Saturday, February 19, 2022

भागवत गीता सुनाने वाली अनोखी किताब, जानिए सबकुछ इसके बारे में || talking bhagavad gita

दुनिया की पहली बोलती Talking भागवत गीता... * (संपर्क : 8103689065 वाट्सएप & फोन)*


भागवत गीता... 

*अब सिर्फ पढ़े नहीं बल्कि सुने भी...*

11,200 रुपये मूल्य की ये श्रीमद भागवत गीता (Talking Bhagavad Gita with Wisdom Flute) बोलने वाली बांसुरी यानी इलेक्ट्रानिक डिवाइस के साथ आती है। 


चिप और सेंसर युक्त इस भागवत में कमाल की टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया है। ये भागवत गीता संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी के अलावा *मराठी, गुजराती, उड़िया, बांग्ला, तमिल, तेलगू और कन्नड़ समेत 14 भाषाओं में आपको भागवत कथा सुनाती है।* इसमें कई और फीचर है। भगवान श्रीकृष्ण के 108 भजन है। इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस या Wisdom Flute 30 मिनट की चार्जिंग के बाद 8 घंटे तक चलता है। 


*विश्व की अनोखी व पहली इस श्रीमद भागवत कथा को प्राप्त करने के लिए नाम और मोबाइल नंबर लिखकर 8103689065 पर वाट्सएप कीजिए या कॉल करें।*


इस भागवत गीता को कर्मयोगी स्व. कल्याण देव वाधवा की प्रेरणा से डीएमपी डिजिटल टेक्नोलॉजी प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली ने तैयार किया है। सेफ शॉप कंपनी की तरफ से इसकी मार्केटिंग की जा रही है।


*डिजिटल भागवत गीता* 

*बोलती भागवत गीता...* 

*आखिर है क्या??*


_पूरी पोस्ट अंत तक जरूर पढ़ें_


*हम आज भारत की बात करें तो हर घर में भागवत गीता है लेकिन ज्ञान की बात कही जाए तो सिर्फ 1% लोगों को ही इसका ज्ञान होगा l*


डिजिटल भागवत गीता उन सभी के लिए वरदान है---

जिनके पास समय नहीं है l

जो देख नहीं सकते l

जो पढ़ नहीं सकते l

अपने माता-पिता के लिए सुन्दर उपहार l

अपने बढ़ते बच्चों के विकास में सहायक l

*क्योंकि आप इसे सुन सकते हैं*

*14 भाषाओं में सुमधुर संगीत के साथ...*

यह एक ग्रंथ नहीं कर्म ग्रंथ है, 

जिसकी आवश्यकता आज की दौड़ भाग वाली जिंदगी में बहुत है l 


तो अपने घर लाएं 

*दुनिया की पहली*

*बोलने वाली* भागवत गीता.... 


💐💐  

_दुनिया में पहली बार भागवत गीता को वैज्ञानिक तरीके से बनाया गया है. इलेक्ट्रानिक चिप यानी सेंसर युक्त यह किताब *हिंदी, अंग्रेजी, संस्कृत, मराठी, गुजराती, उडिया, बंगाली, तमिल, तेलुगू, कन्नड़* समेत देश-विदेश की 14 भाषाओं में बोलती है।_


सम्पर्क करें :- 


*अधिक जानकारी या श्रीमद् भागवत गीता ग्रंथ को आर्डर करने के लिए कृपया फोन या वाट्सएप करें *8103689065*


*बोलने वाली भागवत गीता...*

 #Talking #bhagavad #gita 


क्या आप अपने बच्चों को अनूठा गिफ्ट देना चाहते हैं? 

क्या आप अपने माता पिता को ऐसा गिफ्ट देना चाहते हैं जो उन्हें धर्म से जोड़ें, गीता का ज्ञान उन तक पहुंचाएं,


वह भी सिर्फ बोलकर।।। 

तो *बोलती भागवत गीता* अपने घर लाइए... 


ऐसा धर्म ग्रंथ जो हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी के अलावा तमाम भारतीय भाषाओं में आपको भागवत गीता सुनाता है।


*अधिक जानकारी के लिए 8103689065 पर कॉल या वाट्सएप पर संपर्क कीजिए* 




Friday, January 14, 2022

प्रज्ञा प्रसाद के वॉल से : कितना जरूरी है पैसा?

