of Hindi Blogging : भारत में हिंदी ब्लॉगिंग का पूरा इतिहास, पहला ब्लॉग कौन सा था...


भारत में ब्लॉगिंग की शुरुआत का सटीक समय निर्धारित करना थोड़ा मुश्किल है, क्योंकि यह एक धीरे-धीरे विकसित होने वाली प्रक्रिया थी। वैश्विक स्तर पर ब्लॉगिंग की शुरुआत 1990 के दशक के अंत में हुई, जब 1997 में "वेबलॉग" शब्द का इस्तेमाल जोर्न बर्गर ने किया और 1999 में इसे "ब्लॉग" के रूप में छोटा किया गया। भारत में इंटरनेट का प्रसार 1990 के दशक के मध्य से शुरू हुआ, लेकिन ब्लॉगिंग ने यहाँ लोकप्रियता 2000 के दशक की शुरुआत में हासिल की। 

▪️भारत में ब्लॉगिंग की शुरुआत

भारत में ब्लॉगिंग का आरंभ मुख्य रूप से 2002-2003 के आसपास माना जा सकता है, जब इंटरनेट कनेक्टिविटी बढ़ने लगी और लोग व्यक्तिगत अनुभवों को ऑनलाइन साझा करने के लिए प्रेरित हुए। उस समय ज्यादातर ब्लॉग अंग्रेजी में थे, क्योंकि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं में तकनीकी समर्थन (जैसे यूनिकोड) सीमित था। हिंदी ब्लॉगिंग ने गति 2005-2007 के बीच पकड़ी, जब यूनिकोड समर्थन व्यापक रूप से उपलब्ध हुआ और लोग हिंदी में टाइपिंग के लिए सॉफ्टवेयर का उपयोग करने लगे। इस दौरान ब्लॉगर (Blogger) और ब्लॉगस्पॉट (Blogspot) जैसे मुफ्त प्लेटफॉर्म भारत में लोकप्रिय हो गए, क्योंकि ये आसानी से उपलब्ध थे और तकनीकी ज्ञान की कम आवश्यकता थी।

▪️ब्लॉगर या ब्लॉगस्पाट में बनी हिंदी की शुरुआती वेबसाइट्स

ब्लॉगर (जिसे पहले ब्लॉगस्पॉट के नाम से जाना जाता था) गूगल का एक उत्पाद है, जिसे 1999 में पायरा लैब्स ने शुरू किया और 2003 में गूगल ने इसे खरीद लिया। भारत में हिंदी ब्लॉगिंग के शुरुआती उदाहरणों में निम्नलिखित ब्लॉग्स का उल्लेख मिलता है:

▪️नारद (Naarad)  

यह हिंदी ब्लॉगिंग के इतिहास में एक महत्वपूर्ण नाम है। नारद एक ब्लॉग एग्रीगेटर (संग्रहकर्ता) था, जिसे 2004-2005 के आसपास शुरू किया गया। यह हिंदी ब्लॉग्स को एक मंच पर लाने का पहला प्रयास था। हालाँकि यह स्वयं एक ब्लॉग नहीं था, लेकिन इसने कई हिंदी ब्लॉगर्स को प्रेरित किया और उनकी पहचान बनाई।

▪️चिट्ठा विश्व (Chittha Vishwa)  

यह हिंदी ब्लॉगिंग के शुरुआती दौर का एक उल्लेखनीय ब्लॉग था, जो ब्लॉगस्पॉट पर बनाया गया। इसे 2005 के आसपास शुरू किया गया था और यह हिंदी में ब्लॉगिंग को बढ़ावा देने के लिए समर्पित था।

▪️कबाड़खाना (Kabaadkhana)  
साभार : इंडिया टुडे वेबसाइट 

यह एक और शुरुआती हिंदी ब्लॉग था, जिसे 2005 में अशोक पांडे ने शुरू किया था। यह ब्लॉगस्पॉट पर बनाया गया और साहित्यिक रचनाओं के लिए जाना जाता था।

▪️मोहल्ला (Mohalla)  

अविनाश दास द्वारा शुरू किया गया यह ब्लॉग भी 2005-2006 के आसपास ब्लॉगस्पॉट पर बनाया गया था। यह सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर केंद्रित था और हिंदी ब्लॉगिंग समुदाय में काफी लोकप्रिय हुआ।

▪️भड़ास (Bhadas)  

यशवंत सिंह द्वारा शुरू किया गया यह ब्लॉग 2007 के आसपास ब्लॉगस्पॉट पर बनाया गया था। यह पत्रकारिता और सामाजिक मुद्दों पर कटाक्ष के लिए प्रसिद्ध हुआ।