"रिश्ते-नाते सब हों, लेकिन भूख से बिलबिलाते या फिर अभावों में जीते, छोटी-छोटी खुशियों के लिए तरसते क्या हम प्यार कर सकते हैं? बच्चे को प्यार करें और उसे खराब स्थिति में देखें तो क्या अच्छा लगेगा? मां-बाप को ही प्यार करें और उनका टूटा चश्मा बनाने के लिए पैसे न हों, तो अच्छा लगेगा?"

अक्सर प्यार, पैसे और रिश्तों की तुलना होते हुए आपने सुना होगा. अधिकतर लोगों का कहना है कि रिश्तों और प्यार से बढ़कर कुछ भी नहीं होता है, लेकिन कभी-कभी मेरे मन में कई ख्याल आते हैं, तो सोचा कि आपसे भी इन्हें बांटूं और आपकी भी राय इस पर जानूं... 

दरअसल परिवार की शुरुआत होती है विवाह नाम की संस्था से, क्योंकि विवाह होगा, तभी संतान होगी, फिर वही पति-पत्नी माता-पिता बन जाएंगे और फिर जब उनके बच्चे बड़े होंगे तब वे अपना परिवार कहेंगे अपने माता-पिता, भाई-बहन, पत्नी/पति और फिर उनकी खुद की संतान को...

अब आते हैं प्यार और पैसे पर.. हम जैसे ही जन्म लेते हैं वैसे ही हमें लगती है भूख, जिसके लिए चाहिए दूध तो वो दूध आता है पैसे से... क्योंकि मां की छाती में भी दूध तभी उतरता है जब उसे पौष्टिक या फिर चाहे जैसा भी आहार मिला हो, तो वो भोजन भी आता है पैसे से... इससे भी पहले जब महिला गर्भवती होती है, तो सबसे पहले उसे डॉक्टर को दिखाने की जरूरत होती है और डॉक्टर को देनी पड़ती है फीस .. फीस मतलब पैसा.. अगर आप सरकारी अस्पताल में निःशुल्क इलाज कराने भी जाएं, तो ऑटो या रिक्शा करने के लिए चाहिए होगा पैसा... दवाई लाने के लिए चाहिए होगा पैसा.. 9 महीने महिला को अच्छी देखभाल यानि अच्छा आहार मिले, तो उसके लिए भी चाहिए पैसा. जब बच्चे के जन्म का समय आया, तो फिर अस्पताल में भर्ती होने के लिए चाहिए पैसा.. बच्चा पैदा हो गया, उसे पहनाने के लिए कपड़ा चाहिए, उसकी दवाई चाहिए, टीकाकरण चाहिए, तेल-पाउडर शैंपू चाहिए, इन सबके लिए चाहिए पैसा.. मां स्वस्थ हो पाए, तो उसे अच्छा खिलाने के लिए, कंफर्ट फील कराने के लिए चाहिए पैसा.. बच्चे को जब भूख लगती है, उस वक्त मां का अथाह प्रेम भी सिर्फ थोड़ी देर ही उसे चुप करा सकता है.. उसे सबसे पहले चाहिए दूध.. इसका मतलब कि जब पेट भरा होता है, जरूरतें पूरी रहती हैं, तभी आप प्रेम को भी महसूस कर पाते हैं. भूख से तड़पने पर केवल खाना चाहिए होता है, उस वक्त न तो किसी का प्रेम अच्छा लगता है और न तो किसी की बातें...

जब बच्चा थोड़ा सा बड़ा हुआ तो उसे पढ़ाने के लिए चाहिए पैसा.. स्कूल भेजने के लिए चाहिए पैसा.. किताब-कॉपी खरीदने के लिए चाहिए पैसा... उसके खिलौने खरीदने के लिए चाहिए पैसा... किसी अलग तरह के फील्ड में करियर बनाना चाहता हो तो उसकी कोचिंग के लिए चाहिए पैसा.. बच्चा जब बड़ा होता है और जब नौकरी के लिए फॉर्म भरना हो तो चाहिए पैसा, जॉब इंटरव्यू के लिए जाना हो तो पैसा.. वर्क फ्रॉम होम करना हो, तो लैपटॉप के लिए चाहिए पैसा.. बात करने के लिए मोबाइल चाहिए वो आएगा पैसे से...

जब बच्चे की शादी करनी हो, तो लड़का या लड़की ढूंढने के लिए या फिर बात-वात चलाने के लिए इधर-उधर जाना पड़ता है, उसके लिए चाहिए पैसा.. शादी तय हो गई, तो शादी करवाने के लिए चाहिए पैसा.. गृहस्थी शुरू कराने के लिए जो सामान देते हैं उसके लिए चाहिए पैसा.. भोज-भात कराने के लिए चाहिए पैसा.. बेहतर जिंदगी के लिए भी चाहिए पैसा... माता-पिता बुजुर्ग हो जाते हैं उनकी देखभाल, उनके भोजन-दवा के लिए भी चाहिए पैसा... 

रिश्ते-नाते सब हों, लेकिन भूख से बिलबिलाते या फिर अभावों में जीते, छोटी-छोटी खुशियों के लिए तरसते क्या हम प्यार कर सकते हैं? बच्चे को प्यार करें और उसे खराब स्थिति में देखें तो क्या अच्छा लगेगा? मां-बाप को ही प्यार करें और उनका टूटा चश्मा बनाने के लिए पैसे न हों, तो अच्छा लगेगा? 

हर मां-बाप ये क्यों सोचते हैं कि बच्चे का करियर अच्छा बन जाए.. अच्छा करियर मतलब जिसमें अच्छे पैसे मिलते हों.... अच्छा खाए स्वस्थ रहे.. अच्छा खाना दूध-फल अनाज सबके लिए चाहिए पैसा.... 

न्यूज की हेडलाइन बनती है-

रिक्शेवाले का बेटा बना कलेक्टर, 
खुद से लिखी अपनी तकदीर
या 
चौकीदार की बेटी जाएगी IIT, 
गरीबी को मात देकर बनाया भविष्य

ये हेडलाइन कहां बनती है...

रिक्शेवाले के बेटे ने पाए बहुत अच्छे संस्कार, 
कभी नहीं बोलता है झूठ

अंबानी के बेटे ने पकड़ी 
ईमानदारी की राह, सादा जीवन उच्च विचार
-----
यहां भी अच्छा करियर, सुनहरे भविष्य के पीछे का मतलब पैसा और उसके साथ मिलने वाला पावर ही है... 
अरे, लड़की की तो किस्मत ही चमक गई.. गरीब की लड़की इतने अच्छे (अमीर) घर में चली गई... 

यानी गरीब की लड़की की किस्मत भी तभी चमकती हुई मानी जाती है, जब अच्छा कमाने-खाने वाला लड़का मिल जाए...   

रिश्ते संतोष देते हैं, प्यार खुशी देता है, लेकिन उसे एंजॉय तभी किया जा सकता है, जब पैसे से बुनियादी जरूरतें (ठीकठाक भोजन, छोटा मगर अच्छा आवास, करियर ओरिएंटेड शिक्षा, ढंग के कपड़े और सुविधासहित चिकित्सा) पूरी हो चुकी हों... 

मैं खुद को तब रिलैक्स फील करती हूं, जब खा-पीकर, नहा-धोकर बच्चे को बढ़िया ऑनलाइन क्लास करते हुए देखती हूं, तब लगता है अब शांति से बैठती हूं.. लेकिन खा-पीकर यानी अनाज आया पैसे से, नहा-धोकर यानी साबुन-शैंपू आया पैसे से यहां तक कि वॉटर भी आया पैसे से, क्योंकि कॉलोनी मेंटेनेंस में इन्क्लूडेड है... ऑनलाइन क्लास यानी बच्ची के पास मोबाइल है, जो आया है पैसे से.. इतना सबकुछ हो जाने के बाद अब रिलैक्स हो सकी... 

कहीं घूमने जाना है तो चाहिए पैसा (जगह सस्ती-महंगी हो सकती है), किसी के यहां शादी-छठी, बर्थडे में भी जाना हो तो चाहिए पैसा, रिश्तेदारों के यहां जाना हो तब भी चाहिए पैसा.. 