▪️हिंदी ब्लॉगिंग का विकास

हिंदी ब्लॉगिंग को बढ़ावा देने में ब्लॉगर/ब्लॉगस्पॉट की मुफ्त और सरल सुविधाओं का बड़ा योगदान रहा। शुरुआती ब्लॉग्स ज्यादातर व्यक्तिगत अनुभव, कविताएँ, साहित्य, और सामाजिक टिप्पणियों पर केंद्रित थे। 2007-2008 तक हिंदी ब्लॉगिंग का एक समुदाय बन चुका था, और कई ब्लॉगर्स ने इसे गंभीरता से लेना शुरू किया। इस दौरान "हिंदी ब्लॉगर्स मीट" जैसे आयोजन भी होने लगे, जो हिंदी ब्लॉगिंग के विस्तार का संकेत थे।

हालांकि, सटीक रूप से यह कहना मुश्किल है कि "पहला" हिंदी ब्लॉग कौन सा था, क्योंकि कई व्यक्तिगत प्रयास एक साथ शुरू हुए। ऊपर उल्लिखित ब्लॉग्स उन शुरुआती नामों में से हैं जो हिंदी ब्लॉगिंग के इतिहास में दर्ज हैं और ब्लॉगस्पॉट पर बनाए गए थे। ये ब्लॉग्स न केवल हिंदी में सामग्री प्रदान करने वाले पहले प्रयास थे, बल्कि इन्होंने आने वाले ब्लॉगर्स के लिए मार्ग भी प्रशस्त किया।

Sunday, March 9, 2025

भारत का "Indian YouTube Village" तुलसी गांव Tulsi Village : मीडिया ने जो बताया है, वो पूरा सच नहीं है : पार्ट:1

"समाचार को जल्दबाजी में लिखा गया इतिहास" कहा जाता है। इस वाक्य से तो आप सब परिचित होंगे। आज अचानक इसकी चर्चा क्यों ? तो चलिए इस पर विस्तार से बात करते हैं। आप सभी ने छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) के एक गांव तुलसी (TulsiVillage) का नाम जरूर सुना होगा या अपने मोबाइल पर इससे संबंधित कोई रील देखी होगी, कोई खबर पढ़ी होगी। तो चलिए हम बात शुरू करते हैं... 
तो आज हम चर्चा करने जा रहे हैं, यूट्यूबर विलेज (youtuber village) के नाम से मशहूर हो चुके छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले में स्थित ग्राम तुलसी की…. 

तो सबसे पहले आपको यहां बताना चाहेंगे कि तुलसी गांव समाचार पत्रों यानी मीडिया की सुर्खियां कब बना… 

तो पहली खबर छत्तीसगढ़ के स्थानीय न्यूज चैनल आईबीसी 24 ने 19 अगस्त, 2022 को चलाई थी. इस खबर के वेबसाइट पर अपलोड होते ही तमाम मीडिया ने भी इसको फॉलो किया। वर्ष 2023 में सबसे ज्यादा खबरें इस पर अपलोड हुई। सरकार ने अगस्त सितंबर 2023 यहां यूट्यूब का स्टूडियो बनाया। इसके चलते इस गांव की दूसरी बार खूब चर्चा होने लगी। तब हमने इस पर स्टोरी तैयार की थी। उस वक्त भी मेरी इच्छा इस गांव तक पहुंचने की थी, लेकिन किन्हीं कारणों से मैं पहुंच नहीं पाया। 
तो अब बात करते हैं आखिर पत्रकारिता को जब हम जल्दबाजी में लिखा गया इतिहास कहते हैं तो पत्रकार बिरादरी से कैसे गलती हो जाती है और जब एक बार वह गलती दर्ज हो जाती है तो वह लगातार कैसे दोहराई जाती। 

4, 000 की आबादी वाले 
गांव में 1,000 यूट्यूबर... 
हर घर में एक यूट्यूबर…. 
यह सुनने में तो बहुत अच्छा लगता है। इस तथ्य को किसने लिखा? और क्यों लिखा? इस बहस में नहीं पड़ना चाहता हूं। 

यूट्यूबर का अर्थ है, वह व्यक्ति जिसका स्वयं का यूट्यूब चैनल है। जिस पर वह वीडियो अपलोड करता है। किसी एक वीडियो में काम करने वाले तमाम लोग, एक्टिंग करने वाले लोग, एडिटिंग करने वाले लोग या पूरी टीम को हम यूट्यूबर नहीं कह सकते हैं। 
तकनीकी ज्ञान या तकनीकी समझ के अभाव में यह भूल किसी प्रारंभिक पत्रकार से हो गई और इसे किसी ने सुधारने का प्रयास भी नहीं किया। और हो सकता है कि उसकी मंशा गलत ना रही हो, लेकिन जब इसे लिखा गया था तो उस पत्रकार को भी अनुमान नहीं रहा होगा कि आगे क्या होगा। आज भी इसे दोहराया जा रहा है। 

हर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और वेबसाइट पर लिखा जा रहा है, ऐसा गांव, जहां हर घर में यूट्यूबर… जबकि सच्चाई कुछ और है। तो चलिए आपको रूबरू कराते हैं कि सच क्या है। 