आखिर में मरने के बाद कफन के लिए भी चाहिए पैसा... श्मशान ले जाने के लिए जो चचरी बनेगी उसके लिए भी चाहिए पैसा... जलाने के लिए चाहिए लकड़ी वो आएगा पैसे से.. पंडित क्रियाकर्म कराएगा... उसके लिए लेगा दक्षिणा यानी पैसा....

अब पता नहीं कि पैसा महत्वपूर्ण है या इंसान.. रिश्ता या प्रेम... अगर आपलोग कुछ प्रकाश डाल सकें तो बताएं... 

बाकी मकर संक्रांति की बहुत-बहुत शुभकामनाएं... 
और हां, जो दही-चूड़ा, तिल-लाई, खिचड़ी जो भी खाई हूं, 
उन सबमें भी लगा है पैसा...

(ये आलेख वरिष्ठ पत्रकार प्रज्ञा प्रसाद के फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है। प्रज्ञा मूलतः पूर्णिया बिहार की रहने वाली है। वे डेढ़ दशक से ज्यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय है। दूरदर्शन, ईटीवी, ईटीवीभारत, आईबीसी24 में अपनी सेवाएं दे चुकी है। फिलहाल रायपुर में न्यूज24 मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ के साथ जुड़ी हुई है।) 

Thursday, December 30, 2021

मेरी कविता : हिंदू राष्ट्र

हर कोई
हिंदू राष्ट्र बनाने में जुटा है... 
पूरी दुनिया को
हिंदू राष्ट्र बना दो। 
(फोटो प्रतीकात्मक) 

मिटा दो
पूरी दुनिया को।
फिर अपने हाथ से बना दो।

बना सकते हो?

ये देश
ये दुनिया
आज जिस रूप में है
उसे बनने में
सदियां लगी है।

... और सदियों में
कोई बनाता है।

तुम चाहकर भी
पलभर में कुछ नहीं बना सकते. 
इसलिए इस मुगालते में मत रहो।
हिंदू राष्ट्र, हिंदू राष्ट्र, हिंदू राष्ट्र... 

भूल जाओ...

©® रामकृष्ण डोंगरे तृष्णा
रचना काल : 30 दिसंबर 2021, रायपुर

#डोंगरे_की_डायरी #रचना_डायरी #अधूरी_कविता

Tuesday, December 21, 2021

सेकंड हैंड का जमाना गया, अब सबकुछ न्यू... न्यू...चाहिए

आज (21 दिसंबर 2021) मैंने साढ़े 4 साल के बेटे दक्ष के लिए 
नई साइकिल खरीदी, ₹3500 में...

अचानक अपने बचपन के दिन याद आ गए...। 

मिडिल क्लास फैमिली के लोग हमेशा सेकंड हैंड चीजें ही इस्तेमाल करते थे। मेरे पिताजी ने साल 1993-94 के आसपास सेकंड हैंड मोपेड लूना खरीदी थी ₹4000 में। इससे पहले जब मैं छठवीं क्लास में पहुंचा तो ₹250 में सेकंड हैंड साइकिल खरीदी थी. 

.... सिलसिला यूं ही चलता रहा.

जब मैं कॉलेज पढ़ने के लिए छिंदवाड़ा पहुंचा तो 1998 में ₹800 में हर्कुलस साइकिल खरीदी थी. जो मेरे साथ 2004 में भोपाल तक भी पहुंची। भोपाल में जॉब के दौरान मैं साइकिल से ही रिपोर्टिंग करता था। जब दिल्ली के लिए निकला तो मैंने उस साइकिल को वापस छिंदवाड़ा लाकर अपने भांजे को दे दिया। फिर गांव में भतीजे के पास आ गई।

एक वक्त वो था और आज का दौर है साल 2021...। 

बच्चे के लिए जब साइकिल खरीदने की बारी आई तो मैंने सेकंड हैंड साइकिल भी सर्च की। मुझे 1000 से लेकर 2000 रुपये तक में सेकंड हैंड साइकिल का ऑप्शन मिल रहा था। लेकिन मैंने न्यू साइकिल खरीदने का ही फैसला किया। क्योंकि आज का दौर ही यही है। बच्चे भी बोलने लगते हैं कि - पापा यह साइकिल पुरानी है, मुझे नई वाली चाहिए। 