इस गांव का सकारात्मक पक्ष यही है कि इस गांव में जब यूट्यूब क्रांति पहुंची तो इसने कई कलाकारों को नई ऊंचाइयां दी। नया प्लेटफार्म दिया और इस गांव में जन्म लेने वाली यूट्यूब क्रांति के जनक युवा साथी जय वर्मा और ज्ञानेंद्र शुक्ला जी से मेरी 2023 से ही लगातार बात हो रही है। 9 मार्च को प्रकाशित मेरी स्टोरी में आपको इस गांव का उजला पक्ष देखने को मिल रहा होगा। 
(उस दिन गांव में बीइंग छत्तीसगढ़िया यूट्यूब चैनल के क्रिएटर ज्ञानेंद्र शुक्ला जी के साथ) 

लेकिन आज आप जानेंगे तुलसी गांव की असली कहानी, जो कि अब तक मीडिया द्वारा बताई गई कहानी से अलग है। मीडिया और सोशल मीडिया पर आज भी जो कुछ चल रहा है, वो पूरा सच नहीं है। 

तो रायपुर से 45 किलोमीटर दूर स्थित इस गांव के लिए जब हम 26 फरवरी 2025 को सुबह दस बजे रवाना हुए तो रास्ते में विकास ही विकास नजर आ रहा था। रायपुर रेलवे स्टेशन से जब हम पंडरी होकर बलौदाबाजार रोड पर रवाना हुए तो हमें विधानसभा चौक तक पहुंचने के बाद ज्ञात हुआ कि हमें डीपीएस स्कूल, सारागांव वाली रोड से आगे बढ़ना है। 
तुलसी गांव कोई पहुंच विहीन गांव नहीं है। तुलसी रायपुर के एक बड़े इंडस्ट्रियल हब, तिल्दा इंडस्ट्रियल एरिया से लगा हुआ गांव है। तुलसी और तिल्दा के बीच एक से दो किलोमीटर का फासला होगा। तुलसी तक पहुंचने में हमें रास्ते में दोंदे खुर्द, मटिया, पचेड़ा, तर्रा आदि गांव मिले। मूरा गांव से लेफ्ट लेकर हमने तुलसी गांव का शॉर्टकट और संकरा रोड पकड़ा। आगे हमें बंगोली गांव, अडानी का पावर प्लांट, चिचोली और छतौड़ आदि गांव मिले। मुरा गांव पूर्व आईएएस गणेश शंकर मिश्रा का गांव है। उनके पिता लखन लाल मिश्रा स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। गांव में उनकी प्रतिमा भी लगी हुई है। 
तुलसी तक हम लोग पहुंचे। रास्ते में जैसा ऊपर मैंने बताया कि अडानी का पावर प्लांट, कई और फैक्ट्री और राइस मिल के हमें दर्शन हो गए। जब तक मैं तुलसी नहीं पहुंचा था, मेरे मन में यही कल्पना थी कि शायद तुलसी गांव रोड से अंदर और चमक दमक से दूर होगा।

 24 फरवरी 2025 को सुबह लगभग 11 बजे वहां पहुंचने पर सच्चाई सामने आई। तुलसी गांव सुशिक्षित और संपन्न लोगों का गांव है। जैसा कि आसपास इंडस्ट्रियल एरिया है तो वहां के कर्मचारी भी बड़ी संख्या भी तुलसी और तिल्दा में निवास करते हैं। 
तुलसी में कॉलेज भी है और आईटीआई भी है। जब हम एक स्टोरी को कवर करने जाते हैं। ग्राउंड रिपोर्ट करने जाते हैं तो हमें अपने सोर्स को लाइनअप करके रखना पड़ता है। अब हम इस कहानी के असली किरदारों और अन्य लोगों की बात करते हैं। जैसा कि पूर्व में बता चुका हूं कि तुलसी गांव में यूट्यूब क्रांति के जनक जय वर्मा जी और ज्ञानेंद्र शुक्ला जी से मैं लगातार बातचीत कर रहा था। उन्होंने मुझे इस ओर इशारा भी किया था कि तुलसी गांव को मीडिया ने “पीपली लाइव” में तब्दील कर दिया था। तब से गांव के लोग मीडिया से दूरी बनाने लगे हैं और वे बात करने के लिए आगे नहीं आएंगे। 

लेकिन क्योंकि हमें असाइनमेंट मिला था, इसलिए हमारा ग्राउंड पर जाना आवश्यक था। जब हम गांव में दाखिल हो गए तो हम सीधे पंचायत भवन पहुंचे । 

दूसरी कड़ी में आपको पूरी जानकारी…. इंतजार कीजिएगा जरूर। तब तक के लिए अलविदा….

रामकृष्ण डोंगरे
वरिष्ठ पत्रकार और ब्लॉगर 

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