... और जब हम छोटे थे तब हमारी ऐसी कोई डिमांड नहीं होती थी। बस हमें वो चीज मिल जाए, हम उसी में खुश हो जाते थे। चाहे कपड़े हो या साइकिल हो या कुछ और हो। खैर...। यह बदलाव भी आना था। 

... लेकिन इसी के साथ मिडिल क्लास फैमिली का बजट बिगड़ गया है. हर चीज नई खरीदना है। और ज्यादा से ज्यादा खरीदना है। मोबाइल भी नया खरीदना है। गाड़ियां नई खरीदना है। और कपड़े उनका तो पूछिए मत... 

पहले संयुक्त परिवार होते थे, सब भाई बहन पुराने कपड़े पहनते थे। आज की सिंगल फैमिली में ऐसा कोई ऑप्शन भी नहीं बचा है। इसलिए आजकल सभी को सब कुछ न्यू... न्यू... ही चाहिए।

#डोंगरे_की_डायरी #दक्ष_डायरी #सेकंडहैंड_वाला_जमाना #साइकिल #90skids #90कादशक

Monday, December 6, 2021

अच्छे आदमी

अच्छे आदमी
और बुरे आदमी के बीच
जरा-सा अंतर होता है।
मामूली फर्क होता है।

मां-बाप की जरा-सी 
लापरवाही, उनके बच्चों को
अच्छे आदमी से 
बुरे आदमी में बदल देती है।

इसलिए बच्चों को 
अपना दोस्त बनाएं, 
खुलकर बात करें।
उनके मन में उठने वाले
सभी सवालों का 
उन्हें जवाब दीजिए।

बच्चों को गलत दिशा में
जाने से रोकिए।
वर्ना किसी इंजीनियर के लादेन 
या किसी युवा के गोडसे 
बनने में देर नहीं लगती। 

©® रामकृष्ण डोंगरे तृष्णा 
रचना समय और स्थान - 1 सितंबर, 2021, रायपुर 

Friday, December 3, 2021

DNE FB Post : ट्रेनी से डीएनई तक का सफर

दैनिक भास्कर रायपुर से पहले मेरा सबसे लंबा समय हिंदी दैनिक अमर उजाला नोएडा में बीता। माखनलाल पत्रकारिता यूनिवर्सिटी भोपाल से 2005 साथ में एमजे की डिग्री कंप्लीट होने के बाद हमारा कैंपस अमर उजाला में हुआ था। मैंने 7 मई 2007 को अमर उजाला, नोएडा ज्वाइन किया था। प्रताप सोमवंशी सर ने हमारा कैंपस भोपाल आकर लिया था। जॉइनिंग के दिन हमारा इंटरव्यू ग्रुप एडिटर श्री शशि शेखर जी ने लिया था। 

उस दौरान काफी सारे क्वेश्चन पूछे गए थे. मेरा एक्सपीरियंस जानने के बाद मैंने उनसे कहा कि आप मुझे Sub Editor ज्वाइन करवाएं तो उन्होंने इंकार कर दिया था. और मुझे नए सिरे से बतौर ट्रेनी यहां से नई शुरुआत करनी पड़ी। हालांकि इससे पहले मैं करीब आधा दर्जन संस्थानों में काम कर चुका था। यानी पत्रकारिता में अलग अलग फील्ड की रिपोर्टिंग और डेस्क पर काम करने का लगभग 3 साल का अनुभव मुझे हो चुका था। लेकिन इन संस्थानों में मेरा जॉब पार्ट टाइम जैसा ही रहा। क्योंकि मैं पढ़ाई के साथ ये काम कर रहा था। 

साल 2003 में लोकमत समाचार पत्र छिंदवाड़ा से शुरुआत रिपोर्टिंग से हुई। इसके बाद 2004 में स्वदेश समाचार पत्र भोपाल में रिपोर्टिंग के साथ डेस्क की जिम्मेदारी मिली। बीच में कुछ वक्त "शब्द शिल्पियों के आसपास" में काम किया। इसके बाद 2005 में सांध्य दैनिक अग्निबाण में आर्ट एंड कल्चर रिपोर्टर के रूप में काम किया। साल 2006 में राज्य की नई दुनिया में आर्ट एंड कल्चर रिपोर्टर और डेस्क की जिम्मेदारी निभाई। 

*अब बात विस्तार से करते हैं अमर उजाला नोएडा की...*

यहां पर हमने बतौर ट्रेनी ज्वाइन किया. सबसे पहले मुझे बिजनेस  डेस्क पर रखा गया। इसके बाद जनरल डेस्क पर मेरी नियुक्ति की गई। जहां मुझे सबसे ज्यादा समय तक काम करने का मौका मिला। 

अमर उजाला का हेड ऑफिस नोएडा में था। इसीलिए मुझे उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर आदि राज्यों के एडिशन से कोडिनेट करना पड़ता था। हमारी टीम में दो से चार साथी ही थे। लेकिन सबसे शुरुआत से जुड़े होने की वजह कई बार बॉस की अनुपस्थिति में मुझे ही जिम्मेदारी संभालनी पढ़ती थी। इसी दौरान श्री राम शॉ जी जनरल डेस्क में शामिल हुए थे। वे पेज वन पर भी काम करते थे। लेकिन बॉस के नहीं रहने पर वे मेरे साथ भी होते थे। 

*मेरे बॉस चूंकि DNE थे. और मैं ट्रेनी था तो वे (श्री राम शॉ) मुझे कहते थे कि तुमको तो ट्रेनी नहीं DNE होना चाहिए... क्योंकि आप ट्रेनी होकर डीएनई का काम करते हो...खैर...।*

जनरल डेस्क पर मेरे सहयोगी थे - चंद्रशेखर राय जी, धर्मनाथ प्रसाद जी, मनीष मिश्रा जी, हरिशंकर त्रिपाठी जी, मनीष, दीपक कुमार जी आदि। और बॉस थे राधारमण जी। 

अमर उजाला नोएडा में मुझे ग्रुप एडिटर श्री शशि शेखर जी, श्री देवप्रिय अवस्थी सर, संजय पांडेय जी, श्री निशीथ जोशी जी, श्री शंभूनाथ शुक्ला जी, श्री यशवंत व्यास जी, श्री राधारमण सर, श्री अरुण आदित्य सर, श्रीचंद सर, श्री भूपेन जी, श्री आलोक चंद्र जी आदि का सानिध्य मिला। यहां मैंने बतौर ट्रेनी ज्वाइन किया. उसके बाद सब एडिटर और सीनियर सब एडिटर बना।

पत्रकारिता में मेरे पहले मार्गदर्शक बड़े भैया जगदीश पवार जी हैं, जिन्होंने मुझे इस राह पर चलने के लिए प्रेरित किया. लोकमत समाचार छिंदवाड़ा में श्री धर्मेंद्र जायसवाल के नेतृत्व में बतौर ट्रेनी काम करने के दौरान ही मुझे छिंदवाड़ा दैनिक भास्कर के लिए ऑफर मिला. मुझे परासिया ब्लॉक में ब्यूरो चीफ की जिम्मेदारी दी जा रही थी। लेकिन चूंकि में MA फाइनल ईयर में था. मैंने इस ऑफर को अस्वीकार कर दिया. उसके बाद मुझे दैनिक भास्कर से जुड़ने में कई साल लग गए। जब मैं भोपाल पहुंचा तो ज्यादा किसी से पहचान ना होने के चलते मैंने एक के बाद एक सारे समाचार पत्रों में अपना रिज्यूमे दिया। जहां मुझे स्वदेश समाचार पत्र में तत्काल ही जॉब मिल गई। 3 साल भोपाल में रहने के दौरान मेरा सभी समाचार पत्र के साथियों के साथ परिचय हो गया था।

भोपाल में अलग-अलग संस्थानों में काम के दौरान मुझे श्री अवधेश बजाज जी, अजय बोकिल जी, विनय उपाध्याय जी, पंकज शुक्ला जी, गौरव चतुर्वेदी जी, गीत दीक्षित जी के साथ काम करने और सीखने का मौका मिला। 

भोपाल में मेरे कई साथ रहे… जैसे श्री संजय पांडेय जी, हरीश बाबू, जितेंद्र सूर्यवंशी, निश्चय कुमार बोनिया, जुबैर कुरैशी, खान आशु भाई आदि। श्री संजय पांडे जी, जो इन दिनों जमशेदपुर दैनिक भास्कर में बतौर स्थानीय संपादक कार्यरत है. वे मेरे बड़े भाई और मार्गदर्शक है। दैनिक भास्कर रायपुर में मुझे ज्वाइन कराने में उनका बड़ा योगदान रहा है। 

आज जबकि में प्रमोट हुआ हूं तो यह खुशी आप सभी के साथ शेयर कर रहा हूं। आप सभी मेरी इस सफलता में सहभागी रहे है।

DNE - Dis (this) is Not the End...

this is just the beginning

अभी तो शुरुआत है…

तो सफलता का यह सिलसिला यूं ही चलता रहे. और आप सभी का स्नेह, आशीर्वाद मुझे मिलता रहे. यही कामना करता हूं… इसी के साथ उम्मीद करता हूं कि और भी नए दोस्त और सीनियर साथी मेरे इस कारवां का हिस्सा बनेंगे…

#DNE_POST #Facebook #डोंगरे_की_डायरी #फेसबुक_पोस्ट 


Thursday, November 4, 2021

कोरोना महामारी के बीच 'एक दीया उम्मीद का...'


*दीयों के बिना दीपावली का त्योहार अधूरा सा लगता है,*
*यहीं संदेश देने के लिए आयुषी ने बनाई अनोखी रंगोली*

रायपुर। कोरोना के इस दौर में एक तरफ जहां दीपावली पर हर तरफ पटाखों का शोर है। वहीं राजधानी रायपुर की *भावना नगर कॉलोनी में रेसिडेंशियल सोसाइटी साईं सिमरन* की एक रंगोली चर्चा का विषय बनी हुई है। इसमें कोरोना महामारी से पनपते मायूसी भरे माहौल में हर हाथ में उम्मीद का एक दीया लेकर चलने का संदेश दिया जा रहा है। साथ ही दीयों के बगैर दीपावली अधूरा सी है। यह संदेश भी बताया जा रहा है। 

*सीए की पढ़ाई कर रही 20 वर्षीय आयुषी बोधवानी* ने अलादीन का चिराग कांसेप्ट पर इस रंगोली को 3 घंटे में तैयार किया है। इसमें दिखाया गया है कि दीये के अंदर से एक महिला बाहर निकलती है और दीया जलाती है। ठीक उसी तरह से जैसे अलादीन के चिराग से अलादीन बाहर निकलता है। 

इस रंगोली का एक कॉन्सेप्ट ये है कि हमारी भारतीय परंपरा में किसी भी त्योहार में रोशनी के लिए, उजियारे के लिए दीया जलाकर उत्सव मनाते हैं। दीयों की रोशनी के बिना दीपावली भी अधूरी सी रहती है। इसीलिए एक महिला और दीये को इसमें दिखाया गया है। 

आयुषी बोधवानी ने बताया कि मैंने रंगोली में एक महिला को दिखाने के बारे में सोचा था। थोड़ा और सोचने पर मुझे लगा कि कोई अलादीन का चिराग जैसा कुछ इसमें हो, जो कोरोना महामारी से पैदा हुई हमारी परेशानियों को अपने साथ ले जाए।और अचानक इस रंगोली का कांसेप्ट बना। इसमें एक अलादीन का चिराग जैसे दीये से एक महिला निकलती है, जिसके हाथ में एक दीया है। कोरोना महामारी की वजह से हमारे आसपास पनपते मायूसी भरे माहौल को दूर करने के लिए 'उम्मीद का एक दीया' हर किसी के हाथ में होना चाहिए। ऐसा संदेश भी इस रंगोली से निकलकर आता है।

भले ही आधुनिकता के चलन में दीयों का स्थान रंग-बिरंगी झालरों ने ले लिया हो। तेज आवाज वाले पटाखे ही दीपावली की पहचान बन गए हो लेकिन इसके बावजूद दीयों का क्रेज आज भी कम नहीं हुआ है।